19 जून
बच्चों को पारिवारिक देखरेख देने वाली एक संस्था एसओएस चिल्ड्रंस विलेज़ेस ऑफ इंडिया के बच्चों के हालात पर किए गए ताजा अध्ययन के नतीजे गौर करने के लायक हंै। ऐसे देश में जिसकी 48 फीसदी आबादी बच्चे हंै, माता-पिता के देखरेख और सहारा गंवा देने के खतरे में जी रहे बच्चों की तादद 27 फीसदी है। वह बहुत कमज़ोर हालत में है। देश के पूर्वी इलाके में यह स्थिति ज्यादा खराब है। उड़ीसा, बिहार या झारखंड के बच्चे को भारत के किसी भी दूसरे हिस्से मे रह रहे बच्चे के मुकाबले माता-पिता की देखरेख और सहारा खोने का ज्यादा डर है। अध्ययन ने देश के 100 जिलों को ऐसा पाया जहां के बच्चे ऐसी कमजोर हालत में हैं और इनमें से 62 जिले इस पूर्वी पट्टे में हैं जो बिहार झारखंड, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में मौजूद हैं। अध्ययन कहता है कि इस पूर्वी क्षेत्र में देश के सबसे ज्यादा कमजोर बच्चों का 38.28 फीसदी होता है, जबकि मध्य क्षेत्र में ऐसे 32.13 फीसदी और पश्चिम क्षेत्र में 21.03 फीसदी बच्चे रहते हंै। अध्ययन के मुताबिक भारत में कमजोर बच्चों की तादाद 11 करोड़ है जो देश की 18 साल से कम उम्र की आबादी का 27 फीसदी है। यह एक डरावना आंकड़ा है। यह वह बच्चे हंै जो गरीबी सामाजिक अशांति, एचआईवी, एड्स ,विकलांगता और अन्य कारणों से अपने माता-पिता गंवाने का खतरा झेल रहे हैं। इस अध्ययन में यह भी पाया गया कि बच्चे जैसे-जैसे 14-15 साल की उम्र के करीब पहुंचते हंै उन्हें मिलने वाली माता-पिता की देखरेख, और सहारे में कमी आती जाती है। आबादी कम करने के तरीके अपनाकर देश पैदा होने वाले बच्चों की तादाद तो कम कर रहा है, लेकिन कमजोर बच्चों की तादाद बढ़ती ही जा रही है। देश में बच्चों की हालत कैसी है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि भारत में दुनिया में सबसे ज्यादा बाल मजदूर हैं, यहां एक करोड़ बच्चे रोज सड़क पर भूखे असुरक्षित सोते हंै, भारत दुनिया के एक तिहाई गरीब बच्चों का घर है। देश के 10 हजार बच्चे रोज ऐसी बीमारियों से मर जाते हंै जिनका इलाज आसानी से हो सकता है।
ऐसा नहीं है कि भारत सरकार को बच्चों की कोई फिक्र नहीं है। उसने बच्चों के लिए एक राष्ट्रीय नीति बना रखी है जो कहती है कि सरकार बच्चे के पैदा होने के पहले और उसके बाद, उसके शारीरिक मानसिक और सामाजिक विकास के लिए सभी जरूरी सेवाएं प्रदान करेगी। ऐसा नहीं है कि सरकार इस नीति पर अमल नहीं करती। दुनिया का सबसे बड़ा पोषण कार्यक्रम मध्यान्ह भोजन देश में चल रहा है लेकिन समाज कल्याण की तमाम योजनाओं की तरह बाल कल्याण कार्यक्रमों की हालत भी खस्ता है। समाज और बाल कल्याण योजनाओं पर अमल का हाल इस बात से पता चलता है कि मध्यप्रदेश में इस विभाग के आला अफसर, और उनके पति ढाई सौ करोड़ से भी ज्यादा के आसामी निकले। अच्छी योजनाएं बना देने भर से सरकार बच्चों के प्रति अपनी