आजकल: कोई दिलासा नहीं, और पहाड़ सी जिंदगी

23 जून 2014

सुनील कुमार

पिछले कुछ बरसों में हर हफ्ते का यह कॉलम हर तिमाही का भी नहीं हो पाया, और हर छमाही का भी नहीं। मन कई तरह के अलग-अलग कामों में भटकने लगता है, और लिखना छूट जाता है, और कभी पिक्सटून बनाने लगता है, तो कभी कुछ और काम करने लगता है। फिर पिछले कुछ बरसों में फेसबुक और ट्विटर पर अपने विचार लिखना अखबार में हर हफ्ते कॉलम लिखने के बजाय आसान इसलिए होता है कि कुछ दर्जन अक्षरों से कहीं भी बैठे हुए, किसी भी वक्त यह काम किया जा सकता है। एक बार फिर यह कोशिश शुरू कर रहा हूं कि किसी तरह हर हफ्ते यह कॉलम लिख सकूं। एकदम आखिरी दिन, सोमवार की दोपहर ही इसे लिखने की जिद महीनों तक इसे दूर खिसका देती है, लेकिन आखिरी पलों के पहले लिखने की आदत आ नहीं पाई। एक बार और हाथ आजमाकर देख रहा हूं।
कुछ सवाल अकसर परेशान करते हैं। चौराहों पर टै्रफिक की लालबत्ती पर भीख मांगते बच्चों, बूढ़ों, विकलांगों, या बीमारों को कुछ दिया जाए, या नहीं? यह फिक्र की जाए कि चौराहों पर पूरे वक्त डीजल के धुएं के बीच मांगते हुए लोगों की सेहत वहां बिगड़ती अधिक है, या वहां उनका पेट भरता है? छोटे बच्चों को, अपने खुद के दुधमुंहे बच्चों को, या भाड़े पर लाए गए किराए के बच्चों को गोद में ली हुई महिलाएं जब गाडिय़ों के बीच दौड़ती हैं, तो उन्हें कुछ सिक्के देना बेहतर है, या कि वहां न देकर उन्हें किसी और जगह की तरफ जाने को कहना ठीक है ताकि छोटे बच्चे गाडिय़ों के धुएं से बच सकें?
फिर कई बार यह भी लगता है कि क्या यह फिक्र सचमुच उन लोगों की सेहत की है, या कि उनकी गरीबी और बेहाली कुछ अधिक परेशान करती है, अपनी एसी गाड़ी के भीतर से उन्हें तपती धूप में देखते हुए?
यह भी लगता है कि चौराहों पर पहला हक किनका होना चाहिए, उनका जो सड़कों का टैक्स देते हैं, या उनका जो कि सड़कों पर पेट भरने का रास्ता ढूंढते हैं? इसी तरह रेलवे प्लेटफॉर्म से लेकर बस अड्डे तक, और बगीचों तक यह लगता है कि वहां भूखे और गंदे दिखते बेघर और गरीब लोगों का जिंदा रहने का हक अधिक जरूरी है, या कि एक साफ-सुथरा नजारा? और फिर बेघर और बेसहारा लोग चौराहों से, फुटपाथों से, स्टेशन और बगीचों से हटा दिए जाएं, तो वे रहेंगे कहां? खाएंगे कहां? और कमाएंगे कहां?
ऐसे में लगता है कि बीमार और विचलित लोगों से लेकर बूढ़ों और बेसहारा बच्चों तक के लिए सड़क और स्टेशन से बेहतर कोई इंतजाम समाज और सरकार को करना चाहिए, ताकि वे लोग कम से कम सबसे कम जरूरतों वाले इंसान की तरह तो जी सकें। उनको कहीं नहलाया जा सके, कहीं पर वे सो सकें, खाना खा सकें, और मरने तक बिना जुर्म किए रह सकें। यह जिम्मेदारी आखिर होनी किसकी चाहिए? सरकार की, जिसकी कि हर बात के लिए जिम्मेदारी होती ही है, या कि समाज की, जो कि कई मामलों में खुद होकर कुछ जिम्मेदारियां उठाता भी है।
ऐसे बहुत से सवाल तब परेशान करते हैं जब कोई बीमार, जख्मी, या टूटा हुआ हाथ कार के शीशे को खटखटाता है, और कुछ मांगता है। ऐसे सवाल तब भी परेशान करते हैं जब स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर कुछ खाने-पीने की सोचें और उसी वक्त भूखे पेटों पर टिके हुए कुछ सवालिया चेहरे आकर सामने खड़े हो जाएं। लेकिन आगे-पीछे ये सवाल हवा में घुल भी जाते हैं, जब ऐसे लोग नजरों से दूर हो जाते हैं।
