छत्तीसगढ़ के नगरों ने भाजपा के लिए बजाई खतरे की घंटी

4 जनवरी 2015
संपादकीय
छत्तीसगढ़ के नगरीय चुनाव के नतीजे प्रदेश में पिछले ग्यारह बरसों से सत्तारूढ़ भाजपा के लिए एक सदमा लेकर आए हैं, और भाजपा के जो शुभचिंतक हैं वे इसे पार्टी और सरकार के लिए आंख खोलने वाले भी मानेंगे। नतीजों के आंकड़े तो आते जा रहे हैं, लेकिन सदमा पूरी तरह से आ चुका है। और चूंकि प्रदेश में व्यापक रूप से भाजपा को झटका लगा है, इसलिए यह मानना ठीक नहीं होगा कि सिर्फ स्थानीय स्तर पर पिछले बार के भाजपा के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के खिलाफ यह नाराजगी या जनादेश है। यह स्थानीय से अधिक, राज्यस्तर का जनादेश है, और उसे उसी तरह लेना भी चाहिए। यह सत्तारूढ़ भाजपा के लिए संभलने का एक अच्छा मौका भी हो सकता है, क्योंकि अगले कुछ हफ्तों में पंचायत के चुनाव तो निपट जाएंगे, उसके बाद चार बरस बिना चुनाव के रहेंगे। अगले विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा को आज यह याद रख लेना चाहिए कि पिछले चुनाव में वह कांगे्रस से कुल पौन फीसदी आगे थी, और आज म्युनिसिपल चुनावों में वह कई फीसदी पीछे हो गई है। 
इस चुनाव में भाजपा ने अपने पार्षदों और अध्यक्षों-महापौरों को बड़ी संख्या में बदल दिया था, और उसे उम्मीद थी कि पांच बरस में जनता की जो नाराजगी स्थानीय निर्वाचित जनप्रतिनिधियों से होती है, वह जीत में आड़े नहीं आएगी, लेकिन वैसा हो नहीं पाया। नए-नए उम्मीदवार भी हारे, भाजपा के जानकार लोगों में पहले से यह चर्चा भी थी कि कई जगहों पर पार्टी ने कमजोर संभावनाओं वाले लोगों को उम्मीदवार बनाया था। अभी हम उतनी बारीकी में जाना नहीं चाहते, लेकिन राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी को आज मोटेतौर पर कई बातों को समझना चाहिए। ऐसे कौन से मुद्दे रहे, राज्यस्तर पर जनता की नाराजगी की कौन सी बातें रहीं, जिन्होंने भाजपा के हाथ से इतने म्युनिसिपल छीन लिए?
हमारे पाठकों को याद होगा कि पिछले महीनों में हम लगातार स्थानीय मुद्दों को लेकर राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी को आगाह करते आ रहे थे कि जिस तरह शहर घूरे में तब्दील हो चुके थे, वह भाजपा को नगरीय चुनाव में भारी पड़ेगा। और हमारा यह भी मानना है कि जब प्रदेश की राजधानी में गंदगी से लोग दहशत में थे, और अफसर कुछ भी नहीं कर पा रहे थे, तो इस शहर में भाजपा के महापौर प्रत्याशी की हार में यह मुद्दा अपने-आपमें काफी था। लेकिन यह पूरा नहीं था, राज्य सरकार अपने इस तीसरे कार्यकाल में राशन कार्डों को लेकर बहुत बुरी तरह से नाराज जनता को झेल रही थी, जिस तरह से बिलासपुर में नसबंदी मौतें हुईं, उससे पूरे प्रदेश में महिला मतदाताओं में खास नाराजगी थी, और देश के बाहर के मीडिया ने भी इसे परले दर्जे की सरकारी लापरवाही माना था। लेकिन इसके बाद राज्य सरकार का जो रूख था, वह अपने बचाव का था, इन मौतों के मुजरिमों को सजा देने का सरकार का इरादा नहीं दिखा, और हमारा मानना है कि पूरे प्रदेश में इसे लेकर लोगों के बीच बहुत नाराजगी थी। 
दूसरी तरफ कांगे्रस की बात करना जरूरी है जो कि प्रदेश के अपने एक सबसे बड़े नेता अजीत जोगी की खुली नाराजगी और खुली बगावत को झेलते हुए भी चुनाव मैदान में बड़े सीमित साधनों के साथ थी। राज्य में ग्यारह बरसों से विपक्ष में रहना आसान नहीं होता, और पूरे देश में कांगे्रस पार्टी की जो बदहाली और फटेहाली है, उसके बोझ को राज्य में ढोना भी छत्तीसगढ़ कांगे्रस के लिए आसान बात नहीं थी। जिस कांगे्रस का देश भर मखौल बन रहा है, उसे वार्ड-वार्ड और शहर-कस्बे तक जिताना एक आसान बात नहीं थी। अपनी पार्टी के नेताओं से नुकसान झेलते हुए छत्तीसगढ़ कांगे्रस ने जिस अंदाज और जिस तेवर में ये चुनाव जीते हैं, वह एक बड़ी शानदार कामयाबी है। हमारे पाठकों को यह भी याद होगा कि कुछ हफ्ते पहले ही हमने इसी जगह छत्तीसगढ़ में कांगे्रस की विपक्षी भूमिका को लेकर लिखा था कि इस प्रदेश में संगठन जिस जिम्मेदारी और सक्रियता से काम कर रहा है, उसे देखकर कांगे्रस के राष्ट्रीय संगठन को भी विपक्ष की भूमिका सीखनी चाहिए। 
हमने इस जगह-जगह बार-बार राज्य सरकार के लिए सलाह लिखी थी, और कांगे्रस पार्टी के विपक्षी तेवरों की तारीफ की थी। अभी पूरे प्रदेश में जो नतीजे आए हैं वे इन्हीं दो बातों के मिले-जुले सुबूत हैं। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने अपनी अच्छी छवि और लोकप्रियता के साथ इस चुनाव में पूरे प्रदेश को मथ डाला था। शायद ही कोई शहर ऐसा था जहां उन्होंने रोड-शो न किया हो। भाजपा के इस स्टार प्रचारक की इतनी कोशिशों के बाद भी ऐसे चुनावी नतीजे आए हैं, और अगर इतनी कोशिश न हुई होती, तो पता नहीं क्या हुआ होता। यह मौका भाजपा को कांगे्रस दोनों के लिए आत्ममंथन का है। दोनों को भविष्य की अपनी संभावनाओं को देखना चाहिए, और लोकतंत्र में अपनी भूमिका को जिम्मेदारी के साथ निभाना चाहिए। विधानसभा और लोकसभा में अपनी जीत के बाद भाजपा अभी शहरों को खो बैठी है, और पंचायतों का मोर्चा खुला ही हुआ है। ऐसे में यह प्रदेश अगले चार-पांच बरस एक कड़े चुनावी मुकाबले की तैयारी का प्रदेश रहेगा, और कांगे्रस के प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल और विधानसभा में कांगे्रस के नेता टी.एस. सिंहदेव इसी सक्रियता से काम करते रहे, तो वे प्रदेश भाजपा सरकार के लिए बहुत बड़ी चुनौती रहेंगे। यह छत्तीसगढ़ में लोकतंत्र के लिए एक बहुत अच्छी बात है कि यहां एक जागरूक विपक्ष है, जो कि आज देश के स्तर पर नहीं रह गया है। और यह बात भाजपा के लिए खतरे की एक बड़ी तेज घंटी भी है।