जिम्मेदारी से बरी नहीं हो जाती। इन योजनाओं पर सही अमल की जिम्मेदरी कौन उठाएगा? सही अमल का इंतज़ाम किए बिना, अमल की जवाबदेही तय किए बिना, ऐसी योजनाएं बनाकर सामने रखना, उनके लिए करदाता से वसूला गया धन खर्च करना, देश के साथ एक धोखा है, जिसकी कसूरवार तमाम सरकारें हैं। लेकिन सरकारों के इस प्रशासनिक निकम्मेपन का शिकार देश का भविष्य हो रहा है यह समझने की गंभीरता कोई नहीं दिखाता, खुद जनता भी नहीं जिसे यह अधिकार हक से मांगने चाहिए। इसकी एक वजह बच्चों के प्रति हमारा एक आम नजरिया भी है। सम्पन्न और बच्चों की देखभाल कर सकने में समर्थ घरों में बच्चे के पैदा होते ही उसके नाज़ुक कंधों पर बड़ी भारी उम्मीदों का बोझ लदना शुरू कर दिया जाता है- खानदान का नाम रौशन करना, माता-पिता की अधूरी महत्वाकांक्षाएं पूरी करना, खुद को दूसरों से बेहतर साबित करने की उनकी दौड़ में एक घोड़े की तरह जुत जाना, जन्मते ही उनकी तकदीर बन जाती है। अपने आसपास अगर हम गौर करें तो पाएंगे कि छोटे-छोटे मासूम बच्चे अपने माता-पिता की शान के तमगे बनाने के लिए तेजाब से घिसे जाते हंै उनकी दुश्वारियां गरीब परिवारों के बच्चों की दुश्वारियों के मुकाबले कुछ नहीं, यह सही है, लेकिन अपने बच्चों को पाल पोस सकने लायक वर्ग में भी बच्चों का बड़ा हिस्सा ऐसी परिस्थितियों में जीता जरूर है, जिसमें उसे नहीं डाला जाना चाहिए। इस तबके में बच्चे परिवार का, देश का, भविष्य तो होते हंै, लेकिन उन्हें उनके माता-पिता किसी फूल की तरह खिलने देने का मौका दिए बिना, उनके नाजुक कोमल बचपन को लोहे के तारों से तोड़-मरोड़कर किसी बोंज़ाई की तरह बड़ा करते हंै ताकि बड़ा होने पर वह उसे अपने ड्रॉइंगरूम में सजाकर सबको फख्र से दिखा सकें। उन्हें प्यार दुलार मिलता है, लेकिन सशर्त। भले एसओएस के नजरिये से वह देखभाल या सहारा खोने के डर में जीत बच्चों में शुमार नहीं, लेकिन उन्हें मिल रही इस तरह की सशर्त देखभाल और सहारा भी डरावनी है।
इनके उल्टे गरीब परिवारों के बच्चे हंै जिन्हें परिवार पर बोझ नहीं, परिवार की सम्पत्ति माना जाता है। क्योंकि कि उगकर खड़े होने के साथ ही वह अपने माता-पिता की जिम्मेदारियों का बोझ उठाने लगते हैं। उनके माता-पिता के पास यह सोचने का वक्त और सुविधा ही नहीं होती कि बच्चों के कुछ अधिकार होते हंै जो उन्हें मिलने चाहिए, उनके कुछ सपने होते हंै जो पूरे होने चाहिए। इस वर्ग में बच्चे 14-15 साल के होते तक समय से पहले ही वयस्क हुए मान लिए जाते हंै। उन्हें बच्चों को जो प्यार-दुलार मिलना चाहिए वह नहीं मिलता। ऐसे माता-पिता के प्यार देखभाल को तरसे बच्चों को बरगलाने के लिए, उन्हें भीख, यौन शोषण और अपराधों में जोतने के लिए उन पर झपटने वाले गिद्ध, समाज में हर कहीं,हर शक्ल में मिल जाते हैं और राष्ट्रीय बाल नीति में बच्चों के हर उम्र में शारीरिक, मानसिक और सामजिक विकास की जिम्मेदारी लेने वाले सरकार हाशिए पर खड़ी देखती रहती है। उसके द्वारा इन बच्चों के लिए बनाए गए गृहों में बाल यौन शोषण की खबरें, रहने की खराब परिस्थितियों और इनसे घबराकर बच्चों के गाहे-बगाहे भाग जाने की खबरें आम होती हैं ,जबकि इन गृहों से परे सड़कों पर रहने वाले बच्चों को अपराध की दुनिया में धकेलने में पुलिस जाने अनजाने अहम भूमिका अदा करती है। रायपुर मे रेल्वे स्टेशन पर हमने देखा है कि पुलिस घर से भागे, सड़क पर, प्लेटफार्म पर जीते इन बच्चों को अपराधियों का औजार बनने पर मजबूर करती है। अगर समाज सेवी संगठन इन्हें यहां से हटाकर इन्हें सुधारकर इनके घर वापस भी भेजना चाहें तो इनके माता-पिता इन्हें इस डर से वापस नहीं लेते, कि इनकी सोहबत में दूसरे बच्चे बिगड़ जाएंगे। देश के नौनिहालों के लिए इतने खतरनाक और निराशाजनक माहौल में हम 8 फीसदी की विकासदर से दौड़ रहे हंै, यह देखे बिना कि कड़कड़ाते नोट थामने के लालच में इन बच्चों की कोमल अंगुलियां हमारे हाथों से कब फिसल जा रही हंै, हमें होश भी नहीं है। कब और कैसे यह कोमल हाथ अपराध की कंटीली बाड़ों से लहूलुहान हो रहे हंै, मुड़कर यह देखने का हमारे पास न वक्त है, न इच्छा।
बच्चे केवल माता-पिता की जिम्मेदारी नहीं होते वह पूरे समाज की जिम्मेदारी होते हैं। इसी तरह बच्चों की भलाई केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं होती। इसके लिए एक नागरिक के तौर पर हर हिन्दुस्तानी को जागने की जरूरत है। बच्चे और उनके माता-पिता जिस एक जगह बड़ी संख्या में जुटते हैं वह है स्कूल, इसलिए बच्चों के प्रति माता-पिता के नजरिए को स्कूलों में दिशा दी जा सकती है। सरकारी स्कूल बहुत से अभावों से जूझ रहे हंै, यह सच है, लेकिन यह एक आपातकालीन स्थिति है, जिससे डरने की जरूरत है, इससे मुंह नहीं चुराया जा सकता। बच्चों के प्रति एक संतुलित नजरिया विकसित करने, उनके साथ प्यार और जिम्मेदारी से बरतने के लिए माता-पिता, घर वालों और प्रशासन को तैयार करना उन्हें इस काम से लगाना एक ऐसा काम है, जिसे अनदेखा करने के बहुत गंभीर नतीजे सामने आएंगे। इस तरह से बड़े हो रहे यह 27 फीसदी बच्चों में से कल को अगर अपराधियों की फौज खड़ी हो, तो उससे आपातकाल के स्तर पर निपटना ही पड़ेगा, समय और संसाधन खर्च करने ही पडेंग़े, लेकिन तब ऐसा कर के भी हम इन बच्चों का बिगड़ा हुआ मुकद्दर संवार नहीं सकेंगे। उसकी जगह आज इस दिशा में निवेश करने से भविष्य में अपरधियों, मानसिकरूप से रोगी, हताश लोगों की फौज खड़ी करने के खतरे से हम निपट सकेंगे। दुख की बात यह है कि आज देश में बच्चों के लिए सरकार अगर कोई भी गंभीरता दिखा रही है तो वह इसलिए नहीं कि उसे देश के भविष्य की चिंता है, बल्कि इसलिए कि उसे सहस्त्राब्दि लक्ष्य हासिल करने हैं। क्योंकि अगर यह न हुआ, तो अंतरराष्ट्रीय मदद मिलने में दिक्कत होगी। ठीक वैसे ही जैसे सड़क बनाने के लिए आर्थिक मदद देने के पहले सरकार राज्यों पर शर्त लगा रही है, कि वह अपनी जनता से जलकर वसूले। माता-पिता की देखभाल, और उनका सहारा बच्चों का हक है, उनके सामाजिक मानसिक और शारीरिक विकास की जरूरत है। यह उन्हें किसी शर्त के साथ नहीं, उनके अधिकार के रूप में, बेरोकटोक मिलनी चाहिए। एसओएस की रिपोर्ट एक समाज के रूप में हमें जगाने के लिए एक सायरन की तरह है कि हम अपनी बेहोशी से जागें, अपने घर , पड़ोस सब कहीं में बच्चों के साथ सही तरीके से बरतें, बच्चों के लिए चल रही योजनाओं की जानकारी जुटाकर उन पर नजर रखें, सामाजिक संगठनों को इसमे मदद करें, सरकार को भी सरकारी योजनाओं की निगरनी के लिए जनता की भागीदारी बढ़ाने की जरूरत है। गरीबी निवारण कार्यक्रमों में बच्चों को पेश इस खतरे पर भी गौर किया जाए। हमने पीडीएस जैसे कार्यक्रम में देखा है कि जो कार्यक्रम देश में भ्रष्टाचार और अक्षमता का पर्याय माना जाता था, आज भी अधिकांश राज्यों में माना जाता है, छत्तीसगढ़ सरकार ने राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाकर उसे एक पूरी तरह कामयाब कार्यक्रम बनाने की मिसाल खड़ी की है। सरकार में इच्छाशक्ति होने से कोई भी काम नामुमकिन नहीं होता, अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति से एक काम हो सकता है तो दूसरे काम भी हो सकते हंै। देश के भविष्य के लिए सरकारों को यह इच्छाशक्ति दिखानी ही चाहिए।
बच्चों को पारिवारिक देखरेख देने वाली एक संस्था एसओएस चिल्ड्रंस विलेज़ेस ऑफ इंडिया के बच्चों के हालात पर किए गए ताजा अध्ययन के नतीजे गौर करने के लायक हंै। ऐसे देश में जिसकी 48 फीसदी आबादी बच्चे हंै, माता-पिता के देखरेख और सहारा गंवा देने के खतरे में जी रहे बच्चों की तादद 27 फीसदी है। वह बहुत कमज़ोर हालत में है। देश के पूर्वी इलाके में यह स्थिति ज्यादा खराब है। उड़ीसा, बिहार या झारखंड के बच्चे को भारत के किसी भी दूसरे हिस्से मे रह रहे बच्चे के मुकाबले माता-पिता की देखरेख और सहारा खोने का ज्यादा डर है। अध्ययन ने देश के 100 जिलों को ऐसा पाया जहां के बच्चे ऐसी कमजोर हालत में हैं और इनमें से 62 जिले इस पूर्वी पट्टे में हैं जो बिहार झारखंड, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में मौजूद हैं। अध्ययन कहता है कि इस पूर्वी क्षेत्र में देश के सबसे ज्यादा कमजोर बच्चों का 38.28 फीसदी होता है, जबकि मध्य क्षेत्र में ऐसे 32.13 फीसदी और पश्चिम क्षेत्र में 21.03 फीसदी बच्चे रहते हंै। अध्ययन के मुताबिक भारत में कमजोर बच्चों की तादाद 11 करोड़ है जो देश की 18 साल से कम उम्र की आबादी का 27 फीसदी है। यह एक डरावना आंकड़ा है। यह वह बच्चे हंै जो गरीबी सामाजिक अशांति, एचआईवी, एड्स ,विकलांगता और अन्य कारणों से अपने माता-पिता गंवाने का खतरा झेल रहे हैं। इस अध्ययन में यह भी पाया गया कि बच्चे जैसे-जैसे 14-15 साल की उम्र के करीब पहुंचते हंै उन्हें मिलने वाली माता-पिता की देखरेख, और सहारे में कमी आती जाती है। आबादी कम करने के तरीके अपनाकर देश पैदा होने वाले बच्चों की तादाद तो कम कर रहा है, लेकिन कमजोर बच्चों की तादाद बढ़ती ही जा रही है। देश में बच्चों की हालत कैसी है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि भारत में दुनिया में सबसे ज्यादा बाल मजदूर हैं, यहां एक करोड़ बच्चे रोज सड़क पर भूखे असुरक्षित सोते हंै, भारत दुनिया के एक तिहाई गरीब बच्चों का घर है। देश के 10 हजार बच्चे रोज ऐसी बीमारियों से मर जाते हंै जिनका इलाज आसानी से हो सकता है।
ऐसा नहीं है कि भारत सरकार को बच्चों की कोई फिक्र नहीं है। उसने बच्चों के लिए एक राष्ट्रीय नीति बना रखी है जो कहती है कि सरकार बच्चे के पैदा होने के पहले और उसके बाद, उसके शारीरिक मानसिक और सामाजिक विकास के लिए सभी जरूरी सेवाएं प्रदान करेगी। ऐसा नहीं है कि सरकार इस नीति पर अमल नहीं करती। दुनिया का सबसे बड़ा पोषण कार्यक्रम मध्यान्ह भोजन देश में चल रहा है लेकिन समाज कल्याण की तमाम योजनाओं की तरह बाल कल्याण कार्यक्रमों की हालत भी खस्ता है। समाज और बाल कल्याण योजनाओं पर अमल का हाल इस बात से पता चलता है कि मध्यप्रदेश में इस विभाग के आला अफसर, और उनके पति ढाई सौ करोड़ से भी ज्यादा के आसामी निकले। अच्छी योजनाएं बना देने भर से सरकार बच्चों के प्रति अपनी जिम्मेदारी से बरी नहीं हो जाती। इन योजनाओं पर सही अमल की जिम्मेदरी कौन उठाएगा? सही अमल का इंतज़ाम किए बिना, अमल की जवाबदेही तय किए बिना, ऐसी योजनाएं बनाकर सामने रखना, उनके लिए करदाता से वसूला गया धन खर्च करना, देश के साथ एक धोखा है, जिसकी कसूरवार तमाम सरकारें हैं। लेकिन सरकारों के इस प्रशासनिक निकम्मेपन का शिकार देश का भविष्य हो रहा है यह समझने की गंभीरता कोई नहीं दिखाता, खुद जनता भी नहीं जिसे यह अधिकार हक से मांगने चाहिए। इसकी एक वजह बच्चों के प्रति हमारा एक आम नजरिया भी है। सम्पन्न और बच्चों की देखभाल कर सकने में समर्थ घरों में बच्चे के पैदा होते ही उसके नाज़ुक कंधों पर बड़ी भारी उम्मीदों का बोझ लदना शुरू कर दिया जाता है- खानदान का नाम रौशन करना, माता-पिता की अधूरी महत्वाकांक्षाएं पूरी करना, खुद को दूसरों से बेहतर साबित करने की उनकी दौड़ में एक घोड़े की तरह जुत जाना, जन्मते ही उनकी तकदीर बन जाती है। अपने आसपास अगर हम गौर करें तो पाएंगे कि छोटे-छोटे मासूम बच्चे अपने माता-पिता की शान के तमगे बनाने के लिए तेजाब से घिसे जाते हंै उनकी दुश्वारियां गरीब परिवारों के बच्चों की दुश्वारियों के मुकाबले कुछ नहीं, यह सही है, लेकिन अपने बच्चों को पाल पोस सकने लायक वर्ग में भी बच्चों का बड़ा हिस्सा ऐसी परिस्थितियों में जीता जरूर है, जिसमें उसे नहीं डाला जाना चाहिए। इस तबके में बच्चे परिवार का, देश का, भविष्य तो होते हंै, लेकिन उन्हें उनके माता-पिता किसी फूल की तरह खिलने देने का मौका दिए बिना, उनके नाजुक कोमल बचपन को लोहे के तारों से तोड़-मरोड़कर किसी बोंज़ाई की तरह बड़ा करते हंै ताकि बड़ा होने पर वह उसे अपने ड्रॉइंगरूम में सजाकर सबको फख्र से दिखा सकें। उन्हें प्यार दुलार मिलता है, लेकिन सशर्त। भले एसओएस के नजरिये से वह देखभाल या सहारा खोने के डर में जीत बच्चों में शुमार नहीं, लेकिन उन्हें मिल रही इस तरह की सशर्त देखभाल और सहारा भी डरावनी है।
इनके उल्टे गरीब परिवारों के बच्चे हंै जिन्हें परिवार पर बोझ नहीं, परिवार की सम्पत्ति माना जाता है। क्योंकि कि उगकर खड़े होने के साथ ही वह अपने माता-पिता की जिम्मेदारियों का बोझ उठाने लगते हैं। उनके माता-पिता के पास यह सोचने का वक्त और सुविधा ही नहीं होती कि बच्चों के कुछ अधिकार होते हंै जो उन्हें मिलने चाहिए, उनके कुछ सपने होते हंै जो पूरे होने चाहिए। इस वर्ग में बच्चे 14-15 साल के होते तक समय से पहले ही वयस्क हुए मान लिए जाते हंै। उन्हें बच्चों को जो प्यार-दुलार मिलना चाहिए वह नहीं मिलता। ऐसे माता-पिता के प्यार देखभाल को तरसे बच्चों को बरगलाने के लिए, उन्हें भीख, यौन शोषण और अपराधों में जोतने के लिए उन पर झपटने वाले गिद्ध, समाज में हर कहीं,हर शक्ल में मिल जाते हैं और राष्ट्रीय बाल नीति में बच्चों के हर उम्र में शारीरिक, मानसिक और सामजिक विकास की जिम्मेदारी लेने वाले सरकार हाशिए पर खड़ी देखती रहती है। उसके द्वारा इन बच्चों के लिए बनाए गए गृहों में बाल यौन शोषण की खबरें, रहने की खराब परिस्थितियों और इनसे घबराकर बच्चों के गाहे-बगाहे भाग जाने की खबरें आम होती हैं ,जबकि इन गृहों से परे सड़कों पर रहने वाले बच्चों को अपराध की दुनिया में धकेलने में पुलिस जाने अनजाने अहम भूमिका अदा करती है। रायपुर मे रेल्वे स्टेशन पर हमने देखा है कि पुलिस घर से भागे, सड़क पर, प्लेटफार्म पर जीते इन बच्चों को अपराधियों का औजार बनने पर मजबूर करती है। अगर समाज सेवी संगठन इन्हें यहां से हटाकर इन्हें सुधारकर इनके घर वापस भी भेजना चाहें तो इनके माता-पिता इन्हें इस डर से वापस नहीं लेते, कि इनकी सोहबत में दूसरे बच्चे बिगड़ जाएंगे। देश के नौनिहालों के लिए इतने खतरनाक और निराशाजनक माहौल में हम 8 फीसदी की विकासदर से दौड़ रहे हंै, यह देखे बिना कि कड़कड़ाते नोट थामने के लालच में इन बच्चों की कोमल अंगुलियां हमारे हाथों से कब फिसल जा रही हंै, हमें होश भी नहीं है। कब और कैसे यह कोमल हाथ अपराध की कंटीली बाड़ों से लहूलुहान हो रहे हंै, मुड़कर यह देखने का हमारे पास न वक्त है, न इच्छा।
