03 जनवरी 2015
संपादकीय
गुजरात से लगी हुई भारतीय समुद्र सीमा में पाकिस्तान की तरफ से एक मछुवारा बोट आने की खबर लगी, और भारतीय निगरानी एजेंसियों को इनमें कुछ खतरनाक सामान होने का अंदेशा था। भारत सरकार के मुताबिक इस बोट को रोकने की कोशिश की गई, पीछा किया गया, लेकिन इसने रूकने के बजाय अपने आपको एक विस्फोट से उड़ा दिया।
कल से भारत का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आसमान और समंदर से ली गई इस बोट की विस्फोट के पहले और विस्फोट के बाद की तस्वीरें दिखाकर अटकलबाजी के एक गलाकाट मुकाबले में लग गया है कि यह मुंबई हमले जैसे एक आतंकी हमले के लिए आ रही थी, या गुजरात में होने जा रहे प्रवासी भारतीय सम्मेलन पर हमला करने आ रही थी, या इसका और क्या मकसद था? बड़े-बड़े विश्लेषक इस बात पर बहस कर रहे हैं कि यह कितना बड़ा खतरा था, और इसे रोक पाना कितनी बड़ी कामयाबी थी। लेकिन टीवी की खबरों पर किसी संदेह या किसी आशंका की कोई गुंजाइश छोड़ी नहीं जा रही, और मोटे तौर पर इस बोट को आतंकी हमले का एक हिस्सा मान लिया गया है। हो सकता है कि यह बात पूरी तरह सही हो, लेकिन दूसरी तरफ सच यह है कि अभी आतंक के संदेह से आगे और कुछ भी स्थापित नहीं हुआ है, और आज सुबह कुछ दूसरे जानकार लोगों ने एक दूसरा संदेह जाहिर किया है कि यह बोट हो सकता है कि तस्करों की हो, और उस पर डीजल या दूसरे किस्म के सामान लदे हों, और उसका किसी आतंकी हमले से कुछ लेना-देना न रहा हो।
आज पल-पल की खबर देने वाले मीडिया की वजह से पहली सूचना का तो सैलाब आया रहता है, लेकिन ऐसी सूचना के वजन की फिक्र किए बिना जो सबसे अधिक सनसनीखेज, सबसे अधिक नाटकीय बात हो सकती है, उस निष्कर्ष पर बड़ी तेजी से पहुंचा जाता है। अखबारों के जमाने में यह दिक्कत नहीं होती थी, क्योंकि दिन में दो या तीन वक्त पर निकलने वाले अखबारों के लिए खबरें तैयार करते हुए संवाददाताओं को कई घंटे का वक्त मिलता था, और उतने में सच को ठोक-बजाकर परख लेना हो जाता था। लेकिन अभी ब्रेकिंग न्यूज नाम की एक ऐसी हड़बड़ी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आने के साथ-साथ पैदा हुई है कि जिसके चलते किसी भी तरह की जांच-पड़ताल तकरीबन गैरजरूरी मान ली जाती है।
पाकिस्तान के खिलाफ एक युद्धोन्माद के चलते हुए यह मान लिया जाता है कि उससे जुड़ी खबरों को जांचना-पड़तालना राष्ट्रदोह किस्म का काम है। इन दो देशों के बीच टकराव के चलते भारत में मीडिया इस तंगनजरिए का शिकार हो गया है, जो कि अखबारनवीसी के बुनियादी तौर-तरीकों, तकनीकों, और उसके तकाजे से अनछुआ रहने से पैदा होता है। देश के लिए प्रेम तो अच्छी बात है, लेकिन सच के लिए प्रेम इससे और अधिक अच्छी बात होती है। एक पेशे को अपने आपको सरहद का कैदी नहीं बनाना चाहिए, और सच पर टिके रहना चाहिए। न सिर्फ पाकिस्तान के मामले में, बल्कि किसी भी देश के मामले में, किसी भी प्रदेश के मामले में मीडिया को एक सत्याग्रह पर चलना चाहिए। सत्य के लिए आग्रह यह पत्रकारिता की एक बुनियादी बात होती थी, लेकिन जबसे पत्रकारिता का नाम बदलकर मीडिया हो गया, और अखबारों के साथ टीवी जुड़ गया, और उसके बाद अब इंटरनेट और सोशल मीडिया जुड़ गए, तबसे सत्य का आग्रह खत्म हो गया, और एक बदहवास हड़बड़ी हावी हो गई। इसका नतीजा यह भी हुआ है कि पत्रकारिता की जो साख थी, छपे हुए शब्द की जो विश्वसनीयता थी, वह अब खत्म हो चुकी है, और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से मुकाबले के चलते प्रिंट मीडिया का नजरिया भी एक अभूतपूर्व हड़बड़ी का हो गया है, जिसमें जांचने-परखने की कोई गुंजाइश नहीं है, और न ही जरूरत मानी जाती है।
खबरों का सैलाब समंदर की आती-जाती लहरों की तरह ही मिनट-मिनट आते रहता है, और इसके चलते अब लोग कुछ घंटों पहले भी अधकचरी, अधपकी, और कई बार गलत साबित हो चुकी खबर को भूल भी जाते हैं। टीवी को यह सहूलियत हासिल है, लेकिन अखबारों को अधिक जिम्मेदार रहना पड़ता था क्योंकि पुराने पन्ने और कतरनें बरसों तक मुंह चिढ़ाने के लिए जिंदा रहते थे। एक बार फिर यह जरूरत आन खड़ी हुई है कि खबरों की बुनियादी तकनीक, उनके तथ्यों का तर्कों की कसौटी से गुजरते हुए खबर का हिस्सा बनना, ऐसी तमाम बातों को एक बार फिर गंभीरता से देखा जाए, उनको लागू किया जाए। इसके बिना मीडिया की विश्वसनीयता खत्म हो रही है, और लोकतंत्र में यह एक खतरनाक नौबत है।
