संपादकीय
28 फरवरी 2012
हरियाणा में बंधुवा बनाकर काम पर लगाए गए छत्तीसगढ़ी मजदूरों की रिहाई को लेकर कल ही रायपुर से सरकार ने हरियाणा से बात की है। इसे एक दिन भी पूरा नहीं हुआ है कि उत्तरप्रदेश से खबर आई है कि छत्तीसगढ़ के सरगुजा सीमा तरफ की उप्र की एक अवैध खदान के ऊपर का पूरा पहाड़ धसक जाने से उसमें करीब पचास लोगों के मरने की आशंका है और दर्जन भर लाशें मिल चुकी हैं, इस पूरे काम में इस इलाके में छत्तीसगढ़ के हजारों मजदूरों के लगे होने की खबर है। कोई महीना ऐसा नहीं गुजरता जब देश के किसी न किसी इलाके से मजदूरों के बंधुवा होने, या किसी काम के दौरान मारे जाने की ऐसी खबर न आती हो जिसमें कि छत्तीसगढ़ के मजदूरों का जिक्र हो।
देश के बहुत से हिस्सों से अधिक या बेहतर संभावनाओं वाले दूसरे हिस्सों की तरफ मजदूरों की आवाजाही लगी ही रहती है। और यह बात सिर्फ हिंदुस्तान की नहीं है, अमरीका में पड़ोस के देश मैक्सिको से रोजाना दसियों हजार मजदूर सरहद पार करके आते हैं और अमरीका को सस्ती मजदूरी देकर, अपने लिए मैक्सिको से अधिक रोजी जुटाकर लौटते हैं। हम इसे किसी किस्म का पलायन नहीं कहते। छत्तीसगढ़ में सरकारी और राजनीतिक जुबान जिसे छत्तीसगढ़ी मजदूरों का पलायन कहती है वह तो दरअसल जिंदगी की लड़ाई का एक ऐसा सफर है जिसमें लोग दिक्कतें और खतरे झेलते हुए दूर-दूर तक जाते हैं और तरह-तरह के शोषण को झेलते हुए भी अपने परिवार और बच्चों के साथ वहां रात-दिन खून-पसीना एक करते हैं। वे इसे पलायन कहने वाले लोग जो कि सत्ता पर काबिज रहते हैं, उनको अपनी भाषा सुधारने की जरूरत है। जिन लोगों पर गरीबों को काम देने, उनके लिए बेहतर संभावनाएं बढ़ाते चलने की जिम्मेदारी है, यह उनका पलायन है, अपनी जिम्मेदारियों से। लेकिन छत्तीसगढ़ में सरकार से लेकर विधानसभा तक इसे मजदूरों का पलायन कहा जाता है।
हर बरस लाखों मजदूर इस राज्य से दूसरे राज्यों में जाते ही हैं। हो सकता है कि उनके गांवों के आसपास जो काम खेत-कारखानों या सरकार की योजनाओं में मिलते हैं, उनसे काफी अधिक मजदूरी उनको दूसरे प्रदेशों में ठेके की मजदूरी की शक्ल में मिलती हो। वहां जाकर पूरा परिवार रात-दिन काम करता है और कुछ पैसे बचाकर अपने घर लौटता है। लेकिन यहां हर बरस हम ऐसे बयान छापते हैं कि जाते हुए मजदूरों को रोककर स्टेशनों पर पुलिस किस तरह की वसूली करती है। होना तो यह चाहिए कि राज्य सरकार किसी अच्छे संस्थान के लोगों को बाहर से लाकर यह शोध करने का जिम्मा दे कि राज्य के किस-किस इलाकों से किन वजहों से लोग हर बरस मजदूरी के लिए बाहर जाते हैं। इन इलाकों में उनके लिए अगले बरस तक बेहतर इंतजाम करना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन आधी सदी से 'पलायनÓ जैसी गाली देते हुए रिपोर्ट छपती चली जाती है, और न भोपाल के वक्त हालत सुधरी, न रायपुर के वक्त।
छत्तीसगढ़ सरकार को बिना देर किए हुए राज्य के ऐसे इलाकों का अध्ययन करवाना चाहिए। लेकिन इसके साथ-साथ यह भी जरूरी है कि देश के नक्शे में ऐसे इलाकों को लगातार दर्ज करके रखा जाए जहां पर कि छत्तीसगढ़ से गए हुए मजदूर काम पर रहते हैं। इनकी शिनाख्त बहुत मुश्किल नहीं है क्योंकि इनके गांव में यह पता होता है और ऐसे लोगों के फोन नंबर जुटाकर सरकार लगातार इनसे संपर्क भी कर सकती है ताकि उनकी किसी परेशानी के वक्त यहां की सरकार उस राज्य से तुरंत बात कर सके। हमारा अनुभव यह भी कहता है कि सरकार के अपने ढांचे के लोग अपने काम के मिजाज के चलते संवेदनशीलता खो बैठते हैं। ऐसे में राज्य के ऐसे जिलों में काम करने वाले कुछ भरोसेमंद जनसंगठनों को ऐसी रिपोर्ट और संपर्क का काम दिया जा सकता है ताकि बाहर गए हुए छत्तीसगढ़ी मजदूरों के हाल की खबर यहां होती रहे। इस राज्य ने अपने अस्तित्व में आने के बाद से अपने ढांचे में बहुत क्रांकीट ढलते देखा है, लेकिन राज्य के मजदूरों के हुनर में खूबियां जोड़कर उनको सबसे सस्ती मजदूरी से बेहतर किसी काम के लायक बनाने का मानवीय ढांचा बेहतर नहीं बन पाया है। इस बारे में कोशिश की जानी चाहिए और यहां के मानव संसाधन में महत्व जोडऩे की जरूरत है। फिलहाल उत्तरप्रदेश के जिस हादसे को लेकर हमने लिखना शुरू किया है, उसमें अगर छत्तीसगढ़ी मजदूर शिकार हुए हैं तो उनकी पूरी मदद राज्य सरकार को करनी चाहिए।

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