16 मई


आने वाले दिन पता नहीं और कितने समझौतों के होंगे


संपादकीय
16 मई
संसद में एक पाठ्य पुस्तक के कार्टून को लेकर जिस तरह यूपीए सरकार दहशत में आकर अंबेडकरवादियों के सामने बिछ गई और पूरी की पूरी किताब को प्रतिबंधित करने की बात मान ली उसी का नतीजा था कि इन किताबों के लिए बनी चयन समिति के सदस्यों पर हमले हुए और देश भर में अब यह माहौल बना कि किसी धर्म या जाति का संगठन अगर धमकी देता है तो लोकतंत्र के भीतर की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सरकार कूड़ेदान में फेंक देगी। इस बारे में हमने कुछ विचारकों के लेख भी पिछले दिनों में इस अखबार के पहले पन्ने से छापे हैं ताकि लोगों को उस मुद्दे की बारीकियां समझ में आए। लेकिन आज की एक दूसरी खबर यह है कि देश के कंट्रोलर और ऑडिटर जनरल ने रेल भाड़े की वापिसी को लेकर कहा है कि सरकार को ऐसा करने के बजाए रेल के घाटे को भाड़े से पूरा करना चाहिए। लोगों को याद होगा कि कुछ हफ्ते पहले रेल बजट से नाराज होकर यूपीए सरकार की एक बड़ी भागीदार ममता बैनर्जी ने अपनी तृणमूल कांग्रेस के रेलमंत्री को हटा दिया था और अपने एक दूसरे सांसद के रेलमंत्री बनवाकर ही उन्होंने दम नहीं लिया बल्कि बढ़े हुए रेल भाड़े को हटवा भी दिया। रेल सुविधा जनता के लिए तो है लेकिन वह एक कारोबार भी है और सस्ती लोकप्रियता के लिए एक कारोबार को तबाह करने का नतीजा देश के बहुत से राज्यों में घाटे में आ गए बिजली विभागों में भी देखने मिलता है और भारतीय रेल भी उसी तरफ जा रही है। 
गठबंधन की सरकार के जो नुकसान सामने आ रहे हैं उनमें से एक यह है कि अलग-अलग क्षेत्रीय दलों की अलग-अलग सनक या प्राथमिकता के मुताबिक केन्द्र सरकार को समर्पण करना पड़ रहा है और देश के व्यापक और दीर्घकालीन नुकसान की कीमत पर भी कहीं आर्थिक नुकसान झेलना पड़ रहा है कहीं भ्रष्टाचार की तरफ आंख बंद करनी पड़ रही है और कहीं एक संकीर्णता को बढ़ावा देना पड़ रहा है। दलितों की नाराजगी से डरकर यूपीए सरकार ने जिस तरह से आधी सदी पुराने और अंबेडकर की जिंदगी में ही उनके सामने आ चुके एक निहायत मासूम और अच्छे कार्टून को हटाया है वह कट्टरता के सामने बुरी तरह से घुटने टेक देना है। एक तरफ महाराष्ट्र में ठाकरे कुनबा जिस तरह से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ लाठियां लेकर टूट पड़ता है, उसी तरह से कांग्रेस की लीडरशिप वाले यूपीए ने सरकार की कलम से पाठ्य पुस्तकों पर हमला करने का भरोसा दिलाया और दलितों की नाराजगी से यह पार्टी और यह सरकार बची। सरकार में इतना नैतिक साहस होना चाहिए कि वह नाजायज मांगों को मानने से इंकार कर सके। लेकिन अपने कुकर्मों से लदी हुई यूपीए सरकार और कांग्रेस पार्टी न तो आज ममता बैनर्जी को किसी बात के लिए मना कर सकती और न ही दलितों को नाराज कर सकती। 
देश एक किस्म से पीछे जा रहा है, धर्मान्ध और कट्टर पार्टियों से, सांप्रदायिक ताकतों से तो ऐसी उम्मीद की जाती है कि वे वैज्ञानिक सोच और प्रगतिशीलता के खिलाफ लोगों को गुदगुदाकर पिछली सदी में ले जाएं। लेकिन कांग्रेस पार्टी, एक वक्त की नेहरू की पार्टी, आज इस कदर दहशत में जी रही है, इस कदर समझौतापरस्त हो गई है कि उसके पास सही बातों के साथ खड़े रहने का हौसला भी नहीं है। एक कार्टून ने यह साबित कर दिया है कि इस सरकार और इस पार्टी की रीढ़ की हड्डी नीचे खिसक कर इसके घुटनों में आ गई है और आए दिन यह घुटनों पर दिखाई पड़ती है। पिछले दिनों इसी सरकार के आर्थिक सलाहकार ने कुछ बातें कहीं थीं जिनसे उपजी खबरों से यह तस्वीर बनी थी कि बचे कार्यकाल में यह सरकार कोई आर्थिक सुधार नहीं कर पाएगी। बाद में उन बातों की कुछ लीपापोती की गई। लेकिन यह बात साफ है कि यह कार्यकाल इसी तरह का गुजरने वाला है और देश के लिए यह बहुत ही महंगा भी पडऩे वाला है। पता नहीं आने वाले दिन केन्द्र सरकार और उसकी मुखिया पार्टी के और कितने किस्म के समझौतों के आएंगे। 

राजधानी में गोलीबारी


15 मई 2012
संपादकीय
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में बीती शाम जमीन के दो व्यापारियों पर बाजार के बीच गोलियों से हमला लोगों के बीच डर पैदा कर गया है। करीब दो बरस पहले एक हवाला व्यापारी का कत्ल करके अपराधी वहां से मोटी रकम लूटकर भागे थे। इस बीच जमीनों के व्यापार को लेकर रायपुर शहर में ही कई हत्याएं हुई हैं, शेयर बाजार में सैकड़ों करोड़ डुबवाने वाले फरार हैं, और जमीन-ईमारतों के कारोबार में सुपारी लेने-देने की चर्चा होते रहती है। दरअसल दो नंबर के धंधों में राज्य बनने के बाद से अब तक लगातार इतनी बढ़ोतरी हुई है कि मोटी कमाई के मुकाबले जान बहुत सस्ती साबित होने लगी है और भाड़े के हत्यारे तो ऐसी कमाई के एक-दो फीसदी दाम पर ही मिल जाते हैं। जहां पर जमीन के एक-एक सौदे से करोड़ों के नफे-नुकसान का रिश्ता हो, वहां पर कुछ लाख देकर अपहरण और हत्या उन लोगों को तो बिल्कुल भी महंगे नहीं लगते जो रात-दिन वैसे भी कई किस्म के कानून तोड़ते हैं।
कुल मिलाकर राजधानी की संपन्नता ने कालेधन के खेल को इतना बढ़ा दिया है कि रिश्वत, भ्रष्टाचार से लेकर जालसाजी तक हर किस्म के काम में बहुत से लोग लगे हुए हैं। कहीं कुछ अफसर, कहीं कुछ नेता और बहुत से गुंडे-मवाली जमीनों के काम में अपनी अलग-अलग किस्म की ताकत का खुलकर इस्तेमाल करते हैं और कल शहर के बीच घने इलाके में हुई गोलीबारी ऐसे ही किसी झगड़े की वजह से हुई हो सकती है, लेकिन मामले की असलियत जांच के बाद ही सामने आएगी इसलिए अभी इस बारे में पुख्ता तौर पर कुछ कहना मुश्किल है सिर्फ आसार ही बताए जा सकते हैं। जमीन का कारोबार राजधानी में सबसे बड़ी कमाई का जरिया भी है और सबसे बड़ी काली कमाई का जरिया भी है। इसमें छोटे-छोटे बहुत से लोग नुकसान भी झेलते हैं लेकिन माफिया के अंदाज में काम करने वाले जमीन के सौदागर आसमान तक पहुंचते लोगों ने देखे हैं। इसलिए जिस शहर या बाजार में इतना अधिक कालाधन तैर रहा हो, वहां पर पेशेवर अपराधी न आएं, या पेशेवर अपराधियों को लोग भाड़े पर न लें ऐसा नहीं हो सकता। जिस तरह गुड़ के साथ मक्खियां आती ही हैं, उसी तरह दो नंबर के धंधों के साथ जुर्म भी चले आते हैं।
इसलिए हम ऐसी वारदातों के बाद आनन-फानन आंदोलन की चर्चा करने को गलत मानते हैं। जांच के बाद जब यह साबित होता है कि हमलों के शिकार लोग किसी गलत सौदे की वजह से, या किसी जाती दुश्मनी की वजह से मुसीबत में फंसे हैं, तो उस वक्त तक आंदोलनों की वजह से शहर के गरीबों का बहुत बड़ा नुकसान हो चुका होता है। बाजार या राजनीतिक दल, जाति या धर्म के संगठन, इनकी ताकत के चलते हर जुर्म के बाद आंदोलन की बात होने लगती है। जिस हवाला कारोबार का जिक्र हमने किया है, उस कत्ल के बाद भी व्यापारियों ने आंदोलन छेड़ा था और शायद शहर बंद भी करवाया था। अब अगर दो नंबर के कारोबार में लगे लोग, बिना किसी सुरक्षा इंतजाम के ऐसा खतरनाक काम करते हैं, तो उनको कौन सी पुलिस बचा सकती है? इसलिए कल के हमले के बाद से आसपास के बहुत से लोग जो चर्चा कर रहे हैं कि एक-दो दिनों में ही हमलावर न पकड़े जाएं तो आंदोलन किया जाएगा, उसका विरोध होना चाहिए। बहुत से मामले ऐसे रहते हैं जिनमें पुलिस लंबे समय तक किसी अपराधी तक नहीं पहुंच पाती। इसलिए किसी तरह का अल्टीमेटम देकर आंदोलन करना निहायत गलत होता है, और होगा। गलत कारोबार की वजह से या निजी रंजिश की वजह से इस तरह के सोचे-समझे निशाने पर अगर कोई हमला होता है तो उससे शहर या प्रदेश की कानून व्यवस्था का कोई पैमाना तय नहीं होता। ऐसे अपराधों से बचने के लिए लोगों को खुद भी गलत धंधों से बचना चाहिए और ऐसा काम करने या करवाने वाले लोग चाहे किसी भी तबके के हों, उन पर कड़ी कार्रवाई के लिए उनके तबके के लोगों को भी तैयार रहना चाहिए।
अपराध तो हर किस्म का खराब होता है, उस पर जल्द से जल्द कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन इसे लेकर किसी तरह का दबाव खड़ा करना ठीक नहीं होता।

बच्चों के यौनशोषण को अब तो हकीकत मानें


14 मई 2012
संपादकीय
जिन लोगों को कई बरसों से इसी जगह पर लगातार हमारे लिखे हुए का असर न हुआ हो, उन लोगों को भी कल शायद टेलीविजन के एक कार्यक्रम में आमिर खान के उठाए हुए मुद्दे में गंभीरता लगेगी। पिछले हफ्ते आमिर खान ने कन्या भू्रण हत्या के खिलाफ बातें कीं, तो देश के कई तबकों में उस पर चर्चा होने लगी और हमने भी समाज में सकारात्मक फेरबदल के लिए किसी भी प्रेरणास्रोत के सामने आने पर इसी कॉलम में खुशी जाहिर की थी। कल उन्होंने बच्चों के यौन शोषण का मुद्दा उठाया और मनोचिकित्सकों से लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं तक से बातें कीं। उनकी शोहरत का भी कुछ असर होगा कि उन्होंने जब तीन बरस से दस बरस तक के बच्चों से बात करके उन्हें यह समझाया कि किस तरह उन्हें देहशोषण के मामले में सावधान रहना चाहिए तो देश में बहुत से परिवारों मेें इसे लेकर असुविधा हुई होगी। लेकिन हमारा मानना है कि भारत का दकियानूसी समाज जिस सच को अनदेखा करके अपने-आपको महफूज पाता है, उसे इसी तरह झकझोरने की जरूरत है, और बार-बार झकझोरने की जरूरत है। इस अखबार में हम इसीलिए दुनिया के बच्चों पर छाए हुए इस खतरे की बात हर कुछ महीनों में छेड़ते हैं कि किसी न किसी दिन तो मां-बाप को लगेगा कि शायद उन्हें अपने बच्चों को लेकर एक सावधानी बरतने की जरूरत है। 
बच्चों का देहशोषण दुनिया की एक शर्मनाक हकीकत है, और इस जुर्म के शौकीन लोग अपनी बीमार मानसिकता के साथ रात-दिन ऐसे मौके ढूंढते रहते हैं कि उन्हें बच्चों के करीब पहुंचने मिले। दो-चार बरस उम्र से ही बच्चों पर ऐसा खतरा मंडराने लगता है जो उनके वयस्क हो जाने तक जारी रहता है। इसके बाद के लिए वे खुद जवाबदेह भी रहते हैं और किसी नौबत से निपटने के लिए खुद काबिल भी रहते हैं। आंकड़ों का अंदाज बताता है कि हिंदुस्तान में करीब आधे बच्चे अपना बचपन पार करते हुए ऐसे शोषण के शिकार हो चुके रहते हैं। और इन बच्चों को खतरों से बचाने के लिए जो लोग लगे रहते हैं, उनका अध्ययन यह कहता है कि इन बच्चों को सबसे बड़ा खतरा उन लोगों से रहता है जिनकी इन बच्चों तक पहुंच रहती है। घर के लोग, रिश्तेदार, पड़ोसी, पारिवारिक मित्र और स्कूल के शिक्षक या हॉस्टल के लोग। ऐसे आसपास के लोगों से ही बच्चों का देहशोषण पूरी दुनिया में एक बड़ा खतरा है और अमरीका जैसे देश अगुवाई करके इंटरनेट पर बच्चों को फंसाने वालों को पूरी दुनिया से पकड़ रहे हैं और उन पर मुकदमे चला रहे हैं। दुनिया के अधिक जिम्मेदार देशों में इसके लिए अलग से कड़े कानून हैं, लेकिन भारत में इस पर सेक्स अपराध से जुड़े हुए साधारण कानून ही हैं। 
हम बार-बार इस बात को लिखते हैं कि भारतीय समाज में मां-बाप अपने छोटे बच्चों की शिकायतों को झूठा मानते हुए उन्हें डांटकर चुप करा देते हैं। जबकि कल की ही खबर है कि किसी दादा ने अपनी ही दो बरस की पोती के साथ बलात्कार किया। ऐसे बहुत से मामले होते हैं और लोगों को अपने बच्चों के मुकाबले दूसरे बड़े लोगों पर अधिक भरोसा रहता है, और बच्चों को यह समझ भी नहीं आता कि वे शिकायत लेकर कहां जाएं। अभी तक की बातें तो परिवार के भीतर के देहशोषण की हैं लेकिन भारत में लाखों बच्चे हर बरस देह के धंधे में उतार दिए जाते हैं और चकलाघरों का संगठित अपराध पुलिस और दूसरी एजेंसियों को इस हद तक जेब में रखता है कि कमउम्र बच्चों के साथ ऐसी ज्यादती भी लगभग हर मामले में दबी ही रह जाती है। 
इन दोनों किस्म की बातों को देखें तो लगता है कि भारत जब तक बच्चों के शोषण की हकीकत को मंजूर नहीं करेगा तब तक वह इसके किसी इलाज की तरफ भी एक कदम नहीं बढ़ा पाएगा। चाहे एक फिल्मी सितारे के असरदार कार्यक्रम से ही सही, इस बारे में बात आगे बढऩी चाहिए और जैसा कि जानकारों और विशेषज्ञों का कहना है, तीन बरस की उम्र से ही बच्चों को यह सावधान करने की जरूरत है कि उनके साथ कोई लोग अगर खिलवाड़ करते हैं तो इस बात को उन्हें किस तरह मां-बाप को और दूसरे जिम्मेदार लोगों को बताना चाहिए। यहां पर इस बात को फिर लिखने का हमारा मकसद यह है कि इसे पढऩे वाले लोग अपने आसपास के दायरे में इसकी चर्चा करें और हर बच्चे को इस खतरे से बचाने की कोशिश भी करें।

छाती का बोझ हल्का करने के लिए


14 मई 2012
अमरीका के ओरेगान की एक दिलचस्प घटना अभी वहां छपी है। स्कूल में सातवीं कक्षा में पढऩे वाला लैरी बारह बरस का था उसने कोई ऐसी हरकत की जिससे कि उसके शिक्षक को तकलीफ हुई। बात आई-गई हो गई। लेकिन बाद मेें जब वह बड़ा हुआ और इंटरनेट का इस्तेमाल शुरू हुआ तो वह बार-बार अपने शिक्षक का नाम उसमें डालकर ढूंढता था कि उसकी कोई खबर लगे। ऐसा इसलिए कि उसे शिक्षक के दिल दुखाने का अफसोस हो रहा था। और वह उससे माफी मांगकर इस आत्मग्लानि से उबरना चाह रहा था। दिल के बोझ को दूर करने की और शिक्षक से माफी मांगने की उसकी कोशिश अब जाकर पूरी हुई जब उस घटना के उनचालीस बरस बाद ढूंढते-ढूंढते उसका अपने उस शिक्षक से संपर्क हो पाया। 
यह कहानी खासी लंबी है कि किस तरह एक अखबार में छपी एक रिपोर्ट के साथ तस्वीर में उसने अपने उस शिक्षक को पहचाना और फिर अखबार को वजह बताते हुए उसने पता जानने की कोशिश की। घूमते-फिरते उसकी अपील शिक्षक तक पहुंची और फिर उसे अपनी गलती को सुधारने का मौका मिला। 
जिंदगी में अपने किए हुए गलत को, अपनी की हुई गलती को सुधारने की गुंजाइश हो सकता है कभी हो, और न हो। लेकिन अपनी गलती को मान लेने, और दिल से उस पर अफसोस करने की गुंजाइश तो हमेशा ही रहती है। ऐसा ही वे लोग भी कर सकते हैं जो कि कोई गलत काम कर बैठते हैं, या करते हैं, और जब उन्हें मलाल होता है तो वे उससे उबरना चाहते हैं। इसकी भी पूरी गुंजाइश दुनिया और जिंदगी में होती है कि आपकी गलती या गलत काम से जिन लोगों को नुकसान पहुंचा हो, उस नुकसान की जितनी हो सके उतनी, और उससे भी अधिक, भरपाई करके दिल से मांगी गई एक माफी के साथ खुद भी माफी पाने की उम्मीद कर सकते हैं।
लेकिन हिंदुस्तान की आम बातचीत को देखें तो उर्दू जुबान की तहजीब वाले लोग  किसी बात को शुरू करने के पहले अगर जरूरत होती है तो भी और कई बार जरूरत नहीं होती है तो भी, माफ कीजिएगा, जैसे शब्दों से बात शुरू करते हैं, और शुक्रिया जैसे शब्द पर बात खत्म करते हैं। अंगे्रजी में इसी किस्म से, एक्सक्यूज मी, से बात शुरू करके थैंक्स पर बात खत्म करते हैं। लेकिन हिंदी बोलने वाले अधिकतर इलाके में ऐसा कोई रिवाज आम जिंदगी में दिखता नहीं है। लोग राह चलते किसी से पता भी पूछते हैं, तो बात शुरू करने के पहले ऐसा कुछ कहने का रिवाज बोलचाल की हिंदी में नहीं है जिससे कि किसी के काम में दखल देने, या खलल डालने के लिए अफसोस जाहिर किया जाए। और किसी से कोई जानकारी मिल भी जाती है तो उसके बाद उसे धन्यवाद कहना भी आम बोलचाल की हिंदी में रिवाज में शामिल नहीं है।
जो लोग अंगे्रजी भी बोलते हैं, या जिनका उर्दू से वास्ता पड़ता है, उनकी आदत धीरे-धीरे जुबान से या दिल से ऐसे औपचारिक शब्द बोलने की पडऩे लगती है।
अब सवाल यह है कि किसी पुरानी घटना को लेकर, गलती या गलत काम को लेकर आधी जिंदगी गुजर जाने के बाद भी अफसोस जाहिर करने की और माफी मांगने की हसरत, बेचैनी और छाती पर लदा बोझ, इनमें से कुछ भी किसी भाषा से जुड़ा हुआ है या नहीं, यह तो पता नहीं। लेकिन बहुत से मामलों में ऐसी सोच एक दूसरी बात से जुड़ी हुई मुझे दिखती है। वह बात है लोगों के आस्थावान होने या नास्तिक होने की। नास्तिक गिनती में इतने कम हैं कि उनकी आस्तिक लोगों से कोई बहुत बड़ी तुलना नहीं हो सकती, लेकिन उनके मिजाज की तुलना हो सकती है। 
मेरा पुराना तर्क यह है कि आस्थावान या आस्तिक को किसी ईश्वर पर भरोसा होने से उन्हें यह सहूलियत रहती है कि वे ईश्वर के दरबार में जाकर या उसे याद करके अपने किए हुए गलत काम पर माफी मांग लें। इसके लिए तकरीबन हर मजहब में रास्ते निकाले गए हैं। कहीं पर प्रायश्चित के लिए चेंबर ही बना हुआ है जहां पर बिना किसी की नजरों में आए बगल के चेंबर में बैठे पादरी से अपना चेहरा दिखाए बिना अपने पाप या गलत कामों को बयां करके प्रायश्चित किया जाए और माफी मांगी जाए। ऐसे में माफी का रास्ता भी धर्म ने बनाया है। दूसरे धर्मों में भी तरह-तरह के इंतजाम आत्मा पर लगे दाग-धब्बे छुड़ाने के लिए ईश्वर के एजेंटों और डीलरों ने निकाल रखे हैं। किसी पाप के लिए गऊदान, तो किसी के लिए सोने की बिल्ली बनवाकर चढ़ाना, और फिर जहां लोग डीलर और एजेंट से बात नहीं करते हैं वहां लोग खुद ही यह तय कर लेते हैं कि किस पाप के लिए कितना बड़ा प्रायश्चित ठीक होगा।  कुछ लोग चींटियों को आटा डालना काफी समझते हैं, कुछ लोग गाय और कुत्ते को रोटी जितना बड़ा उपकार करते हैं, और कुछ लोग केवल ऐसे ही मौकों पर कुष्ठ रोगियों की बस्तियां, अनाथाश्रम और भिखारियों के डेरे ढूंढते हैं। 
बहुत से ऐसे लोग होते हैं जो कि कुछ गलत कामों के करने की तैयारी के साथ-साथ ही इस तरह का प्रायश्चित खरीदने लगते हैं। जैसे मुंबई में माफिया डॉन हाजी मस्तान खुद भी हज कर आया था, एंबुलेंस चलवाता था, और दूसरे गरीबों को हज जैसी तीर्थयात्रा में मदद भी करता था। उसके लिए यह एक किस्म की बीमा पॉलिसी थी जो कि उसने अपने आने वाले कुकर्मों के लिए खरीदकर रखी थी। मुंबई की ही कहानी एक बड़े स्मगलर और माफिया डॉन वरदराजन उर्फ वरदा की है जिसका गणेशोत्सव में से एक होता था। ऐसा कभी भी नहीं हुआ कि उसके पंडाल से उठकर गणेश विसर्जन के पहले ही समंदर चले गए हों कि ऐसे जुर्म की कमाई के लड्डू वे नहीं खा सकते। मतलब यह कि एक मुजरिम-भक्त, और उसके लड्डुओं से कोई परहेज न रखने वाला उसका ईश्वर। मेरा पक्का भरोसा है कि मस्तान और वरदा ईश्वर की मेहरबानी से अपनी छाती पर बिना किसी बोझ के सोते होंगे क्योंकि ईश्वर को खुश करने का इंतजाम वे जुर्म के साथ-साथ, जुर्म के पहले, और जुर्म के बाद करते ही रहते थे। और इसके बाद में पूरी जिंदगी उनका कोई नुकसान न होने से यह बात तो लगती ही है कि बीमा पॉलिसी खरी थी।
एक नास्तिक के रूप में मेरा अनुभव यह है कि आस्था की ऐसी लॉन्ड्री की सुविधा नास्तिक को नहीं रहती उसके पास किसी नतीजे पर पहुंचने के लिए तर्क और विज्ञान का ही रास्ता रहता है और ये रास्ते किसी भी आस्था के मुकाबले अधिक न्यायसंगत होते हैं। हो सकता है कि अमरीका के जिस बच्चे से आज की यह बात शुरू हुई है वह आस्तिक भी रहा हो, आस्तिकों में अच्छे लोग नहीं होते हैं ऐसी बात नहीं है, लेकिन आस्तिकों में जो खराब होते हैं उनके पास भी अपनी खराबी के बोझ से छुटकारा पाने का एक अच्छा रास्ता हमेशा ही रहता है। बहुत से तो ऐसे आस्तिक मेरे देखे हुए हैं जो कि किसी गलत काम को करने के ठीक पहले से ईश्वर को कुछ किस्म की मनौतियों के मार्फत एक किस्म का भागीदार ही बनाकर चलते हैं। 
इसलिए ऐसा लगता है कि अपनी गलती या अपने गलत काम के लिए माफी मांगने का काम करने वाला यह इंसान शायद नास्तिक रहा हो।
खैर उस ईश्वर की अधिक चर्चा क्या करना जिसके ऊपर से देखते हुए निठारी में बलात्कारी हत्यारे एक-एक करके दर्जनों बच्चों को निपटाते रहे और खुले आसमान के नीचे वे लाशें एक पर एक थप्पी बनती रहीं। आज की यह चर्चा उन लोगों के लिए अधिक है जो ईश्वर से ऐसा प्रोटेक्शन प्लान खरीदकर बैठे हैं या फिर जरूरत पडऩे पर मजहब के रास्ते एक बाईपास सर्जरी करवाने की तैयारी रखते हैं। इन लोगों को एक बार यह सोचना चाहिए कि क्या ईश्वर को बीच में लाए बिना अपनी गलतियों का पूरी तरह अहसास करके, उसके लिए अफसोस, माफी और भरपाई करके वे एक बेहतर काम कर सकते हैं, बजाय ईश्वर के दरबार में जाकर मामला निपटाने के।
और आस्तिक या नास्तिक इस बात को छोड़ भी दें, तो लोगों को अपने मिजाज में इतनी नरमी तो लानी ही चाहिए कि वे उन लोगों से माफी मांगने में शर्म महसूस न करें जिनका उन्होंने दिल दुखाया है, या जिनका नुकसान किया है। और इस बात को भी यहां पर कहना ठीक होगा कि जैसा कि लंबे समय से कहा जाता है कि कोई भी माफी किंतु-परंतु के साथ की नहीं होनी चाहिए, माफी पूरे खुले दिल से और ईमानदारी से मांगी हुई होनी चाहिए और उसी से भले लोगों की छाती पर बैठा हुआ बोझ हल्का होता है। जिनकी छाती का बोझ हल्का करने के लिए ईश्वर नाम का एक कुली मौजूद है, उनके बारे में अब हम क्या कहें। 

13 may


13 may


संसद के आत्ममंथन का मौका खासा जहर निकलना तय


13 मई 2012
संपादकीय
भारतीय संसद आज साठ बरस पूरे कर रही है। इस मौके पर बहुत किस्म की यादें सामने आ रही हैं। लेकिन एक गौरवशाली कहे जा रहे अतीत के साथ-साथ लोगों को संसद का आज का हाल अनदेखा करते नहीं बन रहा है। इसलिए साठ बरस के सफर पर एक नजर डालने के अलावा यह भी देखना होगा कि इस सफर में आज का पड़ाव कहां पर है, यह सफर किस तरफ चल रहा है, किस तरह चल रहा है। बहुत सी बातें हैं जिनके बिना संसद के इस आधी सदी के इतिहास का मूल्यांकन नहीं हो सकता। और आज जब संसद एक जश्न मना रही है तो इस देश के पास उसके बारे में उससे पूछने के लिए बहुत से सवाल भी हैं। 
जनता के मन में आज उठ रही बातों को देखने के साथ-साथ हम अपने मन की बातों को भी जोड़ें तो संसद का आज का पल एक गौरव का भी है और एक शर्म का भी है। जब इस संसद की कल्पना की गई और इसे तय किया गया तब नेहरू से लेकर अंबेडकर तक किसने यह सोचा होगा कि इतने-इतने भ्रष्ट, इतने-इतने अपराधों से जुड़े हुए लोग, इतने किस्म के विवादों से घिरे हुए लोग संसद के भीतर पहुंचने की हालत में आ जाएंगे और गरीबों की जगह संसद में करीब-करीब खत्म होने लगेगी। पैसों का खेल इतना बड़ा हो जाएगा कि पहले टिकट के लिए, फिर वोटों के लिए नोट बोरे भर-भरकर लगेंगे। ऐसे में देश की यह सबसे बड़ी पंचायत किन लोगों का और किस तरह से प्रतिनिधित्व करती है? क्या ईमानदार और गरीब यहां पर आसानी से पहुंच सकते हैं? क्या गरीबों की आवाज यहां पर उठाने वाले इतने कम रह जाने की कल्पना साठ बरस पहले किसी ने की होगी? क्या किसी ने सोचा होगा कि चोरों के सवालों को यहां उठाने के लिए इस संसद के विशेषाधिकार प्राप्त सांसद रिश्वत के हफ्ताखोर बन जाएंगे? क्या किसी ने यह सोचा था कि गांधी और नेहरू की पार्टी की सरकार इस संसद में अपने-आपको बचाने के लिए एक वक्त क्रांतिकारी लगती एक आदिवासी पार्टी को खरीद ही लेगी? और क्या यह भी किसी ने सोचा था कि इस देश में एक डबलरोटी चुराने पर जो कानून कैद दे सकता है वह कानून सांसदों के बिक जाने और संसद के एक मंडी बन जाने पर इतना लाचार और बेसहारा हो जाएगा कि वह सारे सुबूत मिल जाने पर भी इन बिकाऊ लोगों का, ऐसे खरीददारों का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकेगा क्योंकि संसद ने अपने इर्द-गिर्द एक फौलादी खोल ऐसा बना रखा है जहां इस देश के कानून को घुसने की इजाजत नहीं है। इन साठ बरसों में संसद में ऐसे चोर, बेईमान और बिकाऊ लोगों को अपने बीच पा लेने के बाद भी, अपने भीतर खरीद-फरोख्त के सुबूत पा लेने के बाद भी, न इस नौबत को खत्म करने के लिए कुछ किया, और न ही अपने-आपको कानून के लिए खोला। संविधान में विशेष दर्जा और विशेषाधिकार इसलिए नहीं बनाए गए थे कि संसद को मंडी बना देने वाले लोग उस दर्जे के सहारे अपने जुर्म के बाद भी बचे रहें, और बाकी देश को छोटी-छोटी बेईमानी के लिए बड़ी-बड़ी और कड़ी-कड़ी सजा देने के कानून बनाते रहें। इस संसद को आखिर किसने रोका था कि नरसिंह राव सरकार की खरीदी और झारखंड मुक्ति मोर्चा की बिक्री के बाद यह अपने-आपको कानून के हवाले करती? इसने और इसके अध्यक्षों ने, इसके सदस्यों ने विशेषाधिकार नाम की उस ओट का इस्तेमाल किया जिसके पीछे अमूमन मुजरिमों को ही छुपना सुहाता। संसद के साठ बरस पूरे होने के मौके पर लोकतंत्र में आस्था रखने वाले लोगों के मन में भी यह सवाल हैं कि भारत का संसदीय लोकतंत्र क्या एक ऐसी सामंतशाही और राजशाही की तर्ज पर नहीं चल रहा है जिसमें कुलीन तबके का दावा करने वाले लोग अपने जुर्म के लिए कोई सजा नहीं पाते। इस संसद ने अपने लोगों के सवाल पूछने पर रिश्वत लेने के पुख्ता मामले के सुबूतों सहित आ खड़े होने पर महज उनकी सदस्यता खत्म की, न कि उनको कानून के हवाले किया। हम संसद के ऐसे किसी भी विशेषाधिकार को खारिज करते हैं जो उसे अपने मुजरिमों को देश के कानून से बचाने का हक देता है। आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब भ्रष्ट और दुष्ट लोगों के संसद पहुंचने की संभावनाएं अधिक रहती हैं, जब चुनाव एक फरेब की तरह वोटों को खरीदकर फैसला पाने का जरिया रह गए हैं, जब चुनावों में एक-एक सीट पर करोड़ों रुपए का कालाधन खर्च करना एक रिवाज बन गया है, तब भी क्या यह संसद ऐसे विशेषाधिकार की हकदार रह गई है जो शायद किसी समय देश के महान लोगों को संसद के बाहर के कानूनों से बचाने के लिए सही लगते रहे होंगे?
इस संसद की सबसे बड़ी उपलब्धि यह मानी जा सकती है कि आपातकाल के कुछ अरसे को छोड़कर बाकी वक्त वह लगातार उसकी हस्ती बनी रही, और भारतीय लोकतंत्र में उसकी जगह जारी रही। लेकिन क्या जारी रहना ही बहुत मायने रखता है? जो संसद बहुमत से इस देश की सरकार चुनती है, उस संसद में आने वाले लोगों का बहुमत जब गैरकानूनी तरीकों से चुनकर आता है, तो देश में बनने वाली सरकार का राज करने का कैसा नैतिक हक रह जाता है? अपने-अपने इलाके में लोग देखें तो साफ दिखेगा कि निर्वाचित सांसदों का बहुमत बेईमानी से दिल्ली पहुंचता है। कम लोग ऐसे हैं जो ईमानदारी के चुनाव से दिल्ली जाते हैं, अधिकतर लोग वोटरों को नाजायज तरीके से प्रभावित करके जीतते हैं। यह संसद, और भारत का लोकतंत्र भारत के लिए मुमकिन, और आज तक के सबसे बेहतर इंतजाम हो सकते हैं, लेकिन ये बेहतर जरा भी अच्छा नहीं है। यह मुगलों और उनके पहले की राजशाही से बेहतर हैं, यह अंगे्रजों के राज से बेहतर है, यह पड़ोस के पाकिस्तान के फौजी राज से बेहतर है, यह आसपास के अस्थिर लोकतंत्रों से बेहतर है, लेकिन यह अच्छा जरा भी नहीं है। इस संसद में इतना सब हो जाने के बाद भी अपने-आपको सुधारने के लिए कुछ भी करने की नीयत और हसरत नहीं दिखती। लोकतंत्र का यह सबसे बड़ा मंच किसी धर्म और जाति के एक ऐसे संगठन की तरह हो गया है जिसका सबसे बड़ा और अकेला मकसद अपनी खुद की हस्ती को बचाना रहता है और इसके लिए वह अपने लोगों के सात खून माफ करने के लिए एक पैर पर खड़ा रहता है। आज अदालत के साथ किसी टकराव की नौबत आने पर भारतीय संसद का बर्ताव इसी किस्म का रहता है। इस संसद में अपने-आपको खामियों से बचाने के लिए कुछ करने की नीयत ही नहीं दिखाई।
दिल्ली का जश्न तो आज होगा और दो-चार दिन तक छपेगा, दिखेगा। लेकिन इस संसद में बैठे हुए लोगों को यह सोचना होगा कि आज उनके बारे में जब अन्ना-बाबा और उनके लोग बहुत ही ओछी और नाजायज बातें कहते हैं, तब अगर जनता वाहवाही करती है तो इसके पीछे क्या वजहें हैं। इस संसद को अपने तन-मन में पड़ी दरारों की मरम्मत करनी होगी। यह संसद जिस अंबेडकर पर साठ बरस पहले बने एक कार्टून को लेकर आज हिल गई, उस अंबेडकर के हाथों बनी संसदीय व्यवस्था की खरीदी-बिक्री से भी वह संसद इतनी नहीं हिलती कि सांसद उससे बचने के रास्ते बनाते। अपने अहाते में भ्रष्ट और दुष्ट लोगों को आने से बचाने के लिए जो रूकावट संसद को बनानी थी, उस ईंट-गारे से इस संसद ने देश के कानून को रोकने के लिए रूकावट बनाई। 
जो जनता बेईमान से लड़े जा रहे चुनाव में अपने जनप्रतिनिधियों को चुनकर भेजने के बाद पांच बरस के लिए अपना जिम्मा पूरा समझती है, उस मुर्दा बिरादरी को ऐसी ही संसद और ऐसी ही सरकारें मिलती हैं, वे बस इसी के हकदार रहते हैं। इसलिए लोगों को यह सीखना होगा कि वे गांधी-नेहरू और अंबेडकर की जयंती मनाने के बजाय उनके खड़े किए हुए लोकतांत्रिक संस्थानों से कैसे सवाल करें, कौन से सवाल करें। खुद संसद को ऐसा आत्ममंथन करना चाहिए जिसमें कि खासा जहर निकलना तय है।

लोगों के कब्र से निकलने की जरूरत


12 मई 2012
संपादकीय
इस पल लखनऊ की एक खबर आ रही है कि वहां निर्मल बाबा नाम के एक पाखंडी के खिलाफ दो किशारों की शिकायत पर जुर्म दर्ज हुआ है। इस आदमी की धोखाधड़ी, जालसाजी, अंधविश्वास, धनउगाही के मामले पिछले कई हफ्तों से खबरों में हैं और यह कार्रवाई दो बच्चों की शिकायत पर हुई है। सरकार की एजेंसियां तो समय रहते ऐसे किसी धोखे और जालसाजी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करती है लेकिन सरकार के परे भी क्या हो सकता है और क्या होना चाहिए था इस पर भी बात होनी चाहिए।
भारत में हर बरस विज्ञान और कानून की पढ़ाई करके निकलने वाले लोग दसियों लाख हैं। दसियों लाख लोग विज्ञान और कानून को पढ़ाने वाले हैं या उससे जुड़े हुए रोजगार में हैं। जब इस तरह की खबरें चारों तरफ से आनी शुरू होती हैं उसके पहले की बात तो हम छोड़ दें, उन खबरों के बाद भी विज्ञान और कानून के इन लोगों का रूख ऐसी घोर अवैज्ञानिक और गैरकानूनी बात के लिए कैसा रहता है? क्या सरकार से परे भी किसी की कोई जिम्मेदारी बनती है? क्या लोग जिस पढ़ाई को किए हुए हैं, जिस पेशे में हैं, उसके साथ जिम्मेदारी निभाना उनकी कोई जिम्मेदारी बनती है? समाज के लोगों की ऐसी गैरजिम्मेदारी हमें उसी तरह की लगती है जैसे हिंदी भाषा पढ़ाने वाले लोग अपने घर के सामने की दूकान को हिंदी के बोर्ड में हिज्जे की कई गलतियां देखते हुए भी जिंदगी भर कुछ न कहें। अभी दो-तीन दिन पहले ही हमने छत्तीसगढ़ में अंधश्रद्धा निवारण उन्मूलन के काम में दशकों से अकेले जुटे हुए डॉ. दिनेश मिश्र की आपबीती छापी थी, जिसमें उन्होंने छत्तीसगढ़ में एक ईसाई धर्मप्रचारक की चंगाई सभा से चमत्कार के दावों को हटवाने में कामयाबी पाई थी। लेकिन पूरे छत्तीसगढ़ की सवा दो करोड़ आबादी में इस एक व्यक्ति से अधिक कोई दूसरा ऐसा जुझारू नहीं मिला है जो लोगों की अंधश्रद्धा के खिलाफ खुलकर बोलने की हिम्मत करे और ऐसा एक अभियान अपने खुद के समय को निकालकर चलाए। तो ऐसे में समाज को धोखाधड़ी से बचाने की सारी जिम्मेदारी क्या सरकार ही निभाए? क्या इक्का-दुक्का आंदोलनकारी ही यह काम करे? 
मुंह को बंद रखकर चुपचाप घर में रहने वाले ऐसे समाज का हाल ऐसा ही होता है। जब तक दुनिया में बेवकूफों की भीड़ बनी रहेगी, निर्मल बाबा जैसे लोग अरबपति-खरबपति बनते ही रहेंगे। एक कहीं दक्षिण भारत के किसी बाबा की फिल्में इंटरनेट पर लाखों की संख्या में तैर रही हैं जिनमें वे किसी फिल्म अभिनेत्री से देहसुख पा रहे हैं। कहीं और कोई दूसरा गुरू किसी और तरीके से लोगों को धोखा दे रहा होगा। एक धर्म के एक प्रमुख व्यक्ति के बारे में मध्यप्रदेश के समय से यह आम चर्चा रही है कि राजनीति और सत्ता में ऊपर पहुंचने वाली कौन सी महिला उनकी संतान है। ऐसी तमाम बातों के चलते लगता यही है कि जब तक समाज में वजनदार जुबान रखने वाले लोग हल्की-फुल्की जिम्मेदारी से भी बचते चलेंगे, तब तक धूर्त और जालसाज, पाखंडी और बहुरूपिए लोग इसी तरह से लोगों को लूटते रहेंगे। सरकार की तो ऐसी चीजों पर नजर रखने की और उनको रोकने की अपनी जिम्मेदारी होती है, लेकिन समाज भी जिम्मेदारी से बरी नहीं हो सकता। लोगों को अपनी बनाई हुई कब्रों से निकलकर बाहर आना होगा, वरना समाज में अंधविश्वास अगर बढ़ते चलेगा तो उससे छुटकारा पाना मुश्किल होगा, और लोगों की अगली पीढ़ी एक और भयानक, और खतरनाक समाज में पैदा होगी।
निर्मल बाबा जैसे लोगों के खिलाफ मुंह खोलने के बजाय देश के बड़े-बड़े मीडिया कारोबारियों ने उनकी कमाई में भागीदार बनकर अपने चैनलों से उनके पाखंड को फैलाने का ही काम किया है। मीडिया के दर्शकों और पाठकों को भी यह सोचना होगा कि वे अपने चैनल या अपने अखबार के इस तरह के कारोबारी पाखंड और जालसाजी को कब तक बर्दाश्त करेंगे। यह सिलसिला समाचारों का झांसा देने वाले इश्तहारों से शुरू होता है और फिर भविष्यवाणियों तक और अंधविश्वास के कॉलमों तक बढ़ते चलता है। लोगों को अपने-आपको मीडिया से बचाना भी आना चाहिए और उसके लिए भी उनको मुंह तो खोलना ही होगा, क्योंकि मीडिया बाजार और बाजारू ताकतों के हित में उनके आंख-कान बंद करने में लगा ही हुआ है।