बात की बात

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बात की बात

छोटी सी बात


कहीं आपसे गलती या गलत काम हो जाए तो तुरंत पूरी ईमानदारी से उसे मानकर, काफी से काफी अधिक माफी मांगें। इसके साथ कोई किंतु -परंतु न जोड़ें। और आगे की चर्चा में याद न दिलाएं कि आप माफी मांग चुके हैं। याद दिलाने से माफी की अहमियत खत्म। अगर सामने वाले आपकी माफी को याद न रख रहे हों, तो एक बार और माफी मांग लें।

सर्द वादियों में खुले आसमां तले चेहरे

20 जून 2011
सुनील कुमार

कश्मीर से साथ लौटीं कुछ हजार तस्वीरों को देखने से जी नहीं भरता। न उन सबके पूरे आकार में छापने के लिए अखबार के पन्ने का आकार काफी है और न ही उनको शब्दों में बयां किया जा सकता है। ऐसे में दो चेहरे एकदम अलग याद पड़ते हैं जिनमें से एक से कुछ बात हो पाई और दूसरे से बोली के फर्क की वजह से बिल्कुल ही बात नहीं हो पाई।
इतनी तस्वीरों में जो दो चेहरे सबसे अलग थे उसमें से एक श्रीनगर से सोनमर्ग के रास्ते पर बंजारों के साथ चल रही भेड़-बकरियों के रेवड़ के आगे-आगे चल रही दो महिलाओं में से एक का था। यह बूढ़ी महिला अपने चेहरे पर गहरी लकीरों के साथ इत्मीनान से तस्वीरें खिंचवा रही थी और वह पहले ही कुछ बख्शीश की उम्मीद जाहिर कर चुकी थी। मैं उसकी तस्वीरें खींचते हुए लगातार यह सोच रहा था कि उसके साथ उससे दो या तीन पीढ़ी छोटी एक दूसरी महिला भी चल रही थी, और ऐसे ही एक दूसरे रेवड़ के पीछे चलता हुआ पांच-सात बरस का एक लड़का भी मुझे याद पड़ रहा था।
भेड़-बकरियों और घोड़ों को लेकर चलते यह पहाड़ी बंजारे पूरे कश्मीर में कहीं से कहीं जाते हुए दिखते हैं, घोड़ों पर उनका सामान दिखा या मर्द। औरतें सभी जगहों पर पैदल ही दिखीं। ऐसा नहीं कि आदमी बिल्कुल भी पैदल नहीं चलते, लेकिन ऐसे दर्जनों रेवड़ देखने के बाद भी जब एक भी औरत घोड़े पर नहीं दिखी तो फिर उसे शायद घुड़सवारी की इजाजत न रही हो। लेकिन ऐसे तमाम रेवड़ों के साथ-साथ उन्हें खाई में गिरने से बचाने के लिए बंजारा कुत्ते साथ चल रहे थे जो कि पहाड़ी ठंड के हिसाब से खासे घने और बड़े बालों वाले थे।
इन लोगों के सामानों के ग_र बहुत रंग-बिरंगे कपड़ों से बने हुए थे और उन पर राजस्थान-गुजरात की तरह के कसीदे का काम भी था और कपड़ों का जोड़ भी था। उनकी जुबान बहुत अलग थी इसलिए उनसे अधिक बातचीत हो नहीं पाई और दर्जनों तस्वीरों के एवज में जब मैंने इन दोनों महिलाओं को 10-10 रुपए दिए तो वे 50-50 रुपए मांगती रहीं। सड़क किनारे इनके रंगों, इनके हुलिए और इनके जानवरों की वजह से सैलानी रूककर तस्वीरें खींचते होंगे और इन्हें बख्शीश का हक ठीक से समझ आ चुका है। जिन शहरों में मॉडलों को तस्वीरों के लिए हजारों और लाखों रुपए दिए जाते हैं, वहां के फोटोग्राफरों को इन पहाड़ी या बंजारा लोगों की तस्वीरों के एवज में कुछ तो भुगतान करना सीखना चाहिए।
एक दूसरा चेहरा जिसे भूलना बहुत मुश्किल है, वह था सोनमर्ग की पहाडिय़ों पर प्लास्टिक की एक चादर से बने एक तंबू के बाहर एक मुस्कान का। बहुत दूर से एक बहुत बड़ी चट्टान के ऊपर फैलाई हुई घास पर दो बच्चे खेलते दिख रहे थे, नीचे बहुत से घोड़े घास चर रहे थे। जैसे-जैसे पास पहुंचना हुआ, कैमरे के टेलीलैंस से दिखना शुरू हुआ कि एक लड़का को कम उम्र का था लेकिन उसके साथ जो लड़की दिख रही थी वह शायद सलवार कुर्ते में एक युवती थी।
चूंकि यह तंबू खुले में था इसलिए वहां पहुंचने तक यह दिख गया कि तमाम लोग हम चार शहरी लोगों को वहां पहुंचते हुए देखकर उस अकेले तंबू के भीतर सिमट गए थे। हममें से एक लड़की और एक महिला को देखकर उनकी हड़बड़ाहट कुछ कम हुई लेकिन फिर भी वे बात करने को बहुत तैयार नहीं थे। उनमें से एक युवती का चेहरा देखकर कैमरा बेताब हो रहा था लेकिन जैसे ही मैं तस्वीर लेने की कोशिश कर रहा था वैसे ही उसका हाथ या कपड़ा अपने चेहरे को ढांक ले रहा था या वह सिर घुमा ले रही थी। लेकिन कुछ देर बाद जब वहां सभी लोगों की तस्वीरें मैं लेने लगा तो फिर यह युवती सीना तानकर खड़ी हो गई कि लो फोटो। उसकी अब तक की झिझक खत्म हो गई और जब वह यह देख रही थी कि कैमरे का लैंस सीधे उसके चेहरे पर टिक गया है तब भी वह कैमरे के पीछे की आंख से मानो सीधे आंख मिलाते हुए लैंस में झांकती रही, और एक-दो नहीं, दर्जनों तस्वीरों तक झांकती रही।
सैलानियों के लिए घोड़े चलाने वालों के इस परिवार में 7 छोटे-छोटे बच्चे थे जो सभी इस वक्त तक तंबू के भीतर खाना पूरा करके बाहर आ गए थे और कम से कम दो और महिलाएं, दो-तीन बड़े बच्चे भी थे। इतने लोगों के बीच जब किसी एक खास खूबसूरत चेहरे पर कैमरा टिके और अड़े हुए घोड़े की तरह हटने से ही इंकार कर दे तो वहां के बाकी लोग भी उसे समझ तो रहे होंगे और मानो उन सबका ख्याल रखते हुए मैं उनकी भी बहुत सी तस्वीरें लेते रहा, लेकिन कैमरा एक भौंरे की तरह उड़कर, घूमकर मानो फिर उसी फूल पर जाकर बैठ रहा था।
उसका नाम मुस्कान था और जाने कैसे उसके मां-बाप नाम रखते वक्त यह सूझा होगा कि बड़ी होकर उसकी मुस्कान ही उसकी सबसे बड़ी खूबसूरती होगी। लेकिन मैं मुस्लिम रिवाज वाले इस इलाके में मैं मन में आई इस बात को वहां बोल भी नहीं पा रहा था और बस कैमरे को ही बात करने दे रहा था। प्लास्टिक की चादर के जमीन छूते सौ वर्गफीट से कम के इस तंबू तले ही इस घर के मर्द भी सैलानियों का दिन खत्म हो जाने के बाद आकर रहते होंगे। ये तमाम लोग इसमें समाते भी कैसे होंगे यह भी समझ से परे है।
सोनमर्ग की सर्द पहाडिय़ों में बिल्कुल खुले आसमान तले उस पूरे टीले पर यह अकेला तंबू था और शाम होते-होते वहां ओले पड़ रहे थे और हवा सर्द हो चली थी। दिन भर तो सैलानियों को घोड़ों पर चढ़ाए इन तंबुओं के मर्द पैदल चलते ठंड से कुछ हद तक बच जाते होंगे, उनके बदन पर विदेशी सैलानियों के छोड़े हुए या विदेशों से आकर यहां बिके हुए पुराने गर्म कपड़े दिख जा रहे थे। लेकिन ठंड आने तक ऐसे छोटे से तंबू में इतने तमाम लोग किस तरह पूरी रात काटते होंगे यह समझना बहुत मुश्किल था। यह तंबू चारों तरफ से नीचे से, जमीन से ऊपर भी था और वहां हवा की रफ्तार बहुत तेज भी थी।
एक तंबू के इन तमाम लोगों के बीच यह मुस्कान भी है जिसका चेहरा अगर मुंबई जैसे किसी शहर में होता तो फैशन के किसी बड़े ईश्तहार में वह सड़क किनारे दीवारों पर छाया होता। लेकिन जंगल में नाचते मोर की खूबसूरती किसे दिखती है?
जब शहरों में तरह-तरह के सौंदर्य स्पर्धाएं होती हैं और उनकी खबरें आती हैं तो हर बार उन्हें पढ़कर मुझे यही लगता है कि यह भारत की सबसे सुंदर युवती न होकर उन युवतियों में सबसे सुंदर है जो इस मुकाबले तक पहुंच पाती हैं। भारत के कई हिस्सों में ऐसी मुस्कान बिखरी हुई होगी जिन तक कैमरे भी शायद नहीं पहुंच पाते होंगे।
इन तस्वीरों को लेने के बाद उनमें से एक दूसरी युवती ने जब पूछा कि क्या इस कैमरे से पर्ची नहीं निकलेगी, तो मैं समझ गया कि उन्होंने पहले किसी सैलानी के पास पोलराइड कैमरा देखा होगा जिसमें से तुरंत ही एक लगभग धुंधली सी तस्वीर छपकर निकल आती है। मैंने उन्हें अपने कैमरे के पीछे के स्क्रीन पर इन तस्वीरों को दिखाने की बात कही, तो वे सब फासला छोड़कर पास आ जुटे। और यहीं पर मेरी दिलचस्पी उजागर भी हो गई कि मैंने किन चेहरों की कितनी तस्वीरें ली थीं। लेकिन यह सब तो शायद उन्हें पहले भी समझ आ रहा होगा।
लेकिन चेहरों को याद करते हुए मुझे पहले ही दिन ली हुई एक तस्वीर याद पड़ती है जो कि पहलगाम से श्रीनगर लौटते हुए सड़क किनारे के एक खेत में धान का रोपा लगाती हुई एक छोटी सी परी की थी। उसके बारे में मैं पहले लिख भी चुका हूं लेकिन उस वक्त उसके चेहरे की चर्चा नहीं हो पाई थी। आज जब कम्प्यूटर पर उसका चेहरा बड़ा करके देख रहा हूं तो लग रहा है कि उस खेत में उपजे धान का दाम कुछ अधिक होना चाहिए जहां यह परी रोपा लगा रही थी। (बाकी कल)

पीएमटी की नाकामयाबी से परे भी बहुत से मुद्दे

19 जून 11
छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ हफ्तों में पीएमटी दो बार रद्द हो गई क्योंकि पहली बार तो उसके पर्चे फूटे और दूसरी बार एक गिरोह ने छत्तीसगढ़ के इम्तहान-इतिहास में सबसे बड़ा संगठित अपराध करते हुए फोड़े गए पर्चों के आधार पर पांच-पांच, दस-दस लाख रुपए में एक-एक छात्र-छात्रा को पीएमटी की तैयारी करवाई। इस अपराध से पूरे प्रदेश के लोगों में इम्तहान पर से भरोसा पूरी तरह हिल गया है। उन लाखों बच्चों की सोचें जो स्कूल के आखिरी दो बरस सिर्फ ऐसे इम्तहानों की तैयारी में लगा देते हैं कि इसके बाद वे किसी अच्छे कॉलेज में जा सकें। बार-बार इम्तहान रद्द होने के बाद अगर कोई इम्तहान आगे बिना पर्चे फूटे भी निपटेगी, तो उस पर भरोसा किसका रहेगा?
छत्तीसगढ़ का यह अपराध अपने-आपमें भयानक है और जनता का विश्वास इससे स्कूल-कॉलेज की परीक्षाओं पर से बुरी तरह, और शायद पूरी तरह हिल गया है। इसकी जांच के बाद तो इसके लिए जिसको भी सजा हो वह अलग बात है, लेकिन सोचने की बात यह है कि ऐसे बड़े भांडाफोड़ के बिना दबे-छुपे ऐसे कितना कुछ होता होगा जिससे कि समाज के कमजोर तबके के हक, ताकतवर तबकों के लोग अपने बच्चों के लिए खरीद लेते होंगे। हम इसीलिए बार-बार पढ़ाई की परीक्षा पर जोर देते हैं और प्रवेश की परीक्षा के खिलाफ रहते हैं। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने पीएमटी, पीईटी को खत्म करने का फैसला लिया था लेकिन उससे सैद्धांतिक रूप से गरीबों का भला हो पाता और व्यवहारिक रूप से ताकतवर तबके की महंगी कोचिंग पाने की ताकत बिना इस्तेमाल रह जाती इसलिए उसे अदालत तक जाकर खारिज करवा दिया गया। हमारा यह साफ मानना है कि तमाम किस्म की प्रवेश परीक्षाएं इस देश में गरीब बच्चों और पैसे वाले बच्चों के बीच एक खाई खोद देती हैं।
ऐसे समय जब देश में इंजीनियरिंग की हजारों सीटें साल दर साल खाली पड़ी रह रही हैं, इंजीनियरिंग संस्थानों के लिए प्रवेश परीक्षाएं आयोजित करके एक नए किस्म के बाजार खड़े  करना और पहले से ही पहुंच के बाहर होती जा रही शिक्षा व्यवस्था में जैसे तैसे अपने बच्चों को पढ़ा पा रहे माता-पिता पर और बोझ डालना सरकार की ऐसी नीति है, जिससे उसकी जनता के प्रति, शिक्षा के प्रति असंवेदनशीलता पता चलती है। प्रवेश परीक्षाओं के लिए बच्चे कोटा में दो-दो साल तक कोचिंग संस्थाओं में कोचिंग लेते हंै। उन्हें ये संस्थान अपने ही फर्जी स्कूलों में दर्ज करवाकर उन्हें 11वीं 12वीं की फर्जी हाजिरी दिलवाकर दो साल तक बस आईआईटी-जेईई में कामयाब होने के लिए तैयार करते हंै, लेकिन देश में ऐसे मौके पाने वाले बच्चों का अनुपात कितना है? प्रवेश परीक्षाएं, कोचिंग संस्थानों का बाजार खड़ा करती हंै जो देश के लगभग तमाम बच्चों की पहुंच के बाहर होता है। यह व्यवस्था शिक्षा में समान अवसरों की संभावना खत्म कर देती है। यह सब सरकार की नाक के नीचे उसकी नजरों के सामने हो रहा है, उसके अपने किए हो रहा है। देश के 99 फीसदी बच्चे जब सरकार की ऐसी नीति का शिकार हों, तो देश में नक्सलवाद न पनपे, तो और क्या हो? प्रवेश परीक्षाएं आयोजित करके सरकार क्या हासिल कर लेती है यह गौर करने की बात है। प्रवेश परीक्षाएं, स्कूलों में ली जाने वाली उन परीक्षाओं की अहमियत खत्म कर देती हैं,जो विद्यार्थियों के विषय विशेष में ज्ञान की परख के लिए ली जाती हंै। इन परीक्षाओं के लिए  दसवीं के बाद से ही शुरू हो जाने वाली इस दौड़ के कारण बच्चे कच्ची उम्र से ही इस दौड़ में महंगे जूते और ट्रैक सूट पहनकर दौड़ सकने वाले विद्यार्थियों, सामान्य जूते पहनकर दौडऩे वालों, नंगे पैर दौडऩे वालों और किनारे खड़े होकर देखने वाले बेबस विद्यार्थियों में बंट जाते हंै। उनके बीच अपने साथ अन्याय होने का अहसास एक आग की तरह  सुलगने लगता  है, ऐसी व्यवस्था के प्रति हिकारत पैदा होने लगती है जो उन्हें, उनके किसी कुसूर के बिना पीछे धकेल देती है। मु_ी भर आईआईटियन देश के लिए जितने फायदेमंद नहीं हैं उससे कई गुना खतरनाक हताश विद्यार्थियों की यह फौज है जिसे कभी भी, कहीं भी, व्यवस्था के खिलाफ पत्थर उठाने के लिए आसानी से बरगलाया जा सकता है। फिर सरकार उससे निपटने के लिए नक्सल जैसे मोर्चो पर वह सब खर्च करती है जिसे अन्य विकास पर खर्च कर समाज को बहुत ऊपर उठाया जा सकता था। यह सोचें कि आज बस्तर जैसे कुछ दर्जन जो मोर्चे देश में हैं वे अगर शहर-शहर तक खुल जाएं तो क्या होगा? सिर्फ कुलीन तबके के विकास की यह कैसी सरकारी-लोकतांत्रिक चिंता है? ये परीक्षाएं लेकर 11वीं और 12वींं कक्षा में की जानी वाली स्कूली पढ़ाई को ही अप्रसांगिक बन देना हो तो स्कूलों में 11वीं 12 वीं की कक्षाएं चलाने की ही क्या जरूरत है?