पहली खबर से सीधे नतीजों पर छलांग लगाते मीडिया के खतरे

03 जनवरी 2015
संपादकीय

गुजरात से लगी हुई भारतीय समुद्र सीमा में पाकिस्तान की तरफ से एक मछुवारा बोट आने की खबर लगी, और भारतीय निगरानी एजेंसियों को इनमें कुछ खतरनाक सामान होने का अंदेशा था। भारत सरकार के मुताबिक इस बोट को रोकने की कोशिश की गई, पीछा किया गया, लेकिन इसने रूकने के बजाय अपने आपको एक विस्फोट से उड़ा दिया।
कल से भारत का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आसमान और समंदर से ली गई इस बोट की विस्फोट के पहले और विस्फोट के बाद की तस्वीरें दिखाकर अटकलबाजी के एक गलाकाट मुकाबले में लग गया है कि यह मुंबई हमले जैसे एक आतंकी हमले के लिए आ रही थी, या गुजरात में होने जा रहे प्रवासी भारतीय सम्मेलन पर हमला करने आ रही थी, या इसका और क्या मकसद था? बड़े-बड़े विश्लेषक इस बात पर बहस कर रहे हैं कि यह कितना बड़ा खतरा था, और इसे रोक पाना कितनी बड़ी कामयाबी थी। लेकिन टीवी की खबरों पर किसी संदेह या किसी आशंका की कोई गुंजाइश छोड़ी नहीं जा रही, और मोटे तौर पर इस बोट को आतंकी हमले का एक हिस्सा मान लिया गया है। हो सकता है कि यह बात पूरी तरह सही हो, लेकिन दूसरी तरफ सच यह है कि अभी आतंक के संदेह से आगे और कुछ भी स्थापित नहीं हुआ है, और आज सुबह कुछ दूसरे जानकार लोगों ने एक दूसरा संदेह जाहिर किया है कि यह बोट हो सकता है कि तस्करों की हो, और उस पर डीजल या दूसरे किस्म के सामान लदे हों, और उसका किसी आतंकी हमले से कुछ लेना-देना न रहा हो।
आज पल-पल की खबर देने वाले मीडिया की वजह से पहली सूचना का तो सैलाब आया रहता है, लेकिन ऐसी सूचना के वजन की फिक्र किए बिना जो सबसे अधिक सनसनीखेज, सबसे अधिक नाटकीय बात हो सकती है, उस निष्कर्ष पर बड़ी तेजी से पहुंचा जाता है। अखबारों के जमाने में यह दिक्कत नहीं होती थी, क्योंकि दिन में दो या तीन वक्त पर निकलने वाले अखबारों के लिए खबरें तैयार करते हुए संवाददाताओं को कई घंटे का वक्त मिलता था, और उतने में सच को ठोक-बजाकर परख लेना हो जाता था। लेकिन अभी ब्रेकिंग न्यूज नाम की एक ऐसी हड़बड़ी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आने के साथ-साथ पैदा हुई है कि जिसके चलते किसी भी तरह की जांच-पड़ताल तकरीबन गैरजरूरी मान ली जाती है।
पाकिस्तान के खिलाफ एक युद्धोन्माद के चलते हुए यह मान लिया जाता है कि उससे जुड़ी खबरों को जांचना-पड़तालना राष्ट्रदोह किस्म का काम है। इन दो देशों के बीच टकराव के चलते भारत में मीडिया इस तंगनजरिए का शिकार हो गया है, जो कि अखबारनवीसी के बुनियादी तौर-तरीकों, तकनीकों, और उसके तकाजे से अनछुआ रहने से पैदा होता है। देश के लिए प्रेम तो अच्छी बात है, लेकिन सच के लिए प्रेम इससे और अधिक अच्छी बात होती है। एक पेशे को अपने आपको सरहद का कैदी नहीं बनाना चाहिए, और सच पर टिके रहना चाहिए। न सिर्फ पाकिस्तान के मामले में, बल्कि किसी भी देश के मामले में, किसी भी प्रदेश के मामले में मीडिया को एक सत्याग्रह पर चलना चाहिए। सत्य के लिए आग्रह यह पत्रकारिता की एक बुनियादी बात होती थी, लेकिन जबसे पत्रकारिता का नाम बदलकर मीडिया हो गया, और अखबारों के साथ टीवी जुड़ गया, और उसके बाद अब इंटरनेट और सोशल मीडिया जुड़ गए, तबसे सत्य का आग्रह खत्म हो गया, और एक बदहवास हड़बड़ी हावी हो गई। इसका नतीजा यह भी हुआ है कि पत्रकारिता की जो साख थी, छपे हुए शब्द की जो विश्वसनीयता थी, वह अब खत्म हो चुकी है, और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से मुकाबले के चलते प्रिंट मीडिया का नजरिया भी एक अभूतपूर्व हड़बड़ी का हो गया है, जिसमें जांचने-परखने की कोई गुंजाइश नहीं है, और न ही जरूरत मानी जाती है।
खबरों का सैलाब समंदर की आती-जाती लहरों की तरह ही मिनट-मिनट आते रहता है, और इसके चलते अब लोग कुछ घंटों पहले भी अधकचरी, अधपकी, और कई बार गलत साबित हो चुकी खबर को भूल भी जाते हैं। टीवी को यह सहूलियत हासिल है, लेकिन अखबारों को अधिक जिम्मेदार रहना पड़ता था क्योंकि पुराने पन्ने और कतरनें बरसों तक मुंह चिढ़ाने के लिए जिंदा रहते थे। एक बार फिर यह जरूरत आन खड़ी हुई है कि खबरों की बुनियादी तकनीक, उनके तथ्यों का तर्कों की कसौटी से गुजरते हुए खबर का हिस्सा बनना, ऐसी तमाम बातों को एक बार फिर गंभीरता से देखा जाए, उनको लागू किया जाए। इसके बिना मीडिया की विश्वसनीयता खत्म हो रही है, और लोकतंत्र में यह एक खतरनाक नौबत है। 

