8 जून 2014
संपादकीय
कांगे्रस पार्टी के पास चूंकि अभी खासा वक्त खाली है, इसलिए उसके नेता तरह-तरह के नए कामों में अपने को व्यस्त रख रहे हैं। दिग्विजय सिंह ट्वीट करते हैं कि आने वाले महीनों में किस-किस खेल के कौन-कौन से अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट होने जा रहे हैं, और खेल प्रेमियों के लिए अच्छे दिन आने वाले हैं। गिने-चुने जीतने वाले कांगे्रस सांसदों में से एक, शशि थरूर, कांगे्रस प्रवक्त की हैसियत से सार्वजनिक बयान देते हुए नरेन्द्र मोदी की कुछ बातों के लिए तारीफ करते हैं, और उनकी इस तारीफ को सुनकर, लोकसभा चुनाव में चौथे नंबर पर आकर जमानत तक जब्त करा बैठे एक दूसरे बड़बोले कांगे्रस सांसद मणिशंकर अय्यर ने शशि थरूर को करीब-करीब भाजपा में जा चुका बताया है, और कहा है कि संसद में कांगे्रस का एक सदस्य कम गिना जाना चाहिए। इस तेजाबी जुबान, और शशि थरूर की शिष्टाचार वाली जुबान के बीच के फर्क को समझने की जरूरत है।
नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बनने के बाद से अब तक जो रूख दिखा रहे हैं, जो बयान दे रहे हैं, जो फैसले ले रहे हैं, और काम का जो तौर-तरीका कायम कर रहे हैं, उसके बीच अब तक उन्होंने ऐसी कोई भी चूक नहीं की है कि उनकी आलोचना करने के लिए जिनकी हसरत अभी निकल नहीं पा रही है, उनको कोई मौका मिले। हम शशि थरूर की इस बात से सहमत हैं कि विरोधी की अच्छी बातों की तारीफ करके, और गैरजरूरी या बेबुनियाद आलोचना न करके, हर किसी को अपनी खुद की विश्वसनीयता बनाए रखना चाहिए, ताकि जिस दिन आलोचना का मौका आए, उस दिन आलोचक की विश्वसनीयता बची रहे। यह एक बहुत साधारण समझबुझ की, और सही बात, यह एक और बात है कि एक कुनबे की चापलूसी ही जिस पार्टी में सबसे बड़ी काबिलीयत है, उस पार्टी के भीतर न्यायसंगत और तर्कसंगत बातों की अधिक कद्र हो भी नहीं सकती।
राजनीति में आकर लोग इतने बेदिमाग और इतने बददिमाग कैसे हो जाते हैं, कैसे वे इतने तंगदिल और तंगनजर हो जाते हैं, यह देखना हैरान करता है। नरेन्द्र मोदी ने चुनावी नतीजे आने के बाद से अब तक जो रूख दिखाया है, वह ऊपर के इन चारों विशेषणों के ठीक खिलाफ है। उन्होंने लोगों को दफ्तर साफ-सुथरा रखने कहा, काम में खूब मेहनत करने को कहा, लोगों को अपने पैर छूने की मनाही की, रिश्तेदारों को स्टाफ में रखने को मना किया, पड़ोसी देशों से रिश्ते सुधारने की कोशिश की, अपने मंत्रियों और सांसदों को फालतू के बयान न देने को कहा। ऐसी और भी कुछ बातें उन्होंने लंबे समय बाद कायम कीं, जिनको भारतीय राजनीतिक जीवन में लोगों ने, पार्टियों ने, कूड़ेदान में फेंक दिया था। उन्होंने अफसरों से हौसले और ईमानदारी से काम करने को कहा, और खुद मेहनत की एक मिसाल वे कायम कर रहे हैं। उनका कोई भी बयान, या कोई भी फैसला साम्प्रदायिक नहीं दिख रहा, और कांगे्रस के राज वाले पुणे में जाहिर तौर पर जो साम्प्रदायिक हत्या हुई है, उसे राज्य सरकार ने तो आम कत्ल दर्ज किया है, दूसरी तरफ मोदी सरकार ने दिल्ली से पूछा है कि इसे साम्प्रदायिक हिंसा क्यों दर्ज नहीं किया गया? अब पलभर को यह सोचें कि महाराष्ट्र सरकार वाला फैसला मोदी का किया हुआ रहता, तो देश भर के मोदी-विरोधी उन पर चढ़ बैठे रहते कि साम्प्रदायिक हिंसा को उन्होंने साम्प्रदायिक दर्ज नहीं होने दिया।
आज मोदी के विरोधी और आलोचकों को अपनी खुद की विश्वसनीयता बचाए रखनी चाहिए। हम इस बात को इस अखबार में दर्जनों बार पहले भी लिख चुके हैं कि किसी के समर्थन या विरोध में झंडा उठाकर चलने वालों की अपनी खुद की साख अगर नहीं बची रहेगी, तो उनके झंडों का कोई असर भी नहीं होगा। कांगे्रस को हर दिन मोदी के खिलाफ कुछ बोलने की हड़बड़ी छोडऩी होगी, क्योंकि देश की जनता कांगे्रस के कुछ कहे बिना भी अपने आंख-कान का इस्तेमाल जानती है, और करती भी है। इसलिए मोदी-विरोधियों को उनकी प्रधानमंत्री की हैसियत से पहली गलती की राह देखनी चाहिए, तब तक के लिए यह गाना याद रखना चाहिए कि ये तो पब्लिक है, ये सब जानती है...
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