गरीबों के हक लूटने, बेचने वाले लोगों को सजा मिलना जरूरी

संपादकीय
23 जून 14
मध्यप्रदेश में सरकारी नौकरियों में मंत्री के स्तर पर, और शायद मुख्यमंत्री और उनके परिवार के स्तर पर भी जो धांधली हुई है, उससे भाजपा के साफ-सुथरे कामकाज का नारा गंदा हुआ है। मंत्री तो हाईकोर्ट की निगरानी में चल रही विशेष जांच के दौरान गिरफ्तार करके जेल भेजे जा चुके हैं, और सैकड़ों दूसरे लोग गिरफ्तारी के अलग-अलग दौर में हैं। कांग्रेस के आरोप हैं कि मुख्यमंत्री का घर-दफ्तर, उनका निजी स्टॉफ और परिवार सैकड़ों नियुक्तियों की धांधली के पीछे है। हम अभी जांच के बीच अपना कोई नतीजा निकालना नहीं चाहते, लेकिन यह बात जगजाहिर है कि सरकारी नियुक्तियों में एक-एक के लिए दसियों लाख का लेन-देन होता है, और विपक्ष का यह आरोप बहुत ही सनसनीखेज भी है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की ससुराल के शहर गोंदिया के कोई डेढ़ दर्जन लोग आरटीओ में नियुक्त किए गए हैं।
अधिक मांग वाले कॉलेजों के दाखिले में मध्यप्रदेश में भारी धांधली पहले ही सामने आ चुकी है और मेडिकल कॉलेज की भर्ती पुलिस की जांच और अदालत तक है, और उसमें भी बड़ी संख्या में लोग जेल पहुंच चुके हैं। करोड़ों-अरबों के ऐसे दाखिले-नियुक्ति के घोटाले से जनता का भरोसा लोकतंत्र पर से पूरी तरह खत्म हो जाता है। एक तो यह कि जो काबिल लोग हैं, वे न पढ़ाई का मौका पाते, और न नौकरी। जो रिश्वत देने के लायक हैं, या जिनकी राजनीतिक पहुंच है, वैसे ही लोग अगर सरकारी कुर्सियों पर काबिज होते हैं, वैसे ही लोग अगर मेडिकल कॉलेज पहुंचते हैं, तो देश और प्रदेश का भविष्य साफ दिखता है। ऐसे लोग अपने पूंजीनिवेश की वसूली के लिए आगे जाकर कैसा काम करेंगे यह जाहिर है। दूसरी तरफ गरीब और बेबस छात्र-छात्राएं, या बेरोजगार जब कॉलेज में सीट या सरकारी नौकरी की कुर्सी नहीं पाते, और वे जब इन जगहों को बिकते और नीलाम होते देखते हैं, तो उन्हें सरकार से उसी तरह की नफरत होती है, जैसी नफरत के चलते पूरे देश में लोगों ने यूपीए और कांग्रेस का सफाया कर दिया। मध्यप्रदेश में जिस तरह भाजपा का एक मंत्री इस सिलसिले में गिरफ्तार हुआ है, और बड़े-बड़े भाजपा-संबंधी जांच और शक के घेरे में हैं, उसका भुगतान मध्यप्रदेश में भाजपा को आज नहीं तो कल करना पड़ेगा।
न सिर्फ मध्यप्रदेश और न सिर्फ भाजपा की सरकार वाला राज्य, जहां कहीं भी सीटों और कुर्सियों की ऐसी बिक्री और नीलामी होगी, वहां-वहां सरकारें जाएंगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश के अच्छे दिन आने का नारा लगा-लगाकर सत्ता पर आए हैं, और भाजपा पूरी जिंदगी से शुचिता और सुशासन का नारा लगाते आई है। अब मध्यप्रदेश में भ्रष्ट लोगों के अगर अच्छे दिन आए हैं, और सरकार का ऐसा हाल दिखाई पड़ रहा है, तो यह आने वाले बरसों के लिए भाजपा के लिए खतरे की घंटी से कम कुछ नहीं है। और बाकी प्रदेशों में भी चाहे जिस पार्टी की सरकार हो, अगर गरीबों के हक के साथ, काबिल लोगों के हक के साथ ऐसी बेइंसाफी होगी, तो वह आगे-पीछे पकड़ में भी आएगी, और ऐसा करने वाली सरकार सत्ता से भी जाएगी। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए, और इसके पीछे जिम्मेदार जो लोग भी हैं, जिस प्रदेश में भी हैं, जिस सरकार और पार्टी में हैं, उन सबको जेल जाना चाहिए। हम अभी कांग्रेस के आरोप या भाजपा की सफाई पर नहीं जा रहे, लेकिन हम यह मानते हैं कि मध्यप्रदेश का हाईकोर्ट जब अपनी निगरानी पुलिस के एक विशेष जांच दल से जांच करवा रहा है, तो वहां पर गरीबों के लूटे हुए हक के लुटेरों को सजा जरूर मिलेगी,  और बाकी प्रदेशों के लोगों को उससे एक नसीहत मिलेगी। 

आजकल: कोई दिलासा नहीं, और पहाड़ सी जिंदगी

23 जून 2014

सुनील कुमार

पिछले कुछ बरसों में हर हफ्ते का यह कॉलम हर तिमाही का भी नहीं हो पाया, और हर छमाही का भी नहीं। मन कई तरह के अलग-अलग कामों में भटकने लगता है, और लिखना छूट जाता है, और कभी पिक्सटून बनाने लगता है, तो कभी कुछ और काम करने लगता है। फिर पिछले कुछ बरसों में फेसबुक और ट्विटर पर अपने विचार लिखना अखबार में हर हफ्ते कॉलम लिखने के बजाय आसान इसलिए होता है कि कुछ दर्जन अक्षरों से कहीं भी बैठे हुए, किसी भी वक्त यह काम किया जा सकता है। एक बार फिर यह कोशिश शुरू कर रहा हूं कि किसी तरह हर हफ्ते यह कॉलम लिख सकूं। एकदम आखिरी दिन, सोमवार की दोपहर ही इसे लिखने की जिद महीनों तक इसे दूर खिसका देती है, लेकिन आखिरी पलों के पहले लिखने की आदत आ नहीं पाई। एक बार और हाथ आजमाकर देख रहा हूं।
कुछ सवाल अकसर परेशान करते हैं। चौराहों पर टै्रफिक की लालबत्ती पर भीख मांगते बच्चों, बूढ़ों, विकलांगों, या बीमारों को कुछ दिया जाए, या नहीं? यह फिक्र की जाए कि चौराहों पर पूरे वक्त डीजल के धुएं के बीच मांगते हुए लोगों की सेहत वहां बिगड़ती अधिक है, या वहां उनका पेट भरता है? छोटे बच्चों को, अपने खुद के दुधमुंहे बच्चों को, या भाड़े पर लाए गए किराए के बच्चों को गोद में ली हुई महिलाएं जब गाडिय़ों के बीच दौड़ती हैं, तो उन्हें कुछ सिक्के देना बेहतर है, या कि वहां न देकर उन्हें किसी और जगह की तरफ जाने को कहना ठीक है ताकि छोटे बच्चे गाडिय़ों के धुएं से बच सकें?
फिर कई बार यह भी लगता है कि क्या यह फिक्र सचमुच उन लोगों की सेहत की है, या कि उनकी गरीबी और बेहाली कुछ अधिक परेशान करती है, अपनी एसी गाड़ी के भीतर से उन्हें तपती धूप में देखते हुए?
यह भी लगता है कि चौराहों पर पहला हक किनका होना चाहिए, उनका जो सड़कों का टैक्स देते हैं, या उनका जो कि सड़कों पर पेट भरने का रास्ता ढूंढते हैं? इसी तरह रेलवे प्लेटफॉर्म से लेकर बस अड्डे तक, और बगीचों तक यह लगता है कि वहां भूखे और गंदे दिखते बेघर और गरीब लोगों का जिंदा रहने का हक अधिक जरूरी है, या कि एक साफ-सुथरा नजारा? और फिर बेघर और बेसहारा लोग चौराहों से, फुटपाथों से, स्टेशन और बगीचों से हटा दिए जाएं, तो वे रहेंगे कहां? खाएंगे कहां? और कमाएंगे कहां?
ऐसे में लगता है कि बीमार और विचलित लोगों से लेकर बूढ़ों और बेसहारा बच्चों तक के लिए सड़क और स्टेशन से बेहतर कोई इंतजाम समाज और सरकार को करना चाहिए, ताकि वे लोग कम से कम सबसे कम जरूरतों वाले इंसान की तरह तो जी सकें। उनको कहीं नहलाया जा सके, कहीं पर वे सो सकें, खाना खा सकें, और मरने तक बिना जुर्म किए रह सकें। यह जिम्मेदारी आखिर होनी किसकी चाहिए? सरकार की, जिसकी कि हर बात के लिए जिम्मेदारी होती ही है, या कि समाज की, जो कि कई मामलों में खुद होकर कुछ जिम्मेदारियां उठाता भी है।
ऐसे बहुत से सवाल तब परेशान करते हैं जब कोई बीमार, जख्मी, या टूटा हुआ हाथ कार के शीशे को खटखटाता है, और कुछ मांगता है। ऐसे सवाल तब भी परेशान करते हैं जब स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर कुछ खाने-पीने की सोचें और उसी वक्त भूखे पेटों पर टिके हुए कुछ सवालिया चेहरे आकर सामने खड़े हो जाएं। लेकिन आगे-पीछे ये सवाल हवा में घुल भी जाते हैं, जब ऐसे लोग नजरों से दूर हो जाते हैं।
सरकार के कुछ लोगों का यह भी कहना रहता है कि बेसहारा लोगों को जब ले जाकर उनके लिए बनाए गए किसी आश्रम में रखा जाता है, तो वे वहां के नियम-कायदों के तहत अधिक वक्त तक रहना नहीं चाहते और वे बाहर निकलकर अपनी मर्जी की जिंदगी जीना चाहते हैं, अधिक कमाना चाहते हैं, या भूखे पेट भी अपने सिर पर अपना खुद का आसमान चाहते हैं।
हिंदुस्तान में ही नहीं, दुनिया के सबसे विकसित देशों में से एक अमरीका में फुटपाथों पर बिखरे हुए इस तरह के लोग वहां की जिंदगी के आराम के सामने सवाल की तरह खड़े हो जाते हैं। कभी किसी बगीचे पर ऐसे लोगों की भीड़ पहुंचकर पूरे के पूरे बगीचे पर कब्जा कर लेती है और यह साबित करती है कि बगीचा घरबार वाले लोगों के मुकाबले बेघर लोगों के लिए अधिक जरूरी है, और उनका पहला हक जिंदा रहने के लिए बगीचे पर कब्जा करना है, बजाय लोगों के टहलने और घूमने के।
इसी तर्क के आधार पर हिंदुस्तान में भी रेलवे स्टेशनों पर पहला हक उनका माना जा सकता है, जिनके पास जिंदा रहने को और कोई जगह नहीं है, और स्टेशन जिन्हें पानी, पखाना, रौशनी, छत, और पक्की फर्श देता है।
हिंदुस्तान एक तरफ तो शहरी ढांचों को अधिक से अधिक संपन्न बनाते हुए अपने-आपको अब विकसित देश गिनता है, लेकिन दूसरी तरफ शहरी समाज में ही जो सबसे कमजोर लोग हैं, ऐसे शायद आबादी के एक फीसदी से भी कम लोगों के लिए सामाजिक या सरकारी पहल दिखाई नहीं पड़ती। ऐसे लोग किसी एक टोली की शक्ल में वोटों का ग_ा नहीं रहते, इसलिए उनकी कोई गिनती नहीं रहती। वे इतने बिखरे रहते हैं, इतने बेघर रहते हैं कि उनके पास कोई शिनाख्त भी नहीं होती। किसी भी शहर में अगर ऐसे बेघर लोग एक साथ रहते, तो शायद एक वार्ड बन जाते, और उनके वोटों की कीमत एकदम से लोगों को दिखने लगती।
बात छोटी है, बहुत मामूली भी है, बदमजा भी है, लेकिन ऐसी जिंदगियां चाहे जितनी भी हों, उनके नजरिए से देखें तो पहाड़ सी लंबी जिंदगी अगर बिना छत बिना किसी सहारे के काटना हो, तो उनकी जगह अपने को रखकर सोचें कि हम कितने दिन ऐसे काट सकेंगे? दुनिया में अलग-अलग कई लोगों ने यह कोशिश की है कि एक हफ्ते, एक महीने, या एक बरस अपने देश के सबसे गरीब की तरह गुजारकर देखें कि वे जिंदगी कैसे काट सकते हैं। लेकिन ऐसे प्रयोगों में भी दरअसल लोगों के सामने एक यह दिलासा तो रहता ही है कि आने वाले उतने दिनों के बाद वे फिर अपनी जिंदगी में लौटने वाले हैं। जो असली बेसहारा होते हैं, उनके पास ऐसा कोई दिलासा नहीं होता, और कई बार पहाड़ सी लंबी जिंदगी होती है, और होता है खाई की तरह गहरा भूखा पेट, बदन की चमड़ी पर बिखरी कोई बीमारी, और उसके खासे भीतर छलनी फेंफड़े। इनमें से बहुत से लोगों के तन-मन, अलग-अलग दर्जों तक विचलित रहते हैं, और किसी मानसिक चिकित्सा से ठीक होने की कोई संभावना तक टटोलने की गुंजाइश भी पहाड़ सी लंबी इन जिंदगियों में नहीं होतीं। ऐसे सबसे कमजोर तबकों को कारों की अगल-बगल की खिड़कियों से अनदेखा करके देश सामने की खिड़की से देखते हुए किस तरफ आगे बढ़ सकता है?

गंगा को संकुचित-धार्मिक नहीं, वैज्ञानिक नजरिए की जरूरत

संपादकीय
22 जून 2014

दिल्ली की खबर है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की गंगा-सफाई की महत्वाकांक्षी सोच के मुताबिक केंद्रीय सिंचाई मंत्री उमा भारती एक बैठक बुलाने जा रही हैं जिसमें नदियों के मामले से जुड़े हुए विभागों और विशेषज्ञों के साथ-साथ 'साधु-संतोंÓ को बुलाने की बात भी उमा भारती ने की है। गंगा की सफाई और उसके किनारे के इलाकों में सुधार के मुद्दे तकनीकी और वैज्ञानिक तो हैं ही, वे गंगा तट की संस्कृति और सभ्यता से भी जुड़े हुए हैं, और जिन लोगों को उमा भारती साधु-संत के दर्ज में रखकर इस गंगा-मंथन में बुलाना चाहती हैं, वे भी गंगा तट के धार्मिक रीति-रिवाजों में दखल रखते हैं, और इसलिए इस विचार-मंथन में उनकी मौजूदगी महज धार्मिक नहीं कही जा सकती। लेकिन उमा भारती का पुराना इतिहास यह बताता है कि मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने जिस तरह मुख्यमंत्री के दफ्तर की मेज पर ही एक मंदिर बना डाला था, जिस तरह उन्होंने मुख्यमंत्री निवास पर एक पक्का मंदिर बनवा लिया था, और जिस तरह वे अयोध्या से लेकर अब तक लगातार धर्म को, आस्था को लोकतंत्र और कानून से ऊपर मानती हैं, उससे उनके गंगा-मंथन को लेकर कई तरह की फिक्र खड़ी होती है।
यह बात सही है कि धर्म और सामाजिक रीति-रिवाज पर काबू पाकर, उनमें से नुकसानदेह हिस्सों को सुधारकर अगर पर्यावरण को बचाया जा सकता है, तो उसके लिए धर्म से जुड़े लोगों की मदद लेने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन आज मोदी सरकार के तहत देश की सबसे बड़ी खुफिया एजेंसी की रिपोर्ट को लेकर जिस तरह देश के सारे सामाजिक, गैरसरकारी संगठनों, और सामाजिक आंदोलनकारियों के विदेशी अनुदान को शक के घेरे में लाकर उनके लिए एक दिक्कत खड़ी की गई है, उसका नुकसान भी कई मोर्चों पर होगा। हमें इसमें कोई शक नहीं है कि हिंदुस्तान की अर्थव्यवस्था को, यहां के विकास को जो लोग रोकना चाहते होंगे, वैसे विदेशी कारोबारी, या विदेशी सरकारें-संगठन, हिंदुस्तानी एनजीओ को अनुदान देकर अपना मकसद पूरा करवा सकते होंगे। लेकिन सिर्फ शक के आधार पर अगर ऐसे तमाम आंदोलनों की विश्वसनीयता को खत्म करके, सामाजिक आंदोलन बिना बूट कुचल दिया जाएगा, तो उससे सरकार पर से जवाबदेही की जिम्मेदारी खत्म होगी, और उससे देश का बड़ा नुकसान भी होगा। लोकतंत्र में सामाजिक आंदोलनों का अपना इस्तेमाल रहता है, और वैचारिक विविधता ही किसी भी तरह की लोकतांत्रिक-मंथन के लिए जरूरी भी होती है। ऐसे में आज केंद्र सरकार की पसंद के साधु-संत उमा भारती के गंगा-मंथन की दिशा को मोडऩे के हकदार अगर बनाए जाएंगे, तो उससे एक बहुत ही तकनीकी-वैज्ञानिक मुद्दा पटरी से ही उतर जाएगा। आज गंगा की सफाई, और उसके किनारों का सुधार पर्यावरण, शहरी विकास, और अर्थव्यवस्था, इन प्राथमिकताओं के आधार पर होना चाहिए, और धार्मिक-सामाजिक पहलू इन पर हावी नहीं होने चाहिए।
अभी हम यहां पर सामाजिक संगठनों, आंदोलनों, और कार्यकर्ताओं के खिलाफ देश में खड़े किए जा रहे एक नए शक के मुद्दे पर अपनी पूरी बात नहीं लिख रहे हैं, क्योंकि हम गंगा पर लिखना चाह रहे हैं। गंगा का इतिहास हिंदू धर्म के इतिहास के और बहुत पहले का है। और गंगा के किनारे विकसित सभ्यता, संस्कृति, बसाहट और अर्थव्यवस्था की दिशा को आज एकाएक नहीं मोड़ा जा सकता। और यह अपने-आपमें एक बहुत भयानक चूक होगी, अगर गंगा को हिंदू धर्म और संस्कृति तक सीमित रखकर कोई भी योजना बनाई जाएगी। देश के सबसे महान धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक नेता, जवाहर लाल नेहरू अपने वक्त पर गंगा को लेकर भावनाओं से लबालब हो जाते थे, और गंगा के महत्व पर अगर किसी ने सबसे गहरी सोच के साथ, सबसे वजनदार बातें लिखी हैं, तो वे शायद नेहरू ने ही लिखी हैं। आज मोदी सरकार को भी गंगा को हिंदुत्व से परे इस देश की सभ्यता की सबसे विशाल धारा, और देश की सबसे बड़ी दौलत भी, मानकर चलना होगा, और एक लोकतांत्रिक-आधुनिक सोच के साथ गंगा पर काम करना होगा।

चुनाव के मोदी के अच्छे दिन तो गए, लेकिन जनता के अच्छे दिन अभी आए नहीं

संपादकीय
21 जून 2014
मोदी सरकार का पहला बड़ा कड़वा फैसला कल आया जब रेल के मुसाफिर किराए और माल भाड़े में एक साथ लंबी-चौड़ी बढ़ोत्तरी कर दी गई। पिछले दस बरसों में लोगों को यह याद ही नहीं रह गया था कि रेलभाड़ा बढ़ा करता है, और लोग यह मानकर चल रहे थे कि टिकटें कभी नहीं बढ़ेंगी। लेकिन देश की मौजूदा हालत को देखते हुए जब बजट और हिसाब-किताब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से बेहतर वित्त मंत्री अरूण जेटली तक के सामने है, तब अपने ही सारे नारों को भूलकर यह सरकार देश की अर्थव्यवस्था के अच्छे दिन लाने पर बेबस हो गई है, बजाय आनन-फानन जनता के अच्छे दिन लाने के। यह एक ऐतिहासिक हकीकत है कि नारों का सच्चाई से कोई लेना-देना नहीं होता है, इसलिए जब नरेन्द्र मोदी ने देश की जनता को यह भरोसा बंधाया था कि अच्छे दिन आने वाले हैं तो वह बात नारा अधिक, उसका आने वाले दिनों से कोई लेना-देना नहीं था। मोदी की नीयत को अगर ईमानदार भी मानें, तो वह इतनी ही ईमानदार थी कि वे सरकार को मेहनत और काबिलीयत से चलाएंगे, भ्रष्टाचार घटाएंगे और सरकार का अहंकार कम करेंगे। उस मोर्चे पर तो वे कुछ कर रहे हैं, लेकिन लोगों को यह एहसास बिल्कुल नहीं था कि सीएम रहते जो मोदी बजट के ठीक पहले रेलभाड़ा बढ़ाने के खिलाफ पीएम को चि_ी लिखकर विरोध कर रहे थे, वे आज पीएम बनकर ठीक वही काम खुद भी करेंगे। लेकिन हम उनके इस फैसले से सरकार के कामकाज या आने वाले अच्छे और बुरे दिन का बहुत अंदाज नहीं लगा रहे, क्योंकि रेलभाड़े से परे भी अनगिनत चुनौतियां इस सरकार के सामने हैं। प्याज से लेकर ब्याज तक, देश की बहुत सी उम्मीदें हैं, और उनका पूरा होना या नाउम्मीदी में बदलना आने वाले दिन ही बताएंगे। दरअसल नरेन्द्र मोदी को लेकर देश और दुनिया में जो उम्मीदें हैं, उनको पूरा करने के लिए जादू की एक छड़ी से कम कुछ नहीं चलेगा, और इसीलिए बड़े-बूढ़े यह कह गए हैं कि अधिक बड़ी बातें बोलने के पहले उनको तौल लेना चाहिए। आने वाले दिनों में अगर डीजल और पेट्रोल भी महंगा होते हैं, तो जनता की बेचैनी और बुरी तरह बढ़ जाएगी।
मोदी सरकार की कोशिशों को अभी और वक्त मिलना बाकी है, और अगले किसी चुनाव में उनको अपने कामकाज को साबित करने के लिए अभी और मौका मिलेगा। इसलिए आज उनके कल के नारों को लेकर आज लतीफे बन रहे हैं, वे बहुत अधिक मायने नहीं रखते, और उसके बजाय किफायत और कड़ाई की उनकी नीयत अधिक महत्वपूर्ण है। यह सरकार दो बिल्कुल अलग-अलग प्राथमिकताओं के बीच अपने आपको खिंचता हुआ पा रही होगी। जिस कारोबारी दुनिया को मोदी-राज में अपने पूंजीनिवेश से कमाई बढऩे की उम्मीद है, वह भी टकटकी लगाकर बजट की राह देख रही है, और जिस गरीब जनता से ही एनडीए ऐसा ऐतिहासिक बहुमत पा सकी है, उस गरीब जनता को अच्छे दिन आने की बड़ी उम्मीदें हैं। पिछले पूरे दस बरस देश में एनडीए विपक्ष में रहते हुए जनता को लुभाने की जितनी बातें कहते आया था, जितने किस्म के टैक्स बोझ के लिए यूपीए सरकार को कोसते आया था, वे तमाम पुरानी कतरनें आज मोदी सरकार के सामने सवाल बनकर खड़ी हो गई हैं। विपक्ष के अच्छे दिन अब जा चुके हैं और सत्ता के पड़े दिन आ चुके हैं। ऐसे में आज नरेन्द्र मोदी के सामने धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यक समुदाय, मंदिर और मस्जिद बड़े मुद्दे नहीं रह गए हैं, लोगों की रोजी-रोटी और उनका पेट ही आज सबसे बड़ा मुद्दा है, और इस मोर्चे पर काम, चुनावी सभाओं के मोर्चे के मुकाबले बहुत अधिक कड़ा है। दस बरस के यूपीए सरकार के खराब हाल के चलते चुनाव में मोदी के बहुत अच्छे दिन, वे अब जा चुके हैं। अब कड़वी हकीकत एक कसौटी बनकर उनको कसने जा रही है। आने वाले दिन यही देखना है कि जनता कुछ राहत पाती है, या भूखे पेट, गरीबी में, कुछ कड़वे लतीफे बनाती है। 

इराक में बंधक हिंदुस्तानी मोदी के सामने बड़ी चुनौती

20 जून 14
संपादकीय

मोदी सरकार ने काम संभाला ही था कि इराक में इस्लामी या मुस्लिम आतंकियों के कब्जे में फंसे हुए दर्जनों हिन्दुस्तानियों को छुड़ाने की मुसीबत आ खड़ी हुई। यह मुद्दा अधिक नाजुक इसलिए है कि पड़ोस या आसपास के दूसरे देशों में जब किसी धर्म के नाम पर होते आतंकी हमलों की बात आती है, तो उसका साया हिंदुस्तान पर भी पड़ता है, और यहां भी कुछ तबकों के लोग यह सोचा समझा सवाल उठाते हैं कि सभी आतंकी एक ही मजहब के क्यों होते हैं? लगे हाथों इस चर्चा में यह भी याद करने की जरूरत है कि किस तरह जब एनडीए की पिछली सरकार थी तो अफगानिस्तान के कंधार में आतंकियों ने भारत से अपहरण करके ले जाए गए एक मुसाफिर विमान को बंधक बनाकर रखा था, और हिंदुस्तानी लोगों को जिंदा छोडऩे के एवज में भारत के तब के विदेश मंत्री जसवंत सिंह को भारतीय जेलों में बंद आतंकियों को लेकर कंधार जाना पड़ा था। उस वक्त की तोहमत आज तक एनडीए पर से नहीं हटी है, और अब फिर कुछ दर्जन हिंदुस्तानी इराक में वैसे ही मुस्लिम आतंकियों के कब्जे में हैं। 
अभी हम इस घटना की बारीकियों पर कुछ कहना नहीं चाहते क्योंकि रिहाई के लिए बातचीत अभी चल ही रही है, लेकिन भारत को अपने पड़ोसी देशों के अंदरूनी मामलों से किस तरह का फर्क पड़ता है यह सोचने की जरूरत है। एक तरफ जो म्यांमार है, वहां पर बौद्ध लोगों ने जिस तरह मुस्लिम समुदाय को मारा, उसके जवाब में हिंदुस्तानी की जमीन पर मुस्लिम आतंकियों ने बोधगया पर हमला किया। इस किस्म का खतरा अभी भारत से टला भी नहीं है क्योंकि इन दोनों धर्मों के पर्याप्त लोग हिंदुस्तान में बसे हुए हैं, और दूसरी तरफ श्रीलंका में एक बार फिर बौद्ध और मुस्लिम समुदायों के बीच साम्प्रदायिक दंगे हो रहे हैं। श्रीलंका को लेकर भारत के तमिलनाडु में पहले से तमिल-हितों को लेकर एक तनाव चलते ही रहता है, बांग्लादेश को लेकर असम और पश्चिम बंगाल में समस्या बनी रहती है, वहां से आकर गैरकानूनी रूप से रहने वाले लोगों की। इस बीच में अब अगर इराक में मुस्लिम आतंकियों की पकड़ से हिंदुस्तानी कामगारों के छूटने में देर होती है, तो भारत में कुछ तबके मुस्लिमों को लेकर कुछ सवाल उठा सकते हैं। इस तरह भारत के आसपास के देशों में जो कुछ होता है, या भारत के लोगों के साथ दुनिया में कहीं भी कुछ होता है, तो उसका असर भारत पर पड़ता है।
हाल की ही एक अंतरराष्ट्रीय मिसाल है कि किस तरह अफगानिस्तान में बरसों से बंधक बनाकर रखे गए एक अमरीकी सैनिक को छुड़ाने के लिए अमरीकी सरकार ने अपने देश में कैद कई अफगान-आतंकियों को छोड़ा है। अब ऐसी मिसालों के बीच भारत की सरकार एक अभूतपूर्व तनाव में आ गई है, उसके पास अपने लोगों को छुड़ाने के लिए आतंकियों की कुछ बातें मानने की नौबत भी आ सकती है, और इसमें नाकामयाब होने पर मोदी सरकार आम जनता की नाराजगी की शिकार भी हो सकती है। हम फिक्र के साथ इस नौबत पर नजर रखे हुए हैं, लेकिन सच तो यह है कि हिंद महासागर क्षेत्र के इन तमाम देशों में लोकतांत्रिक, राजनीतिक, धार्मिक, और आर्थिक स्थिरता बढ़े बिना आतंक और हमले घटना नहीं हैं, फिर वे चाहे एक देश के भीतर ही हों, या फिर दूसरे देश पर, या उनके लोगों पर हों। इस इलाके का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के नाते भारत पर जिम्मेदारी भी सबसे बड़ी आती है, और मोदी के सामने यह पहले महीने की सबसे बड़ी चुनौती है।

मनोनयन का कार्यकाल सरकार के साथ ही खत्म होना चाहिए

19 जून 2014
संपादकीय
मोदी सरकार ने कई राज्यपालों से इस्तीफा मांगा, उनमें से कुछ ने दिया, कुछ ने मना कर दिया, और कुछ के बारे में अभी अटकलें जारी हैं। जिन लोगों के बारे में ऐसी खबरें नहीं आई थीं कि उनसे इस्तीफा मांगा गया है, उनमें से एक, छत्तीसगढ़ के राज्यपाल शेखर दत्त ने खुद होकर कल रात इस्तीफा दे दिया। इसके साथ ही अब नए राज्यपाल तैनात होने का सिलसिला शुरू होगा, और इन लोगों को मोदी सरकार का पूरा कार्यकाल मिलेगा। 
यह विवाद और बहस हमेशा ही शुरू होते हैं, जब कोई सरकार आती है, और वह पुरानी सरकार के मनोनीत लोगों से इस्तीफे मांगती है। ऐसा सिर्फ राजभवनों के मामले में नहीं होता, बहुत से ऐसे संवैधानिक आयोग होते हैं, दूसरे सरकारी ओहदे होते हैं, जिन पर सरकारें अपनी मर्जी से लोगों को बिठाती हैं। हमारा सोचना है कि किसी भी सरकार को अपनी मर्जी से किए जाने वाले ऐसे मनोनयन सिर्फ अपने कार्यकाल तक ही करने का हक रहना चाहिए। मनोनीत संवैधानिक पदों का कार्यकाल पूरे पांच बरस का रखने की कोई जरूरत नहीं होती, ऐसी कुर्सियों पर लोग आते-जाते रह सकते हैं। क्योंकि कई दूसरी वजहों से मनोनीत लोग इस्तीफा देते हैं, या काम के लायक न रह जाने पर उनकी जगह दूसरों को लाया जाता है। देश में कोई भी कुर्सी ऐसी नहीं होती जिस पर लोगों के विकल्प न हों। भारत के राष्ट्रपति चूंकि चुनाव की एक प्रक्रिया से जीतकर आते हैं, इसलिए उनका तो अपना कार्यकाल पूरा करना ठीक है, लेकिन राज्यपाल, मानवाधिकार आयोग, और इस तरह के सैकड़ों और मनोनयन कोई भी केंद्र सरकार करती है, और इन सभी को सत्ता बदलने के साथ अपने इस्तीफे दे देने चाहिए। 
लोकतंत्र में जहां किसी सत्तारूढ़ पार्टी की सरकार को अपनी मर्जी से लोगों को मनोनीत करने का हक होता है, वैसे में विपरीत विचारों वाली पिछली पार्टी या गठबंधन की सरकार के मनोनीत लोगों को इस तकाजे को खुद होकर भी समझना चाहिए। हम इस बात के हिमायती बिल्कुल नहीं हैं कि सत्ता बदलने के साथ सभी संवैधानिक पदों पर नई सत्ता की विचारधारा के साथ प्रतिबद्ध लोग ही आएं, लेकिन जब ऐसे लोगों का मनोनयन वैचारिक प्रतिबद्धता, या राजनीतिक दल की सदस्यता के आधार पर ही होता है, तो ऐसे लोगों को नई सरकार के तहत नये लोगों के लिए जगह खाली करनी चाहिए। राजनीति से परे के, सरकारी सेवाओं के, या फौज के जो लोग राज्यपाल बनाए जाते हैं, उनके मामले थोड़े से अलग हो सकते हैं, लेकिन उनका मनोनयन भी किसी गैरराजनीतिक, तटस्थ चयन प्रक्रिया के तहत हुआ होता, तो उनका कुर्सियों पर बना रहना जायज होता। लेकिन भारत में ऐसी नियुक्तियों के लिए किसी तरह की चयन प्रक्रिया नहीं है, और हमको पिछले बरसों में महिला आयोग के सदस्यों के बारे में, देश के कुछ राज्यपालों के बारे में यह लिखना पड़ा कि वे अपने पिछले राजनीतिक दल के साथ प्रतिबद्धता दिखाते हुए अपने ओहदे की इज्जत घटा रहे हैं। 
छत्तीसगढ़ के राज्यपाल शेखर दत्त यहां आने के बाद से अब तक बड़ी जिम्मेदारी से, और बिना पक्षपात काम कर रहे थे। कुछ महीने पहले कांगे्रस के ही लोगों ने यूपीए सरकार के रहते हुए शेखर दत्त के खिलाफ केंद्र सरकार से शिकायतें की थीं, क्योंकि उनको लग रहा था कि शेखर दत्त राज्य की भाजपा सरकार के खिलाफ कांगे्रस की मर्जी की कार्रवाई नहीं कर रहे हैं। उनकी ऐसी साख और निष्पक्षता के बावजूद उन्होंने आज अगर सलाह मिलने पर, या अपनी मर्जी से इस्तीफा दिया है तो हम अपनी व्यापक सोच के मुताबिक इस इस्तीफे को सही मानते हैं। उनके जाने से इस राज्य का एक नुकसान तो होगा, लेकिन सैद्धांतिक रूप से सही परंपराएं कायम करने के लिए लोकतंत्र को ऐसे कई नुकसान झेलने भी पड़ते हैं। मानवाधिकार आयोग सहित दूसरे मनोनीत ओहदों से यूपीए के मनोनीत लोगों को इस्तीफे देने चाहिए। हम भारतीय लोकतंत्र में ऐसी स्थाई व्यवस्था चाहते हैं जिसके तहत इस तरह के तमाम मनोनीत लोगों का कार्यकाल मनोनयन करने वाली सरकार के कार्यकाल के साथ ही खत्म हो जाना चाहिए। 

Bat ke bat, बात की बात,

18 june 2014

चारों तरफ की तबाही के पीछे सिर्फ अमरीका है...

18 जून 2014
संपादकीय
भारत के पड़ोस के पाकिस्तान, और उसके बगल के इराक, अफगानिस्तान जैसे मुस्लिम देशों में इस्लामी आतंक आसमान पर पहुंचा हुआ है। मजहब के नाम पर वहां के आतंकी दस्ते खुद भी जान दे रहे हैं, और फौज से लेकर पुलिस तक, पोलियो ड्रॉप्स देने वाले स्वास्थ्य कर्मचारियों से लेकर आतंकविरोधी आम नागरिकों तक, सब पर बुरी तरह हमले हो रहे हैं, सैकड़ों लोग आए दिन मारे जा रहे हैं, और हमारे जैसे अखबारनवीसों के लिए कई बार यह दिक्कत आ खड़ी होती है कि किस खबर के साथ तबाही की कौन सी तस्वीर ताजा है, और कौन सी तस्वीर दो-तीन दिन पहले की बासी तस्वीर है। ऐसे में खबर और तस्वीर को मिलाकर छापने में चूक होने का खतरा भी रहता है। मौत का यह मंजर भयानक है, और अधिक भयानक यह इसलिए है कि इसके पीछे जो लोग हैं वो मजहब का नाम लेकर, खुदा के नाम पर यह सब कर रहे हैं। इन पर पाकिस्तान में पिछले दो-तीन दिनों में फौजी कार्रवाई शुरू हुई है, लेकिन इसमें इतने बरस देर हो चुकी है, कि हालात बहुत बुरी तरह बेकाबू हैं। दूसरी तरफ इराक में अमरीका फिर फौजी कार्रवाई की सोच रहा है, क्योंकि वहां पर आतंकी दस्ते राजधानी के करीब तक पहुंच रहे हैं, सैकड़ों लोगों को उन्होंने एक साथ बांधकर गोलियों से भून डाला है, और स्थानीय सरकार के काबू में कुछ भी नहीं रह गया है। 
लेकिन हाल के दो-चार बरसों के पहले के इतिहास को थोड़ा सा जानने-समझने वाले लोगों को अच्छी तरह याद है कि किस तरह पाकिस्तान, अफगानिस्तान में, और बाकी अरब देशों में भी जगह-जगह अमरीका ने खुलकर कट्टरपंथियों का, हिंसक आतंकियों का साथ दिया, और वह खुद दुनिया में उनका खासा बड़ा शिकार भी हो गया। कट्टरपंथ को बढ़ावा देते-देते अमरीका ने पूरी दुनिया में सामाजिक सुधार की संभावनाओं को कत्ल भी कर दिया और ईरान से लेकर अफगानिस्तान तक, और टर्की तक बहुत से देश इसके गवाह हैं जहां पर चौथाई या आधी सदी पहले समाज बहुत उदार था, और आज वहां पर कट्टरपंथ ने समाज की सोच को पत्थरयुग में भेजने का काम किया है। 
अमरीका ने एक तरफ तो सोवियत वामपंथ को खदेडऩे के लिए, दूसरी तरफ तेल के कुंओं वाले देशों पर कब्जा करने के लिए, और तीसरी तरफ चीन-भारत के करीब अपने फौजी अड्डे बढ़ाने के लिए इन तमाम देशों ने खुफिया दखल दी, फौजी दखल दी, और बागियों को बढ़ावा दिया। नतीजा यह है कि यह पूरा इलाका अमरीकी साजिश से उबर ही नहीं पाया, और यहां की सरकारें अमरीकी मदद की मोहताज होती चली गईं, और दूसरी तरफ अमरीकी हमलों के सामने उनके पास मुंह खोलने की ताकत भी नहीं बची। अमरीका ने पिछले दस बरसों में दस लाख से अधिक लोगों को अपनी बमबारी और फौजी कार्रवाई से पाकिस्तान, इराक, अफगानिस्तान में मार डाला है, और दूसरी तरफ फिलीस्तीनियों पर जुल्म जारी रखने के लिए अमरीका हर दिन लाखों अमरीकी डॉलर इजराईल को दे रहा है। 
दुनिया का सबसे ताकतवर माफिया बना हुआ है अमरीका जिस मजहबी साजिश को आगे बढ़ाना चाहता था, वह उसमें कामयाब हुआ है, और अमरीकी सरकार के साथ मिलकर दुनिया के हथियारों के सौदागर अपनी ग्राहकी इन देशों में बढ़ा रहे हैं, सरकारें उनसे सीधे खरीद रही है, और हथियारबंद बागी अमरीकी सरकार के पैसों से हथियार पा रहे हैं। सीरिया और इजिप्ट तक यह तबाही फैल चुकी है, और दूसरी तरफ देखें तो अफ्रीका में नाइजीरिया में इस्लाम के नाम पर बोकोहराम जैसे भयानक धर्मान्ध हथियारबंद मुजरिम बच्चियों को अगुवा करके उनसे बलात्कार कर रहे हैं, और अमरीका वहां पर फौजी दखल देने के लिए जमीन तैयार करने में लगा हुआ है। आज पूरी दुनिया का माहौल बहुत साफ-साफ इस तरह का दिखता है कि बाकी देश कब तक या तो अमरीकी गिरोह में शामिल होने से बचते हैं, या उसकी बमबारी से बचते हैं, या उसके बढ़ाए हुए बागियों के खड़े किए हुए गृहयुद्ध से बचते हैं। अमरीका से बचना अब बाकी दुनिया के लिए मुमकिन नहीं दिख रहा है, और लोगों के सामने यह विकल्प बहुत साफ है कि या तो ब्रिटेन और योरप के दूसरे देशों की तरह उसके गिरोह में शामिल हों, या फिर उसके बम झेलने के लिए तैयार रहें। लोकतंत्र के नाम पर जो अमरीकी पाखंड चलता है, उसमें अमरीका दुनिया का अकेला तानाशाह बनकर रहना चाहता है, और उसे वह लोकतंत्र और मानवाधिकार साबित करता है। इसके साथ-साथ अमरीका ने जिस तरह इस्लाम को बुरा दिखाने, और हिंसक साबित करके बदनाम करने की साजिश की है, वह भी बहुत जाहिर है, और इससे बचने का दुनिया के पास कोई रास्ता भी नहीं दिख रहा है।