बिना विरासत अपने ही बूते पर पीएम से सीएम तक बनने वाले

26 दिसंबर 2014
संपादकीय
झारखंड के अगले मुख्यमंत्री बनने जा रहे रघुबर दास के बारे में छत्तीसगढ़ के एक छोटे से गांव से खबर मिली है कि वे बचपन में वहां रहे हुए हैं, और अपने मजदूर मां-बाप के साथ वे यहां से झारखंड गए थे क्योंकि उनके मां-बाप के लिए यहां काम नहीं था। देश के सबसे अधिक खनिज-संपन्न राज्यों में से एक झारखंड में डेढ़ दशक की राजनीतिक अस्थिरता के बाद अब भाजपा का जो मुख्यमंत्री बनने जा रहा है, वह ऐसे बचपन से ऊपर उठकर यहां तक पहुंचा है, यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक गौरव की बात है। लोगों के कामकाज तो इतिहास में दर्ज होते हैं, लेकिन इस लोकतंत्र में लोगों की संभावना देखने लायक है। बचपन में चाय बेचने वाला इस देश का प्रधानमंत्री है, और यह कोई आज की ही बात नहीं है, तमिलनाडू के एक वक्त मुख्यमंत्री रहे, और कांग्रेस की केन्द्रीय राजनीति में सबसे बड़े नेताओं में से एक कामराज नाडर को 11 बरस की उम्र में स्कूल छोड़ देनी पड़ी थी, क्योंकि पिता गुजर गए थे, और मां की जिम्मेदारी थी। उन्होंने कपड़े की दुकान में काम करते हुए जिंदगी आगे बढ़ाई। लेकिन देश भर में राजनीति का यह हाल आम नहीं है। आम तो भारतीय राजनीति में कुछ कुनबों का दबदबा है। हम कई बार देश भर में कई प्रदेशों में, और केन्द्रीय राजनीति में भी बुरी तरह और पूरी तरह से हावी कुछ परिवारों का जिक्र कर चुके हैं, जो कि लोकतांत्रिक राजनीति को एक गृह उद्योग की तरह चलाते हैं। ऐसे में जब पहली पीढ़ी के राजनेता उभरकर सामने आते हैं, और ऊंचाई तक पहुंचते हैं, तो अमरीका के बराक ओबामा की भी याद आती है जो कि एक प्रवासी परिवार में पैदा, अफ्रीकी मूल के, अमरीका में वंचित तबके के, नस्लभेद के शिकार रहते हुए भी राष्ट्रपति बने। 
मोदी से लेकर रघुबर दास तक की मिसालें बहुत से लोगों के लिए एक उम्मीद लेकर आती हैं कि अपने कुनबे की ताकत के बिना भी लोग लगातार मेहनत करके ऊपर तक पहुंच सकते हैं। न राजनीतिक विरासत, न सांसदों या विधायकों को खरीदने की जरूरत, अकेले अपने दम पर भी लोग बड़ी कमजोर जिंदगी से लोकतंत्र के सबसे ऊंचे ओहदों तक पहुंच सकते हैं। और राजनीति से परे भी हर बरस केन्द्र सरकार की सबसे बड़ी नौकरियों के लिए होने वाली यूपीएससी परीक्षाओं के बाद कहानियां सामने आती हैं कि किस तरह एक ऑटो रिक्शा वाले की बेटी आईएएस अफसर बन गई, या रोजी पर मजदूरी करने वाले मां-बाप के बच्चे आईपीएस बन गए। यह बात सही है कि भारतीय लोकतंत्र में गैरबराबरी बहुत अधिक है, और ऐसी मिसालें अधिक नहीं हैं, लेकिन मिसालें तो गिनती की ही होती हैं, और उनसे निकलने वाला हौसला दूर तक रौशनी बिखेरता है। 
भारत में कई खेलों में भी ऐसे खिलाड़ी बहुत ऊपर तक पहुंचे जहां उनका मुकाबला बड़े ताकतवर और संपन्न परिवारों के बच्चों से हुआ। उसके बावजूद नंगे पैर दौडऩे वाले बच्चे भी आसमान तक पहुंचे। आज जब देश में चारों तरफ चोरी और बेईमानी के चलते आने वाले दिन लोगों को अंधेरे में लगते हैं, तब ऐसी मिसालें भी आगे बढ़ानी चाहिए, ताकि लोग सिर्फ गैरबराबरी का बहाना लेकर मेहनत छोड़ न दें।

Bat ke bat, बात की बात

25 dec 2014

Bat ke bat, बात की बात

21 dec 2014


सुशासन का नारा तो ठीक है, पर जमीनी जरूरत है कि...

