यह गाना याद रखें कि ये तो पब्लिक है, ये सब जानती है...

8 जून 2014
संपादकीय

कांगे्रस पार्टी के पास चूंकि अभी खासा वक्त खाली है, इसलिए उसके नेता तरह-तरह के नए कामों में अपने को व्यस्त रख रहे हैं। दिग्विजय सिंह ट्वीट करते हैं कि आने वाले महीनों में किस-किस खेल के कौन-कौन से अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट होने जा रहे हैं, और खेल प्रेमियों के लिए अच्छे दिन आने वाले हैं। गिने-चुने जीतने वाले कांगे्रस सांसदों में से एक, शशि थरूर, कांगे्रस प्रवक्त की हैसियत से सार्वजनिक बयान देते हुए नरेन्द्र मोदी की कुछ बातों के लिए तारीफ करते हैं, और उनकी इस तारीफ को सुनकर, लोकसभा चुनाव में चौथे नंबर पर आकर जमानत तक जब्त करा बैठे एक दूसरे बड़बोले कांगे्रस सांसद मणिशंकर अय्यर ने शशि थरूर को करीब-करीब भाजपा में जा चुका बताया है, और कहा है कि संसद में कांगे्रस का एक सदस्य कम गिना जाना चाहिए। इस तेजाबी जुबान, और शशि थरूर की शिष्टाचार वाली जुबान के बीच के फर्क को समझने की जरूरत है।
नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बनने के बाद से अब तक जो रूख दिखा रहे हैं, जो बयान दे रहे हैं, जो फैसले ले रहे हैं, और काम का जो तौर-तरीका कायम कर रहे हैं, उसके बीच अब तक उन्होंने ऐसी कोई भी चूक नहीं की है कि उनकी आलोचना करने के लिए जिनकी हसरत अभी निकल नहीं पा रही है, उनको कोई मौका मिले। हम शशि थरूर की इस बात से सहमत हैं कि विरोधी की अच्छी बातों की तारीफ करके, और गैरजरूरी या बेबुनियाद आलोचना न करके, हर किसी को अपनी खुद की विश्वसनीयता बनाए रखना चाहिए, ताकि जिस दिन आलोचना का मौका आए, उस दिन आलोचक की विश्वसनीयता बची रहे। यह एक बहुत साधारण समझबुझ की, और सही बात, यह एक और बात है कि एक कुनबे की चापलूसी ही जिस पार्टी में सबसे बड़ी काबिलीयत है, उस पार्टी के भीतर न्यायसंगत और तर्कसंगत बातों की अधिक कद्र हो भी नहीं सकती। 
राजनीति में आकर लोग इतने बेदिमाग और इतने बददिमाग कैसे हो जाते हैं, कैसे वे इतने तंगदिल और तंगनजर हो जाते हैं, यह देखना हैरान करता है। नरेन्द्र मोदी ने चुनावी नतीजे आने के बाद से अब तक जो रूख दिखाया है, वह ऊपर के इन चारों विशेषणों के ठीक खिलाफ है। उन्होंने लोगों को दफ्तर साफ-सुथरा रखने कहा, काम में खूब मेहनत करने को कहा, लोगों को अपने पैर छूने की मनाही की, रिश्तेदारों को स्टाफ में रखने को मना किया, पड़ोसी देशों से रिश्ते सुधारने की कोशिश की, अपने मंत्रियों और सांसदों को फालतू के बयान न देने को कहा। ऐसी और भी कुछ बातें उन्होंने लंबे समय बाद कायम कीं, जिनको भारतीय राजनीतिक जीवन में लोगों ने, पार्टियों ने, कूड़ेदान में फेंक दिया था। उन्होंने अफसरों से हौसले और ईमानदारी से काम करने को कहा, और खुद मेहनत की एक मिसाल वे कायम कर रहे हैं। उनका कोई भी बयान, या कोई भी फैसला साम्प्रदायिक नहीं दिख रहा, और कांगे्रस के राज वाले पुणे में जाहिर तौर पर जो साम्प्रदायिक हत्या हुई है, उसे राज्य सरकार ने तो आम कत्ल दर्ज किया है, दूसरी तरफ मोदी सरकार ने दिल्ली से पूछा है कि इसे साम्प्रदायिक हिंसा क्यों दर्ज नहीं किया गया? अब पलभर को यह सोचें कि महाराष्ट्र सरकार वाला फैसला मोदी का किया हुआ रहता, तो देश भर के मोदी-विरोधी उन पर चढ़ बैठे रहते कि साम्प्रदायिक हिंसा को उन्होंने साम्प्रदायिक दर्ज नहीं होने दिया।
आज मोदी के विरोधी और आलोचकों को अपनी खुद की विश्वसनीयता बचाए रखनी चाहिए। हम इस बात को इस अखबार में दर्जनों बार पहले भी लिख चुके हैं कि किसी के समर्थन या विरोध में झंडा उठाकर चलने वालों की अपनी खुद की साख अगर नहीं बची रहेगी, तो उनके झंडों का कोई असर भी नहीं होगा। कांगे्रस को हर दिन मोदी के खिलाफ कुछ बोलने की हड़बड़ी छोडऩी होगी, क्योंकि देश की जनता कांगे्रस के कुछ कहे बिना भी अपने आंख-कान का इस्तेमाल जानती है, और करती भी है। इसलिए मोदी-विरोधियों को उनकी प्रधानमंत्री की हैसियत से पहली गलती की राह देखनी चाहिए, तब तक के लिए यह गाना याद रखना चाहिए कि ये तो पब्लिक है, ये सब जानती है...

