02 जनवरी 2015
संपादकीय
छत्तीसगढ़ के सिंचाई विभाग के कुछ अफसरों के पास से जितनी नगदी बरामद हुई है, उसमें ठंड में ठिठुरते छत्तीसगढ़ के गरीबों को यह सोचने पर मजबूर किया है कि सरकारी अमला कितना कमा-खा रहा है? अगर इन अफसरों के पास इतनी बड़ी रकम नगद है, तो उनकी कुल दौलत कितनी होगी, और उन्होंने इतनी दौलत जुटाने के लिए जनता के हक किस हद तक बेचे होंगे?
सरकारी भ्रष्टाचार के जानकार लोगों का यह मानना है कि किसी भी भ्रष्ट अफसर के पास से कभी भी उसकी कमाई का पांच-दस फीसदी से अधिक बरामद हो ही नहीं सकता। सरकार के जानकार लोगों का यह भी मानना है कि जब कारोबारी या ठेकेदार को सौ रूपए की कमाई होती है, तो ही वे दस रूपए रिश्वत या कमीशन में विभाग के लोगों को बांटते हैं। इस नियमित रिश्वत से परे जब भी मोटी रिश्वत सरकार में किसी को दी जाती है, तो वह सरकारी खजाने में मोटी लूट के लिए दी जाती है, या फिर सरकार को लंबा नुकसान पहुंचाने के एवज में। इसलिए यह माना जाना चाहिए कि जिस अफसर से भ्रष्टाचार की जितनी बरामदगी होती है, जनता के हक उससे सैकड़ों गुना अधिक लुट चुके रहते हैं।
अब साल में दस-बीस बार भ्रष्ट लोगों पर छापे पड़ जाएं, कुछ दर्जन लोग हर बरस रिश्वत लेते पकड़ा जाएं, और दस-बीस बरस तक मुकदमे चलने के बाद इनमें से अधिकतर लोग छूट भी जाएं, तो सरकार का भ्रष्टाचार कम कैसे होगा? दूसरी बात यह कि किसी भी तरह के रिश्वत-भ्रष्टाचार, या अनुपातहीन संपत्ति के मामलों में जो अफसर पकड़ाते भी हैं, उनमें से अधिकतर अपने ही विभागों की कमाऊ कुर्सियों पर कुछ महीने के भीतर ही नजर आने लगते हैं। ऐसे में आगे के भ्रष्टाचार के रूकने की उम्मीद ही करना बेकार है। सरकार में भ्रष्टाचार के इतने बड़े-बड़े मामले दस-दस बरसों से साबित पड़े हैं, लेकिन उनसे जुड़े हुए अफसर अभी भी सरकार के बड़े-बड़े विभागों को या दफ्तरों को हांक रहे हैं। ऐसे में आगे भ्रष्टाचार की गारंटी रहती है।
इन दिनों छत्तीसगढ़ में छापेमारी और भ्रष्टाचार पकडऩे की जो हवा दिख रही है, वह पता नहीं कितने दिन टिकती है। और हम ऐसी नौबत आने के पहले सरकार की एक ऐसी खुफिया मशीनरी की सिफारिश बरसों से करते आ रहे हैं जो कि खेत चुग लिए जाने के पहले उसे बचाने का काम कर सके। आज सारा भ्रष्टाचार जब हो चुका रहता है, और भ्रष्ट लोग देश भर में जगह-जगह बेनामी और गुमनामी दौलत बना चुके रहते हैं, तब उनसे आखिरी के कुछ महीनों या एक-दो बरसों की कमाई को छापों में पकडऩे से राज्य का कुछ भला नहीं होता। राज्य के हितों का बचाव तो तभी हो सकेगा जब यह सरकार आर्थिक अपराध निगरानी ब्यूरो बनाकर सरकारी काम में भ्रष्टाचार के दौरान ही उस पर नजर रखने का काम करे, और अपनी जानकारी से सरकार की जांच और कार्रवाई की एजेंसियों को खबर करे। आज सरकार के पास अपने खुद के आर्थिक भ्रष्टाचार को रोकने के लिए सिर्फ जांच ब्यूरो है, निगरानी ब्यूरो नहीं है। जिस तरह नक्सलियों पर नजर रखने के लिए सरकार का खुफिया विभाग है, जिस तरह राजनीतिक या सामाजिक जानकारी इक_ी करने के लिए खुफिया विभाग है, उसी तरह एक अलग दफ्तर सरकार की आर्थिक गड़बड़ी पर नजर के लिए बनना चाहिए, और इस पर होने वाला खर्च राज्य को सस्ता पड़ेगा।
छत्तीसगढ़ के भ्रष्टाचार के मामलों का इतिहास इस बात का गवाह है कि राज्य बनने के पहले से यहां पर भ्रष्टाचार के पांव मजबूती से जमे हुए हैं, और कांग्रेस की भोपाल या राजधानी की सरकार के चलते भ्रष्टाचार का जो हाल था, वह अभी भी बहुत बदला नहीं है। राजधानी के भोपाल रहने तक तो यह बात थी कि छत्तीसगढ़ वहां से दूर था और इसे लूटना भोपाल को उसी तरह सुहाता था जिस तरह लंदन से अंग्रेज हिन्दुस्तान को लूटते थे। लेकिन अब तस्वीर बदलनी चाहिए। इस राज्य को बने डेढ़ दशक हो रहे हैं, सरकार का बजट बहुत बढ़ चुका है, छत्तीसगढ़ के स्थानीय नेताओं को राज चलाने का अनुभव बहुत लंबा हो चुका है। ऐसे में सरकार के अपने आर्थिक अपराधों को होने का मौका देना ठीक नहीं है, उस पर खुफिया नजर रखकर उसे होने के पहले ही रोकना ठीक है, या जिस तरह रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा जाता है, उसी तरह भ्रष्टाचार होते हुए रंगे हाथों फाइलों को, और उन पर दस्तखत करते हाथों को पकडऩा चाहिए।

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