27 फरवरी 2012
आजकल
सुनील कुमार
अपने अखबार के लिए रोज हिंदी ग्राफिती, 'दीवारों पर लिक्खा हैÓ लिखते या बनाते हुए उस दिन के आसपास कुछ देखा हुआ, कुछ भोगा हुआ या कुछ पढ़ा और सुना हुआ असर डालता है। तकरीबन हर बार अपने खुद के शब्दों में एक पैनी बात लिखना कभी-कभी कुछ मुश्किल भी होता है और ऐसी नौबत से बचने के लिए जब जहां जो बात सूझ जाती है, उसे लिखकर रख लेने की आदत सी पड़ गई है।
कभी-कभी दिमाग में कुछ बातें इस कदर घर कर जाती हैं कि हफ्तों तक किसी एक ही किस्म की बातें लिखना होता है और मुझे जानने वाले कुछ करीबी लोग इस बात को लेकर परेशान होने लगते हैं कि मेरे निशाना कहीं उनकी तरफ तो नहीं है। ऐसे में कुछ लोगों के सामने यह भी खुलासा करना पड़ता है कि लंबे सफर पर अचानक चले जाने की बुरी आदत के चलते मैं अक्सर दीवार के लिए कुछ बातों को पहले से लिखते चलता हूं ताकि न रहने पर भी ऐसी नौबत न आए कि खाली दीवार पर कोई इश्तहार लिखने लग जाए।
लेकिन जैसा कि फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग वेबसाईटों के बारे में कहा जाता है कि लोग वहां कई बातें किसी और को पढ़वाने के लिए कहीं और लिखते हैं, और फिर उस पर कुछ दूसरों की प्रतिक्रिया देखते हैं, ऐसे ही कभी-कभी चाहे-अनचाहे मुझसे भी हो जाता है कि अपने मन की कोई बात दीवार पर लिखा जाती है ताकि उसे कोई कहीं पर पढ़ ले। लेकिन अखबार की जरूरत के मुताबिक ऐसी बातें उन्हीं मुद्दों पर होती हैं जो मुद्दे मेरे अकेले की दौलत नहीं होते और दुनिया में जगह-जगह लोग कदम-कदम पर वैसे मुद्दों का सामना आज या कल करते ही चलते हैं।
इस बात पर आज लिखना इसलिए ठीक लग रहा है क्योंकि पखानों के दरवाजों के भीतर से परे अब लोगों के पास अपने नाम सहित या बिना नाम के लिखने को बहुत सी जगहें हो गई हैं जिनमें इंटरनेट ने खासा हाथ बंटाया है। इसलिए लोगों की भड़ास अब निकल जाती है और यह हर किसी की दिमागी सेहत के लिए बेहतर भी होता है। यह एक अलग बात है कि लोगों के मन की नफरत जब गंदगी बनकर इंटरनेट पर पहुंचती है तो उसके शिकार लोगों को उतनी ही दिमागी तकलीफ होती है जितनी राहत कुछ दूसरे लोगों को ऐसा लिखकर मिलती है।
लेकिन तकरीबन पूरी जिंदगी लिखने के धंधे में गुजार लेने के बाद मन की भड़ास जितनी कम हो जानी थी, उतनी हुई नहीं। वजह शायद यह है कि हालात में जिस किस्म के बदलाव की नीयत से लिखा जाता है, वह अक्सर स्याही खत्म हो जाने तक करवट भी नहीं बदलता। किसी गेंडे की कड़ी खाल पर तिनका फेंकने से उसके बदन में जितनी हलचल होगी, उससे कम ही हलचल अदालत से परे के भारतीय लोकतंत्र में होती है। जब अदालत के दखल का खतरा आ खड़ा होता है तब कहीं जाकर सरकार या कारखानेदार और कारोबार यह देखना शुरू करते हैं कि आखिर मुद्दा क्या है। इसलिए लगातार लिखने के बाद जब महान होने का दावा करने वाला यह लोकतंत्र बेफिक्री की नींद सोते रहता है, तो फिर फिक्र के साथ लिखने वाले तक उसकी बातें उस बूमरैंग की तरह लौटती हैं जिसे फेंककर इस्तेमाल करने वाला हथियार बनाया गया है। पत्थर की दीवार से टकराकर मानो कुछ लौटा और उसने दीवार पर वार करने वाले को ही जख्मी कर दिया।
दिल से लिखना आसान नहीं होता वह दिल दुखा जाता है। दूसरे दिल पर उसके असर की कोई गारंटी तो नहीं होती, गुंजाइश भी कम ही होती है और अपने ही मन पर चोट लगने का खतरा अधिक होता है।