Bat ke bat, बात की बात

7 june 2014

Bat ke bat, बात की बात

5 june 2014


लोकसभा में नया विपक्षी मोर्चा बनता है, तो बेहतर होगा...

7 जून 2014
संपादकीय
दिल्ली से बड़ी दिलचस्प खबर है कि लोकसभा में कांगे्रस सांसदों के अकाल के चलते हुए एनडीए और यूपीए के बाहर की पार्टियां मिलकर विपक्ष का एक मोर्चा बनाने की सोच रही हैं। अब चुनाव निपट चुके हैं, और एनडीए की सरकार के सामने खड़े होने के लिए अगर यूपीए से परे का एक मोर्चा बनता है तो यह भारतीय संसदीय राजनीति में एक नए किस्म की बात होगी। चुनाव के पहले तो ऐसे मोर्चे बनते आए हैं, बनते रहते हैं, और बनते रहेंगे, लेकिन प्रमुख विपक्षी दल विहीन लोकसभा में बाकी पार्टियां मिलकर एनडीए और यूपीए से परे एक मोर्चा बना लें, यह बिल्कुल ही अलग तस्वीर होगी। 
लेकिन ऐसा मोर्चा बेहतर और जरूरी इसलिए है कि कांगे्रस सुधरते दिख नहीं रही है, और उसके बिना यूपीए की कोई जिंदगी भी मुमकिन नहीं है। आज अगर यूपीए के कुछ साथी कांगे्रस से परे जाने की सोचें भी, तो ऐसे शरद पवारों की जरूरत आज भारतीय संसद में किसको है? आज तो जयललिता जैसे भारी-भरकम संसदीय दल वाले लोग राज्यसभा में एनडीए को जरूरी बहुमत तक पहुंचाने के लिए साथ खड़े दिख रहे हैं, और पवार के साथी, देश के और बहुत से दिग्गज, किंगमेकर न बन पाने के लिए मलाल करते बैठे हैं। ऐसे में लोकसभा में एक मजबूत विपक्ष के लिए अगर कांगे्रस-भाजपा के साथियों से परे की पार्टियां एक मोर्चा बनाती हैं, तो वह मोर्चा भारतीय संसदीय लोकतंत्र के लिए कई वजहों से अच्छा होगा। दरअसल पिछले दस बरस के यूपीए राज, और दस बरस के एनडीए-विपक्ष के चलते इन दोनों खेमों के बीच इतनी बुरी कटुता हो चुकी है, कि लोकसभा में, या राज्यसभा में भी, इनके बीच किसी स्वस्थ बहस की गुंजाइश कम ही दिखती है। और इनके बीच टकराव के लिए पिछले दस बरस का इतिहास मौजूद है। इसलिए आज संसद के भीतर अगर इन दो खेमों से परे का एक मोर्चा रहेगा तो वह यूपीए-कांगे्रस के मुकाबले जुबान खोलने और हमले करने का अधिक हक रखेगा, उसके हमले भरोसेमंद भी होंगे, और उसकी बातों को खारिज करना मोदी सरकार के लिए आसान भी नहीं होगा। 
भारत जैसे लोकतंत्र में चुनावी और संसदीय राजनीति में यह बारीक फर्क करके देखना जरूरी है कि चुनाव के पहले अगर कोई मोर्चा नहीं भी बन पाता है, क्योंकि ऐसे मोर्चे के संभावित भागीदार एक साथ चुनाव लडऩे की हालत में नहीं रहते, तो भी चुनाव के बाद संसद के भीतर ऐसा मोर्चा बनना चाहिए जो कि सत्ता के खिलाफ मजबूती से विश्वसनीय आवाज उठा सके। ऐसा न होने पर कमजोर और बेसाख विपक्ष सरकार को मनमानी का एक मौका और हक दे देता है। 

