01 जनवरी 2015
संपादकीय
उत्तरप्रदेश सरकार ने अपनी तमाम गलतियों और गलत कामों के साथ-साथ कभी-कभी कुछ ऐसा अच्छा भी किया है कि जिसकी तारीफ करनी ही पड़ती है। कल ही हमने इसी जगह पर फिल्म पीके को मनोरंजन कर मुक्त करने के लिए समाजवादी पार्टी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की तारीफ की थी, और आज वहां की एक और दूसरी खबर है कि सफाई कर्मचारियों की तनख्वाह में सरकार ने खासी बढ़ोत्तरी की है, और साथ-साथ यह भी तय किया है कि गटर सफाई के दौरान अगर कोई सफाई कर्मचारी जान खो बैठता है, तो उसके परिवार को सरकार दस लाख रूपए मुआवजा देगी।
नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से देश भर में लगातार सफाई को लेकर एक चर्चा चल रही है, और जगह-जगह नाटकीय अंदाज में नेताओं की तस्वीरें खींची जा रही हैं जिनमें वे उन्हीं के लिए ताजा-ताजा बिखेरे गए कचरे को साफ करते दिखते हैं। हवा में खबरें ऐसी हैं कि मानो पूरे देश में लोग सफाई को लेकर चौकन्ने हो गए हैं, जबकि हकीकत यह है कि ऐसा चौकन्नापन किसी घूरे में कचरे के खासे नीचे दबा दिखता है। हम कुछ और खबरों को यहां पर जोडऩा चाहते हैं, पिछले पखवाड़े यह खबर आई थी कि 21वीं सदी में भी भारत में कानून के खिलाफ सफाई कर्मचारियों के हाथों से पखाना उठवाने का इंतजाम जारी है, और पूरे देश में सबसे अधिक मैला ढोने वाले कर्मचारी उत्तरप्रदेश में ही हैं। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ में आज से ही पॉलीथीन के थैलों पर रोक लगी है, और इसके पीछे वैज्ञानिक तर्क यह है कि ऐसा पॉलीथीन घूरों और नालियों से होते हुए या तो गाय के पेट तक पहुंच जाता है, और गाय जितना पॉलीथीन नहीं खा पाती है, वह नाली और गटर को चोक कर देता है। कई बरस पहले जब मुंबई में बाढ़ आई थी, तब भी इस तरह पानी के रास्ते को रोकने वाले पॉलीथीन को ही गुनहगार माना गया था। और जहां-जहां गटर में कचरा फंसता है, उसके पीछे मोटे तौर पर पॉलीथीन या इसी किस्म का न घुलने वाला कचरा रहता है। इसलिए उत्तरप्रदेश ने अगर गटर में मौत पर बचे परिवार को दस लाखपति बनाना तय किया है, तो इसके साथ-साथ यह भी तय करना चाहिए कि कभी ऐसा मुआवजा देने की नौबत न आए।
शहरी कचरे का निपटारा एक बहुत ही वैज्ञानिक और तकनीकी काम है, जिसके लिए निजी क्षेत्र से लेकर स्थानीय म्युनिसिपल तक के अच्छे मैनेजमेंट की जरूरत भी पड़ती है। लेकिन हमने छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में ही यह मिसाल देखी है कि किस तरह इस पहली शहरी बुनियादी जरूरत को ठेके का धंधा बना लिया गया था, और दूसरे प्रदेश से आया हुआ एक ठेकेदार किस तरह इस प्रदेश की आंखों में कचरा झोंककर करोड़ों-अरबों लेकर चला गया। ऐसे में भारत के शहरों को ठोस कचरे के निपटारे को एक बड़ी प्राथमिकता बनाकर चलना पड़ेगा, और इसके लिए छत्तीसगढ़ में थोड़ी सी पहल अब दिखाई पड़ रही है, जब प्रदेश की राजधानी ऐसे दिवालिया ठेकेदार से आजाद हुई है, और स्थानीय कर्मचारियों की मदद से शहर अब कुछ साफ दिख रहा है। अब एक तरफ तो अलग-अलग किस्म के कचरे के लिए अलग-अलग घूरे या डिब्बे बनाने की जरूरत है, ताकि उसका निपटारा आसान हो सके, और दूसरी तरफ शहरी कचरे से बिजली और खाद बनाने की जो तकनीक आम हो चुकी है, उसके लिए कुछ भरोसेमंद कंपनियों को साथ लेकर, या सरकार को खुद पहल करनी चाहिए। शहरी कचरा बढ़ते ही चलना है, और इसके कम होने का कोई आसार नहीं है, अगर सरकार बड़े पैमाने पर कई विभागों को और जनता को शामिल करके इसकी पहल नहीं करेगी। हमारे पाठकों को याद होगा कि हम बरसों से सरकार को यह सुझाते आ रहे थे कि राज्य में पॉलीथीन पर पूरी रोक लगाने के पायलट प्रोजेक्ट की तरह प्रदेश के तीन बड़े भीड़ भरे तीर्थस्थानों से शुरुआत करनी चाहिए। हमने दंतेश्वरी, बम्लेश्वरी और रतनपुर की महामाया के मंदिरों का नाम भी लिखा था कि वहां पर पॉलीथीन पूरी तरह रोककर, उसके साथ-साथ वहां कपड़े और जूट के थैलों को उपलब्ध कराने के लिए महिला स्व-सहायता समूहों को आगे बढ़ाना चाहिए, और ऐसे विकल्प आने पर जनता खुद भी पॉलीथीन से बचने की कोशिश करेगी। हमको इस बात पर खुशी है कि आज से छत्तीसगढ़ सरकार का जो प्रतिबंध लागू हो रहा है, उसके साथ-साथ सरकार ने ऐसे विकल्प विकसित करने की बात भी कही है। देर से ही सही, राज्य सरकार की यह पहल अच्छी है।
अब हम एक बार फिर गटर साफ करने वाले कर्मचारियों की तरफ लौटें, तो मौत से पहले भी उनकी जो जिंदगी रहती है, वह रोज मरने जैसी रहती है। और वे जिस तबके के पैदा किए हुए कचरे को साफ करते हुए रोजाना घंटों गंदगी में डूबे रहते हैं, वह तबका तथाकथित पढ़ा-लिखा, शहरी और संपन्न तबका है, जो कि अपने पैदा किए हुए कचरे के मामले में बिल्कुल ही गैरजिम्मेदार भी है। लोगों पर पैकिंग के कचरे के लिए एक टैक्स लगाना जरूरी है जो कि व्यापार की जगह पर आसानी से लगाया जा सकता है। छत्तीसगढ़ को ऐसा पहला राज्य बनकर एक मिसाल पेश करनी चाहिए कि जिस सामान के साथ जितनी पैकिंग आती है, उस पर कागज, प्लास्टिक, या दूसरे सामानों के पर्यावरण-बोझ के अनुपात में टैक्स लगाया जाए। ऐसा करने पर लोगों को पैकिंग कम करने की आदत भी पड़ेगी, और किसी प्रदेश में इस्तेमाल के सामान के साथ जितना कचरा आता है, उसे निपटाने के लिए एक टैक्स भी मिल सकेगा। छत्तीसगढ़ को इस बारे में सोचना चाहिए, और पूरे देश की जनता को कचरा घटाने, और उसके सावधानी से निपटारे की अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए।

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