सरकार जरा सा चाहे तो मौत को सड़कों से परे रोजगार ढूंढना होगा

3 जून 2014
संपादकीय
आज की सुबह केन्द्रीय मंत्री गोपीनाथ मुंडे की सड़क हादसे में मौत से हुई। अभी-अभी वे केन्द्र सरकार में आए थे और शहर के भीतर एक दूसरी कार की टक्कर के बाद वे अस्पताल पहुंचने के पहले गुजर गए। उनकी इस तरह बेवक्त की मौत उनके परिवार के एक दूसरे पुराने हादसे की याद भी ताजा करती है कि किस तरह उनके बहनोई, भाजपा के सबसे बड़े नेताओं में से एक, प्रमोद महाजन को उनके भाई ने ही उस वक्त घर में घुसकर गोली मारी थी, जब उन्हें भाजपा में सबसे अधिक संभावनाओं वाला नौजवान नेता माना जा रहा था। 
हर मौत तकलीफदेह होती है, लेकिन जब मौत बेवक्त की होती है, तो वह अधिक तकलीफदेह होती है, और जब वह किसी मशहूर व्यक्ति की होती है, तो उससे जुड़े हुए बहुत से लोगों के लिए भी तकलीफ की होती है। गोपनाथ मुंडे के साथ जो हादसा हुआ है, उसे लेकर देश के हर प्रदेश की सरकार को कुछ देर के लिए अपनी जिम्मेदारी के बारे में सोचना चाहिए, क्योंकि सड़कों पर इंतजाम राज्य सरकारों का काम है, और हिन्दुस्तान दुनिया में सबसे अधिक सड़क हादसों वाला देश है। हम छत्तीसगढ़ में हर दिन औसतन आधा दर्जन दुर्घटना-मौतें देखते हैं, और इनमें संपन्न और ताकतवर तबके की बड़ी गाडिय़ों से लेकर गरीब लोगों से लदी हुईं मालवाहक गाडिय़ों तक, हर किस्म की गाडिय़ों की तकलीफदेह तस्वीरें सामने आती हैं। जब मरने वालों की गिनती अधिक होती है, या उनमें कोई चर्चित लोग जुड़े होते हैं, तो राज्यपाल और मुख्यमंत्री की तरफ से शोक संदेश आते हैं। मरने वाले गरीब होते हैं, तो उनके लिए आर्थिक मदद की खबर जारी होती है। 
लेकिन आज जब एक प्रमुख नेता इस तरह से गुजरे हैं, और कल तक उनके अंतिम संस्कार की खबरें मीडिया में रहेंगी, तो राज्य सरकारों को सड़क हादसों को घटाने के बारे में सोचना चाहिए। और सच तो यह है कि सड़क दुर्घटनाओं को कम करने के लिए किसी रॉकेट-साईंस की जरूरत नहीं है, एक राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है कि सड़कों को काबू करने वाले दो विभागों में भ्रष्टाचार खत्म करके उनको ईमानदारी से अपना काम करने दिया जाए। बहुत छोटे-छोटे उपकरणों से तेज रफ्तार गाडिय़ों के ऐसे चालान हो सकते हैं, जिनके चलते आगे की दुर्घटनाएं टलें। लेकिन अविभाजित मध्यप्रदेश के वक्त से हमारा यह देखा हुआ है कि आरटीओ और ट्रैफिक को सरकार नियमित वसूली का एक जरिया बनाकर चलती है, और चाहे कांग्रेस की सरकार रही हो, या भाजपा की, इस वसूली में कोई कमी नहीं आई, और यही वजह है कि सड़कों पर मौतों में भी कोई कमी नहीं आई। जिन विभागों में लोगों को आने के लिए पूंजीनिवेश करना पड़ता है, वे लोग इनमें आने के बाद इस लागत की भरपाई में लग जाते हैं, और जिंदगियों को बचाना किसी की प्राथमिकता नहीं रह जाती। हद तो तब हो जाती है जब कानून में कड़े जुर्माने या कड़ी सजा के नियमों का इस्तेमाल भी नहीं किया जाता, और रोज मौतें बढ़ती चली जाती हैं। 
छत्तीसगढ़ सरकार को आज सुबह के इस हादसे से सबक लेकर सड़कों पर हिफाजत को बढ़ाने की कसम खानी चाहिए, और उसके लिए ठोस काम करना चाहिए। मौतों के आंकड़े एक अधूरी तस्वीर पेश करते हैं। सच तो यह है कि सड़क हादसे की हर मौत से दर्जनभर अधिक लोग ऐसे हादसों के बाद बुरी तरह घायल होकर जिंदगी भर के लिए बेबस हो जाते हैं। चूंकि ऐसे विकलांग और जख्मी लोग खबरों और आंकड़ों में नहीं आते, इसलिए सड़क हादसों के खतरे पूरी तरह समझ नहीं पड़ते हैं। सड़कों को आधी सदी से देखते हुए हमारा यह तजुर्बा है कि सरकार अगर अपनी बेईमानी छोड़ दे, थोड़ी सी मेहनत करने लगे, तो मौत सड़कों को छोड़कर कहीं और रोजगार ढूंढेगी। चाहे गोपीनाथ मुंडे की बेवक्त की यह मौत हो, या छत्तीसगढ़ के अनजान लोगों की रोजाना की मौत हो, सरकार को कागजी श्रद्धांजलि छोड़कर अपनी यह छोटी सी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए, और प्रदेश को, देश को, सुरक्षित बनाना चाहिए। सरकार को सिर्फ पहल करनी होती है, और लोग नियमों को मानने लगते हैं। लेकिन अगर सरकार हेलमेट और सीट बेल्ट, रफ्तार और गाडिय़ों की फिटनेस जैसी मामूली बातों पर भी एक कड़ा रूख अख्तियार नहीं कर सकती, तो यह मौत के साथ नरमी छोड़कर कुछ नहीं। आज गोपीनाथ मुंडे के गुजरने पर श्मशान वैराग्य की तरह हम यह चर्चा कर रहे हैं, और सरकार शायद उनको श्रद्धांजलि देने के लिए अपनी जिम्मेदारी पूरी करने की सोचेगी, और बाकी जिंदगियों पर से खतरा घटाएगी। 

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