पुणे की साम्प्रदायिक हत्या और मोदी के मौन पर उठते सवाल

6 जून 2014
संपादकीय

भारत की राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले देश-विदेश के बहुत से लोगों की निगाहें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर लगी हैं कि पुणे में एक हमलावर हिंदू संगठन के लोगों ने जिस तरह एक मुस्लिम इंजीनियर की सड़क पर हत्या की है, उस पर उनका क्या कहना है। यह उम्मीद जायज है, क्योंकि भारत में ऐसी खुली और हत्यारी साम्प्रदायिकता के बारे में प्रधानमंत्री का रूख सामने आना चाहिए। और खासकर नरेन्द्र मोदी को लेकर लोगों में इंतजार इसलिए भी बेसब्र हो रहा है कि 2002 के दंगों को लेकर अब तक खलनायक की तरह दर्ज होते आए मोदी का नया रूख क्या है, इसका इंतजार भविष्य का इतिहास भी दर्ज करने के लिए कर रहा है। लेकिन यह समझने की जरूरत है, और यह याद रखना चाहिए कि भारत में हर कुछ हफ्तों में किसी न किसी राज्य में होने वाली साम्प्रदायिक हत्या, या जातीय संघर्ष में हत्या को लेकर क्या देश के प्रधानमंत्री हमेशा ही बयान देते आए हैं? खासकर तब जब मौत कुल एक हुई हो, मामला दर्ज हो गया हो, और दर्जन भर लोग गिरफ्तार भी हो गए हों। 
भारत के संघीय ढांचे में यह याद रखने की जरूरत है कि राज्य में कानून-व्यवस्था का अधिकार, और जिम्मा, दोनों ही राज्य सरकार के हाथ है। और ऐसे में महाराष्ट्र में हुई इस हिंसा को लेकर, साम्प्रदायिक तनाव को लेकर देश का प्रधानमंत्री अगर आनन-फानन कुछ कहे, तो वह राज्य के मामलों में केंद्र की दखल भी समझी जा सकती है, और यह कांगे्रस अगुवाई वाली राज्य सरकार की नाकामयाबी पर केंद्र सरकार द्वारा आलोचना भी ठहराई जा सकती है। प्रधानमंत्री का न तो ऐसी एक-एक हत्या पर मीडिया की उम्मीद पूरी करने के लिए कुछ कहना ठीक है, और न ही जांच के बीच में प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री किसी को जुर्म के बारे में अपने विचार रखने चाहिए। देश के हर जुर्म की जांच या तो राज्य की एजेंसी करती है, या केंद्र सरकार की। ऐसे में सत्ता चला रहे किसी नेता को अपनी अटकल, या अपनी राय रखनी भी नहीं चाहिए। 
देश के बहुत से लोगों को, खासकर जो लोग मोदी के आलोचक रहे हैं, या कि हैं, उन सबको इस बात की हड़बड़ी है कि अब तक मोदी कोई गलत काम कर नहीं पाए हैं। ऐसा भी नहीं कि मोदी से कोई गलती होगी ही नहीं, या वे गलत काम करेंगे ही नहीं, ये दोनों ही बातें आगे चलकर सामने आ सकती हैं। लेकिन आज देश के जनमत का तकाजा यह है, चुनावी नतीजों का हुक्म यह है कि मोदी को अपने काम की शुरूआत करने दी जाए, और उनको अपने-आपको साबित करने का एक मौका दिया जाए। इस साबित करने में देश के अल्पसंख्यकों, खासकर मुस्लिमों के बारे में उनके अब के रूख का पता भी चलेगा, दूसरे देशों के साथ रिश्तों पर सोच का खुलासा भी होगा, और देश के बड़े कारोबारियों को उनसे कोई रियायत मिलती है या नहीं, इसका खुलासा भी होगा। लेकिन इन सब बातों के लिए नरेन्द्र मोदी हों, या कि कोई और प्रधानमंत्री, उनको एक मौका तो देना ही होगा, और यह मौका राजनीतिक और सरकारी जीवन की जुबान में सौ दिनों का हनीमून कहलाता है। किसी को पहले सौ दिन काम करने का मौका मिलना चाहिए, और उसके बाद आलोचक पारखियों को अपनी कसौटी का पत्थर बाहर निकालना चाहिए। पुणे की हिंसा इस देश के चेहरे पर कालिख पोत गई है, लेकिन आज मोदी के आलोचकों को यह याद रखना होगा कि अभी कुछ महीने पहले ही भाजपा-विरोधी सपा के राज वाले उत्तरप्रदेश में हुए साम्प्रदायिक दंगों में दर्जनों लोग मारे गए थे, दसियों हजार बेघर हुए थे, और सैकड़ों लोग आज भी अपने घर लौटने की हालत में नहीं हैं। पिछले कैलेण्डर बरस, 2013 में देश की हर तीसरी साम्प्रदायिक हिंसा उत्तरप्रदेश में हुई, और पहले दस महीनों में साम्प्रदायिक हिंसा की 143 मौतों में से 95 मौतें अकेले उत्तरप्रदेश में हुईं। ऐसे में, ऐसे देश में, हर हत्या पर प्रधानमंत्री से बयान की उम्मीद करना एक खतरनाक राजनीतिक सिलसिला होगा, और मीडिया की भूख मिटाने के लिए ऐसा करना ठीक भी नहीं होगा। मोदी का मूल्यांकन करने का वक्त आए दिन आते रहेगा, लेकिन देश के संघीय ढांचे में बयानों का अतिउत्साह कोई समाधान नहीं हो सकता।