सरकार के आर्थिक अपराधों की जांच के बजाय उनकी खुफिया निगरानी अधिक जरूरी

02 जनवरी 2015
संपादकीय

छत्तीसगढ़ के सिंचाई विभाग के कुछ अफसरों के पास से जितनी नगदी बरामद हुई है, उसमें ठंड में ठिठुरते छत्तीसगढ़ के गरीबों को यह सोचने पर मजबूर किया है  कि सरकारी अमला कितना कमा-खा रहा है? अगर इन अफसरों के पास इतनी बड़ी रकम नगद है, तो उनकी कुल दौलत कितनी होगी, और उन्होंने इतनी दौलत जुटाने के लिए जनता के हक किस हद तक बेचे होंगे? 
सरकारी भ्रष्टाचार के जानकार लोगों का यह मानना है कि किसी भी भ्रष्ट अफसर के पास से कभी भी उसकी कमाई का पांच-दस फीसदी से अधिक बरामद हो ही नहीं सकता। सरकार के जानकार लोगों का यह भी मानना है कि जब कारोबारी या ठेकेदार को सौ रूपए की कमाई होती है, तो ही वे दस रूपए रिश्वत या कमीशन में विभाग के लोगों को बांटते हैं। इस नियमित रिश्वत से परे जब भी मोटी रिश्वत सरकार में किसी को दी जाती है, तो वह सरकारी खजाने में मोटी लूट के लिए दी जाती है, या फिर सरकार को लंबा नुकसान पहुंचाने के एवज में। इसलिए यह माना जाना चाहिए कि जिस अफसर से भ्रष्टाचार की जितनी बरामदगी होती है, जनता के हक उससे सैकड़ों गुना अधिक लुट चुके रहते हैं। 
अब साल में दस-बीस बार भ्रष्ट लोगों पर छापे पड़ जाएं, कुछ दर्जन लोग हर बरस रिश्वत लेते पकड़ा जाएं, और दस-बीस बरस तक मुकदमे चलने के बाद इनमें से अधिकतर लोग छूट भी जाएं, तो सरकार का भ्रष्टाचार कम कैसे होगा? दूसरी बात यह कि किसी भी तरह के रिश्वत-भ्रष्टाचार, या अनुपातहीन संपत्ति के मामलों में जो अफसर पकड़ाते भी हैं, उनमें से अधिकतर अपने ही विभागों की कमाऊ कुर्सियों पर कुछ महीने के भीतर ही नजर आने लगते हैं। ऐसे में आगे के भ्रष्टाचार के रूकने की उम्मीद ही करना बेकार है। सरकार में भ्रष्टाचार के इतने बड़े-बड़े मामले दस-दस बरसों से साबित पड़े हैं, लेकिन उनसे जुड़े हुए अफसर अभी भी सरकार के बड़े-बड़े विभागों को या दफ्तरों को हांक रहे हैं। ऐसे में आगे भ्रष्टाचार की गारंटी रहती है। 
इन दिनों छत्तीसगढ़ में छापेमारी और भ्रष्टाचार पकडऩे की जो हवा दिख रही है, वह पता नहीं कितने दिन टिकती है। और हम ऐसी नौबत आने के पहले सरकार की एक ऐसी खुफिया मशीनरी की सिफारिश बरसों से करते आ रहे हैं जो कि खेत चुग लिए जाने के पहले उसे बचाने का काम कर सके। आज सारा भ्रष्टाचार जब हो चुका रहता है, और भ्रष्ट लोग देश भर में जगह-जगह बेनामी और गुमनामी दौलत बना चुके रहते हैं, तब उनसे आखिरी के कुछ महीनों या एक-दो बरसों की कमाई को छापों में पकडऩे से राज्य का कुछ भला नहीं होता। राज्य के हितों का बचाव तो तभी हो सकेगा जब यह सरकार आर्थिक अपराध निगरानी ब्यूरो बनाकर सरकारी काम में भ्रष्टाचार के दौरान ही उस पर नजर रखने का काम करे, और अपनी जानकारी से सरकार की जांच और कार्रवाई की एजेंसियों को खबर करे। आज सरकार के पास अपने खुद के आर्थिक भ्रष्टाचार को रोकने के लिए सिर्फ जांच ब्यूरो है, निगरानी ब्यूरो नहीं है। जिस तरह नक्सलियों पर नजर रखने के लिए सरकार का खुफिया विभाग है, जिस तरह राजनीतिक या सामाजिक जानकारी इक_ी करने के लिए खुफिया विभाग है, उसी तरह एक अलग दफ्तर सरकार की आर्थिक गड़बड़ी पर नजर के लिए बनना चाहिए, और इस पर होने वाला खर्च राज्य को सस्ता पड़ेगा। 
छत्तीसगढ़ के भ्रष्टाचार के मामलों का इतिहास इस बात का गवाह है कि राज्य बनने के पहले से यहां पर भ्रष्टाचार के पांव मजबूती से जमे हुए हैं, और कांग्रेस की भोपाल या राजधानी की सरकार के चलते भ्रष्टाचार का जो हाल था, वह अभी भी बहुत बदला नहीं है। राजधानी के भोपाल रहने तक तो यह बात थी कि छत्तीसगढ़ वहां से दूर था और इसे लूटना भोपाल को उसी तरह सुहाता था जिस तरह लंदन से अंग्रेज हिन्दुस्तान को लूटते थे। लेकिन अब तस्वीर बदलनी चाहिए। इस राज्य को बने डेढ़ दशक हो रहे हैं, सरकार का बजट बहुत बढ़ चुका है, छत्तीसगढ़ के स्थानीय नेताओं को राज चलाने का अनुभव बहुत लंबा हो चुका है। ऐसे में सरकार के अपने आर्थिक अपराधों को होने का मौका देना ठीक नहीं है, उस पर खुफिया नजर रखकर उसे होने के पहले ही रोकना ठीक है, या जिस तरह रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा जाता है, उसी तरह भ्रष्टाचार होते हुए रंगे हाथों फाइलों को, और उन पर दस्तखत करते हाथों को पकडऩा चाहिए। 