25 दिसंबर 2014
संपादकीय
आज जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश में अटल-जन्मदिवस पर राष्ट्रीय सुशासन दिवस शुरू कर रहे हैं, तब असम की खबर यह है कि वहां के मुख्य सचिव हाथी पर चढ़कर जंगल के जीवन को देखते हुए परिवार सहित छुट्टियां मना रहे हैं, सैर कर रहे हैं। यह खबर बताती है कि किस तरह इस देश में सुशासन की जरूरत है। और यह हाल सिर्फ असम में इस एक अफसर का हो, या किसी दूसरे राज्य में किसी एक मंत्री का हो, ऐसा नहीं है। देश भर में जगह-जगह से भयानक खबरें आती हैं कि किस तरह जब लोग मरते रहते हैं, नेता और अफसर अपने में मस्त रहते हैं। शासन में ये दोनों तबके हिस्सेदार होते हैं, और आज के इस दिन पर अगर नारे से अधिक कुछ करना है, तो प्रधानमंत्री को, और राज्यों के मुख्यमंत्रियों को यह सोचना होगा कि किस तरह सरकारों को संवेदनशील बनाया जा सकता है। 
कुछ बरस पहले की बात हमको याद आती है जब कर्नाटक में भयानक बाढ़ आई थी और लोगों का बहुत बुरा हाल था, तब भाजपा के उस वक्त के मुख्यमंत्री येदियुरप्पा के खिलाफ पार्टी के विधायकों में बगावत को बढ़ावा दिया जा रहा था, और बेल्लारी के कुख्यात लोहा चोर मंत्री-भाई विधायकों को खरीदकर दूसरे प्रदेशों के पांच और सात सितारा होटलों में अय्याशी करवा रहे थे। ऐसा हाल अलग-अलग प्रदेशों के विधायकों का, देश के सांसदों का, मंत्रियों और अफसरों का बहुत बार सामने आता है। अभी कुछ हफ्ते पहले ही कश्मीर की एक खबर आई थी कि किस तरह वहां के एक बड़े पुलिस अफसर के बेटे ने अपने बाप की एक तस्वीर के साथ फेसबुक पर यह पोस्ट किया था कि उसने पिछले बीस बरस से किस तरह कभी अपने जूतों के तस्में नहीं बांधे। अर्दली से जूते बंधवाने का शौक छत्तीसगढ़ में राज्यपाल रहे के.एम. सेठ को भी था, और उनके पहले से लेकर उनके बाद तक अनगिनत ऐसे नेता और अफसर रहे लोग हैं जिनके बंगलों पर सरकारी कर्मचारियों को बंधुआ मजदूरों की तरह इस्तेमाल किया जाता है। 
हम इन तमाम बातों को परले दर्जे का कुशासन मानते हैं, और देश में अगर सुशासन की तरफ पहला कदम भी बढ़ाना है, तो ऐसी सामंती सोच को हर दफ्तर और घर में कुचलना होगा। हम भ्रष्टाचार से परे भी इन ना दिखती बातों की चर्चा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि भ्रष्टाचार तो लोगों को शायद कभी कटघरे तक ले जाए, लेकिन ऐसी राजशाही तबियत और ऐसा सामंती मिजाज कानून के कटघरे में खड़ा करना मुश्किल होता है। सरकार के किसी भी तबके को देखें तो उसमें यह बात बहुत आम दिखती है कि वह अपने से नीचे के तबकों का इस्तेमाल अपनी निजी जरूरतों और अपनी निजी सनक के लिए, अपने दिखावे के लिए, और एक झूठी सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए खुलकर करता है। ऐसे में लोगों को यह सोचना चाहिए कि जनता के पैसों पर चलने वाली सरकारों में जो घोषित और अघोषित सहूलियतें और अय्याशी हैं, वे गरीब जनता के खून-पसीनों पर चलती हैं। इनको कैसे खत्म किया जा सकता है, इसके बारे में देश में कोई चर्चा भी इसलिए नहीं हो पाती क्योंकि सरकार से लेकर संसद तक, और अदालतों से लेकर बाकी संवैधानिक संस्थाओं तक पर काबिज लोग ही ऐसी अय्याशी उठाते हैं, और वे भला क्यों अपने सामंती राज को खत्म करना चाहेंगे? 
देश में नेताओं और अफसरों के लिए जनता के मन में सम्मान इसलिए कम है क्योंकि उनकी फिजूलखर्ची लोग देखते हैं, और कांग्रेस राज से लेकर उस भाजपा राज तक देखते हैं जो कि अपने आपको आरएसएस की सादगी वाली संस्कृति की पार्टी कहती है। आज भाजपा राज को देखकर भी यह अंदाज लगाना मुश्किल है कि इस सत्तारूढ़ पार्टी की सोच के पीछे किसी तरह की कोई सादगी है। सुशासन का पहला सबक किफायत और सादगी से शुरू होना चाहिए, और इसके लिए केन्द्र और राज्य सरकारों को अपने-अपने स्तर पर नए-नए तरीके सोचने चाहिए, और जनता भी सूचना के अधिकार के तहत जानकारी लेकर सत्ता को किफायत के लिए मजबूर कर सकती है। 