अभी कुछ ही महीने हुए है जब देश ने देखा था कि तकनीकी और व्यवसायिक शिक्षा के बाप बने बैठे लोग किस तरह मेडिकल शिक्षा में सीटों की संख्या कम रखकर स्नातकोत्तर पढ़ाई की सीटें करोड़ों रुपयों में बेचते थे। उस व्यवस्था में कोई आम भारतीय एमडी और एमएस करने का खयाल भी नहीं कर सकता था। बरसों सरकार की नाक के नीचे यह सब चला। अवसरों की यह असमानता खड़ी की जाती है, उसे भुनाया जाता है, समाज को बांटा जाता है, समाज के भीतर गुस्से की आग सुलगाई जाती है, और सरकारें चुपचाप देखती रहती हंै। अभी कुछ ही दिन पहले पढ़ा था कि किस तरह पीएमटी और आईआईटी कोचिंग के संस्थान प्रतिभाशाली विद्यार्थियों का उनके माता-पिता के साथ सौदा करते हंै, ताकि उनका नाम इस्तेमाल कर सकें। ऐसी शिक्षा व्यवस्था में बच्चों को छोटी उम्र से ही पीस डालने, उन्हें नम्बर, पैसों के लिए दौड़ाने की जिम्मेदार ये प्रवेश परीक्षाएं ही हैं। इनके लिए खड़े किए जा रहे महंगे कोचिंग संस्थानों की असलियत बिहार के सुपर-30 की कामयाबी से खुल जाती है, जहां सिर्फ गरीब बच्चों को आईआईटी प्रवेश परीक्षा के लिए तैयार किया जाता है, और देश के किसी भी कोचिंग संस्थान के प्रदर्शन को यह प्रयोग बरसों से टक्कर दे रहा है।
फिर क्यों जनता भी इन सरकारों को खारिज न करे? आज तक जंगल में रह रहे लोग विकास से अछूते थे इसलिए नक्सलवाद जंगलों में पनपा, लेकिन अब शहरों में  असमानता और हताशा की खेती जिस तरह खड़ी हो रही है, ताज्जुब नहीं कि नक्सलवाद शहरों में कॉलेजों और स्कूलों तक पहुंच जाए। सरकार जिन संस्थानों को उत्कृष्टता के केंद्र मानती है, जिन पर फख्र करती है, उनके दरवाजे तक भी पहुंचने से महरूम रह जा रही जनता ऐसे लोकतंत्र पर भरोसा क्यों करे, जो इन सरकारों को उनके भविष्य के साथ ऐसा खिलवाड़ करने की छूट देता है।
इन प्रवेश परीक्षाओं को खत्म करके इनकी जगह स्कूलों की पढ़ाई को ही दुरुस्त करने, उसका स्तर सुधारने पर महत्व दिया जाना चाहिए। शिक्षा को लोगों की पहुंच के भीतर बनाया जाना चाहिए। शिक्षा के अधिकार की बात करने वाली सरकार को शिक्षा तंत्र में फैल रही इस सामाजिक, आर्थिक, असमानता पर अपनी बेहोशी तोडऩा चाहिए। जब आईआईटी जैसे संस्थानों के बड़े शिक्षक तक प्रवेश परीक्षाओं में नकल करवाने लगें तो यह मौका सरकार के नींद से जागकर यह सोचने का है कि वह जैसी शिक्षा व्यवस्था खड़ी कर रही है, उसकी जरूरत किसे है?
जब भी प्रधानमंत्री से महंगी शिक्षा की बात की जाती है, वह कह देते हंै कि देश में पगारें बढ़ी हंै, तो लोग कर्ज लेकर पढें़, लेकिन जहां गरीबी 40 फीसदी बढ़ चुकी है वहां गरीब को कर्ज कौन सी बैंक देगा यह भी उन्हें बताना चाहिए। क्या अब कर्ज लेकर आत्महत्या कर रहे किसानों की तरह हम कर्ज लेकर आत्महत्या करने वाले  मां-बाप भी देखेंगे? पहले शिक्षा महंगी की जाए, फिर शिक्षा संस्थानों में प्रवेश के नियम ऐसे बना दिए जाएं कि ताकतवर ही उनमें जा सके, आम जनता के लिए उनके दरवाजे बंद ही रहे , ऐसी नीतियां बंद होनी चाहिए। आगे बढऩे के लिए, गरीबी से उठने के लिए, जीवन स्तर सुधारने के लिए जनता को सरकार की दया नहीं, ठीक-ठाक सस्ती शिक्षा का अधिकार चाहिए। अगर वह भी सरकार नहीं दे सकती तो नक्सलवाद के जंगलों से निकलकर राजधानी पहुंचने में अब बहुत देर नहीं है।
 

छोटी सी बात


किसी भी जगह इंतजार में वहां पड़े अखबार-मेगजीन को पढ़कर अपना वक्त बर्बाद ना करें। अपने साथ कोई किताब, पेपर-मेगजीन लेकर ही कहीं जाएं, ताकि अपनी मर्जी और जरूरत का ही पढ़े।

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देश में बच्चों का हाल: कल चौंकने की बजाए आज जागें

19 जून
बच्चों को पारिवारिक देखरेख देने वाली एक संस्था एसओएस चिल्ड्रंस  विलेज़ेस ऑफ इंडिया के बच्चों के हालात पर  किए गए ताजा अध्ययन के नतीजे गौर करने के लायक हंै। ऐसे देश में जिसकी 48 फीसदी आबादी बच्चे हंै, माता-पिता के देखरेख और सहारा गंवा देने के खतरे में जी रहे  बच्चों की तादद 27 फीसदी है। वह बहुत कमज़ोर हालत में है। देश के पूर्वी इलाके में यह स्थिति ज्यादा खराब है। उड़ीसा, बिहार या झारखंड के  बच्चे  को भारत के किसी भी दूसरे हिस्से मे रह रहे बच्चे के मुकाबले माता-पिता की देखरेख और सहारा खोने का ज्यादा डर है। अध्ययन ने देश के 100 जिलों को ऐसा पाया जहां के बच्चे ऐसी कमजोर हालत में हैं और इनमें से 62 जिले इस पूर्वी पट्टे में हैं जो बिहार झारखंड, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में मौजूद हैं। अध्ययन कहता है कि इस पूर्वी क्षेत्र में देश के सबसे  ज्यादा कमजोर बच्चों का 38.28 फीसदी होता है, जबकि मध्य क्षेत्र में ऐसे 32.13 फीसदी और पश्चिम क्षेत्र में 21.03 फीसदी बच्चे रहते हंै। अध्ययन के मुताबिक भारत में कमजोर बच्चों की तादाद 11 करोड़ है जो देश की 18 साल से कम उम्र की  आबादी का 27 फीसदी है। यह एक डरावना आंकड़ा है। यह वह बच्चे हंै जो गरीबी सामाजिक अशांति, एचआईवी, एड्स ,विकलांगता और अन्य कारणों से अपने माता-पिता गंवाने का खतरा झेल रहे हैं। इस अध्ययन में यह भी पाया गया कि बच्चे  जैसे-जैसे 14-15 साल की उम्र के करीब पहुंचते हंै उन्हें मिलने वाली माता-पिता की देखरेख, और सहारे में कमी आती जाती है। आबादी कम करने के तरीके अपनाकर देश पैदा होने वाले बच्चों की तादाद तो कम कर रहा है, लेकिन कमजोर बच्चों की तादाद बढ़ती ही जा रही है। देश में बच्चों की हालत कैसी है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि भारत में दुनिया में सबसे ज्यादा बाल मजदूर हैं, यहां एक करोड़ बच्चे रोज सड़क पर भूखे असुरक्षित सोते हंै, भारत दुनिया के एक तिहाई गरीब बच्चों का घर है। देश के 10 हजार बच्चे रोज ऐसी बीमारियों से मर जाते हंै जिनका इलाज आसानी से हो सकता है।
ऐसा नहीं है कि भारत सरकार को बच्चों की कोई फिक्र नहीं है। उसने बच्चों के लिए एक राष्ट्रीय नीति बना रखी है जो कहती है कि सरकार बच्चे के पैदा होने के पहले और उसके बाद, उसके शारीरिक मानसिक और सामाजिक विकास के लिए सभी जरूरी सेवाएं प्रदान करेगी। ऐसा नहीं है कि सरकार इस नीति पर अमल नहीं करती। दुनिया का सबसे बड़ा पोषण कार्यक्रम मध्यान्ह भोजन देश में चल रहा है लेकिन समाज कल्याण की तमाम योजनाओं की तरह बाल कल्याण कार्यक्रमों की हालत भी खस्ता है। समाज और बाल कल्याण योजनाओं पर अमल का हाल इस बात से पता चलता है कि मध्यप्रदेश में इस विभाग के आला अफसर, और उनके पति ढाई सौ करोड़ से भी ज्यादा के आसामी निकले।  अच्छी  योजनाएं बना देने भर से सरकार बच्चों के प्रति अपनी जिम्मेदारी से बरी नहीं हो जाती। इन योजनाओं पर सही अमल की जिम्मेदरी कौन उठाएगा?  सही अमल का इंतज़ाम किए बिना, अमल की जवाबदेही तय किए बिना, ऐसी योजनाएं बनाकर सामने रखना, उनके लिए करदाता से वसूला गया धन खर्च करना, देश के साथ एक धोखा है, जिसकी कसूरवार तमाम सरकारें हैं। लेकिन सरकारों के इस प्रशासनिक निकम्मेपन का शिकार देश का भविष्य  हो रहा है यह समझने की गंभीरता कोई नहीं दिखाता, खुद जनता भी नहीं जिसे यह अधिकार हक से मांगने चाहिए। इसकी एक वजह बच्चों के प्रति हमारा एक आम नजरिया भी है। सम्पन्न और बच्चों की देखभाल कर सकने में समर्थ घरों में बच्चे के पैदा होते ही उसके नाज़ुक कंधों पर बड़ी भारी उम्मीदों का बोझ लदना शुरू कर दिया जाता है- खानदान का नाम रौशन करना, माता-पिता की अधूरी  महत्वाकांक्षाएं पूरी करना, खुद को दूसरों से बेहतर साबित करने की उनकी दौड़ में एक घोड़े की तरह जुत जाना, जन्मते ही उनकी तकदीर बन जाती है। अपने आसपास अगर हम गौर करें तो पाएंगे कि छोटे-छोटे मासूम बच्चे अपने माता-पिता की शान के तमगे बनाने के लिए तेजाब से घिसे जाते हंै उनकी दुश्वारियां गरीब परिवारों के बच्चों की दुश्वारियों के मुकाबले कुछ नहीं, यह सही है, लेकिन अपने बच्चों को पाल पोस सकने लायक वर्ग में भी  बच्चों का बड़ा हिस्सा ऐसी परिस्थितियों में जीता जरूर है, जिसमें उसे नहीं डाला जाना चाहिए। इस तबके में बच्चे परिवार का, देश का, भविष्य तो होते हंै, लेकिन उन्हें उनके माता-पिता किसी फूल की तरह खिलने देने का मौका दिए बिना, उनके नाजुक कोमल बचपन को लोहे के तारों से तोड़-मरोड़कर किसी बोंज़ाई की तरह बड़ा करते हंै ताकि बड़ा होने पर वह उसे अपने ड्रॉइंगरूम में सजाकर सबको फख्र से दिखा सकें। उन्हें प्यार दुलार मिलता है, लेकिन सशर्त। भले एसओएस के नजरिये से वह देखभाल या सहारा खोने के डर में जीत बच्चों में शुमार नहीं, लेकिन उन्हें मिल रही इस तरह की सशर्त देखभाल और सहारा भी डरावनी है।  
इनके उल्टे गरीब परिवारों के बच्चे हंै जिन्हें परिवार पर बोझ नहीं, परिवार की सम्पत्ति माना जाता है। क्योंकि  कि उगकर खड़े होने के साथ ही वह अपने माता-पिता की जिम्मेदारियों का बोझ उठाने लगते हैं। उनके माता-पिता के पास यह सोचने का वक्त और सुविधा ही नहीं होती कि बच्चों के कुछ अधिकार होते हंै जो उन्हें मिलने चाहिए, उनके कुछ सपने होते हंै जो पूरे होने चाहिए। इस वर्ग में बच्चे 14-15 साल के होते तक समय से पहले ही वयस्क हुए मान लिए जाते हंै। उन्हें बच्चों को जो प्यार-दुलार मिलना चाहिए वह नहीं मिलता। ऐसे माता-पिता के प्यार  देखभाल को तरसे बच्चों को बरगलाने के लिए, उन्हें भीख, यौन शोषण और अपराधों में जोतने के लिए उन पर झपटने वाले गिद्ध, समाज में हर कहीं,हर शक्ल में मिल जाते हैं और राष्ट्रीय बाल नीति में बच्चों के हर उम्र में शारीरिक, मानसिक और सामजिक विकास की जिम्मेदारी लेने वाले सरकार हाशिए पर खड़ी देखती रहती है। उसके द्वारा इन बच्चों के लिए बनाए गए गृहों में बाल यौन शोषण की खबरें, रहने की खराब परिस्थितियों और इनसे घबराकर बच्चों के गाहे-बगाहे भाग जाने की खबरें आम होती हैं ,जबकि इन गृहों से परे सड़कों पर रहने वाले बच्चों को अपराध की दुनिया में धकेलने में पुलिस जाने अनजाने अहम भूमिका अदा करती है।  रायपुर मे रेल्वे स्टेशन पर हमने देखा है कि पुलिस घर से भागे, सड़क पर, प्लेटफार्म पर जीते इन बच्चों को अपराधियों का औजार बनने पर मजबूर करती है। अगर समाज सेवी संगठन  इन्हें यहां से हटाकर इन्हें सुधारकर इनके घर वापस भी भेजना चाहें  तो इनके माता-पिता इन्हें इस डर से वापस नहीं लेते, कि इनकी सोहबत में दूसरे बच्चे बिगड़ जाएंगे। देश के नौनिहालों के लिए इतने खतरनाक और निराशाजनक माहौल में हम 8 फीसदी की विकासदर से दौड़ रहे हंै, यह देखे बिना कि कड़कड़ाते नोट थामने के लालच में इन बच्चों की कोमल अंगुलियां हमारे हाथों से कब फिसल जा रही हंै, हमें  होश भी नहीं है। कब और कैसे यह कोमल हाथ अपराध  की कंटीली बाड़ों से लहूलुहान हो रहे हंै, मुड़कर यह देखने का हमारे पास न वक्त है, न इच्छा।
बच्चे केवल माता-पिता की जिम्मेदारी नहीं होते वह पूरे समाज की जिम्मेदारी होते हैं। इसी तरह बच्चों की भलाई केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं होती। इसके लिए एक नागरिक के तौर पर हर हिन्दुस्तानी को जागने की जरूरत है। बच्चे और उनके माता-पिता जिस एक जगह बड़ी संख्या में जुटते हैं वह है स्कूल, इसलिए बच्चों के प्रति माता-पिता के नजरिए को स्कूलों में दिशा दी जा सकती  है। सरकारी स्कूल बहुत से अभावों से जूझ रहे हंै, यह सच है, लेकिन यह एक आपातकालीन स्थिति है, जिससे डरने की जरूरत है, इससे मुंह नहीं चुराया जा सकता। बच्चों के प्रति एक संतुलित नजरिया विकसित करने, उनके साथ प्यार और जिम्मेदारी से बरतने के लिए माता-पिता, घर वालों और प्रशासन को तैयार करना उन्हें इस काम से लगाना एक ऐसा काम है, जिसे अनदेखा करने के बहुत गंभीर नतीजे सामने आएंगे। इस तरह से बड़े हो रहे यह 27 फीसदी बच्चों में से कल को अगर अपराधियों की फौज खड़ी हो, तो उससे आपातकाल के  स्तर पर निपटना ही पड़ेगा, समय और संसाधन खर्च करने ही पडेंग़े, लेकिन तब ऐसा कर के भी हम इन बच्चों का बिगड़ा हुआ मुकद्दर संवार नहीं सकेंगे। उसकी जगह आज इस दिशा में निवेश करने से भविष्य  में अपरधियों, मानसिकरूप  से रोगी, हताश लोगों की फौज खड़ी करने के खतरे से हम निपट सकेंगे। दुख की बात यह है कि आज देश में बच्चों  के लिए सरकार अगर कोई भी गंभीरता दिखा रही है तो वह इसलिए नहीं कि उसे देश के भविष्य की चिंता है, बल्कि इसलिए कि उसे सहस्त्राब्दि लक्ष्य हासिल करने हैं। क्योंकि  अगर यह न हुआ, तो अंतरराष्ट्रीय मदद मिलने में दिक्कत होगी। ठीक वैसे ही जैसे सड़क बनाने के लिए आर्थिक मदद देने के पहले सरकार राज्यों पर शर्त लगा रही है, कि वह अपनी जनता से जलकर वसूले। माता-पिता की देखभाल, और उनका सहारा बच्चों का हक है, उनके सामाजिक मानसिक और  शारीरिक विकास की जरूरत है। यह उन्हें किसी शर्त के साथ नहीं, उनके अधिकार के रूप में, बेरोकटोक मिलनी चाहिए। एसओएस की रिपोर्ट एक समाज के रूप में हमें जगाने के लिए एक सायरन की तरह है कि हम अपनी बेहोशी से जागें, अपने घर , पड़ोस सब कहीं में बच्चों के साथ सही तरीके से बरतें, बच्चों के लिए चल रही योजनाओं की जानकारी जुटाकर उन पर नजर रखें, सामाजिक संगठनों को इसमे मदद करें, सरकार को भी सरकारी योजनाओं की निगरनी के लिए जनता की भागीदारी बढ़ाने की जरूरत है। गरीबी निवारण कार्यक्रमों में बच्चों को पेश इस खतरे पर भी  गौर किया जाए। हमने पीडीएस जैसे कार्यक्रम में देखा है कि जो कार्यक्रम देश में भ्रष्टाचार और अक्षमता का पर्याय माना जाता था, आज भी अधिकांश राज्यों में माना जाता है, छत्तीसगढ़ सरकार ने राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाकर उसे एक पूरी तरह कामयाब कार्यक्रम बनाने की मिसाल खड़ी  की है। सरकार में इच्छाशक्ति होने से कोई भी काम नामुमकिन नहीं होता, अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति से एक काम हो सकता है तो दूसरे काम भी हो सकते हंै। देश के भविष्य  के लिए सरकारों को यह इच्छाशक्ति दिखानी ही चाहिए।

छोटी सी बात


किसी नए शहर जाएं, तो सिर्फ नई कॉलोनियों को शहर न मान लें। नई बस्तियां तो हर जगह एक से होते हैं। नए शहर में जाकर वहां की पुरानी बस्तियों को देखने में ही शहर देखना है। इसी तरह उस जगह की खूबियों को देखें, किसी नए शहर में जाकर फिल्म देखने जाना तो समय को बर्बाद करना होता है। स्थानीय कला हस्तशिल्प, संगीत पर वक्त खर्च करें। और मुमकिन हो तो कैमरा लेकर पैदल घूमें, उससे बेहतर कोई तरीका नहीं होता।