सरकार से लेकर समाज तक को कचरे की फिक्र करने की जरूरत

01 जनवरी 2015
संपादकीय
उत्तरप्रदेश सरकार ने अपनी तमाम गलतियों और गलत कामों के साथ-साथ कभी-कभी कुछ ऐसा अच्छा भी किया है कि जिसकी तारीफ करनी ही पड़ती है। कल ही हमने इसी जगह पर फिल्म पीके को मनोरंजन कर मुक्त करने के लिए समाजवादी पार्टी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की तारीफ की थी, और आज वहां की एक और दूसरी खबर है कि सफाई कर्मचारियों की तनख्वाह में सरकार ने खासी बढ़ोत्तरी की है, और साथ-साथ यह भी तय किया है कि गटर सफाई के दौरान अगर कोई सफाई कर्मचारी जान खो बैठता है, तो उसके परिवार को सरकार दस लाख रूपए मुआवजा देगी। 
नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से देश भर में लगातार सफाई को लेकर एक चर्चा चल रही है, और जगह-जगह नाटकीय अंदाज में नेताओं की तस्वीरें खींची जा रही हैं जिनमें वे उन्हीं के लिए ताजा-ताजा बिखेरे गए कचरे को साफ करते दिखते हैं। हवा में खबरें ऐसी हैं कि मानो पूरे देश में लोग सफाई को लेकर चौकन्ने हो गए हैं, जबकि हकीकत यह है कि ऐसा चौकन्नापन किसी घूरे में कचरे के खासे नीचे दबा दिखता है। हम कुछ और खबरों को यहां पर जोडऩा चाहते हैं, पिछले पखवाड़े यह खबर आई थी कि 21वीं सदी में भी भारत में कानून के खिलाफ सफाई कर्मचारियों के हाथों से पखाना उठवाने का इंतजाम जारी है, और पूरे देश में सबसे अधिक मैला ढोने वाले कर्मचारी उत्तरप्रदेश में ही हैं। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ में आज से ही पॉलीथीन के थैलों पर रोक लगी है, और इसके पीछे वैज्ञानिक तर्क यह है कि ऐसा पॉलीथीन घूरों और नालियों से होते हुए या तो गाय के पेट तक पहुंच जाता है, और गाय जितना पॉलीथीन नहीं खा पाती है, वह नाली और गटर को चोक कर देता है। कई बरस पहले जब मुंबई में बाढ़ आई थी, तब भी इस तरह पानी के रास्ते को रोकने वाले पॉलीथीन को ही गुनहगार माना गया था। और जहां-जहां गटर में कचरा फंसता है, उसके पीछे मोटे तौर पर पॉलीथीन या इसी किस्म का न घुलने वाला कचरा रहता है। इसलिए उत्तरप्रदेश ने अगर गटर में मौत पर बचे परिवार को दस लाखपति बनाना तय किया है, तो इसके साथ-साथ यह भी तय करना चाहिए कि कभी ऐसा मुआवजा देने की नौबत न आए। 
शहरी कचरे का निपटारा एक बहुत ही वैज्ञानिक और तकनीकी काम है, जिसके लिए निजी क्षेत्र से लेकर स्थानीय म्युनिसिपल तक के अच्छे मैनेजमेंट की जरूरत भी पड़ती है। लेकिन हमने छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में ही यह मिसाल देखी है कि किस तरह इस पहली शहरी बुनियादी जरूरत को ठेके का धंधा बना लिया गया था, और दूसरे प्रदेश से आया हुआ एक ठेकेदार किस तरह इस प्रदेश की आंखों में कचरा झोंककर करोड़ों-अरबों लेकर चला गया। ऐसे में भारत के शहरों को ठोस कचरे के निपटारे को एक बड़ी प्राथमिकता बनाकर चलना पड़ेगा, और इसके लिए छत्तीसगढ़ में थोड़ी सी पहल अब दिखाई पड़ रही है, जब प्रदेश की राजधानी ऐसे दिवालिया ठेकेदार से आजाद हुई है, और स्थानीय कर्मचारियों की मदद से शहर अब कुछ साफ दिख रहा है। अब एक तरफ तो अलग-अलग किस्म के कचरे के लिए अलग-अलग घूरे या डिब्बे बनाने की जरूरत है, ताकि उसका निपटारा आसान हो सके, और दूसरी तरफ शहरी कचरे से बिजली और खाद बनाने की जो तकनीक आम हो चुकी है, उसके लिए कुछ भरोसेमंद कंपनियों को साथ लेकर, या सरकार को खुद पहल करनी चाहिए। शहरी कचरा बढ़ते ही चलना है, और इसके कम होने का कोई आसार नहीं है, अगर सरकार बड़े पैमाने पर कई विभागों को और जनता को शामिल करके इसकी पहल नहीं करेगी। हमारे पाठकों को याद होगा कि हम बरसों से सरकार को यह सुझाते आ रहे थे कि राज्य में पॉलीथीन पर पूरी रोक लगाने के पायलट प्रोजेक्ट की तरह प्रदेश के तीन बड़े भीड़ भरे तीर्थस्थानों से शुरुआत करनी चाहिए। हमने दंतेश्वरी, बम्लेश्वरी और रतनपुर की महामाया के मंदिरों का नाम भी लिखा था कि वहां पर पॉलीथीन पूरी तरह रोककर, उसके साथ-साथ वहां कपड़े और जूट के थैलों को उपलब्ध कराने के लिए महिला स्व-सहायता समूहों को आगे बढ़ाना चाहिए, और ऐसे विकल्प आने पर जनता खुद भी पॉलीथीन से बचने की कोशिश करेगी। हमको इस बात पर खुशी है कि आज से छत्तीसगढ़ सरकार का जो प्रतिबंध लागू हो रहा है, उसके साथ-साथ सरकार ने ऐसे विकल्प विकसित करने की बात भी कही है। देर से ही सही, राज्य सरकार की यह पहल अच्छी है। 
अब हम एक बार फिर गटर साफ करने वाले कर्मचारियों की तरफ लौटें, तो मौत से पहले भी उनकी जो जिंदगी रहती है, वह रोज मरने जैसी रहती है। और वे जिस तबके के पैदा किए हुए कचरे को साफ करते हुए रोजाना घंटों गंदगी में डूबे रहते हैं, वह तबका तथाकथित पढ़ा-लिखा, शहरी और संपन्न तबका है, जो कि अपने पैदा किए हुए कचरे के मामले में बिल्कुल ही गैरजिम्मेदार भी है। लोगों पर पैकिंग के कचरे के लिए एक टैक्स लगाना जरूरी है जो कि व्यापार की जगह पर आसानी से लगाया जा सकता है। छत्तीसगढ़ को ऐसा पहला राज्य बनकर एक मिसाल पेश करनी चाहिए कि जिस सामान के साथ जितनी पैकिंग आती है, उस पर कागज, प्लास्टिक, या दूसरे सामानों के पर्यावरण-बोझ के अनुपात में टैक्स लगाया जाए। ऐसा करने पर लोगों को पैकिंग कम करने की आदत भी पड़ेगी, और किसी प्रदेश में इस्तेमाल के सामान के साथ जितना कचरा आता है, उसे निपटाने के लिए एक टैक्स भी मिल सकेगा। छत्तीसगढ़ को इस बारे में सोचना चाहिए, और पूरे देश की जनता को कचरा घटाने, और उसके सावधानी से निपटारे की अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए। 

पीके के बारे में बिना पिए हुए

31 दिसंबर 2014
संपादकीय

एक फिल्म पीके में कई धर्मों के पाखंडों, अंधविश्वासों, और रीति-रिवाजों का मजाक उड़ाया गया है, और इसे लेकर कुछ हिन्दू संगठन देश में जगह-जगह नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। उनका मानना है कि एक मुस्लिम अभिनेता आमीर खान ने हिन्दू धर्म का मजाक उड़ाया है, और इस फिल्म पर रोक लगाई जाए। कुछ गंभीर विश्लेषकों ने यह सवाल उठाया है कि कुछ समय पहले इसी किस्म की एक और फिल्म, ओ माई गॉड, आई थी जिसमें हिन्दू धर्म का, धर्म गुरूओं का, और ईश्वर का इससे कहीं अधिक मजाक बनाया गया था, व्यंग्य कसे गए थे, लेकिन उसका ऐसा विरोध इसलिए नहीं हुआ था कि उसके मुख्य अभिनेता एक हिन्दू परेश रावल थे। 
हो सकता है कि यह बात सच हो, हो सकता है कि फिल्म के प्रचार के लिए खुद इसके निर्माता जगह-जगह इसके खिलाफ बखेड़ा करवा रहे हों, क्योंकि मनोरंजन की दुनिया में यह माना जाता है कि बदनाम हुए तो क्या नाम न हुआ? और हो सकता है कि आज देश में जिस तरह धार्मिक उन्माद को बढ़ाने की एक राजनीतिक और गैरराजनीतिक कोशिश हो रही है, उसके तहत भी इस फिल्म का विरोध किया जा रहा हो। लेकिन उत्तरप्रदेश सरकार ने आज एक साहसी फैसला लेकर इस फिल्म को मनोरंजन कर से मुक्त किया है। और समाजवादी पार्टी की सरकार के इस फैसले के दो दिन पहले की उस बात को भी हम साथ-साथ याद करेंगे कि किस तरह भाजपा के आज के सबसे वरिष्ठ सक्रिय नेता लालकृष्ण अडवानी ने इस फिल्म की खुद होकर खुलकर तारीफ की है। अब यह समझना थोड़ा मुश्किल है कि हिन्दू धर्म की भावनाओं को अगर अडवानी नहीं समझ पा रहे हैं, तो फिर और कौन समझ लेगा? 
दुनिया में अलग-अलग धर्मों के लोगों की संवेदनशीलता अलग-अलग होती है। इस्लाम पर बनने वाले कुछ कार्टून ऐसे रहते हैं कि जिनके खिलाफ सिर काट देने के फतवे भी जारी होते हैं। इस्लाम के भीतर ईश्वर की बातों की व्याख्या में ऐसे विरोधाभास भी रहते हैं कि मुस्लिम समुदाय के ही अलग-अलग तबके एक-दूसरे से लड़-भिड़कर सैकड़ों की जान ले लेते हैं। लेकिन भारत में हिन्दू समाज की सहनशीलता परंपरागत रूप से अधिक रही है। यहां पर गणेशोत्सव देखें, तो उनमें भी गणेश के रूप-रंग से लेकर साज-सज्जा तक हर जगह विविधता की आजादी रहती है। हिन्दू धर्म के भजनों को फिल्मी धुन पर ढाल दिया जाता है, गुजरात में हिन्दू धर्म के सबसे बड़े त्यौहार नवरात्रि के गरबा में वहां की सुंदरियों की खुली पोशाक देखते ही बनती है, हिन्दू धर्म के मंदिरों की दीवारों पर पूरे देश भर में कई जगहों पर एक ऐसी सेक्स-आजादी की प्रतिमाएं देखने मिलती हैं, कि जिनको आज कोई उकेरे, तो दंगा हो जाए। इसलिए हिन्दू धर्म एक बड़ी विविधता से भरा हुआ, अधिक सहनशीलता वाला, अधिक लचीलेपन वाला धर्म है, और इसके भीतर सुधारवादी, प्रगतिशील ताकतें हमेशा से काम करते आई हैं। सनातनी कट्टरता के खिलाफ बहुत से समाज सुधारकों ने पिछली सदियों में खूब काम किया है, और धार्मिक मान्यता प्राप्त सतीप्रथा बंद हुई, बालविवाह बंद हुए, और विधवा विवाह शुरू हुए। हिन्दू धर्म के सारे आयोजन ऐसे रहते हैं जिनमें सभी धर्मों के लोग शामिल होते हैं, और इस धर्म के भीतर की जो धर्मान्ध कट्टरता है, वह मु_ी भर लोगों तक सीमित है। ऐसे कुछ संगठन है जो अपने अस्तित्व को साबित करने के लिए, अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए कभी किताबें जलाते हैं, उन्हें पढ़े बिना, कभी नाटक पर रोक की मांग करते हैं, उन्हें देखे बिना, और कभी फिल्म पर प्रतिबंध मांगते हैं, उसे देखे बिना। कुल मिलाकर धार्मिक विरोध के नाम पर कभी साम्प्रदायिक एजेंडा लागू किया जाता है, तो कभी केवल फुटपाथी-हिंसा से खबरों में आया जाता है। हम लालकृष्ण अडवानी की तारीफ करेंगे कि उन्होंने खुलकर इस फिल्म की तारीफ की है। और हिन्दू धर्म के भीतर के जो लोग इसका विरोध करके जिंदा हैं, उनको समझना चाहिए कि अपने आपको बंद कर लेने वाला धर्म कुंद भी हो जाता है, उसका आगे बढऩा थम जाता है। 
भारत में धार्मिक पाखंड को खत्म करने के इतिहास को देखें तो सैकड़ों बरस पहले के उस गरीब और फक्कड़ कबीर पर फख्र होता है जिसने बिना किसी लोकतांत्रिक बचाव के, बिना किसी अदालती सहूलियत के, समाज के पाखंड के खिलाफ यह लिखा था कि कांकर-पाथर जोड़कर मस्जिद लेई बनाए, तां चढ़ मुल्ला बांग दे, बहरा हुआ खुदाए। आज किसी का यह हौसला है कि इतनी बड़ी बात कह सके? लेकिन दुनिया के धर्म, दुनिया की संस्कृतियां उनके कट्टर और पाखंडी लोगों से विकसित नहीं हुए हैं, वे विकसित हुए हैं अपने आप पर हंसने की ताकत रखने वाले लोगों से, वे विकसित हुए हैं अपने आपकी खामियों को दूर करने का हौसला रखने वाले लोगों से। हम इन बातों को लिखने के पहले इस फिल्म को देख चुके हैं, और इसके बारे में हमारी राय वही है जो अडवानी से लेकर अखिलेश यादव तक की है। जो धर्म अपने पाखंड की आलोचना पर भी आक्रामक हो जाता है, उस धर्म का, उसे मानने वालों का क्या हाल होता है, यह दुनिया के कई देशों में तालिबानियों ने दिखा दिया है। वहां पर अगर अपने धर्म की खामियों को दूर करने का हौसला होता, तो आज इतना बुरा हाल नहीं होता। 

ऑपरेशन घरवापिसी से भी अधिक जरूरी एक वापिसी

30 दिसंबर 2014
संपादकीय
जब पूरा हिंदुस्तान तरह-तरह की नकारात्मक और निराशाजनक खबरों से घिरा हुआ है, तब दिल्ली से एक अच्छी खबर यह आती है कि शिक्षकों का एक संगठन स्कूल छोड़ चुके बच्चों की स्कूलवापिसी का अभियान शुरू करने जा रहा है। इसके बिना देश में ऐसा अंधकार छाया हुआ है कि लोग तरह-तरह से धर्म बदलवाकर घरवापिसी का अभियान चला रहे हैं, और पिछले सैकड़ों-हजारों बरसों के इतिहास को इस तरह वापिस घुमा देना चाहते हैं मानो दुनिया की जिंदगी एक दीवालघड़ी हो और उसके कांटों को घुमाकर हजार बरस पहले ले जाया जा सकता है। लोग कुदरत की विविधता से कुछ सीखना नहीं चाहते, और हर फूल को एक ही रंग का, एक ही आकार का देखना चाहते हैं। घरवापिसी के ऐसे तनाव भरे साम्प्रदायिक अभियान के बीच जब कोई भी तबका कोई छोटी सी भी अच्छी बात करता है, तो वह बहुत अधिक सुहानी लगने लगती है। जिन लोगों को धर्म बदलकर, या किसी शहरी-संगठित धर्म को पहली बार अपनाने वाले आदिवासियों को हिंदू बनाने के अभियान में किसी भी दर्जे की आक्रामकता जायज लगती है, उन लोगों को यह भी सोचना चाहिए कि धर्म से अधिक जरूरी, जिंदा रहने के लिए रोटी, कपड़ा, और मकान, पढ़ाई और इलाज, जैसे कई हकों की तरफ लोगों की वापिसी कैसे करवाई जा सकती है? 
जिस वक्त के धर्म और धर्म बदलने की बात की जा रही है, उस वक्त लोगों के हक क्या थे, उस वक्त के आम लोग आज किस तरह आर्थिक और सामाजिक शोषण का शिकार होकर गरीब और भुखमरी के शिकार हो चुके हैं, और उनकी उनके हकों की तरफ वापिसी कैसे हो सकती है,  इस सोच को धर्म और जाति व्यवस्था कभी आगे बढ़ाना नहीं चाहेंगे। धर्म और जाति का सारा कारोबार लोगों को दबा-कुचला बनाए रखने के हिसाब से बनाया गया है, और ऐसे में ऑपरेशन स्कूलवापिसी से तो इस कारोबार को एक बड़ा खतरा खड़ा हो सकता है। अगर लोग पढ़-लिख गए, तो हो सकता है कि वे धर्म और जाति की पकड़ के बाहर हो जाएं। इसलिए इंसाफ की तरफ वापिसी, इंसान की तरफ वापिसी, कुदरत के दिए हुए बराबरी के हक की तरफ वापिसी की बात भी कोई नहीं करता। कुल मिलाकर कुछ सौ बरस पहले के एक कैलेंडर पर ले जाकर घड़ी को रोक देना चाहते हैं, और उससे अधिक पीछे तक की वापिसी कोई नहीं चाहते, कोई यह नहीं चाहते कि लोग इंसानियत तक वापिस चले जाएं, लोग धर्म के पहले तक वापिस चले जाएं।
देश में किसी भी विचारधारा के लोग अगर स्कूल और हकवापिसी के अभियान चलाते हैं, तो उसको बढ़ावा मिलना चाहिए। हम दिल्ली से परे बाकी जगहों पर भी सरकार के स्कूल दाखिला वाले सालाना अभियान से परे भी समाज की तरफ से ऐसे अभियान की राह देख रहे हैं जो कि धर्मों से परे बच्चों को पढऩा-लिखना सिखाए, और फिर बड़े होकर वे अपनी मर्जी का धर्म खुद तय कर सकें, या बिना धर्म के नास्तिक रहना तय कर सकें।

नए साल पर क्या संकल्प लें? कुछ छोटी-छोटी नसीहतें...