बच्ची से बलात्कार के बाद सरकारी व्यवस्था द्वारा रेप

5 जून 2014
संपादकीय

एक तरफ उत्तरप्रदेश बलात्कार की खबरों से खौल रहा है, और पूरी दुनिया में समाजवादी होने का दावा करने वाले बाप-बेटे का राज हैवानियत सा दिख रहा है, उसी वक्त छत्तीसगढ़ में तीन बरस की एक बच्ची बलात्कार के बाद अलग-अलग कस्बों और शहरों के सरकारी अस्पतालों में धक्के खा रही थी, और एक के बाद दूसरा अस्पताल उसे दूसरी तरफ धकेल रहा था। ऐसी कौन सी कानूनी औपचारिकता हो सकती है, जिसकी इज्जत करने के लिए तीन बरस की इस घायल बच्ची को सुबह से रात तक इलाज न मिल सके? और यह मामला छत्तीसगढ़ के उस बालोद जिले का है जहां से राज्य की महिला और बाल विकास मंत्री रमशीला साहू विधायक है, जहां से भाजपा की महिला मोर्चे की राष्ट्रीय अध्यक्ष सरोज पांडेय अभी कल तक सांसद थी। और इस बच्ची का बिना इलाज धक्के खाना राजधानी के मेडिकल कॉलेज अस्पताल तक जारी रहा, जहां पर उससे सरकारी कागजात की मांग पहले की गई, इलाज की फिक्र बाद में। 
यह सरकारी हैवानियत छत्तीसगढ़ में नई नहीं है। खुद मुख्यमंत्री के चुनाव क्षेत्र राजनांदगांव से कुछ महीने पहले ऐसा ही एक मामला रायपुर के मेडिकल कॉलेज अस्पताल तक पहुंचा था, और बलात्कार की तीन बरस उम्र की शिकार के साथ सरकारी कागजात न होने से उसकी जांच और इलाज से डॉक्टरों ने इंकार किया था, और बाद में सीधे मुख्यमंत्री के दखल के बाद उसका इलाज हो पाया था, और शायद किसी डॉक्टर को निलंबित भी किया गया था। 
बलात्कार की शिकार छोटी सी बच्ची को लेकर अगर उसके मां-बाप अलग-अलग कस्बों और शहरों में सरकारी अस्पतालों में धक्के खाते घूम रहे हैं, और उसे इलाज नहीं मिल पा रहा है, तो यह एक अकेले बलात्कारी के बाद सरकारी इंतजाम और लोकतंत्र का उस बच्ची पर सामूहिक बलात्कार है। ऐसे में अगर उस बच्ची के मां-बाप हिंसक नहीं होते हैं, तो यह उनकी बहुत ही बड़ी बेजुबानी और बेबसी है, और उनका अहिंसक बने रहना एक बहुत ही बड़ी बात है। फिल्मों में जिस तरह प्रताडऩा के बाद हिंसा दिखाई देती है, वैसा कोई खतरा किसी दिन ऐसे बेबस मां-बाप की तरफ से खड़ा हो जाए, तो हमको उसमें हैरानी नहीं होगी।
छत्तीसगढ़ सरकार को अपने स्वास्थ्य विभाग के कामकाज को लेकर इसलिए भी आंखें खोलनी चाहिए क्योंकि राज्य के बहुत से अखबारों में रोजाना अनगिनत खबरें सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेज के अस्पतालों की ऐसी छपती हैं, जो कि छपने के पहले ही सरकार की नजर में आ जानी चाहिए थी। लेकिन आठ महीने पहले की राजनांदगांव जिले की घटना के बाद, आज अगर राजधानी का मेडिकल कॉलेज अस्पताल बलात्कार की शिकार बच्ची को लेकर उसी हाल में है, तो यह बात सरकार के लिए बहुत शर्मनाक है। छत्तीसगढ़ के चुनावों में भाजपा की लगातार जीत की वजह से राज्य में एक ऐसा माहौल दिखता है कि सरकार का काम बहुत अच्छा है। यह काम चुनाव जीतने के लिए तो अच्छा हो सकता है, लेकिन ऐसी जीत की वजह से अगर सत्तारूढ़ लोग आत्मसंतुष्टि के शिकार होकर अखबारों में रोज छपती गड़बड़ी की तरफ भी नहीं देखेंगे, तो यह सरकार की बहुत बड़ी खामी रहेगी। आज पूरे प्रदेश में स्वास्थ्य विभाग का हाल हर दिन इसी तरह का दिखता है, और मुख्यमंत्री को इस बारे में सोचना चाहिए।