सरकार के कुछ लोगों का यह भी कहना रहता है कि बेसहारा लोगों को जब ले जाकर उनके लिए बनाए गए किसी आश्रम में रखा जाता है, तो वे वहां के नियम-कायदों के तहत अधिक वक्त तक रहना नहीं चाहते और वे बाहर निकलकर अपनी मर्जी की जिंदगी जीना चाहते हैं, अधिक कमाना चाहते हैं, या भूखे पेट भी अपने सिर पर अपना खुद का आसमान चाहते हैं।
हिंदुस्तान में ही नहीं, दुनिया के सबसे विकसित देशों में से एक अमरीका में फुटपाथों पर बिखरे हुए इस तरह के लोग वहां की जिंदगी के आराम के सामने सवाल की तरह खड़े हो जाते हैं। कभी किसी बगीचे पर ऐसे लोगों की भीड़ पहुंचकर पूरे के पूरे बगीचे पर कब्जा कर लेती है और यह साबित करती है कि बगीचा घरबार वाले लोगों के मुकाबले बेघर लोगों के लिए अधिक जरूरी है, और उनका पहला हक जिंदा रहने के लिए बगीचे पर कब्जा करना है, बजाय लोगों के टहलने और घूमने के।
इसी तर्क के आधार पर हिंदुस्तान में भी रेलवे स्टेशनों पर पहला हक उनका माना जा सकता है, जिनके पास जिंदा रहने को और कोई जगह नहीं है, और स्टेशन जिन्हें पानी, पखाना, रौशनी, छत, और पक्की फर्श देता है।
हिंदुस्तान एक तरफ तो शहरी ढांचों को अधिक से अधिक संपन्न बनाते हुए अपने-आपको अब विकसित देश गिनता है, लेकिन दूसरी तरफ शहरी समाज में ही जो सबसे कमजोर लोग हैं, ऐसे शायद आबादी के एक फीसदी से भी कम लोगों के लिए सामाजिक या सरकारी पहल दिखाई नहीं पड़ती। ऐसे लोग किसी एक टोली की शक्ल में वोटों का ग_ा नहीं रहते, इसलिए उनकी कोई गिनती नहीं रहती। वे इतने बिखरे रहते हैं, इतने बेघर रहते हैं कि उनके पास कोई शिनाख्त भी नहीं होती। किसी भी शहर में अगर ऐसे बेघर लोग एक साथ रहते, तो शायद एक वार्ड बन जाते, और उनके वोटों की कीमत एकदम से लोगों को दिखने लगती।
बात छोटी है, बहुत मामूली भी है, बदमजा भी है, लेकिन ऐसी जिंदगियां चाहे जितनी भी हों, उनके नजरिए से देखें तो पहाड़ सी लंबी जिंदगी अगर बिना छत बिना किसी सहारे के काटना हो, तो उनकी जगह अपने को रखकर सोचें कि हम कितने दिन ऐसे काट सकेंगे? दुनिया में अलग-अलग कई लोगों ने यह कोशिश की है कि एक हफ्ते, एक महीने, या एक बरस अपने देश के सबसे गरीब की तरह गुजारकर देखें कि वे जिंदगी कैसे काट सकते हैं। लेकिन ऐसे प्रयोगों में भी दरअसल लोगों के सामने एक यह दिलासा तो रहता ही है कि आने वाले उतने दिनों के बाद वे फिर अपनी जिंदगी में लौटने वाले हैं। जो असली बेसहारा होते हैं, उनके पास ऐसा कोई दिलासा नहीं होता, और कई बार पहाड़ सी लंबी जिंदगी होती है, और होता है खाई की तरह गहरा भूखा पेट, बदन की चमड़ी पर बिखरी कोई बीमारी, और उसके खासे भीतर छलनी फेंफड़े। इनमें से बहुत से लोगों के तन-मन, अलग-अलग दर्जों तक विचलित रहते हैं, और किसी मानसिक चिकित्सा से ठीक होने की कोई संभावना तक टटोलने की गुंजाइश भी पहाड़ सी लंबी इन जिंदगियों में नहीं होतीं। ऐसे सबसे कमजोर तबकों को कारों की अगल-बगल की खिड़कियों से अनदेखा करके देश सामने की खिड़की से देखते हुए किस तरफ आगे बढ़ सकता है?

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