भारत रत्न से जुड़े मुद्दे

24 दिसंबर 2014
संपादकीय
जैसी कि पहले से घोषणा की जा चुकी थी, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने नए चुनाव क्षेत्र बनारस के सबसे बड़े नेता पं. मदन मोहन मालवीय और भाजपा के सबसे बड़े नेता अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न देने का फैसला लिया है। मालवीयजी पूरी जिंदगी कांग्रेस के सबसे बड़े नेताओं में से रहे, उन्होंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना भी की, और वे गांधी के समकालीन होने के साथ-साथ कुछ बार कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे। उनकी मौत के आधी-पौन सदी बाद उनको यह राष्ट्रीय सम्मान भाजपा के प्रधानमंत्री की ओर से दिया गया, और कांग्रेस पार्टी ने अपनी सरकारों के चलते यह फैसला नहीं लिया था। लेकिन खैर आज कांग्रेस सरकार के पिछले फैसलों के बारे में, लिए गए फैसलों के बारे में भी और न लिए गए फैसलों के बारे में भी, अधिक सोच-विचार की कोई जरूरत नहीं बची है। 
अब अगले साढ़े चार बरस भाजपा के पास पांच-दस और लोगों को भारत रत्न देने की संभावना बची हुई है, और देश का यह सबसे बड़ा सम्मान चुनावी राजनीति से लेकर धर्म और जाति तक, प्रदेशों के संतुलन तक, और सत्तारूढ़ पार्टी की रीति-नीति से प्रभावित रहता है। वैसे तो हर बरस केन्द्र सरकार द्वारा दिए जाने वाले पद्म सम्मानों को लेकर भी ये ही तमाम बातें सामने आती हैं, और हमारा तो हमेशा से यह कहना रहा है कि सरकारों को ऐसे सम्मान नहीं देने चाहिए। लोग अपने कामकाज से समाज के भीतर पर्याप्त सम्मान पाते हैं, और अक्सर सम्मानों की लंबी फेहरिस्त में कई नामों पर लोगों को हैरानी होती है, और उनके मुकाबले अधिक महत्वपूर्ण कई नामों को लिस्ट में न पाकर भी लोगों को सदमा लगता है। जब तक सरकारों के पास कोई ऐसे पैमाने न हों, कि जिनके आधार पर सरकार से परे का कोई निर्णायक मंडल पुरस्कार या सम्मान के ऐसे नाम तय कर सके, तब तक सरकार को ऐसे काम से बचना चाहिए। हम तो पत्रकारिता के भी ऐसे तमाम पुरस्कारों और सम्मानों के खिलाफ हैं, जो कि बिना किसी सार्वजनिक रूप से घोषित पैमानों के, बिना निर्णायक मंडल के, और बिना सबको खुला मौका दिए हुए तय हो जाते हैं, और दे दिए जाते हैं। 
दुनिया के सामने नोबल पुरस्कार तय करने के लिए जिस तरह की एक कमेटी रहती है, जिस तरह से नामांकन होते हैं, जिस तरह से नामों पर विचार होता है, उस तरह की एक प्रक्रिया सम्मान और पुरस्कार के लिए होनी चाहिए। हालांकि नोबल के इतिहास पर भी यह एक धब्बा लगा हुआ है कि उसके पैमानों पर गांधी को किसी बरस इस सम्मान के लायक नहीं पाया गया, लेकिन खुद नोबल कमेटी ने अपनी इस ऐतिहासिक गलती को कुबूल किया है। भारत में जब सरकार ऐसे सम्मान-पुरस्कार हर बरस तय करती है, तो उसे खुद अपनी राजनीतिक पसंद-नापसंद को परे रखना चाहिए। हमारे पाठकों को याद होगा कि कुछ बरस पहले जब यूपीए सरकार की पद्मभूषण या पद्मविभूषण की लिस्ट में उसके खुद के मंत्री प्रणब मुखर्जी का नाम था, तब भी हमने उसका विरोध किया था। आज देश भर में बहुत से तबकों में, बहुत से प्रदेशों में यह उम्मीद जागेगी कि उनके भी किसी महान व्यक्ति को भारत रत्न दिया जाए। अब देखना यह होगा कि अपने बाकी कार्यकाल में मोदी सरकार किस तरह के नामों को तय करती है। 