29 दिसंबर 2014
संपादकीय

नया साल बस दो दिन परे खड़ा है। जो लोग इसके आने के जश्न को नहीं भी मना पाते हैं, वे भी नए साल के लिए कई किस्म की बातें सोचना शुरू करते हैं कि इस बरस में कौन-कौन सा बुरा काम छोड़ेंगे, और कौन-कौन से अच्छे काम करना शुरू करेंगे। इंसान का मिजाज ही ऐसा होता है कि वे कुछ तारीखों से जोड़कर कुछ तय करने की कोशिश करते हैं, कभी जन्मदिन से, तो कभी किसी और सालगिरह से, तो कभी किसी त्यौहार से जोड़कर लोग कुछ संकल्प लेते हैं। बहुत से लोगों का यह भी मानना है कि ऐसे दिनों पर लिए गए संकल्प किसी किनारे नहीं पहुंचते, और बेकार हो जाते हैं। 
लेकिन हमारा मानना है कि किसी संकल्प के पूरे होने की संभावना उसे लेने के बाद ही शुरू हो सकती है, जब तक लोग इस बात के लिए कसम खाने की सोचें भी नहीं, तब तक क्या हो सकता है। इसलिए हर किसी को ऐसे मौके पर अपने, और अपने आसपास के लोगों के बारे में सोचना-विचारना चाहिए, और कुछ अच्छे काम करने का इरादा जुटाकर उसकी कोशिश जरूर करनी चाहिए। कोशिश में नाकामयाब भी वे ही लोग हो सकते हैं, जो कि उसकी कोशिश करते हैं। जंग के बारे में कहा जाता है कि गिरते हैं शहसवार ही मैदाने जंग में...। मतलब यह कि जो कोशिश करते हैं उन्हीं का तो बाद में मूल्यांकन हो सकता है, जो इतने लापरवाह रहते हैं कि कभी कोशिश भी नहीं करते, उनको कौन आंकता है। 
हम कुछ छोटी-छोटी बातें आज यहां पर सुझाते हैं, जो कि हमारे तकरीबन हर पाठक पर लागू होती हैं, और इनमें से अपने फायदे की और अपनी मर्जी की बातों को छांटकर लोग अगले दो दिन अपने मन के भीतर, अपने परिवार में, और अपने दोस्तों में इसकी चर्चा करके खुद भी एक नया बरस तय कर सकते हैं, और आसपास के लोगों को इसके लिए सोचने पर मजबूर भी कर सकते हैं। अब जैसे सबसे पहली बात जो हमको सूझती है, वह है सिगरेट-बीड़ी, और तम्बाकू से परे रहने की। हमारे पाठकों में से शायद एक चौथाई ऐसे होंगे, जो इनमें से किसी एक आदत के शिकार होंगे। इनको यह सोचना चाहिए कि अगर मुंह या गले का कैंसर इनको हुआ, या कैंसर ने इनके फेफड़े खा लिए, तो ये लोग परिवार पर किस तरह का बोझ बन जाएंगे, और किस तरह आधे रास्ते में अपने परिवार को छोड़कर वे चल बसेंगे। इसी तरह की बात शराब पीने वालों के साथ हो सकती हैं, खासकर जो लोग अधिक पीते हैं, और गरीबी के बावजूद पीते हैं। जो लोग इसका खर्च उठा सकते हैं, और काबू के भीतर पीते हैं, उनके लिए यह शायद उतनी नुकसानदेह नहीं है, जितनी कि सिगरेट हो सकती है। लेकिन बुरी लत कब बढ़कर बेकाबू हो जाती है, यह किसने देखा है?
संपन्न तबकों के कुछ लोगों का खानपान बड़ा नुकसानदेह रहता है। जरूरत से अधिक घी-तेल, मुर्गा-मछली, या अधिक तला हुआ, अधिक नमक या अधिक शक्कर वाला खाना या तो आज ही तकलीफ दे देता है, या फिर लंबी बीमारियों की शुरुआत करता है। ऐसे परिवार यह तय कर सकते हैं कि नए साल में वे किस तरह अपने खानपान को अधिक सेहतमंद बनाएंगे, और इसकी जानकारी अधिक मुश्किल भी नहीं है, बाजार में ऐसी सस्ती किताबें मौजूद हैं जो कि खानपान की खामियों और खूबियों के वैज्ञानिक तथ्य बतलाती हैं। लोगों को एक-दूसरे को ऐसी कुछ अच्छी किताबें भी नए साल के तोहफे में देना चाहिए, और आगे का खानपान भी बेहतर बनाने का संकल्प लेना चाहिए। बहुत से लोगों को यह लगता है कि आजकल खानपान और जीवन शैली से होने वाली तमाम बीमारियों के इलाज कुछ दाम पर ही सही, मौजूद हैं। लेकिन ऐसा होता नहीं है, कितना भी महंगा और अच्छा इलाज हो, वह पूरी भरपाई कभी नहीं कर सकता। इसलिए पूरे घर को इस बारे में बैठकर तय करना चाहिए, इससे बड़े लोगों का तो तुरंत ही भला होगा और छोटे बच्चों की बेहतर आदतें शुरू होंगी। 
एक और मुद्दा जो हमको बहुत जरूरी लगता है और जिसके बारे में हम लगातार लिखते और छापते हैं, वह है हेलमेट का। दुपहिया दुर्घटनाओं में होने वाली अधिकतर मौतें ऐसी रहती हैं जो कि हेलमेट लगने से टल सकती हैं, या कम से कम बहुत गंभीर चोट से लोग बच सकते हैं, और बाकी पूरी जिंदगी अपाहिज की तरह रहने की बेबसी से भी। लोगों को अपने आसपास के लोगों के बारे में भी यह तय करना चाहिए कि वे बिना हेलमेट दुपहियों पर नहीं बैठेंगे। 
एक और बात जो जरूरी है और लोग जिसे अनदेखा करते हैं, वह है एक स्वस्थ जीवन शैली की। लोग घूमने नहीं जाते, कसरत नहीं करते, योग, ध्यान या प्राणायाम नहीं करते। ये तमाम बातें लोगों को मुफ्त में मिली हुई हैं, और जिसे यह लगता है कि उनके जीवन में इनके लिए समय नहीं है, उन्हीं के जीवन में इन बातों की जरूरत उतनी अधिक है। हम तो सिर्फ इतना ही याद दिला सकते हैं कि कसरत और योग जैसे बचाव के काम में लोग जितना समय लगाएंगे, उससे कई गुना अधिक समय उनकी जिंदगी में बढ़ जाता है, और जिंदगी कम तकलीफदेह भी हो जाती है, और अधिक उत्पादक भी हो जाती है। इस बारे में हर किसी को जरूरत सोचना चाहिए, और यह भी याद रखना चाहिए कि दुनिया के अधिकतर सफल लोग अपने तन और मन के लिए बचाव के ऐसे काम करते हैं, और नुकसान उनसे दूर रहता है। ऐसा करके लोग बुढ़ापे में महंगे इलाज की जरूरत से भी बच सकते हैं। इनमें से किसी भी बात के लिए कुछ खर्च करने की जरूरत नहीं रहती। 
इसके बाद की अच्छी बातों के लिए हम लोगों को उनकी कल्पना के साथ छोड़ देते हैं, क्योंकि जब भी वे आसपास के समझदार लोगों के साथ बैठकर नए साल के संकल्पों के बारे में बात करेंगे, लोग भी उनको सलाह दे सकेेंगे।

सेहत कुछ कम-ज्यादा हो तो भी वोट डालने निकलें

28 दिसंबर 2014
संपादकीय
छत्तीसगढ़ में कल इस वक्त मतदान जोरों पर होगा। यह राज्य एक बरस के भीतर विधानसभा, लोकसभा, म्युनिसिपल, और पंचायतों के चुनाव देख लेता है। इसके बाद के चार बरस चुनावों से मुक्त रहते हैं, और सरकार के लिए काम करने का खासा मौका रहता है। लेकिन आज जो चुनाव चल रहे हैं, उनसे लोग अपने-अपने वार्ड के पार्षद भी चुनेंगे, और अपने शहर-कस्बे के म्युनिसिपल के मुखिया भी। लोगों को वैसे तो हर चुनाव में बाहर निकलकर वोट डालने चाहिए, लेकिन स्थानीय संस्थाओं के चुनाव इतने अधिक महत्वपूर्ण होते हैं कि ब्रिटेन जैसे देश में जो लोग वहां के निवासी नहीं भी हैं, वे भी अगर छह महीने से अधिक से वहां रह रहे हैं, तो उनको भी म्युनिसिपल चुनाव में वोट डालने का हक रहता है। वहां का लोकतंत्र यह मानता है कि स्थानीय चुनावों में वोट डालने का हक सिर्फ नागरिकों का नहीं रहता, बल्कि वहां बसे हुए, रह रहे तमाम लोगों की रोज की जिंदगी स्थानीय संस्थाओं से जुड़ी रहती है, और इसलिए सब लोगों को वोट डालने का हक रहना चाहिए। अब ऐसी सोच के सामने भारत में लोग अगर घर बैठे रहें, और पार्षद या महापौर-अध्यक्ष चुनने बाहर न निकलें, तो यह एक बड़ी गैरजिम्मेदारी की बात होगी। जो लोग अभी वोट डालने नहीं निकलेंगे, वे लोग घूरों पर ही रहने के हकदार रहेंगे। जिनको एक साफ-सुथरी जिंदगी चाहिए, उनको साफ-सुथरे उम्मीदवारों को चुनने के लिए बाहर निकलना चाहिए। 
शहरों में म्युनिसिपल, और गांवों में पंचायत, ये ही संस्थाएं लोकतंत्र को मजबूत करने का काम कर सकती हैं। अंगे्रजों के समय भी देश में आजादी के पहले से स्थानीय संस्थाओं के चुनाव होते थे, और देश के कई बड़े-बड़े नेता स्थानीय चुनावों से उभरकर विधाानसभाओं तक पहुंचे, और फिर संसद तक गए। इसलिए ये चुनाव विधानसभा या लोकसभा चुनावों के मुकाबले अधिक ईमानदार, अधिक महत्वपूर्ण, और अधिक मुश्किल भी होते हैं। फिर इसके बाद यह साफ होने लगता है कि आने वाले वक्त में उस इलाके से किस तरह का नेतृत्व विकसित होकर सामने आएगा।
हम इस मुद्दे पर पिछले कुछ हफ्तों में एक-दो बार और भी लिख चुके हैं, लेकिन कल चूंकि मतदान शुरू हो रहा है, इसलिए इस बारे में और लिखना जरूरी लग रहा है। चुनाव के नतीजे बतलाएंगे कि जितने लोग वोट डालने नहीं निकलते हैं, उससे कम वोटों से जीत या हार हो जाती है। ऐसा होने पर राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों को यह आसान पड़ता है कि वे आमतौर पर वोट डालने वाले लोगों की गिनती का अंदाज लगाकर जीत के लिए कोशिश करें। लेकिन अगर हर कोई वोट  डालने निकल जाए, तो पार्टियों और प्रत्याशियों का सारा गणित गड़बड़ा जाएगा। इसलिए लोकतंत्र की सेहत के यह जरूरी है कि कल जिनकी सेहत ठीक है वे तो वोट डालने निकले ही, जिनकी सेहत कुछ कम-ज्यादा भी है, वे भी वोट डालने निकलें। अच्छे उम्मीदवार को चुनें, जिस पर ईमानदारी का भरोसा हो, उसे चुनें, और इस तरह अपने लिए एक बेहतर कल चुनें। ऐसा न करने वाले अपने आसपास के घूरों को लेकर, वार्ड और शहर की घूरों जैसी जिंदगी को लेकर बाद में कोई शिकायत न करें।

पुराण कथाओं को लेकर खोज-आविष्कार के दावे

27 दिसंबर 2014
संपादकीय
अगले हफ्ते मुंबई में भारतीय विज्ञान कांग्रेस का पांच दिनों का एक कार्यक्रम होने जा रहा है, और इसमें वैदिक काल में भारत में विमानों के बारे में एक सत्र रखा गया है। पिछले कुछ महीनों से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार बनने के बाद से लगातार भारतीय पौराणिक काल की कहानियों को इतिहास का दर्जा देने की होड़ लगी हुई है, और आज की विकसित दुनिया की बहुत सी वैज्ञानिक खोजों को, आविष्कारों को, भारतीय वैदिक काल की भारतीय उपलब्धि होने का दावा किया जा रहा है। इसमें कारों का आविष्कार भारत में होने से प्लास्टिक सर्जरी, कृत्रिम गर्भाधान जैसी बहुत सी वैज्ञानिक तकनीकों को भारत में खोजा हुआ बताया जा रहा है। यह दावा किया जा रहा है कि बीच की सदियों में विदेशी हमलावरों के राज की वजह से भारतीय इतिहास खो गया और उसकी गौरवशाली उपलब्धियां दबा दी गईं। अब पुराण कथाओं को लेकर उसी तरह वैज्ञानिक उपलब्धियों का दावा किया जा रहा है जिस तरह कि आज कोई  विज्ञान कथा को लेकर अपने देश को कई तरह की खोजों की वाहवाही दे दे। 
मुंबई में होने वाली भारतीय साईंस कांग्रेस के एक वक्ता कैप्टन आनंद जे. बोडस भी हैं, और उन्होंने अभी मुंबई में कहा कि विमानों की खोज भारत में वैदिक काल में कर ली गई थी और ये विमान एक देश से दूसरे देश ही नहीं, एक ग्रह से दूसरे ग्रह पर भी जाते थे। उन्होंने कहा कि उस समय के विमान आकार में बहुत बड़े होते थे और आज तो विमान सिर्फ आगे उड़ान भरते हैं, उस समय के भारतीय विमान दाएं-बाएं भी उड़ सकते थे, और पीछे भी उड़ान भर सकते थे। आज इस तरह के कई लोग केन्द्र सरकार के शोध संस्थानों पर बिठाए गए हैं, जो कि इतिहास लेखन की किसी भी वैज्ञानिक पद्धति को खारिज करते हुए पौराणिक कहानियों को ही इतिहास करार देने पर उतारू हैं। 
खैर, हिन्दुस्तान का इतिहास महज हिन्दुस्तान में ही दर्ज नहीं है, यह दुनिया के कई देशों के लोगों ने लिखा है, और हिन्दुस्तान के ही जाने-माने इतिहासकार काम कर चुके हैं। इसलिए दर्ज हो चुके इतिहास को आज सरकारी कुर्सियों पर बैठकर भी खारिज नहीं किया जा सकता, और न ही अवैज्ञानिक बातों को सरकारी स्कूलों में किताबों में डालकर दुनिया का इतिहास बदला जा सकता है। इससे देश का नुकसान होने के अलावा और कुछ नहीं होने जा रहा। ऐसा कोई भी देश या समाज, जो कि एक काल्पनिक अतीत पर गौरव करते हुए अपने आपको दूसरों से बेहतर समझता है, उसके आगे बढऩे की संभावनाएं बुरी तरह बर्बाद होती हैं। ऐसे देश या समाज के मन में अपनी पौराणिक कथाओं को लेकर जो एक झूठी आत्मसंतुष्टि घर कर जाती है, वह लोगों को बाकी दुनिया के मुकाबले आज काम करने, खोज और आविष्कार करने, और आगे बढऩे से रोक देती है। काल्पनिक कहानियां हमेशा ही बहुत सुखद होती हैं, क्योंकि उनको किसी वैज्ञानिक कसौटी पर खरा उतरकर कुछ साबित करने की जरूरत नहीं होती। लेकिन देश की वैज्ञानिक सोच को अगर स्कूलों के स्तर से इस आधार पर बर्बाद करना है कि विदेशी शासकों ने कुछ सदियों तक भारत का वैदिक काल का इतिहास दबा दिया था, तो उससे आज भारी नुकसान छोड़, कोई नफा नहीं होने वाला है। एक झूठी शान में जीना आज के लिए तो मजे की बात होती है, लेकिन उसके पीछे न तो बीते इतिहास में की गई कोई मेहनत होती, और न ही आने वाले भविष्य में उससे कोई फायदा होता। 
देश में एक अलग तरह की भावनात्मक, सांस्कृतिक धर्मान्धता बढ़ाने से किसी चुनाव में वोटों का थोड़ा-बहुत फायदा शायद होता होगा, लेकिन देश का उससे बहुत बड़ा नुकसान हो रहा है। आज जब जनता के बीच, स्कूली बच्चों के बीच, वैज्ञानिक सोच खत्म की जा रही है, तो फिर उनके बीच लोकतांत्रिक न्यायप्रिय सोच भी खत्म होती है, और कट्टरता बढ़ती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश के लोगों को एक तरफ तो आर्थिक विकास की ओर ले जाना चाहते हैं, दुनिया के मुकाबले खड़ा करना चाहते हैं, और दूसरी तरफ वे एक काल्पनिक इतिहास के नर्म गद्दे पर मौजूदा पीढ़ी को सुलाकर जिंदगी की कड़ी जमीन पर मुकाबले से दूर भी करने का माहौल खड़ा कर रहे हैं। एकाएक भारत का ऐसा सांस्कृतिक फेरबदल कई पीढिय़ों की सोच का बड़ा नुकसान कर रहा है, और जो इतिहास कभी रहा नहीं, उसके झंडे बनाकर नारों के साथ आज कोई देश या समाज किसी कामयाबी तक नहीं पहुंच सकते।