प्रतिभाओं का जवाब है, गरीबी का नहीं


संपादकीय
24 फरवरी 2012
प्रदेश के होनहार खिलाडिय़ों की खोज करके उन्हें तालीम देने वाले एक संस्थान ने पिछले दिनों छत्तीसगढ़ को बताया कि बहुत से प्रतिभावान खिलाड़ी गरीबी के कारण संस्थान में तालीम लेने के लिए चुने जाने के बाद भी, अपनी प्रतिभा को निखार नहीं पाते। संस्थान खेल प्रतिभाओं की तलाश करने दूर दराज के गांवों में जाकर उन्हें ढूंढ भी लाता है, लेकिन जब छात्रावास में रहकर तालीम लेने की बात आती है तो यह या तो यह आते ही नहीं या अपने घर लौट जाते हैं, क्योंकि उन्हें अपने घर के कामकाज में कमाई में मदद करनी होती है। राज्य स्तर के खेल मुकाबलों में बेहतरीन प्रदर्शन करने के बावजूद वह अपने खेत-खलिहानों में अपने माता-पिता का हाथ बंटाने लौट जाने मजबूर हैं। उनके सपने, उनकी प्रतिभा, और खेल जगत में राज्य की संभावनाएं इस तरह दम तोड़ती रहती हैं। यह सिलसिला हम बहुत बरसों से देखते आ रहे हैं। इसे देखकर हमें लगता है कि गरीबी के हाथों हार जाने वाले खिलाडिय़ों का हश्र देखकर भी खेल के प्रति छत्तीसगढ़ की प्रतिभाओं का उत्साह फीका नहीं पड़ता है। वह अपनी तरफ से तो आखिरी दम तक कोशिश करती है, मानो अपने राज्य से कहती हो- देखो हमारे बस में जो था हमने कर दिखाया, बात इसके आगे ले जाना अगर तुम्हारे बस में है, तो कर दिखाओ। बहुत बार जलसों में परेड करते वक्त नंगे पैरों चलते युवाओं, स्कूली बच्चों की तस्वीरें भी हमने छापी हैं, जिनमें अपनी गरीबी के बावजूद दुनिया के सामने, एक चमचमते मैदान पर कदम रखने का तो हौसला है, लेकिन अपनी गरीबी का जिनके पास कोई जवाब नहीं जो इनके हौसले तोड़ देती है। विकास के बहुत से पैमानों पर बहुत तेज रफ्तार से दौड़ रहे अपने राज्य का यह एक अफसोसनाक और दुखद पहलू है,  लेकिन इससे भी अफसोसनाक बात यह है कि तेजी से सम्पन्न होते चल रहे इस राज्य में अपने इन हीरों को तराशने का माद्दा नहीं है।
जिस दिन विश्व कप क्रिकेट में पाकिस्तान को सेमी फाईनल में हरा देने के बाद देश भर में जनता आधी रात को सड़कों पर उतर आई, और हाथ में तिरंगा लिए रात पर देश प्रेम के नारे लगा रही तो हमें लगा कि शायद पाकिस्तान के खिलाफ देश भर में कहीं सोए, कहीं जागे जुनून का असर है, लेकिन दो दिन बाद विश्वकप जीतने पर फिर वही नजारा देखा, तो लगा कि नहीं, लोगों को खेल और देश दोनों के लिए लगाव है। लेकिन यह लगाव इतना क्षणिक और इतना सतही क्यों है? यह सोचने की बात है। विश्व कप यंू ही नहीं जीता जाता ,उसके लिए प्रतिभाशाली खिलाडिय़ों के चुनाव, उनकी तालीम,और कड़े अभ्यास और सही मौके की जरूरत होती है। यह सब उन्हें कौन देगा कि वह हमें तिरंगा हाथ में लेकर सड़कों पर नारे लगाने, घूमने, खुश होने का मौका दें? इस राज्य में देश के बड़े-बड़े उद्योग यहां के प्राकृतिक संसाधनों,और यहां की श्रम शक्ति के बूते अपनी तिजोरियां भर रहे हैं। वह इसके लिए रॉयल्टी देते होंगे, लेकिन क्या उनका फर्ज बस वहीं तक आ कर खत्म हो जाता है ? यहां  जितने भी उद्योग चल रहे हैं, उनमें से ज्यादातर पूरी तरह छतीसगढ़ के संसाधनों और मानव बल के बूते चल रहे हैं। उनकी जिम्मेदारी स्थानीय लोगों को छोटी-बड़ी नौकरियां देकर ही खत्म नहीं हो जाती। कार्पोरेट क्षेत्र की सामाजिक जवाबदेही के बारे में उनकी सोच भी गौर करने की बात है। अभी कुछ ही अर्सा पहले देश के औद्योगिक घरानों में ऊंचा नाम रखने वाले जिंदल समूह के मुखिया ने अमरीका की अपनी यूनिवर्सिटी को बड़ा दान दिया, ताकि वह जिस स्कूल में पढ़े वह उनके नाम से जान जाए। हम इसमें कोई बुराई भी नहीं देखते, यह एक सहज मानवीय हसरत है, जो किसी भी आम इंसान में जाग सकती है, और जब जेब में ऐसा करने के लिए जरूरी दौलत हो, तो यह सपना पूरा भी किया जा सकता है। ऐसे समय स्कूल में पढ़ते हुए परीक्षा में कितने नंबर आते थे, यह देखने की जरूरत नहीं रह जाती। लेकिन ऐसे उद्योगपतियों की तिजोरी अपनी कोख से भरने वाली इस धरती के बच्चों के सपनों का क्या, जो पूरी तरह इस लायक है कि आगे बढऩे की सुविधा उनके नाम हो। इस उद्योग समूह समेत राज्य भर में चल रहे बड़े-बड़े उद्योगों में से ज्यादातर छत्तीसगढ़ के लिए अपनी सामाजिक भागीदारी फ्लावर शो, डॉग शो या ऐसी ही किन्ही बातों में खर्च करते दिखते हैं। कई तो वह भी नहीं करते। अपने कारखानों में काम करने वालों के बच्चों के लिए स्कूल बनवाकर और उनमें आसपास के कुछ बच्चों को शिक्षा देकर जैसे छतीसगढ़ के लिए उनके फर्ज पूरे हो जाते हैं।