झारखंड और जम्मू-कश्मीर के चुनावी नतीजों के मायने

23 दिसंबर 2014
संपादकीय
आज सुबह से हिंदुस्तान झारखंड और जम्मू-कश्मीर के चुनावी नतीजे देख रहा है। इन दोनों ही जगहों पर कांगे्रस या उसकी भागीदार पार्टियों के जीतने के आसार छोड़कर बाकी कुछ भी होने की उम्मीद थी, और वैसा ही हो भी रहा है। झारखंड में भाजपा के जिस तरह के बहुमत की भविष्यवाणी की जा रही थी, वह उससे कुछ पीछे जरूर है, लेकिन वह सत्ता के करीब है, और ऐसे आसार दिख रहे हैं कि वहां वह अपनी खुद की, या किसी गठबंधन से एक स्थाई सरकार बना पाएगी। यह बात इस नए राज्य के लिए इसलिए भी मायने रखेगी कि इसने चौदह बरसों की अपनी जिंदगी में नौ मुख्यमंत्री, और दो बार का राष्ट्रपति शासन सब देख लिया है। अल्पमत की सरकार देखी है, और मुख्यमंत्री को जेल में देख लिया है। ऐसे में मतदाताओं के फैसले से अगर एक मजबूत सरकार वहां बनती है, तो यह बात कम महत्वपूर्ण है कि वह किस पार्टी या गठबंधन की बनती है। दूसरी तरफ जम्मू-कश्मीर में भी नौबत यही है कि वहां किस पार्टी की सरकार बनती है, या कौन सा गठबंधन सत्ता पर आता है, उसके बजाय महत्वपूर्ण यह है कि वहां एक मजबूत सरकार बने, जो अच्छी तरह काम करे। 
आज दोपहर इस संपादकीय को लिखे जाते कश्मीर में जो नौबत दिख रही है, वह कुनबापरस्ती पर टिकी पार्टियों की वापिसी की है। भाजपा को छोड़ दें, तो कश्मीर में पीडीपी, नेशनल कांफे्रंस, और कांगे्रस, ये तीनों पार्टियां एक कुनबे वाली पार्टियां हैं, और वहां की अगली सरकार में इनमें से कोई न कोई शामिल रहना तय है। इसलिए जम्मू-कश्मीर की राजनीति से कुनबापरस्ती इस चुनाव में भी खत्म नहीं हुई है, और दमखम के साथ डटी हुई है। लेकिन जम्मू-कश्मीर में सबसे बड़ी बात भाजपा की बहुत दमदार जीत है, जो बहुमत से दूर है, लेकिन पहली बार इस विधानसभा में वह इतनी ताकत के साथ पहुंच रही है। दूसरी तरफ झारखंड में भी झारखंड मुक्तिमोर्चा एक कुनबे वाली पार्टी के रूप में चुनाव लड़ रही थीं, और जेल काट रहे भूतपूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा ने भी अपनी पत्नी के साथ मिलकर एक पार्टी बना ली थी। कश्मीर में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला दो सीटों से लड़े थे, दोनों पर हार गए, वहां पर घाटी में भाजपा का चेहरा कही जाने वाली बड़बोली नेता हीना भट के वोटों की गिनती हजार तक भी नहीं पहुंच पाई, और वे तीसरे नंबर पर रहीं। झारखंड में भ्रष्टाचार के मामले में जेल काट रहे भूतपूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा चुनाव हार गए, और भूतपूर्व मुख्यमंत्री, और संभावित भावी मुख्यमंत्री समझे जा रहे अर्जुन मुंडा सहित कुछ बड़े नामों के हार के आसार दिख रहे हैं। 
कांगे्रस और भाजपा के बीच यह जुबानी जंग चल रही है कि पिछले लोकसभा चुनाव के मुकाबले भाजपा को इस बार कितने विधानसभा क्षेत्रों में लीड मिली है, और उसके वोट कम या ज्यादा क्या हुए हैं? लेकिन विवादों से परे जो बात है वह यह है कि इन दोनों जगहों पर भाजपा बड़ी पार्टी की तरह उभरी है, झारखंड में वह सत्ता तक पहुंच गई है, और कश्मीर में भी वह या तो किंगमेकर रहेगी, या विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी रहेगी। देश के अकेले मुस्लिम बहुसंख्यक राज्य में भाजपा की ऐसी घुसपैठ मामूली नहीं समझी जानी चाहिए, और कम से कम देश भर में भाजपा के मुकाबले पार्टी के रूप में जो सबसे अधिक राज्यों में मौजूदगी वाली पार्टी है, उस कांगे्रस के लिए तसल्ली की कहीं कोई बात नहीं है। ये वोट भाजपा के बढ़ते हुए दबदबे और कब्जे की एक निरंतरता है, और चाहे उसकी सरकार कश्मीर में न बन सके, कश्मीर विधानसभा में उसकी मौजूदगी दमदार रहेगी, और हो सकता है कि कल तक वह वहां की सत्ता में भागीदार भी हो।
इन दो राज्यों के चुनावी नतीजे देश में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की राजनीति और रणनीति की निरंतरता वाले हैं, और इनके खिलाफ जिन लोगों को राजनीति में कोई महत्वाकांक्षा है, उनको अगले दो-तीन दिन टीवी पर मनचाहे बयान देने के बाद, घर बैठकर आत्मचिंतन करना चाहिए, उसके बिना उनका कोई भविष्य खुद होकर आकर दरवाजा नहीं खटखटाएगा।

