20 जून 14
संपादकीय
मोदी सरकार ने काम संभाला ही था कि इराक में इस्लामी या मुस्लिम आतंकियों के कब्जे में फंसे हुए दर्जनों हिन्दुस्तानियों को छुड़ाने की मुसीबत आ खड़ी हुई। यह मुद्दा अधिक नाजुक इसलिए है कि पड़ोस या आसपास के दूसरे देशों में जब किसी धर्म के नाम पर होते आतंकी हमलों की बात आती है, तो उसका साया हिंदुस्तान पर भी पड़ता है, और यहां भी कुछ तबकों के लोग यह सोचा समझा सवाल उठाते हैं कि सभी आतंकी एक ही मजहब के क्यों होते हैं? लगे हाथों इस चर्चा में यह भी याद करने की जरूरत है कि किस तरह जब एनडीए की पिछली सरकार थी तो अफगानिस्तान के कंधार में आतंकियों ने भारत से अपहरण करके ले जाए गए एक मुसाफिर विमान को बंधक बनाकर रखा था, और हिंदुस्तानी लोगों को जिंदा छोडऩे के एवज में भारत के तब के विदेश मंत्री जसवंत सिंह को भारतीय जेलों में बंद आतंकियों को लेकर कंधार जाना पड़ा था। उस वक्त की तोहमत आज तक एनडीए पर से नहीं हटी है, और अब फिर कुछ दर्जन हिंदुस्तानी इराक में वैसे ही मुस्लिम आतंकियों के कब्जे में हैं।
अभी हम इस घटना की बारीकियों पर कुछ कहना नहीं चाहते क्योंकि रिहाई के लिए बातचीत अभी चल ही रही है, लेकिन भारत को अपने पड़ोसी देशों के अंदरूनी मामलों से किस तरह का फर्क पड़ता है यह सोचने की जरूरत है। एक तरफ जो म्यांमार है, वहां पर बौद्ध लोगों ने जिस तरह मुस्लिम समुदाय को मारा, उसके जवाब में हिंदुस्तानी की जमीन पर मुस्लिम आतंकियों ने बोधगया पर हमला किया। इस किस्म का खतरा अभी भारत से टला भी नहीं है क्योंकि इन दोनों धर्मों के पर्याप्त लोग हिंदुस्तान में बसे हुए हैं, और दूसरी तरफ श्रीलंका में एक बार फिर बौद्ध और मुस्लिम समुदायों के बीच साम्प्रदायिक दंगे हो रहे हैं। श्रीलंका को लेकर भारत के तमिलनाडु में पहले से तमिल-हितों को लेकर एक तनाव चलते ही रहता है, बांग्लादेश को लेकर असम और पश्चिम बंगाल में समस्या बनी रहती है, वहां से आकर गैरकानूनी रूप से रहने वाले लोगों की। इस बीच में अब अगर इराक में मुस्लिम आतंकियों की पकड़ से हिंदुस्तानी कामगारों के छूटने में देर होती है, तो भारत में कुछ तबके मुस्लिमों को लेकर कुछ सवाल उठा सकते हैं। इस तरह भारत के आसपास के देशों में जो कुछ होता है, या भारत के लोगों के साथ दुनिया में कहीं भी कुछ होता है, तो उसका असर भारत पर पड़ता है।
हाल की ही एक अंतरराष्ट्रीय मिसाल है कि किस तरह अफगानिस्तान में बरसों से बंधक बनाकर रखे गए एक अमरीकी सैनिक को छुड़ाने के लिए अमरीकी सरकार ने अपने देश में कैद कई अफगान-आतंकियों को छोड़ा है। अब ऐसी मिसालों के बीच भारत की सरकार एक अभूतपूर्व तनाव में आ गई है, उसके पास अपने लोगों को छुड़ाने के लिए आतंकियों की कुछ बातें मानने की नौबत भी आ सकती है, और इसमें नाकामयाब होने पर मोदी सरकार आम जनता की नाराजगी की शिकार भी हो सकती है। हम फिक्र के साथ इस नौबत पर नजर रखे हुए हैं, लेकिन सच तो यह है कि हिंद महासागर क्षेत्र के इन तमाम देशों में लोकतांत्रिक, राजनीतिक, धार्मिक, और आर्थिक स्थिरता बढ़े बिना आतंक और हमले घटना नहीं हैं, फिर वे चाहे एक देश के भीतर ही हों, या फिर दूसरे देश पर, या उनके लोगों पर हों। इस इलाके का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के नाते भारत पर जिम्मेदारी भी सबसे बड़ी आती है, और मोदी के सामने यह पहले महीने की सबसे बड़ी चुनौती है।

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