निजी क्षेत्र के उद्योगों के लिए तो सरकार ने सामाजिक भागीदारी को जरूरी बनाया ही नहीं है, लेकिन इसकी अपनी औद्योगिक इकाइयां, जहां सीएसआर अनिवार्य है, उनके इस मद के खर्च कैसे हैं, यह भी जांच का विषय है। जो सरकार राज्य के संसाधनों का औद्योगिक घरानों से सौदा करती है, उसे यह तय करना चाहिए कि वह यहां के मानव बल के विकास में अपनी कमाई का एक निश्चित हिस्सा जरूर खर्च करे। यही नहीं सरकार को इन उद्योगों को अपने सीएसआर की सालाना रिपोर्ट में यह जाहिर करने की शर्त भी रखनी चाहिए। सामाजिक भागीदारी के अपने कामों में उन्होंने कहां, किस तरह के काम किए, और उनसे कितने लोगों को फायदा हुआ।
विकास में सामाजिक भागीदारी कई तरीके से हो सकती है इसके लिए कई तरह से सोचा जा सकता है जैसे नरेन्द्र मोदी को जब कोई किसी समारोह में मुख्य अतिथि की तरह बुलाता है, तो उसे उन्हें पैसे देने पड़ते हंै, जिन्हें वह अपने राज्य में लड़कियों की पढ़ाई-लिखाई पर खर्च करते हैं। साल भर में इस तरह अच्छी खासी रकम जमा हो जाती है। हम समझते हैं कि सरकार राज्य प्रतिभाओं के बारे में भी कुछ नया सोचने के लिए माहौल बनाए, और यहां से पैसा कमा रहे उद्योगों के लिए सामाजिक भागीदारी के तहत कोई ठोस काम करने की शर्त लगाए। यह केवल सरकार और औद्योगिक घरानों के सोचने की बात ही नहीं है। यह अच्छी स्थिति में जी रहे हर व्यक्ति के सोचने की बात होनी चाहिए कि वह ऐसी प्रतिभाओं का दम घुटने से कैसे रोक सकता है। गरीबी हटाना, या समाज में निचली पायदान पर खड़े इंसान की मदद करना, केवल एक अच्छा सामाजिक काम ही नहीं है। हालांकि हम यह मानते हंै कि ऐसा अच्छा  काम करने के अच्छे  नतीजे किसी न किसी रूप में मिलकर ही रहते हैं। वर्ना गुलाब का पौधा उगाने पर कैक्टस ऊग जाता, लेकिन हम इसके शुद्ध आर्थिक पहलू की बात करना चाहते हंै, जो गरीबी से बाहर आती जनता के उपभोक्ता वर्ग में तब्दील होने की बात करता है, जिससे व्यापार उद्योग को बढ़ावा मिलता है, नई नौकरियां  बनती हंै, समृद्धि आती है, यह अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए एक बेहतर दुनिया छोड़कर जाने की बात है। यह सच है कि यह एक लंबी प्रक्रिया है, लेकिन इतनी लंबी भी नहीं कि सालों साल तक प्रकृतिक संसाधनों का दोहन करके भी ना थकने वाले इसकी शुरुआत ना कर सके। ऐसे दौर में, जब जंगलों में जनता के असंतोष की चिंगारी को भड़काकर दावानल की शक्ल देने की कोशिशें जारी हों,   अपना धंधा चैन से चलाने के लिए व्यापारियों, उद्योगपतियों द्वारा नक्सलों को कर देने की बातें अक्सर सुनाई देती हों, क्या इन गरीब खिलाडिय़ों को मदद इसलिए न मिले कि इनके हाथ में हथियार नहीं है? 
समाज के प्रति जिम्मेदारी और जवाबदेही के माहौल के फायदे घर से लेकर बाहर तक सब को है। वर्ना यहां के युवाओं को कार्पोरेट लालच के खिलाफ आवाज उठाने में कितनी देर लगेगी ? राजधानी और राज्य के बड़े शहरों में चलते बड़े स्कूल, मंडियां, बैंक, अगर मन बना लें तो, ऐसे कितने की खिलाडिय़ों को दत्तक लेकर आगे बढऩे के लिए थोड़ी सी मदद कर सकते हैं। स्कूल ऐसे खिलाडिय़ों के लिए अपने विद्यार्थियों की फीस में मामूली बढ़ोत्तरी करके भी यह काम कर सकते हंै, इसके लिए अपने विद्यार्थियों के पालकों को राजी कर सकते हैं। इससे दूसरे अच्छे कामों के लिए भी जागरुकता का स्तर बढ़ेगा। जरूरत अपने आसपास रह रहे,अपने से कमजोर लोगों के बारे में बड़े दिल से सोचने की है, रास्ते निकल आएंगे। ऐसे खिलाडिय़ों का सामने आना नहीं रुकेगा, क्योंकि हौसलों का तो जवाब है, लेकिन गरीबी का नहीं, इसलिए मुकाबले जीत कर भी, इनका मन में दुख और असंतोष की चिंगारी लिए घर वापस लौटने का सिलसिला भी जारी रहेगा- जब तक सरकार और छत्तीसगढ़ के लोग यह तय नहीं कर लेते कि वह ऐसा नहीं होने देंगे।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें