19 जून 11
छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ हफ्तों में पीएमटी दो बार रद्द हो गई क्योंकि पहली बार तो उसके पर्चे फूटे और दूसरी बार एक गिरोह ने छत्तीसगढ़ के इम्तहान-इतिहास में सबसे बड़ा संगठित अपराध करते हुए फोड़े गए पर्चों के आधार पर पांच-पांच, दस-दस लाख रुपए में एक-एक छात्र-छात्रा को पीएमटी की तैयारी करवाई। इस अपराध से पूरे प्रदेश के लोगों में इम्तहान पर से भरोसा पूरी तरह हिल गया है। उन लाखों बच्चों की सोचें जो स्कूल के आखिरी दो बरस सिर्फ ऐसे इम्तहानों की तैयारी में लगा देते हैं कि इसके बाद वे किसी अच्छे कॉलेज में जा सकें। बार-बार इम्तहान रद्द होने के बाद अगर कोई इम्तहान आगे बिना पर्चे फूटे भी निपटेगी, तो उस पर भरोसा किसका रहेगा?
छत्तीसगढ़ का यह अपराध अपने-आपमें भयानक है और जनता का विश्वास इससे स्कूल-कॉलेज की परीक्षाओं पर से बुरी तरह, और शायद पूरी तरह हिल गया है। इसकी जांच के बाद तो इसके लिए जिसको भी सजा हो वह अलग बात है, लेकिन सोचने की बात यह है कि ऐसे बड़े भांडाफोड़ के बिना दबे-छुपे ऐसे कितना कुछ होता होगा जिससे कि समाज के कमजोर तबके के हक, ताकतवर तबकों के लोग अपने बच्चों के लिए खरीद लेते होंगे। हम इसीलिए बार-बार पढ़ाई की परीक्षा पर जोर देते हैं और प्रवेश की परीक्षा के खिलाफ रहते हैं। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने पीएमटी, पीईटी को खत्म करने का फैसला लिया था लेकिन उससे सैद्धांतिक रूप से गरीबों का भला हो पाता और व्यवहारिक रूप से ताकतवर तबके की महंगी कोचिंग पाने की ताकत बिना इस्तेमाल रह जाती इसलिए उसे अदालत तक जाकर खारिज करवा दिया गया। हमारा यह साफ मानना है कि तमाम किस्म की प्रवेश परीक्षाएं इस देश में गरीब बच्चों और पैसे वाले बच्चों के बीच एक खाई खोद देती हैं।
ऐसे समय जब देश में इंजीनियरिंग की हजारों सीटें साल दर साल खाली पड़ी रह रही हैं, इंजीनियरिंग संस्थानों के लिए प्रवेश परीक्षाएं आयोजित करके एक नए किस्म के बाजार खड़े करना और पहले से ही पहुंच के बाहर होती जा रही शिक्षा व्यवस्था में जैसे तैसे अपने बच्चों को पढ़ा पा रहे माता-पिता पर और बोझ डालना सरकार की ऐसी नीति है, जिससे उसकी जनता के प्रति, शिक्षा के प्रति असंवेदनशीलता पता चलती है। प्रवेश परीक्षाओं के लिए बच्चे कोटा में दो-दो साल तक कोचिंग संस्थाओं में कोचिंग लेते हंै। उन्हें ये संस्थान अपने ही फर्जी स्कूलों में दर्ज करवाकर उन्हें 11वीं 12वीं की फर्जी हाजिरी दिलवाकर दो साल तक बस आईआईटी-जेईई में कामयाब होने के लिए तैयार करते हंै, लेकिन देश में ऐसे मौके पाने वाले बच्चों का अनुपात कितना है? प्रवेश परीक्षाएं, कोचिंग संस्थानों का बाजार खड़ा करती हंै जो देश के लगभग तमाम बच्चों की पहुंच के बाहर होता है। यह व्यवस्था शिक्षा में समान अवसरों की संभावना खत्म कर देती है। यह सब सरकार की नाक के नीचे उसकी नजरों के सामने हो रहा है, उसके अपने किए हो रहा है। देश के 99 फीसदी बच्चे जब सरकार की ऐसी नीति का शिकार हों, तो देश में नक्सलवाद न पनपे, तो और क्या हो? प्रवेश परीक्षाएं आयोजित करके सरकार क्या हासिल कर लेती है यह गौर करने की बात है। प्रवेश परीक्षाएं, स्कूलों में ली जाने वाली उन परीक्षाओं की अहमियत खत्म कर देती हैं,जो विद्यार्थियों के विषय विशेष में ज्ञान की परख के लिए ली जाती हंै। इन परीक्षाओं के लिए दसवीं के बाद से ही शुरू हो जाने वाली इस दौड़ के कारण बच्चे कच्ची उम्र से ही इस दौड़ में महंगे जूते और ट्रैक सूट पहनकर दौड़ सकने वाले विद्यार्थियों, सामान्य जूते पहनकर दौडऩे वालों, नंगे पैर दौडऩे वालों और किनारे खड़े होकर देखने वाले बेबस विद्यार्थियों में बंट जाते हंै। उनके बीच अपने साथ अन्याय होने का अहसास एक आग की तरह सुलगने लगता है, ऐसी व्यवस्था के प्रति हिकारत पैदा होने लगती है जो उन्हें, उनके किसी कुसूर के बिना पीछे धकेल देती है। मु_ी भर आईआईटियन देश के लिए जितने फायदेमंद नहीं हैं उससे कई गुना खतरनाक हताश विद्यार्थियों की यह फौज है जिसे कभी भी, कहीं भी, व्यवस्था के खिलाफ पत्थर उठाने के लिए आसानी से बरगलाया जा सकता है। फिर सरकार उससे निपटने के लिए नक्सल जैसे मोर्चो पर वह सब खर्च करती है जिसे अन्य विकास पर खर्च कर समाज को बहुत ऊपर उठाया जा सकता था। यह सोचें कि आज बस्तर जैसे कुछ दर्जन जो मोर्चे देश में हैं वे अगर शहर-शहर तक खुल जाएं तो क्या होगा? सिर्फ कुलीन तबके के विकास की यह कैसी सरकारी-लोकतांत्रिक चिंता है? ये परीक्षाएं लेकर 11वीं और 12वींं कक्षा में की जानी वाली स्कूली पढ़ाई को ही अप्रसांगिक बन देना हो तो स्कूलों में 11वीं 12 वीं की कक्षाएं चलाने की ही क्या जरूरत है?
अभी कुछ ही महीने हुए है जब देश ने देखा था कि तकनीकी और व्यवसायिक शिक्षा के बाप बने बैठे लोग किस तरह मेडिकल शिक्षा में सीटों की संख्या कम रखकर स्नातकोत्तर पढ़ाई की सीटें करोड़ों रुपयों में बेचते थे। उस व्यवस्था में कोई आम भारतीय एमडी और एमएस करने का खयाल भी नहीं कर सकता था। बरसों सरकार की नाक के नीचे यह सब चला। अवसरों की यह असमानता खड़ी की जाती है, उसे भुनाया जाता है, समाज को बांटा जाता है, समाज के भीतर गुस्से की आग सुलगाई जाती है, और सरकारें चुपचाप देखती रहती हंै। अभी कुछ ही दिन पहले पढ़ा था कि किस तरह पीएमटी और आईआईटी कोचिंग के संस्थान प्रतिभाशाली विद्यार्थियों का उनके माता-पिता के साथ सौदा करते हंै, ताकि उनका नाम इस्तेमाल कर सकें। ऐसी शिक्षा व्यवस्था में बच्चों को छोटी उम्र से ही पीस डालने, उन्हें नम्बर, पैसों के लिए दौड़ाने की जिम्मेदार ये प्रवेश परीक्षाएं ही हैं। इनके लिए खड़े किए जा रहे महंगे कोचिंग संस्थानों की असलियत बिहार के सुपर-30 की कामयाबी से खुल जाती है, जहां सिर्फ गरीब बच्चों को आईआईटी प्रवेश परीक्षा के लिए तैयार किया जाता है, और देश के किसी भी कोचिंग संस्थान के प्रदर्शन को यह प्रयोग बरसों से टक्कर दे रहा है।
फिर क्यों जनता भी इन सरकारों को खारिज न करे? आज तक जंगल में रह रहे लोग विकास से अछूते थे इसलिए नक्सलवाद जंगलों में पनपा, लेकिन अब शहरों में असमानता और हताशा की खेती जिस तरह खड़ी हो रही है, ताज्जुब नहीं कि नक्सलवाद शहरों में कॉलेजों और स्कूलों तक पहुंच जाए। सरकार जिन संस्थानों को उत्कृष्टता के केंद्र मानती है, जिन पर फख्र करती है, उनके दरवाजे तक भी पहुंचने से महरूम रह जा रही जनता ऐसे लोकतंत्र पर भरोसा क्यों करे, जो इन सरकारों को उनके भविष्य के साथ ऐसा खिलवाड़ करने की छूट देता है।
इन प्रवेश परीक्षाओं को खत्म करके इनकी जगह स्कूलों की पढ़ाई को ही दुरुस्त करने, उसका स्तर सुधारने पर महत्व दिया जाना चाहिए। शिक्षा को लोगों की पहुंच के भीतर बनाया जाना चाहिए। शिक्षा के अधिकार की बात करने वाली सरकार को शिक्षा तंत्र में फैल रही इस सामाजिक, आर्थिक, असमानता पर अपनी बेहोशी तोडऩा चाहिए। जब आईआईटी जैसे संस्थानों के बड़े शिक्षक तक प्रवेश परीक्षाओं में नकल करवाने लगें तो यह मौका सरकार के नींद से जागकर यह सोचने का है कि वह जैसी शिक्षा व्यवस्था खड़ी कर रही है, उसकी जरूरत किसे है?
जब भी प्रधानमंत्री से महंगी शिक्षा की बात की जाती है, वह कह देते हंै कि देश में पगारें बढ़ी हंै, तो लोग कर्ज लेकर पढें़, लेकिन जहां गरीबी 40 फीसदी बढ़ चुकी है वहां गरीब को कर्ज कौन सी बैंक देगा यह भी उन्हें बताना चाहिए। क्या अब कर्ज लेकर आत्महत्या कर रहे किसानों की तरह हम कर्ज लेकर आत्महत्या करने वाले मां-बाप भी देखेंगे? पहले शिक्षा महंगी की जाए, फिर शिक्षा संस्थानों में प्रवेश के नियम ऐसे बना दिए जाएं कि ताकतवर ही उनमें जा सके, आम जनता के लिए उनके दरवाजे बंद ही रहे , ऐसी नीतियां बंद होनी चाहिए। आगे बढऩे के लिए, गरीबी से उठने के लिए, जीवन स्तर सुधारने के लिए जनता को सरकार की दया नहीं, ठीक-ठाक सस्ती शिक्षा का अधिकार चाहिए। अगर वह भी सरकार नहीं दे सकती तो नक्सलवाद के जंगलों से निकलकर राजधानी पहुंचने में अब बहुत देर नहीं है।
छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ हफ्तों में पीएमटी दो बार रद्द हो गई क्योंकि पहली बार तो उसके पर्चे फूटे और दूसरी बार एक गिरोह ने छत्तीसगढ़ के इम्तहान-इतिहास में सबसे बड़ा संगठित अपराध करते हुए फोड़े गए पर्चों के आधार पर पांच-पांच, दस-दस लाख रुपए में एक-एक छात्र-छात्रा को पीएमटी की तैयारी करवाई। इस अपराध से पूरे प्रदेश के लोगों में इम्तहान पर से भरोसा पूरी तरह हिल गया है। उन लाखों बच्चों की सोचें जो स्कूल के आखिरी दो बरस सिर्फ ऐसे इम्तहानों की तैयारी में लगा देते हैं कि इसके बाद वे किसी अच्छे कॉलेज में जा सकें। बार-बार इम्तहान रद्द होने के बाद अगर कोई इम्तहान आगे बिना पर्चे फूटे भी निपटेगी, तो उस पर भरोसा किसका रहेगा?
छत्तीसगढ़ का यह अपराध अपने-आपमें भयानक है और जनता का विश्वास इससे स्कूल-कॉलेज की परीक्षाओं पर से बुरी तरह, और शायद पूरी तरह हिल गया है। इसकी जांच के बाद तो इसके लिए जिसको भी सजा हो वह अलग बात है, लेकिन सोचने की बात यह है कि ऐसे बड़े भांडाफोड़ के बिना दबे-छुपे ऐसे कितना कुछ होता होगा जिससे कि समाज के कमजोर तबके के हक, ताकतवर तबकों के लोग अपने बच्चों के लिए खरीद लेते होंगे। हम इसीलिए बार-बार पढ़ाई की परीक्षा पर जोर देते हैं और प्रवेश की परीक्षा के खिलाफ रहते हैं। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने पीएमटी, पीईटी को खत्म करने का फैसला लिया था लेकिन उससे सैद्धांतिक रूप से गरीबों का भला हो पाता और व्यवहारिक रूप से ताकतवर तबके की महंगी कोचिंग पाने की ताकत बिना इस्तेमाल रह जाती इसलिए उसे अदालत तक जाकर खारिज करवा दिया गया। हमारा यह साफ मानना है कि तमाम किस्म की प्रवेश परीक्षाएं इस देश में गरीब बच्चों और पैसे वाले बच्चों के बीच एक खाई खोद देती हैं।
ऐसे समय जब देश में इंजीनियरिंग की हजारों सीटें साल दर साल खाली पड़ी रह रही हैं, इंजीनियरिंग संस्थानों के लिए प्रवेश परीक्षाएं आयोजित करके एक नए किस्म के बाजार खड़े करना और पहले से ही पहुंच के बाहर होती जा रही शिक्षा व्यवस्था में जैसे तैसे अपने बच्चों को पढ़ा पा रहे माता-पिता पर और बोझ डालना सरकार की ऐसी नीति है, जिससे उसकी जनता के प्रति, शिक्षा के प्रति असंवेदनशीलता पता चलती है। प्रवेश परीक्षाओं के लिए बच्चे कोटा में दो-दो साल तक कोचिंग संस्थाओं में कोचिंग लेते हंै। उन्हें ये संस्थान अपने ही फर्जी स्कूलों में दर्ज करवाकर उन्हें 11वीं 12वीं की फर्जी हाजिरी दिलवाकर दो साल तक बस आईआईटी-जेईई में कामयाब होने के लिए तैयार करते हंै, लेकिन देश में ऐसे मौके पाने वाले बच्चों का अनुपात कितना है? प्रवेश परीक्षाएं, कोचिंग संस्थानों का बाजार खड़ा करती हंै जो देश के लगभग तमाम बच्चों की पहुंच के बाहर होता है। यह व्यवस्था शिक्षा में समान अवसरों की संभावना खत्म कर देती है। यह सब सरकार की नाक के नीचे उसकी नजरों के सामने हो रहा है, उसके अपने किए हो रहा है। देश के 99 फीसदी बच्चे जब सरकार की ऐसी नीति का शिकार हों, तो देश में नक्सलवाद न पनपे, तो और क्या हो? प्रवेश परीक्षाएं आयोजित करके सरकार क्या हासिल कर लेती है यह गौर करने की बात है। प्रवेश परीक्षाएं, स्कूलों में ली जाने वाली उन परीक्षाओं की अहमियत खत्म कर देती हैं,जो विद्यार्थियों के विषय विशेष में ज्ञान की परख के लिए ली जाती हंै। इन परीक्षाओं के लिए दसवीं के बाद से ही शुरू हो जाने वाली इस दौड़ के कारण बच्चे कच्ची उम्र से ही इस दौड़ में महंगे जूते और ट्रैक सूट पहनकर दौड़ सकने वाले विद्यार्थियों, सामान्य जूते पहनकर दौडऩे वालों, नंगे पैर दौडऩे वालों और किनारे खड़े होकर देखने वाले बेबस विद्यार्थियों में बंट जाते हंै। उनके बीच अपने साथ अन्याय होने का अहसास एक आग की तरह सुलगने लगता है, ऐसी व्यवस्था के प्रति हिकारत पैदा होने लगती है जो उन्हें, उनके किसी कुसूर के बिना पीछे धकेल देती है। मु_ी भर आईआईटियन देश के लिए जितने फायदेमंद नहीं हैं उससे कई गुना खतरनाक हताश विद्यार्थियों की यह फौज है जिसे कभी भी, कहीं भी, व्यवस्था के खिलाफ पत्थर उठाने के लिए आसानी से बरगलाया जा सकता है। फिर सरकार उससे निपटने के लिए नक्सल जैसे मोर्चो पर वह सब खर्च करती है जिसे अन्य विकास पर खर्च कर समाज को बहुत ऊपर उठाया जा सकता था। यह सोचें कि आज बस्तर जैसे कुछ दर्जन जो मोर्चे देश में हैं वे अगर शहर-शहर तक खुल जाएं तो क्या होगा? सिर्फ कुलीन तबके के विकास की यह कैसी सरकारी-लोकतांत्रिक चिंता है? ये परीक्षाएं लेकर 11वीं और 12वींं कक्षा में की जानी वाली स्कूली पढ़ाई को ही अप्रसांगिक बन देना हो तो स्कूलों में 11वीं 12 वीं की कक्षाएं चलाने की ही क्या जरूरत है?
अभी कुछ ही महीने हुए है जब देश ने देखा था कि तकनीकी और व्यवसायिक शिक्षा के बाप बने बैठे लोग किस तरह मेडिकल शिक्षा में सीटों की संख्या कम रखकर स्नातकोत्तर पढ़ाई की सीटें करोड़ों रुपयों में बेचते थे। उस व्यवस्था में कोई आम भारतीय एमडी और एमएस करने का खयाल भी नहीं कर सकता था। बरसों सरकार की नाक के नीचे यह सब चला। अवसरों की यह असमानता खड़ी की जाती है, उसे भुनाया जाता है, समाज को बांटा जाता है, समाज के भीतर गुस्से की आग सुलगाई जाती है, और सरकारें चुपचाप देखती रहती हंै। अभी कुछ ही दिन पहले पढ़ा था कि किस तरह पीएमटी और आईआईटी कोचिंग के संस्थान प्रतिभाशाली विद्यार्थियों का उनके माता-पिता के साथ सौदा करते हंै, ताकि उनका नाम इस्तेमाल कर सकें। ऐसी शिक्षा व्यवस्था में बच्चों को छोटी उम्र से ही पीस डालने, उन्हें नम्बर, पैसों के लिए दौड़ाने की जिम्मेदार ये प्रवेश परीक्षाएं ही हैं। इनके लिए खड़े किए जा रहे महंगे कोचिंग संस्थानों की असलियत बिहार के सुपर-30 की कामयाबी से खुल जाती है, जहां सिर्फ गरीब बच्चों को आईआईटी प्रवेश परीक्षा के लिए तैयार किया जाता है, और देश के किसी भी कोचिंग संस्थान के प्रदर्शन को यह प्रयोग बरसों से टक्कर दे रहा है।
फिर क्यों जनता भी इन सरकारों को खारिज न करे? आज तक जंगल में रह रहे लोग विकास से अछूते थे इसलिए नक्सलवाद जंगलों में पनपा, लेकिन अब शहरों में असमानता और हताशा की खेती जिस तरह खड़ी हो रही है, ताज्जुब नहीं कि नक्सलवाद शहरों में कॉलेजों और स्कूलों तक पहुंच जाए। सरकार जिन संस्थानों को उत्कृष्टता के केंद्र मानती है, जिन पर फख्र करती है, उनके दरवाजे तक भी पहुंचने से महरूम रह जा रही जनता ऐसे लोकतंत्र पर भरोसा क्यों करे, जो इन सरकारों को उनके भविष्य के साथ ऐसा खिलवाड़ करने की छूट देता है।
इन प्रवेश परीक्षाओं को खत्म करके इनकी जगह स्कूलों की पढ़ाई को ही दुरुस्त करने, उसका स्तर सुधारने पर महत्व दिया जाना चाहिए। शिक्षा को लोगों की पहुंच के भीतर बनाया जाना चाहिए। शिक्षा के अधिकार की बात करने वाली सरकार को शिक्षा तंत्र में फैल रही इस सामाजिक, आर्थिक, असमानता पर अपनी बेहोशी तोडऩा चाहिए। जब आईआईटी जैसे संस्थानों के बड़े शिक्षक तक प्रवेश परीक्षाओं में नकल करवाने लगें तो यह मौका सरकार के नींद से जागकर यह सोचने का है कि वह जैसी शिक्षा व्यवस्था खड़ी कर रही है, उसकी जरूरत किसे है?
जब भी प्रधानमंत्री से महंगी शिक्षा की बात की जाती है, वह कह देते हंै कि देश में पगारें बढ़ी हंै, तो लोग कर्ज लेकर पढें़, लेकिन जहां गरीबी 40 फीसदी बढ़ चुकी है वहां गरीब को कर्ज कौन सी बैंक देगा यह भी उन्हें बताना चाहिए। क्या अब कर्ज लेकर आत्महत्या कर रहे किसानों की तरह हम कर्ज लेकर आत्महत्या करने वाले मां-बाप भी देखेंगे? पहले शिक्षा महंगी की जाए, फिर शिक्षा संस्थानों में प्रवेश के नियम ऐसे बना दिए जाएं कि ताकतवर ही उनमें जा सके, आम जनता के लिए उनके दरवाजे बंद ही रहे , ऐसी नीतियां बंद होनी चाहिए। आगे बढऩे के लिए, गरीबी से उठने के लिए, जीवन स्तर सुधारने के लिए जनता को सरकार की दया नहीं, ठीक-ठाक सस्ती शिक्षा का अधिकार चाहिए। अगर वह भी सरकार नहीं दे सकती तो नक्सलवाद के जंगलों से निकलकर राजधानी पहुंचने में अब बहुत देर नहीं है।
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