लोग बेहतर को वोट दें, सबसे अच्छे को वोट दें

22 दिसंबर 2014
संपादकीय
छत्तीसगढ़ में शहरी म्युनिसिपलों के चुनाव अब मतदान के करीब पहुंच रहे हैं। उम्मीदवार साफ हैं, दोनों बड़ी पार्टियों के चुनावी घोषणा पत्र आ चुके हैं, गुटबाजी और भीतरघात के आसार भी साफ हैं। वार्ड छोटे-छोटे होने से तीसरे और चौथे नंबर के उम्मीदवार भी मैदान में हैं, जिनमें से कुछ बागी हैं और कुछ नए भी हैं। पार्टियों के उम्मीदवारों में कुछ पुराने परखे हुए हैं, और कुछ नए हैं। कई जगहों पर नेताओं ने अपनी पत्नियों को टिकट दिला दिए हैं, और वे एक किस्म से परदे के पीछे से कठपुतली के धागे थामकर काम चलाने की उम्मीद में हैं। चूंकि इसके बाद करीब पांच बरस तक शहरी मतदाता को वोट डालने नहीं मिलेंगे, इसलिए उसका यह वोट उसकी पसंद के मामले में रात की आखिरी गाड़ी जैसा है, जिसे समय पर पकड़ा नहीं गया, तो अगली गाड़ी पांच बरस बाद मिलेगी। 
प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा और विपक्षी कांग्रेस के तेवर, और उनका कामकाज जनता के सामने है। लेकिन स्थानीय संस्थाओं के कामकाज को लेकर हमारा यह मानना है कि पार्टियों से परे बेहतर उम्मीदवार पर भी नजर डालनी चाहिए, क्योंकि किसी एक वार्ड के काम में किसी राजनीतिक दल की रीति-नीति से परे, उसके वार्ड स्तर के नेता के चाल-चलन, उसकी सक्रियता, जनहित की उसकी सोच अधिक मायने रखती है। हालांकि इस चुनाव के पोस्टर देखें तो छत्तीसगढ़ में भाजपा म्युनिसिपल के चुनाव भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के चेहरों को दिखाकर लड़ रही है, ऐसा इसलिए भी है कि उसके स्थानीय उम्मीदवारों की साख अपने वार्ड में भी, अपने शहर और कस्बे में भी मोदी-रमन किस्म की नहीं है। दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी हमेशा की तरह अपने आपसे लड़ रही है, और पिछले चुनावों के नतीजे इस बात के गवाह हैं कि कांग्रेस कई चुनावों में जीत चुकी होती अगर पार्टी अपने ही भीतर के अजीत जोगी से जीत जाती। इस बार भी आसार बहुत अलग नहीं दिख रहे हैं।
लेकिन हम जीत-हार को लेकर यहां कोई विश्लेषण करना नहीं चाहते, जनता अपना फैसला जब करेगी, तो वह नतीजों में सामने आ जाएगा। आज हम चर्चा इस पर करना चाहते हैं कि लोगों को पार्टियों से परे भी अपने शहर-कस्बों और वार्डों में यह देखना चाहिए कि सबसे अच्छे उम्मीदवार कौन हैं। यह बात कम मायने रखती है कि वे किस पार्टी के हैं। अगर उनकी पार्टी अच्छी नहीं है, तो वे जीतकर जाकर गलत बातों के लिए एक गिरोहबंदी में भागीदार होने को मजबूर होंगे। और उनकी पार्टी अच्छी है, लेकिन वे खुद अच्छे नहीं हैं, तो पांच बरस तक ऐसे नेता को झेलना भारी पड़ेगा। ऐसे में जनता को चाहिए कि वह सबसे अच्छे उम्मीदवार को चुने, और फिर ऐसा करने से चाहे किसी एक म्युनिसिपल में चाहे किसी एक दल का बहुमत न बने। हम स्थानीय संस्थाओं में ऐसे बहुमत का नुकसान भी देख चुके हैं जो कि मनमानी करने का एक मौका देता है। लोगों को बहुमत की परवाह किए बिना सबसे अच्छे उम्मीदवारों को जिताना चाहिए, ताकि वे म्युनिसिपल में बैठकर बेहतर काम कर सकें। यह कहीं जरूरी नहीं है कि किसी एक पार्टी के ही पार्षद हों, और उसी के मेयर या अध्यक्ष हों। ये लोग अलग-अलग पार्टियों के भी हो सकते हैं, और वैसी स्थिति एक बेहतर शक्ति संतुलन के काम की भी हो सकती है। हमने देश की संसद में भी राजीव गांधी के वक्त एक ऐतिहासिक बाहुबल का नतीजा देखा था जब एक बूढ़ी शाहबानो को कुचल दिया गया था। और आज देश की संसद में एक दूसरे ऐतिहासिक बाहुबल का नतीजा देश देख रहा है कि किस तरह धर्मांतरण पर सरकार चुप है। इसलिए ऐतिहासिक बहुमत कई बार, या अक्सर, कई तरह के नुकसान लेकर भी आता है। 
वार्डों के चुनाव से छोटे और कोई चुनाव नहीं होते, और अगर इस चुनाव में भी लोग ईमानदार, जनता के हमदर्द, और मेहनती उम्मीदवारों को नहीं चुनेंगे, तो वे अपने वार्ड और अपने शहर-कस्बे की संभावनाओं को खत्म ही करेंगे। हमारी सिफारिश किसी पार्टी या उम्मीदवार के लिए नहीं है, लेकिन लोग बेहतर को वोट दें, सबसे अच्छे को वोट दें।

