6 जून 2014
संपादकीय
भारत की राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले देश-विदेश के बहुत से लोगों की निगाहें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर लगी हैं कि पुणे में एक हमलावर हिंदू संगठन के लोगों ने जिस तरह एक मुस्लिम इंजीनियर की सड़क पर हत्या की है, उस पर उनका क्या कहना है। यह उम्मीद जायज है, क्योंकि भारत में ऐसी खुली और हत्यारी साम्प्रदायिकता के बारे में प्रधानमंत्री का रूख सामने आना चाहिए। और खासकर नरेन्द्र मोदी को लेकर लोगों में इंतजार इसलिए भी बेसब्र हो रहा है कि 2002 के दंगों को लेकर अब तक खलनायक की तरह दर्ज होते आए मोदी का नया रूख क्या है, इसका इंतजार भविष्य का इतिहास भी दर्ज करने के लिए कर रहा है। लेकिन यह समझने की जरूरत है, और यह याद रखना चाहिए कि भारत में हर कुछ हफ्तों में किसी न किसी राज्य में होने वाली साम्प्रदायिक हत्या, या जातीय संघर्ष में हत्या को लेकर क्या देश के प्रधानमंत्री हमेशा ही बयान देते आए हैं? खासकर तब जब मौत कुल एक हुई हो, मामला दर्ज हो गया हो, और दर्जन भर लोग गिरफ्तार भी हो गए हों।
भारत के संघीय ढांचे में यह याद रखने की जरूरत है कि राज्य में कानून-व्यवस्था का अधिकार, और जिम्मा, दोनों ही राज्य सरकार के हाथ है। और ऐसे में महाराष्ट्र में हुई इस हिंसा को लेकर, साम्प्रदायिक तनाव को लेकर देश का प्रधानमंत्री अगर आनन-फानन कुछ कहे, तो वह राज्य के मामलों में केंद्र की दखल भी समझी जा सकती है, और यह कांगे्रस अगुवाई वाली राज्य सरकार की नाकामयाबी पर केंद्र सरकार द्वारा आलोचना भी ठहराई जा सकती है। प्रधानमंत्री का न तो ऐसी एक-एक हत्या पर मीडिया की उम्मीद पूरी करने के लिए कुछ कहना ठीक है, और न ही जांच के बीच में प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री किसी को जुर्म के बारे में अपने विचार रखने चाहिए। देश के हर जुर्म की जांच या तो राज्य की एजेंसी करती है, या केंद्र सरकार की। ऐसे में सत्ता चला रहे किसी नेता को अपनी अटकल, या अपनी राय रखनी भी नहीं चाहिए।
देश के बहुत से लोगों को, खासकर जो लोग मोदी के आलोचक रहे हैं, या कि हैं, उन सबको इस बात की हड़बड़ी है कि अब तक मोदी कोई गलत काम कर नहीं पाए हैं। ऐसा भी नहीं कि मोदी से कोई गलती होगी ही नहीं, या वे गलत काम करेंगे ही नहीं, ये दोनों ही बातें आगे चलकर सामने आ सकती हैं। लेकिन आज देश के जनमत का तकाजा यह है, चुनावी नतीजों का हुक्म यह है कि मोदी को अपने काम की शुरूआत करने दी जाए, और उनको अपने-आपको साबित करने का एक मौका दिया जाए। इस साबित करने में देश के अल्पसंख्यकों, खासकर मुस्लिमों के बारे में उनके अब के रूख का पता भी चलेगा, दूसरे देशों के साथ रिश्तों पर सोच का खुलासा भी होगा, और देश के बड़े कारोबारियों को उनसे कोई रियायत मिलती है या नहीं, इसका खुलासा भी होगा। लेकिन इन सब बातों के लिए नरेन्द्र मोदी हों, या कि कोई और प्रधानमंत्री, उनको एक मौका तो देना ही होगा, और यह मौका राजनीतिक और सरकारी जीवन की जुबान में सौ दिनों का हनीमून कहलाता है। किसी को पहले सौ दिन काम करने का मौका मिलना चाहिए, और उसके बाद आलोचक पारखियों को अपनी कसौटी का पत्थर बाहर निकालना चाहिए। पुणे की हिंसा इस देश के चेहरे पर कालिख पोत गई है, लेकिन आज मोदी के आलोचकों को यह याद रखना होगा कि अभी कुछ महीने पहले ही भाजपा-विरोधी सपा के राज वाले उत्तरप्रदेश में हुए साम्प्रदायिक दंगों में दर्जनों लोग मारे गए थे, दसियों हजार बेघर हुए थे, और सैकड़ों लोग आज भी अपने घर लौटने की हालत में नहीं हैं। पिछले कैलेण्डर बरस, 2013 में देश की हर तीसरी साम्प्रदायिक हिंसा उत्तरप्रदेश में हुई, और पहले दस महीनों में साम्प्रदायिक हिंसा की 143 मौतों में से 95 मौतें अकेले उत्तरप्रदेश में हुईं। ऐसे में, ऐसे देश में, हर हत्या पर प्रधानमंत्री से बयान की उम्मीद करना एक खतरनाक राजनीतिक सिलसिला होगा, और मीडिया की भूख मिटाने के लिए ऐसा करना ठीक भी नहीं होगा। मोदी का मूल्यांकन करने का वक्त आए दिन आते रहेगा, लेकिन देश के संघीय ढांचे में बयानों का अतिउत्साह कोई समाधान नहीं हो सकता।

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