लिखने वाले की एक बड़ी दिक्कत यह भी होती है कि उनके बीच कुछ अधिक नाजुक और महीन सोच के लोग अधिक होते हैं, और पढऩे वालों में ऐसी सोच वालों का अनुपात कुछ कम होता है। इस बेमेल मामले को इस तरह से समझा जा सकता है कि मानो बाजार में डिमांड से सौ गुना अधिक सप्लाई हो रही है और दुकानों के बाद बाजार तक की सड़कें भी माल से पट गई हैं। संवेदनशीलता मांग से सौ गुना अधिक आपूर्ति का मामला हो गया है और दुनिया की कोई व्यवस्था इस अनुपात के साथ चल नहीं पाती। यही वजह है कि संवेदनशील लोग भारत जैसे लगभग आजादी वाले लोकतंत्र में भी अपने-आपको बेसहारा और बेअसर पाते हैं। सोचने वाले, फिक्र करने वाले, और उसूलों वाले लोग लगातार भड़ास से लबालब भरे रहते हैं।
जिस लिखने की बात हो रही है, वह एक किस्म का नहीं होता, वह किस्म-किस्म का होता है। कुछ लोग साहित्य लिखते हैं, और लगभग सारा साहित्य खतरों से परे का होता है। अपवाद की तरह कोई इक्का-दुक्का लेखक विरोध का शिकार होते भी हैं तो भी उससे उनकी किताबों की बिक्री बढ़ जाती है। अखबारों में फिक्र के साथ लिखने का चलन घटते चल रहा है और संपादक या लिखने वाले की फिक्र का जिम्मा मार्केटिंग विभागों ने बड़ी उदारता से लेकर अपने सिर पर रख लिया है, इसलिए वहां पर फिक्र की मृत्युदर, संसद और विधानसभाओं में अरबपति लोगों की बढ़ती भीड़ की वजह से वहां फिक्र की बढ़ चुकी मृत्युदर से मुकाबला करती है।
ऐसे में पूरी तरह असंगठित, गैरकारोबारी और बेकाबू-अराजक, या आजाद, इंटरनेट ने लोगों को लिखने की एक ऐसी आजादी दी है जिसके लिए साहित्य के उत्कृष्टता के आलोचक-पैमानों पर खरे उतरने की कोई बंदिश नहीं होती, मार्केटिंग विभाग की मंजूरी से लिखने की कोई अखबारी बेबसी नहीं होती, और शायद असर कहीं अधिक होता है।
दरअसल दस-बीस बरस पहले तक के विचारों के व्यापार के एकाधिकार को आज इंटरनेट ने ग्रामोफोन रिकॉर्ड की तरह बनाकर रख छोड़ा है। पुराने सामान जमा करने के शौकीन लोग विचार-व्यापार-एकाधिकार को जमा करके रख सकते हैं। जिन लोगों को यह बात अटपटी लग रही हो वे ध्यान से देखें कि मीडिया के कारोबार में अब विचार की कितनी जगह रह गई है, और क्या जगह रह गई है। इसलिए आज मीडिया का जो बढ़ता हुआ एकाधिकार है, वह मीडिया के कारोबार का एकाधिकार है, उसमें विचारों का एकाधिकार नहीं है, मार्केटिंग की रणनीति का साम्राज्यवाद जरूर है।
बाजार बागी तेवर बर्दाश्त नहीं करता। ऐसे में आने वाले दिन विचारों पर और अधिक हमलों के दिन रहेंगे और खासकर लिखने वालों के विचारों के। इन पर हमले मीडिया के विज्ञापनदाता ग्राहकों के भी होंगे, और मीडिया के दफ्तर के भीतर खाता-बही देखने वालों के भी होंगे। यही वजह है कि पिछले दस-बीस बरसों में हिंदुस्तान में पेडन्यूज नाम का एक नया शब्द अंगे्रजी डिक्नशरी के दो शब्दों से निकलकर हिन्दी तक पहुंचते हुए एक शब्द बन गया है। इस माहौल में कबीर की तरह की तेजाबी बातें आमतौर पर छोटा मीडिया ही लिख सकता है, या फिर मीडिया के स्थापित ढांचे से परे का नए मीडिया किस्म का इंटरनेट का मीडिया लिख सकता है। पे्रस कौंसिल ऑफ इंडिया के नए अध्यक्ष जस्टिस काटजू ने पिछले दिनों मीडिया को लेकर बहुत सी कड़वी बातें कही हैं, जिनके जवाब में जवाबी तर्क या आत्मविश्लेषण के बजाय एक भीड़ की तरह हल्ला भर सामने आया है।
आने वाले दिन मीडिया के बड़े घरानों के हाथों छोटे मीडिया कारोबार के बिकने के दिन दिखते हैं। ऐसे में लोगों को खरी और कड़ी बातें लिखने के लिए या तो कुछ दरवाजों के पीछे जाना होगा या इंटरनेट पर।
बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
जवाब देंहटाएंघूम-घूमकर देखिए, अपना चर्चा मंच ।
लिंक आपका है यहीं, कोई नहीं प्रपंच।।
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आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज बुधवार के चर्चा मंच पर लगाई गई है!