बच्चे केवल माता-पिता की जिम्मेदारी नहीं होते वह पूरे समाज की जिम्मेदारी होते हैं। इसी तरह बच्चों की भलाई केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं होती। इसके लिए एक नागरिक के तौर पर हर हिन्दुस्तानी को जागने की जरूरत है। बच्चे और उनके माता-पिता जिस एक जगह बड़ी संख्या में जुटते हैं वह है स्कूल, इसलिए बच्चों के प्रति माता-पिता के नजरिए को स्कूलों में दिशा दी जा सकती है। सरकारी स्कूल बहुत से अभावों से जूझ रहे हंै, यह सच है, लेकिन यह एक आपातकालीन स्थिति है, जिससे डरने की जरूरत है, इससे मुंह नहीं चुराया जा सकता। बच्चों के प्रति एक संतुलित नजरिया विकसित करने, उनके साथ प्यार और जिम्मेदारी से बरतने के लिए माता-पिता, घर वालों और प्रशासन को तैयार करना उन्हें इस काम से लगाना एक ऐसा काम है, जिसे अनदेखा करने के बहुत गंभीर नतीजे सामने आएंगे। इस तरह से बड़े हो रहे यह 27 फीसदी बच्चों में से कल को अगर अपराधियों की फौज खड़ी हो, तो उससे आपातकाल के स्तर पर निपटना ही पड़ेगा, समय और संसाधन खर्च करने ही पडेंग़े, लेकिन तब ऐसा कर के भी हम इन बच्चों का बिगड़ा हुआ मुकद्दर संवार नहीं सकेंगे। उसकी जगह आज इस दिशा में निवेश करने से भविष्य में अपरधियों, मानसिकरूप से रोगी, हताश लोगों की फौज खड़ी करने के खतरे से हम निपट सकेंगे। दुख की बात यह है कि आज देश में बच्चों के लिए सरकार अगर कोई भी गंभीरता दिखा रही है तो वह इसलिए नहीं कि उसे देश के भविष्य की चिंता है, बल्कि इसलिए कि उसे सहस्त्राब्दि लक्ष्य हासिल करने हैं। क्योंकि अगर यह न हुआ, तो अंतरराष्ट्रीय मदद मिलने में दिक्कत होगी। ठीक वैसे ही जैसे सड़क बनाने के लिए आर्थिक मदद देने के पहले सरकार राज्यों पर शर्त लगा रही है, कि वह अपनी जनता से जलकर वसूले। माता-पिता की देखभाल, और उनका सहारा बच्चों का हक है, उनके सामाजिक मानसिक और शारीरिक विकास की जरूरत है। यह उन्हें किसी शर्त के साथ नहीं, उनके अधिकार के रूप में, बेरोकटोक मिलनी चाहिए। एसओएस की रिपोर्ट एक समाज के रूप में हमें जगाने के लिए एक सायरन की तरह है कि हम अपनी बेहोशी से जागें, अपने घर , पड़ोस सब कहीं में बच्चों के साथ सही तरीके से बरतें, बच्चों के लिए चल रही योजनाओं की जानकारी जुटाकर उन पर नजर रखें, सामाजिक संगठनों को इसमे मदद करें, सरकार को भी सरकारी योजनाओं की निगरनी के लिए जनता की भागीदारी बढ़ाने की जरूरत है। गरीबी निवारण कार्यक्रमों में बच्चों को पेश इस खतरे पर भी गौर किया जाए। हमने पीडीएस जैसे कार्यक्रम में देखा है कि जो कार्यक्रम देश में भ्रष्टाचार और अक्षमता का पर्याय माना जाता था, आज भी अधिकांश राज्यों में माना जाता है, छत्तीसगढ़ सरकार ने राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाकर उसे एक पूरी तरह कामयाब कार्यक्रम बनाने की मिसाल खड़ी की है। सरकार में इच्छाशक्ति होने से कोई भी काम नामुमकिन नहीं होता, अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति से एक काम हो सकता है तो दूसरे काम भी हो सकते हंै। देश के भविष्य के लिए सरकारों को यह इच्छाशक्ति दिखानी ही चाहिए।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें