गंगा को संकुचित-धार्मिक नहीं, वैज्ञानिक नजरिए की जरूरत

संपादकीय
22 जून 2014

दिल्ली की खबर है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की गंगा-सफाई की महत्वाकांक्षी सोच के मुताबिक केंद्रीय सिंचाई मंत्री उमा भारती एक बैठक बुलाने जा रही हैं जिसमें नदियों के मामले से जुड़े हुए विभागों और विशेषज्ञों के साथ-साथ 'साधु-संतोंÓ को बुलाने की बात भी उमा भारती ने की है। गंगा की सफाई और उसके किनारे के इलाकों में सुधार के मुद्दे तकनीकी और वैज्ञानिक तो हैं ही, वे गंगा तट की संस्कृति और सभ्यता से भी जुड़े हुए हैं, और जिन लोगों को उमा भारती साधु-संत के दर्ज में रखकर इस गंगा-मंथन में बुलाना चाहती हैं, वे भी गंगा तट के धार्मिक रीति-रिवाजों में दखल रखते हैं, और इसलिए इस विचार-मंथन में उनकी मौजूदगी महज धार्मिक नहीं कही जा सकती। लेकिन उमा भारती का पुराना इतिहास यह बताता है कि मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने जिस तरह मुख्यमंत्री के दफ्तर की मेज पर ही एक मंदिर बना डाला था, जिस तरह उन्होंने मुख्यमंत्री निवास पर एक पक्का मंदिर बनवा लिया था, और जिस तरह वे अयोध्या से लेकर अब तक लगातार धर्म को, आस्था को लोकतंत्र और कानून से ऊपर मानती हैं, उससे उनके गंगा-मंथन को लेकर कई तरह की फिक्र खड़ी होती है।
यह बात सही है कि धर्म और सामाजिक रीति-रिवाज पर काबू पाकर, उनमें से नुकसानदेह हिस्सों को सुधारकर अगर पर्यावरण को बचाया जा सकता है, तो उसके लिए धर्म से जुड़े लोगों की मदद लेने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन आज मोदी सरकार के तहत देश की सबसे बड़ी खुफिया एजेंसी की रिपोर्ट को लेकर जिस तरह देश के सारे सामाजिक, गैरसरकारी संगठनों, और सामाजिक आंदोलनकारियों के विदेशी अनुदान को शक के घेरे में लाकर उनके लिए एक दिक्कत खड़ी की गई है, उसका नुकसान भी कई मोर्चों पर होगा। हमें इसमें कोई शक नहीं है कि हिंदुस्तान की अर्थव्यवस्था को, यहां के विकास को जो लोग रोकना चाहते होंगे, वैसे विदेशी कारोबारी, या विदेशी सरकारें-संगठन, हिंदुस्तानी एनजीओ को अनुदान देकर अपना मकसद पूरा करवा सकते होंगे। लेकिन सिर्फ शक के आधार पर अगर ऐसे तमाम आंदोलनों की विश्वसनीयता को खत्म करके, सामाजिक आंदोलन बिना बूट कुचल दिया जाएगा, तो उससे सरकार पर से जवाबदेही की जिम्मेदारी खत्म होगी, और उससे देश का बड़ा नुकसान भी होगा। लोकतंत्र में सामाजिक आंदोलनों का अपना इस्तेमाल रहता है, और वैचारिक विविधता ही किसी भी तरह की लोकतांत्रिक-मंथन के लिए जरूरी भी होती है। ऐसे में आज केंद्र सरकार की पसंद के साधु-संत उमा भारती के गंगा-मंथन की दिशा को मोडऩे के हकदार अगर बनाए जाएंगे, तो उससे एक बहुत ही तकनीकी-वैज्ञानिक मुद्दा पटरी से ही उतर जाएगा। आज गंगा की सफाई, और उसके किनारों का सुधार पर्यावरण, शहरी विकास, और अर्थव्यवस्था, इन प्राथमिकताओं के आधार पर होना चाहिए, और धार्मिक-सामाजिक पहलू इन पर हावी नहीं होने चाहिए।
अभी हम यहां पर सामाजिक संगठनों, आंदोलनों, और कार्यकर्ताओं के खिलाफ देश में खड़े किए जा रहे एक नए शक के मुद्दे पर अपनी पूरी बात नहीं लिख रहे हैं, क्योंकि हम गंगा पर लिखना चाह रहे हैं। गंगा का इतिहास हिंदू धर्म के इतिहास के और बहुत पहले का है। और गंगा के किनारे विकसित सभ्यता, संस्कृति, बसाहट और अर्थव्यवस्था की दिशा को आज एकाएक नहीं मोड़ा जा सकता। और यह अपने-आपमें एक बहुत भयानक चूक होगी, अगर गंगा को हिंदू धर्म और संस्कृति तक सीमित रखकर कोई भी योजना बनाई जाएगी। देश के सबसे महान धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक नेता, जवाहर लाल नेहरू अपने वक्त पर गंगा को लेकर भावनाओं से लबालब हो जाते थे, और गंगा के महत्व पर अगर किसी ने सबसे गहरी सोच के साथ, सबसे वजनदार बातें लिखी हैं, तो वे शायद नेहरू ने ही लिखी हैं। आज मोदी सरकार को भी गंगा को हिंदुत्व से परे इस देश की सभ्यता की सबसे विशाल धारा, और देश की सबसे बड़ी दौलत भी, मानकर चलना होगा, और एक लोकतांत्रिक-आधुनिक सोच के साथ गंगा पर काम करना होगा।

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