कल से भारत का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आसमान और समंदर से ली गई इस बोट की विस्फोट के पहले और विस्फोट के बाद की तस्वीरें दिखाकर अटकलबाजी के एक गलाकाट मुकाबले में लग गया है कि यह मुंबई हमले जैसे एक आतंकी हमले के लिए आ रही थी, या गुजरात में होने जा रहे प्रवासी भारतीय सम्मेलन पर हमला करने आ रही थी, या इसका और क्या मकसद था? बड़े-बड़े विश्लेषक इस बात पर बहस कर रहे हैं कि यह कितना बड़ा खतरा था, और इसे रोक पाना कितनी बड़ी कामयाबी थी। लेकिन टीवी की खबरों पर किसी संदेह या किसी आशंका की कोई गुंजाइश छोड़ी नहीं जा रही, और मोटे तौर पर इस बोट को आतंकी हमले का एक हिस्सा मान लिया गया है। हो सकता है कि यह बात पूरी तरह सही हो, लेकिन दूसरी तरफ सच यह है कि अभी आतंक के संदेह से आगे और कुछ भी स्थापित नहीं हुआ है, और आज सुबह कुछ दूसरे जानकार लोगों ने एक दूसरा संदेह जाहिर किया है कि यह बोट हो सकता है कि तस्करों की हो, और उस पर डीजल या दूसरे किस्म के सामान लदे हों, और उसका किसी आतंकी हमले से कुछ लेना-देना न रहा हो।
आज पल-पल की खबर देने वाले मीडिया की वजह से पहली सूचना का तो सैलाब आया रहता है, लेकिन ऐसी सूचना के वजन की फिक्र किए बिना जो सबसे अधिक सनसनीखेज, सबसे अधिक नाटकीय बात हो सकती है, उस निष्कर्ष पर बड़ी तेजी से पहुंचा जाता है। अखबारों के जमाने में यह दिक्कत नहीं होती थी, क्योंकि दिन में दो या तीन वक्त पर निकलने वाले अखबारों के लिए खबरें तैयार करते हुए संवाददाताओं को कई घंटे का वक्त मिलता था, और उतने में सच को ठोक-बजाकर परख लेना हो जाता था। लेकिन अभी ब्रेकिंग न्यूज नाम की एक ऐसी हड़बड़ी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आने के साथ-साथ पैदा हुई है कि जिसके चलते किसी भी तरह की जांच-पड़ताल तकरीबन गैरजरूरी मान ली जाती है।
पाकिस्तान के खिलाफ एक युद्धोन्माद के चलते हुए यह मान लिया जाता है कि उससे जुड़ी खबरों को जांचना-पड़तालना राष्ट्रदोह किस्म का काम है। इन दो देशों के बीच टकराव के चलते भारत में मीडिया इस तंगनजरिए का शिकार हो गया है, जो कि अखबारनवीसी के बुनियादी तौर-तरीकों, तकनीकों, और उसके तकाजे से अनछुआ रहने से पैदा होता है। देश के लिए प्रेम तो अच्छी बात है, लेकिन सच के लिए प्रेम इससे और अधिक अच्छी बात होती है। एक पेशे को अपने आपको सरहद का कैदी नहीं बनाना चाहिए, और सच पर टिके रहना चाहिए। न सिर्फ पाकिस्तान के मामले में, बल्कि किसी भी देश के मामले में, किसी भी प्रदेश के मामले में मीडिया को एक सत्याग्रह पर चलना चाहिए। सत्य के लिए आग्रह यह पत्रकारिता की एक बुनियादी बात होती थी, लेकिन जबसे पत्रकारिता का नाम बदलकर मीडिया हो गया, और अखबारों के साथ टीवी जुड़ गया, और उसके बाद अब इंटरनेट और सोशल मीडिया जुड़ गए, तबसे सत्य का आग्रह खत्म हो गया, और एक बदहवास हड़बड़ी हावी हो गई। इसका नतीजा यह भी हुआ है कि पत्रकारिता की जो साख थी, छपे हुए शब्द की जो विश्वसनीयता थी, वह अब खत्म हो चुकी है, और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से मुकाबले के चलते प्रिंट मीडिया का नजरिया भी एक अभूतपूर्व हड़बड़ी का हो गया है, जिसमें जांचने-परखने की कोई गुंजाइश नहीं है, और न ही जरूरत मानी जाती है।
खबरों का सैलाब समंदर की आती-जाती लहरों की तरह ही मिनट-मिनट आते रहता है, और इसके चलते अब लोग कुछ घंटों पहले भी अधकचरी, अधपकी, और कई बार गलत साबित हो चुकी खबर को भूल भी जाते हैं। टीवी को यह सहूलियत हासिल है, लेकिन अखबारों को अधिक जिम्मेदार रहना पड़ता था क्योंकि पुराने पन्ने और कतरनें बरसों तक मुंह चिढ़ाने के लिए जिंदा रहते थे। एक बार फिर यह जरूरत आन खड़ी हुई है कि खबरों की बुनियादी तकनीक, उनके तथ्यों का तर्कों की कसौटी से गुजरते हुए खबर का हिस्सा बनना, ऐसी तमाम बातों को एक बार फिर गंभीरता से देखा जाए, उनको लागू किया जाए। इसके बिना मीडिया की विश्वसनीयता खत्म हो रही है, और लोकतंत्र में यह एक खतरनाक नौबत है।

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