देश भर की कतरा-कतरा खबरों से बन रही एक भयानक तस्वीर

21 दिसंबर 2014
संपादकीय
देश भर में चारों तरफ जिस तरह की हिंसा की खबरें आ रही हैं, महिलाओं से, और छोटी बच्चियों से जिस तरह बलात्कार हो रहा है, जिस तरह सत्ता की ताकत में मदमस्त नेता अपनी पार्टी के राज में सरकारी अफसरों को धमका रहे हैं, गालियां दे रहे हैं, पीट रहे हैं, जिस तरह प्रेम में निराश होकर लोग आत्महत्या कर रहे हैं, सामाजिक मंजूरी न मिलने पर प्रेमी जोड़े ट्रेन तले कट जा रहे हैं, पंचायतों से बलात्कार के हुक्म जारी हो रहे हैं, धर्मान्धता और धर्मांतरण के नारे उठ रहे हैं, देश में रहने वाले हर नागरिक को हिन्दू बनाने की घोषणा हो रही है, सरकार की कुर्सियों पर बैठे लोग भ्रष्टाचार करते पकड़ा रहे हैं, ऐसी हर किस्म की खबरों को पढऩे के बाद उनके बारे में सोचें, तो यही लगता है कि इस देश में लोकतंत्र बड़ी दूर तक नाकामयाब हो गया है, और इसके तीनों स्तंभ अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभा पा रहे हैं। सरकारें पकड़ में आने के पहले तक के दर्जे के भ्रष्टाचार में डूबी हैं, चुनावों में जीत को खरीदकर लोग संसद और विधानसभा पहुंच रहे हैं, कई जगहों पर जीते हुए सांसदों और विधायकों को खरीदकर सरकारें बन या बच रही हैं, और ऐसे में अदालतों के हाथ-पैर बांधकर रखे गए हैं ताकि वे सत्ता के जुर्म का तेजी से निपटारा न कर सकें। इसके साथ-साथ यह भी है कि अदालतें अपने आपमें भ्रष्टाचार का हिस्सा हो गई हैं, और बहुत सी अदालतों पर अधिकतर लोगों का कोई भरोसा नहीं है। लोकतंत्र में चौथा स्तंभ कहा जाने वाला, या होने का दावा करने वाला मीडिया भी जनता के सर्वे में सबसे भ्रष्ट पेशों में गिना जाने लगा है, और एक बड़े संपादक विनोद मेहता ने हाल ही में अपनी किताब में लिखा है कि मीडिया से देश की जनता का आदर्श का मोह किस तरह भंग हो गया है। 
हमारा यह सोचना है कि लोकतंत्र में एक जुर्म दूसरे कई किस्म के जुर्मों को बढ़ावा देता है और ऐसे दो मामलों के बीच जरूरी नहीं है कि कोई रिश्ता दिखाई भी पड़े। जब छत्तीसगढ़ में किसी महिला को टोनही कहकर उसकी हत्या की जाती है, तो इससे उन मुजरिमों को भी बढ़ावा मिल सकता है जो कि किसी और महिला की दहेज प्रताडऩा करते हैं, या किसी और बच्ची के साथ बलात्कार करते हैं। जुर्म के लिए धड़क खुलना बड़ी बात होती है, और जब एक जुर्म बिना सजा रह जाता है, तो तमाम किस्म के दूसरे जुर्म के लिए लोगों का हौसला बढ़ता है। फिर जब देश में ऊंचे ओहदों पर बैठे हुए लोग मुजरिम साबित होते हैं, अदालत के रास्ते जेल पहुंचते हैं, या इन सबसे बचकर भी लोगों की नजरों में गिर जाते हैं, तो फिर लोगों के लिए कोई प्रेरणा नहीं बच जाती। लोगों को एक किस्म से यह नैतिक इजाजत मिल जाती है कि जब बड़े-बड़े लोग बड़े-बड़े गलत काम करते हैं, तो फिर छोटे-छोटे लोग छोटे-छोटे गलत काम क्यों नहीं कर सकते? 
और जब तरह-तरह के मुजरिम चुनाव जीतकर सत्ता में आ जाते हैं, और पुलिस के हाथ हथकडिय़ों के बजाय वे उन हाथों से सलामी पाने लगते हैं, तो फिर देश में नैतिकता के पैमाने और अच्छे चाल-चलन की प्रेरणा, इन दोनों का मटियामेट हो जाना तय रहता है, और भारत में वही हो रहा है। बड़े-बड़े ओहदे वाले लोग जब वीडियो कैमरों पर अफसरों को मां-बहन की गालियां देते कैद होते हैं, तो सार्वजनिक जीवन से शिष्टाचार और अच्छे चाल-चलन की संभावना घटने लगती हैं। भारत की आज की संस्कृति में सत्ता की मंजूरी से गहरे तक पैठ गई इन बातों का रातों-रात कोई इलाज भी नहीं हो सकता, लेकिन यह देश ऐसे माहौल में गड्ढे की तरफ बढ़ रहा है। कोई नासमझ लोग देश की आर्थिक तरक्की के आंकड़े गिनाकर यह साबित कर सकते हैं कि वह ऊपर जा रहा है, लेकिन हकीकत यह है कि अगर कोई मामूली बेहतरी हुई भी है, तो वह देश की तरक्की की संभावनाओं के मुकाबले कहीं नहीं टिकती। यह देश बड़ी हिंसा की आदत वाला हो चुका है, और अब विचारों की हिंसा, सत्ता की बददिमागी की हिंसा, सरकारी ताकत की हिंसा, इन सबको लगातार बढ़ते देखना बहुत भयानक है। और इन तमाम बातों को जोड़कर एक खतरनाक तस्वीर सामने रखने की कोशिश भी नहीं हो रही है, क्योंकि ऐसी हिंसाओं के शिकार लोग महज अपने-अपने तबकों को बचाने की कोशिश करते हुए, बाकी के हक महत्वहीन मान लेते हैं। 