खुरदुरी जुबान का इस्तेमाल किसी मकसद से ही ठीक है

4 जून 2014
संपादकीय
अंग्रेजी की एक भारतीय लेखिका, और स्तंभकार शोभा डे की एक ट्वीट पर सैकड़ों लोगों ने उनके खिलाफ भला-बुरा लिखना शुरू किया है। शोभा डे ने गोपीनाथ मुंडे को श्रद्धांजलि देते हुए जो ट्वीट किया, उसमें उन्होंने लिखा कि परिवार के बुरे दिन आ गए। 
आज दरअसल देश भर में भाजपा के जिस नारे की चर्चा है उसमें भाजपा के अच्छे दिन आने की बात कही जाती है इसलिए शोभा डे के कहे हुए साधारण से शब्द भी आज एक खास मायने रखते हैं, और वे लोगों को चोट पहुंचा रहे हैं। न तो इस लेखिका के बारे में लिखने का हमारा इरादा है, और न ही उनकी आलोचना करने वालों के बारे में। लेकिन जिंदगी के इस पहलू पर हम आज लिखना चाहते हैं कि नाजुक मौकों पर अक्खड़ जुबान किस तरह अधिक गहरा जख्म कर सकती है, और जब तक उससे कुछ हासिल करना मकसद न हो, तब तक जुबान का नर्म रहना ही बेहतर है। लेकिन हम यह बात आलोचना के लायक जो मौके रहते हैं, उन मौकों के बारे में नहीं कह रहे, हम इसे सिर्फ बाकी किस्म के नाजुक मौकों के बारे में कह रहे हैं, जब लापरवाह भाषा एक तनाव खड़ा करती है। और ऐसा सिर्फ जुबान से होता हो, यह भी जरूरी नहीं है, शब्दों से परे लोगों के चेहरों के भाव से भी ऐसा होता है, किसी अंतिम संस्कार के दौरान जब कोई एक छोटा समूह जोरों से हंसने-मुस्कुराने लगता है, तब भी ऐसा होता है। किसी पिघले हुए पल में छपने वाली किसी तस्वीर से भी ऐसा हो सकता है, और ऐसी लापरवाही से बचना चाहिए। 
दरअसल अक्खड़ जुबान का अपना एक इस्तेमाल होता है, जैसे कबीर की जुबान, जैसे मंटो की जुबान, उनके अक्खड़पन, और उनकी धार को निकाल दिया जाए, तो उनका असर खत्म सा हो जाएगा। बहुत किस्म के असर पैदा करने के लिए एक हमलावर तेवर के साथ-साथ हमलावर जुबान और धारदार शब्द भी जरूरी होते हैं। लेकिन किसी धर्म के त्योहार का वक्त, उस धर्म में सुधार के लिए हमले करने का नहीं होता, किसी अंतिम संस्कार का समय, मृतक की पार्टी के नारे के साथ खिलवाड़ का नहीं होता। इसी तरह अलग-अलग संस्कृतियों, अलग-अलग जातियों और धर्मों, अलग-अलग देशों के रीति-रिवाज के मुताबिक उनकी सहनशीलता अलग-अलग होती है, और उसका ख्याल रखना जरूरी होता है। कोई एक जानवर किसी एक धर्म के लोगों के लिए बच्चों की गुल्लक का सामान हो सकता है, लेकिन पश्चिम के देशों में खूब प्रचलित पिगी-बैंक को अगर किसी मुस्लिम देश या परिवार के बच्चे को तोहफे में दिया जाए, तो वह उनकी धार्मिक मान्यताओं के हिसाब से बौखलाने का सामान होगा। 
भारत के भीतर भी अंग्रेजी लिखने-बोलने वाले लोगों के तौर-तरीकों में से कई बातें हिंदी या क्षेत्रीय भाषाएं बोलने वाले लोगों को चोट पहुंचा सकती हैं। खुद हमसे इस अखबार में कभी-कभी ऐसी चूक होती है कि हम लोगों की टीवी के पर्दे का बर्दाश्त अखबार के पन्ने का बर्दाश्त मान लेते हैं, और जो तस्वीर पूरा परिवार एक साथ बैठकर टीवी पर देखता है, उसे हम छापने लायक समझ बैठते हैं, और वैसे में हमें पाठकों की आलोचना झेलनी पड़ती है। लोग टीवी पर कई बातों को बर्दाश्त कर लेते हैं, लेकिन उनकी सांस्कृतिक सहनशीलता अखबारों से कुछ अलग उम्मीद रखती है। हम शोभा डे से चर्चा को शुरू करके देश की सांस्कृतिक सहनशीलता पर यह बात इसलिए आगे बढ़ा रहे हैं कि रोज की जिंदगी में हम कई मौकों पर बिना किसी इरादे के, बिना किसी मकसद के, बिना किसी फायदे के लोगों को नाराज कर सकते हैं, और मामूली समझबूझ से, सावधानी से, हम ऐसे तनाव से बच भी सकते हैं। इसलिए अपनी खुरदुरी भाषा का इस्तेमाल किसी मकसद से ही करना ठीक है, बाकी मौकों पर नर्म जुबान क्या बुरी है? दुनिया में लोगों का जितना नुकसान उनकी अपनी जुबान करती है, उनका उतना बुरा उनके दुश्मन भी नहीं कर पाते।

सरकार जरा सा चाहे तो मौत को सड़कों से परे रोजगार ढूंढना होगा

3 जून 2014
संपादकीय
आज की सुबह केन्द्रीय मंत्री गोपीनाथ मुंडे की सड़क हादसे में मौत से हुई। अभी-अभी वे केन्द्र सरकार में आए थे और शहर के भीतर एक दूसरी कार की टक्कर के बाद वे अस्पताल पहुंचने के पहले गुजर गए। उनकी इस तरह बेवक्त की मौत उनके परिवार के एक दूसरे पुराने हादसे की याद भी ताजा करती है कि किस तरह उनके बहनोई, भाजपा के सबसे बड़े नेताओं में से एक, प्रमोद महाजन को उनके भाई ने ही उस वक्त घर में घुसकर गोली मारी थी, जब उन्हें भाजपा में सबसे अधिक संभावनाओं वाला नौजवान नेता माना जा रहा था। 
हर मौत तकलीफदेह होती है, लेकिन जब मौत बेवक्त की होती है, तो वह अधिक तकलीफदेह होती है, और जब वह किसी मशहूर व्यक्ति की होती है, तो उससे जुड़े हुए बहुत से लोगों के लिए भी तकलीफ की होती है। गोपनाथ मुंडे के साथ जो हादसा हुआ है, उसे लेकर देश के हर प्रदेश की सरकार को कुछ देर के लिए अपनी जिम्मेदारी के बारे में सोचना चाहिए, क्योंकि सड़कों पर इंतजाम राज्य सरकारों का काम है, और हिन्दुस्तान दुनिया में सबसे अधिक सड़क हादसों वाला देश है। हम छत्तीसगढ़ में हर दिन औसतन आधा दर्जन दुर्घटना-मौतें देखते हैं, और इनमें संपन्न और ताकतवर तबके की बड़ी गाडिय़ों से लेकर गरीब लोगों से लदी हुईं मालवाहक गाडिय़ों तक, हर किस्म की गाडिय़ों की तकलीफदेह तस्वीरें सामने आती हैं। जब मरने वालों की गिनती अधिक होती है, या उनमें कोई चर्चित लोग जुड़े होते हैं, तो राज्यपाल और मुख्यमंत्री की तरफ से शोक संदेश आते हैं। मरने वाले गरीब होते हैं, तो उनके लिए आर्थिक मदद की खबर जारी होती है। 
लेकिन आज जब एक प्रमुख नेता इस तरह से गुजरे हैं, और कल तक उनके अंतिम संस्कार की खबरें मीडिया में रहेंगी, तो राज्य सरकारों को सड़क हादसों को घटाने के बारे में सोचना चाहिए। और सच तो यह है कि सड़क दुर्घटनाओं को कम करने के लिए किसी रॉकेट-साईंस की जरूरत नहीं है, एक राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है कि सड़कों को काबू करने वाले दो विभागों में भ्रष्टाचार खत्म करके उनको ईमानदारी से अपना काम करने दिया जाए। बहुत छोटे-छोटे उपकरणों से तेज रफ्तार गाडिय़ों के ऐसे चालान हो सकते हैं, जिनके चलते आगे की दुर्घटनाएं टलें। लेकिन अविभाजित मध्यप्रदेश के वक्त से हमारा यह देखा हुआ है कि आरटीओ और ट्रैफिक को सरकार नियमित वसूली का एक जरिया बनाकर चलती है, और चाहे कांग्रेस की सरकार रही हो, या भाजपा की, इस वसूली में कोई कमी नहीं आई, और यही वजह है कि सड़कों पर मौतों में भी कोई कमी नहीं आई। जिन विभागों में लोगों को आने के लिए पूंजीनिवेश करना पड़ता है, वे लोग इनमें आने के बाद इस लागत की भरपाई में लग जाते हैं, और जिंदगियों को बचाना किसी की प्राथमिकता नहीं रह जाती। हद तो तब हो जाती है जब कानून में कड़े जुर्माने या कड़ी सजा के नियमों का इस्तेमाल भी नहीं किया जाता, और रोज मौतें बढ़ती चली जाती हैं। 
छत्तीसगढ़ सरकार को आज सुबह के इस हादसे से सबक लेकर सड़कों पर हिफाजत को बढ़ाने की कसम खानी चाहिए, और उसके लिए ठोस काम करना चाहिए। मौतों के आंकड़े एक अधूरी तस्वीर पेश करते हैं। सच तो यह है कि सड़क हादसे की हर मौत से दर्जनभर अधिक लोग ऐसे हादसों के बाद बुरी तरह घायल होकर जिंदगी भर के लिए बेबस हो जाते हैं। चूंकि ऐसे विकलांग और जख्मी लोग खबरों और आंकड़ों में नहीं आते, इसलिए सड़क हादसों के खतरे पूरी तरह समझ नहीं पड़ते हैं। सड़कों को आधी सदी से देखते हुए हमारा यह तजुर्बा है कि सरकार अगर अपनी बेईमानी छोड़ दे, थोड़ी सी मेहनत करने लगे, तो मौत सड़कों को छोड़कर कहीं और रोजगार ढूंढेगी। चाहे गोपीनाथ मुंडे की बेवक्त की यह मौत हो, या छत्तीसगढ़ के अनजान लोगों की रोजाना की मौत हो, सरकार को कागजी श्रद्धांजलि छोड़कर अपनी यह छोटी सी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए, और प्रदेश को, देश को, सुरक्षित बनाना चाहिए। सरकार को सिर्फ पहल करनी होती है, और लोग नियमों को मानने लगते हैं। लेकिन अगर सरकार हेलमेट और सीट बेल्ट, रफ्तार और गाडिय़ों की फिटनेस जैसी मामूली बातों पर भी एक कड़ा रूख अख्तियार नहीं कर सकती, तो यह मौत के साथ नरमी छोड़कर कुछ नहीं। आज गोपीनाथ मुंडे के गुजरने पर श्मशान वैराग्य की तरह हम यह चर्चा कर रहे हैं, और सरकार शायद उनको श्रद्धांजलि देने के लिए अपनी जिम्मेदारी पूरी करने की सोचेगी, और बाकी जिंदगियों पर से खतरा घटाएगी। 

छत्तीसगढ़ में बढ़ रही हिंसा के सामाजिक अध्ययन की जरूरत

2 जून 14
संपादकीय

छत्तीसगढ़ में पिछले चार-छह दिनों में जिस रफ्तार से हत्या और आत्महत्या की खबरें आ रही हैं, वे फिक्र पैदा करती हैं। खासकर कुछ ऐसी खबरें जिनमें शराबी बाप को नाबालिग बेटों ने मार डाला। ऐसी कम से कम दो घटनाएं पिछले चार दिनों में छपी हैं। कल एक शराबी बेटे ने वक्त पर खाना न मिलने पर मां को चूल्हे में झोंक दिया और वह जलकर मर गई। इसके अलावा वैध-अवैध संबंधों, प्रेम संबंधों को लेकर अनगिनत हत्याएं और आत्महत्याएं हो रही हैं। इस सिलसिले पर सोचने-विचारने की जरूरत है और सरकार से परे सामाजिक स्तर पर यह विश्लेषण होना चाहिए कि समाज में इतनी निराशा क्यों है, इतना तनाव क्यों है, और खुद के खिलाफ या दूसरों के खिलाफ इतनी अधिक हिंसा क्यों है। अगर इस बारे में सोचा नहीं जाएगा, तो सरकार का काम तो ऐसे जुर्म हो जाने के बाद उन पर पुलिस और अदालत की कार्रवाई तक सीमित रहेगा। 
भारत में समाज की जिंदगी भी इस कदर सरकार केन्द्रित हो गई है कि लोग हर बात में सरकार की तरफ देखते हैं, और समाज अपनी जिम्मेदारी धीरे-धीरे खो बैठा है। छत्तीसगढ़ में ही दो बातों को लेकर समाज में खासी चर्चा होती है। संपन्न तबका यह मानता है कि राज्य सरकार ने गरीबों को इतने कम दाम पर इतना चावल देना शुरू कर दिया है कि वे बिना किसी मेहनत के भी जिंदा रह सकते हैं। दूसरी तरफ इस राज्य में शराब की खपत या उसकी कमाई, या दोनों ही लगातार बढ़ रही हैं, और इसकी वजह से लोगों की जिंदगी तबाह हो रही है। अब इन दो बातों का आपस में कोई सीधा रिश्ता है या नहीं, और अगर है तो कितना गहरा है, इसके बारे में एक गंभीर समाजशास्त्रीय अध्ययन की जरूरत है। दूसरी तरफ यहां जो हिंसा बढ़ रही है, उसका क्या ऊपर की इन दो बातों से कोई रिश्ता है या नहीं, यह भी एक शोध का विषय है। फिर यह भी देखने की जरूरत है कि क्या इस तरह की हिंसा अकेले छत्तीसगढ़ में बाकी देश के मुकाबले ज्यादा बढ़ रही है, या फिर पूरा देश ऐसी हिंसा से गुजर रहा है? 
ये तमाम सवाल हमको बहुत गंभीर लगते हैं, और राज्य सरकार को अपनी जनकल्याणकारी भूमिका में देश के प्रमुख समाजशास्त्रियों को ऐसे अध्ययन और शोध का जिम्मा देना चाहिए। आज जिंदगी के कम अहमियत वाले समझे जाने वाले पहलुओं पर सरकार की नजर नहीं पड़ती, क्योंकि उनको आंकड़ों में नापा-तौला नहीं जा सकता। लेकिन सामाजिक स्थितियों और मानवीय संबंधों के बारे में अधिक गंभीरता से सोचने की जरूरत है, और आज राज्य सरकार के स्तर पर इस बारे में कोई फिक्र दिखाई भी नहीं पड़ती है। हम छत्तीसगढ़ के आर्थिक-सामाजिक ढांचे में आ रहे ऐसे फर्क के बारे में फिक्र से चर्चा चाहते हैं, ताकि न तो समाज के भूखे मरने की नौबत रहे, न ही समाज निकम्मा हो, और न ही नशे में या किसी और तनाव में समाज में हिंसा बढ़े। इस बारे में सरकार से हमारी उम्मीद से परे, समाज के लोग, सामाजिक संगठन खुद होकर भी गंभीरता से विचार-विमर्श कर सकते हैं। लेकिन ऐसे मामलों के आंकड़ों और उनकी कानूनी जानकारी के आधार पर अधिक दूर तक काम कर पाना सरकार के लिए अधिक आसान होगा।

बलात्कार रोकने के लिए चौतरफा कोशिशें जरूरी

1 जून 2014
संपादकीय

उत्तरप्रदेश में हो रहे बलात्कारों को लेकर खबरें जितनी बड़ी नहीं बन रही हैं, उतनी बड़ी खबरें ऐसे जुर्म को लेकर नेताओं के रूख और बयानों को लेकर बन रही हैं। ऐसे में इस मुद्दे पर सोचना एक मजबूरी हो जाती है, कि बहुत निजी किस्म का यह जुर्म कैसे रोका जाए? 
देश भर के आंकड़ों को देखें, तो यह जाहिर है कि बलात्कार की शिकार लड़कियों और महिलाओं में सबसे बड़ा हिस्सा सबसे गरीब तबके का है, और इसके साथ-साथ दलित महिलाओं के साथ बलात्कार सबसे अधिक हो रहा है। हिंदुस्तान में हजारों बरस से जो जाति व्यवस्था चली आ रही है, उसमें दलित महिला पर हाथ डालना उससे ऊंची जाति के मर्दों का हक माना जाता है, और अभी अधिक वक्त नहीं गुजरा है जब मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के कुछ इलाकों में गांवों में गैरदलित जमींदारों और मालगुजारों के साथ दलित दुल्हन को पहली रात गुजारनी होती थी। इसलिए दलित लड़कियों के साथ बलात्कार को सिर्फ सेक्स अपराध नहीं माना जा सकता क्योंकि इसका एक आर्थिक-सामाजिक पहलू है, और बलात्कार का मनोविज्ञान यह बताता है कि बलात्कार सिर्फ सेक्स के मजे के लिए नहीं किया जाता, बल्कि मर्द अपने से कमजोर जातियों की लड़कियों और महिलाओं पर अपने हिंसक दबदबे को कायम रखने के लिए, अपने सामाजिक बाहुबल को स्थापित करने के लिए, या जारी रखने के लिए बलात्कार करते हैं। ऐसे देश में बलात्कार रोकने के लिए जाति व्यवस्था को तोडऩा जरूरी है, और कमजोर तबकों के हक कायम करना जरूरी है, इन कमजोर तबकों में कमजोर जातियों, कमजोर आर्थिक स्थिति के साथ-साथ कमजोर शैक्षणिक स्थिति की महिलाएं भी आ जाती हैं। इसलिए बलात्कार पुलिस के रोके रुकने वाला जुर्म न होकर, जुर्म के बाद उस पर कड़ी कार्रवाई से होने वाले सामाजिक असर वाला जुर्म है, और इसे रोकना एक लंबा सामाजिक-सिलसिला ही हो सकता है। 
कल ही इस अखबार में हमने ये आंकड़े छापे थे कि किस तरह कई राज्य बलात्कार के मामलों में सजा तक पहुंचने में बहुत पीछे हैं। छत्तीसगढ़ की ही बात करें, तो यहां प्रति लाख महिला आबादी पर बलात्कार दो दर्जन राज्यों से अधिक है, और बलात्कार पर सजा तक पहुंचने में छत्तीसगढ़ दो दर्जन राज्यों से पीछे है। इन आंकड़ों से निकलने वाले मतलब पर हम एकदम से छलांग लगाना नहीं चाहते, क्योंकि यह भी हो सकता है कि यहां रिपोर्ट दर्ज करने में आना-कानी न होती हो, और कमजोर मामले भी दर्ज हो जाते हों, जो कि सजा तक पहुंचने के लायक न रहते हों। इसलिए हम आंकड़ों का बहुत अधिक विश्लेषण करना नहीं चाहते, और दूसरी तरफ यह समझते हैं कि सामाजिक जागरूकता, महिलाओं के हक का सम्मान, जाति व्यवस्था को तोडऩा, पुलिस और अदालत की कड़ी कार्रवाई से ही बलात्कार घट सकते हैं। हमने पहले भी यह सुझाया था कि समाज और सरकार की तरफ से जागरूकता के ऐसे अभियान चलाने की जरूरत है जिससे इस जुर्म के बाद की सजा, और परिवार की तबाही का अंदाज मुजरिमों को हो सके। जिनके मन में बलात्कार की हसरत उठ रही हो, उनको सरकार और समाज के जागरूकता अभियान से यह दिखता रहे कि कितने बरस की जेल, कितनी सामाजिक प्रताडऩा, और परिवार की कितनी तबाही की गारंटी एक बलात्कार के बाद हो जाएगी।
न तो हम बलात्कार को सरकारी नाकामयाबी मानकर किसी राज्य सरकार पर हमला करना चाहते, और न ही हम इसे सिर्फ एक निजी सेक्स-अपराध मानकर सरकारों को किसी भी जिम्मेदारी से आजाद करना चाहते हैं। समस्या का समाधान इन दो सिरों के बीच में कहीं पर है, और महिलाओं पर होने वाले ऐसे जुर्म कम करने के लिए चौतरफा कोशिश करनी होगी। तकलीफ की बात यह है कि ऐसी आसान कोशिशों में से किसी एक तरफ से भी कोई कोशिश होते दिख नहीं रही है।