7 जून 2014
संपादकीय
दिल्ली से बड़ी दिलचस्प खबर है कि लोकसभा में कांगे्रस सांसदों के अकाल के चलते हुए एनडीए और यूपीए के बाहर की पार्टियां मिलकर विपक्ष का एक मोर्चा बनाने की सोच रही हैं। अब चुनाव निपट चुके हैं, और एनडीए की सरकार के सामने खड़े होने के लिए अगर यूपीए से परे का एक मोर्चा बनता है तो यह भारतीय संसदीय राजनीति में एक नए किस्म की बात होगी। चुनाव के पहले तो ऐसे मोर्चे बनते आए हैं, बनते रहते हैं, और बनते रहेंगे, लेकिन प्रमुख विपक्षी दल विहीन लोकसभा में बाकी पार्टियां मिलकर एनडीए और यूपीए से परे एक मोर्चा बना लें, यह बिल्कुल ही अलग तस्वीर होगी।
लेकिन ऐसा मोर्चा बेहतर और जरूरी इसलिए है कि कांगे्रस सुधरते दिख नहीं रही है, और उसके बिना यूपीए की कोई जिंदगी भी मुमकिन नहीं है। आज अगर यूपीए के कुछ साथी कांगे्रस से परे जाने की सोचें भी, तो ऐसे शरद पवारों की जरूरत आज भारतीय संसद में किसको है? आज तो जयललिता जैसे भारी-भरकम संसदीय दल वाले लोग राज्यसभा में एनडीए को जरूरी बहुमत तक पहुंचाने के लिए साथ खड़े दिख रहे हैं, और पवार के साथी, देश के और बहुत से दिग्गज, किंगमेकर न बन पाने के लिए मलाल करते बैठे हैं। ऐसे में लोकसभा में एक मजबूत विपक्ष के लिए अगर कांगे्रस-भाजपा के साथियों से परे की पार्टियां एक मोर्चा बनाती हैं, तो वह मोर्चा भारतीय संसदीय लोकतंत्र के लिए कई वजहों से अच्छा होगा। दरअसल पिछले दस बरस के यूपीए राज, और दस बरस के एनडीए-विपक्ष के चलते इन दोनों खेमों के बीच इतनी बुरी कटुता हो चुकी है, कि लोकसभा में, या राज्यसभा में भी, इनके बीच किसी स्वस्थ बहस की गुंजाइश कम ही दिखती है। और इनके बीच टकराव के लिए पिछले दस बरस का इतिहास मौजूद है। इसलिए आज संसद के भीतर अगर इन दो खेमों से परे का एक मोर्चा रहेगा तो वह यूपीए-कांगे्रस के मुकाबले जुबान खोलने और हमले करने का अधिक हक रखेगा, उसके हमले भरोसेमंद भी होंगे, और उसकी बातों को खारिज करना मोदी सरकार के लिए आसान भी नहीं होगा।
भारत जैसे लोकतंत्र में चुनावी और संसदीय राजनीति में यह बारीक फर्क करके देखना जरूरी है कि चुनाव के पहले अगर कोई मोर्चा नहीं भी बन पाता है, क्योंकि ऐसे मोर्चे के संभावित भागीदार एक साथ चुनाव लडऩे की हालत में नहीं रहते, तो भी चुनाव के बाद संसद के भीतर ऐसा मोर्चा बनना चाहिए जो कि सत्ता के खिलाफ मजबूती से विश्वसनीय आवाज उठा सके। ऐसा न होने पर कमजोर और बेसाख विपक्ष सरकार को मनमानी का एक मौका और हक दे देता है।

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