संसद सत्र संसद के बाहर की भड़काऊ साजिशों का शिकार

20 दिसंबर 2014
संपादकीय
भारतीय संसदीय लोकतंत्र सरकार बदलने के साथ-साथ कई तरह के विरोधाभास देखने लगता है। पूरे देश में एक जैसा टैक्स लगाकर सामानों के दाम एक करने के केंद्र सरकार के आज के प्रस्तावित विधेयक पर गैर एनडीए राज्य साथ नहीं दे रहे हैं। गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स को लेकर लंबे अरसे से कोशिश चल रही थी, अटल सरकार के समय इसकी शुरूआत हुई थी, और यूपीए के पूरे कार्यकाल में एनडीए के राज वाले प्रदेश लगातार इसका विरोध करते रहे, और छत्तीसगढ़ से भी ऐसा विरोध दिल्ली में लगातार दर्ज होते रहा। इस विरोध में मोदी का गुजरात बढ़-चढ़कर सबसे आगे था, और लोकतंत्र की विसंगति यह है कि आज उसी एनडीए के, मोदी के ही वित्त मंत्री अरूण जेटली इसे आजाद भारत का सबसे क्रांतिकारी टैक्स सुधार करार दे रहे हैं, लेकिन संसद में उसके पास होने का आसार नहीं है, और गैर एनडीए राज्य उसका साथ नहीं दे रहे। कल तक जो सत्ता थी, आज वह विपक्ष है, और कल का विपक्ष आज सत्ता में है, और इनके संसदीय टकराव के चलते इसका नुकसान देश झेल रहा है। 
दरअसल भारत जैसी संसदीय, और संघीय व्यवस्था एक अंधाधुंध टकराव के साथ जिंदा रहने लायक व्यवस्था नहीं है। इसमें सहमत से लेकर बहुमत तक की कोशिशें जरूरी होती हैं, और देश में गैर आर्थिक मुद्दों को लेकर भी, सामाजिक और साम्प्रदायिक मुद्दों पर सत्ता और विपक्ष के बीच, एनडीए और गैर एनडीए के बीच इतना बड़ा टकराव है कि संसदीय कामकाज पर सहमति के आसार नहीं बन पा रहे। और भाजपा के वित्त मंत्री की जुबान में आज अधिक दम इसलिए नहीं रह जाता कि कल तक उन्हीं की अगुवाई में एनडीए के मुख्यमंत्री, एनडीए के सांसद, यूपीए की जीएसटी की पहल का विरोध कर रहे थे।
आज चूंकि देश पर भाजपा का राज है, इसलिए संसद में सहमति और बहुमत की कोशिश की जिम्मेदारी भी उसी की है। आज इंटरनेट पर ऐसे कई वीडियो तैर रहे हैं जिनमें कल तक लोकसभा में विपक्ष की नेता रही सुषमा स्वराज सदन के बहिष्कार को लोकतंत्र का एक हिस्सा बताते दिख रही हैं। खराब परंपराएं शुरू करना आसान होता है, उनको खत्म करना नामुमकिन हो जाता है, क्योंकि वे मिसाल बनकर दूसरों के हाथ का हथियार भी बन जाती हैं। लेकिन हम यहां पर एक दूसरी बात भी कहना चाहते हैं, इस बार संसद में संसदीय काम न होने के पीछे, विपक्ष के हंगामे के पीछे जो वजहें हैं, उनके बारे में प्रधानमंत्री और एनडीए को सोचना चाहिए। एनडीए के मंत्रियों, सांसदों, नेताओं, और सहयोगी संगठनों ने देश के भीतर एक निहायत गैरजरूरी और नाजायज तनाव खड़ा किया है, और संसद के बाहर का यह तनाव संसद सत्र को खा गया। लोकतंत्र में संसद की इमारत के स्तंभ बाहर की आंधी के झोंकों को रोक नहीं सकते, और वहां का अंधड़ भीतर आकर काम चौपट कर जाता है। मोदी सरकार को यह अंदाज रहना चाहिए था कि जिस तरह का तनाव सोच-समझकर बाहर खड़ा किया गया, उसका शिकार सरकार के हिस्से का संसदीय कामकाज भी होगा। तो एक तरफ तो बहिष्कार की एनडीए की परंपरा आज उसके विरोधियों के हाथ का औजार या हथियार है, और दूसरी तरफ एक निहायत खतरनाक तनाव जो संसद सत्र के ठीक पहले देश भर में फैलाया गया, उसने सबसे अधिक नुकसान मुसलमानों या ईसाईयों का नहीं किया, उसने सबसे अधिक नुकसान नरेन्द्र मोदी का किया है, जो कि अपनी सरकार के विधेयकों को संसद में पास नहीं करवा पा रहे। चुनावी सभाओं के नारे अलग होते हैं, और सरकार चलाने की जिम्मेदारी अलग होती है, मोदी को अब भी आने वाले संसद-सत्रों के लिए अपनी टोली के तौर-तरीकों को बदलवाना होगा, वरना न सिर्फ संसद का समय इसी तरह खराब होते रहेगा, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था, देश की सद्भावना, और देश की साख भी खराब होते रहेगी। संसद के इस सत्र को संसद के बाहर की भड़काऊ बातों, और बाहर की साजिशों के शिकार के रूप में दर्ज किया जा चुका है।

हिन्दुस्तान में आज का वक्त मोदी के सोचने और करने की मांग कर रहा है

19 दिसंबर 2014
संपादकीय
राजस्थान के सत्तारूढ़ भाजपा विधायक ने जिले के चिकित्सा अधिकारी के साथ फोन पर अपने एक रिश्तेदार के तबादले को लेकर जिस तरह की गाली-गलौज की, जिस तरह की धमकियां दीं, उसके रिकॉर्डिंग इंटरनेट पर तैर जाने के बाद अब भाजपा शर्मिंदगी झेल रही है, और कहने के लिए इस विधायक ने भी अफसर से माफी मांगी है, लेकिन यह मामला एक सजा के लायक, और कैद के लायक जुर्म का मामला है, माफी का नहीं। और इस अफसर ने सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया है, साथ ही पुलिस में रिपोर्ट भी कर दी है। राजस्थान का यह ताजा मामला देश में कई जगहों पर भाजपा के मंत्रियों, सांसदों-विधायकों, पदाधिकारियों, और संघ परिवार का हिस्सा कहे जाने वाले संगठनों के हमलावर तेवरों की एक ताजा कड़ी ही है। आज सुबह का टीवी शुरू करते ही एक हिन्दू संगठन का नेता कैमरे पर चीख-चीखकर गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे की स्तुति कर रहा था, और गांधी को गालियां दे रहा था। दूसरी तरफ दिल्ली में ऐसे ही कुछ घोर साम्प्रदायिक हिन्दू संगठन लगातार यह कोशिश कर रहे हैं कि गोडसे को एक महान देशभक्त के रूप में स्थापित करके सार्वजनिक जगहों पर उसकी प्रतिमाएं लगाई जाएं। 
लोगों को याद होगा कि नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद सबसे पहले लालकिले के अपने भाषण में शौचालयों की जरूरत और सफाई अभियान के नारे लगाते हुए गांधी का जिक्र किया था, कि गांधी के सपनों को पूरा करने के लिए वे यह बीड़ा उठा रहे हैं। आजादी के सालगिरह के भाषण में इन बहुत आम लगते मुद्दों को उठाने के लिए नरेन्द्र मोदी ने अमरीका से ऑस्ट्रेलिया तक, और हिन्दुस्तान के कोने-कोने में मंच और माईक से अपनी ही तारीफ की, और बार-बार गांधी का नाम लिया। अब आज अगर उनके ही संगी-साथी गांधी के हत्यारे गोडसे को महिमामंडित करने में ओवरटाईम कर रहे हैं, और प्रधानमंत्री संसद में मौजूद रहते हुए भी इस मुद्दे पर बोलने से बच रहे हैं, और सरकार अपनी यह नीति घोषित कर रही है, कि इस पर सिर्फ गृहमंत्री ही जवाब देंगे, तो मोदी के गांधीप्रेम में एक बड़ा विरोधाभास दिख रहा है। यह नौबत इस देश के लिए बहुत खतरनाक है कि आज कट्टर साम्प्रदायिक ताकतें देश में एक बार फिर गांधी की हत्या जैसा जुनून खड़ा कर रही हैं, और भाजपा के करीबी संगठन इस तरह के भड़काऊ और देशद्रोही भाषण दे रहे हैं कि अगले कुछ बरसों में इस देश में किसी को ईसाई या मुसलमान नहीं रहने दिया जाएगा। 
यह मौका किसी गृहमंत्री के बयान के लायक नहीं है, और प्रधानमंत्री को खुद होकर संसद के भीतर और संसद के बाहर अपने मन की बात बोलनी चाहिए। वे रेडियो पर जनता से बात करते हुए जिंदगी के छोटे-छोटे पहलुओं पर अपने मन की बात बोलते रहें, और देश को साम्प्रदायिकता की आग में झोंक देने की जो बड़ी साजिशें उन्हीं के साथ के लोग कर रहे हैं, उस पर वे चुप रहें, तो इतिहास इसको भी दर्ज कर रहा है। हमने यूपीए सरकार के वक्त भी बार-बार यह लिखा था कि भारत जैसे विशाल लोकतंत्र के जलते-सुलगते मुद्दों पर चुप रहना भारतीय प्रधानमंत्री का हक नहीं हो सकता। इस देश के प्रधानमंत्री को सार्वजनिक रूप से सार्वजनिक मुद्दों पर बोलना ही होगा, और आज नरेन्द्र मोदी संसद के भीतर, सवालों के कटघरों में मनमोहन सिंह की तरह चुप बने हुए हैं, और वे उसी भाजपा के प्रधानमंत्री हैं जो कि मनमोहन सिंह को मौनी बाबा कहते हुए थकती नहीं थी। 
देश की आज की नौबत बहुत ही भयानक है, और हमने पाकिस्तान के संदर्भ में लिखते हुए भारत को सचेत भी किया है कि साम्प्रदायिकता को बढ़ाना, धर्मान्धता को बढ़ाना, लोकतंत्र को किस तरह खत्म करता है, इसकी एक जलती हुई मिसाल सरहद के बगल में पाकिस्तान में दिख रही है। भारत में पिछली पौन सदी में गांधी ने अपनी जिंदगी भी देकर देश के भीतर साम्प्रदायिक एकता रखने की कोशिश की थी, और बहुत से दूसरे नेताओं ने, राजनीतिक दलों और संगठनों ने इसके लिए कुर्बानियां दी हैं। बहुत मुश्किल से विविधताओं से भरा हुआ यह देश एक साथ रहना सीख पाया था, और अब उसकी सीखी हुई गंगा-जमुनी सभ्यता को खत्म करने के लिए साम्प्रदायिक ताकतें ऐसा दिखा रही हैं कि मानो हैवानियत के अच्छे दिन आ गए हैं। 
यह मौका भारत के प्रधानमंत्री की चुप्पी का नहीं है, और हाथ पर हाथ धरे देश भर में साम्प्रदायिक हिंसा फैलाने की कोशिशों को चुपचाप देखते रहने का भी नहीं है। ऐसी चुप्पी भारतीय लोकतंत्र के लिए बहुत महंगी साबित हो रही है, और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इतिहास में यह दर्ज भी हो रही है। उनको यह बात भी सोचनी चाहिए कि आर्थिक विकास से लेकर रोजगार तक, और सफाई से लेकर शौचालयों तक जितने किस्म की उनकी योजनाएं हैं, वे सब की सब इस हिंसा के बीच घूरे पर जा गिरी हैं। आज देश में कोई मोदी की सोच का नाम भी नहीं ले रहा, और देश के ऐसे बड़े-बड़े लेखक-पत्रकार, स्तंभकार और विचारक जो कि आम चुनाव के पहले से मोदी में संभावना देख रहे थे, और चुनाव के बाद मोदी में एक बड़ा नेता देख रहे थे, वे तमाम लोग आज घोर निराश होकर मोदी सरकार, मोदी की पार्टी, और मोदी के सहयोगी संगठनों के खिलाफ आलोचना से भरे लेख लिख रहे हैं। हिन्दुस्तान में आज का वक्त मोदी के सोचने और करने की मांग कर रहा है। पता नहीं क्यों वे संसद में मुंह भी नहीं खोल पा रहे हैं।