आने वाले दिन पता नहीं और कितने समझौतों के होंगे


संपादकीय
16 मई
संसद में एक पाठ्य पुस्तक के कार्टून को लेकर जिस तरह यूपीए सरकार दहशत में आकर अंबेडकरवादियों के सामने बिछ गई और पूरी की पूरी किताब को प्रतिबंधित करने की बात मान ली उसी का नतीजा था कि इन किताबों के लिए बनी चयन समिति के सदस्यों पर हमले हुए और देश भर में अब यह माहौल बना कि किसी धर्म या जाति का संगठन अगर धमकी देता है तो लोकतंत्र के भीतर की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सरकार कूड़ेदान में फेंक देगी। इस बारे में हमने कुछ विचारकों के लेख भी पिछले दिनों में इस अखबार के पहले पन्ने से छापे हैं ताकि लोगों को उस मुद्दे की बारीकियां समझ में आए। लेकिन आज की एक दूसरी खबर यह है कि देश के कंट्रोलर और ऑडिटर जनरल ने रेल भाड़े की वापिसी को लेकर कहा है कि सरकार को ऐसा करने के बजाए रेल के घाटे को भाड़े से पूरा करना चाहिए। लोगों को याद होगा कि कुछ हफ्ते पहले रेल बजट से नाराज होकर यूपीए सरकार की एक बड़ी भागीदार ममता बैनर्जी ने अपनी तृणमूल कांग्रेस के रेलमंत्री को हटा दिया था और अपने एक दूसरे सांसद के रेलमंत्री बनवाकर ही उन्होंने दम नहीं लिया बल्कि बढ़े हुए रेल भाड़े को हटवा भी दिया। रेल सुविधा जनता के लिए तो है लेकिन वह एक कारोबार भी है और सस्ती लोकप्रियता के लिए एक कारोबार को तबाह करने का नतीजा देश के बहुत से राज्यों में घाटे में आ गए बिजली विभागों में भी देखने मिलता है और भारतीय रेल भी उसी तरफ जा रही है। 
गठबंधन की सरकार के जो नुकसान सामने आ रहे हैं उनमें से एक यह है कि अलग-अलग क्षेत्रीय दलों की अलग-अलग सनक या प्राथमिकता के मुताबिक केन्द्र सरकार को समर्पण करना पड़ रहा है और देश के व्यापक और दीर्घकालीन नुकसान की कीमत पर भी कहीं आर्थिक नुकसान झेलना पड़ रहा है कहीं भ्रष्टाचार की तरफ आंख बंद करनी पड़ रही है और कहीं एक संकीर्णता को बढ़ावा देना पड़ रहा है। दलितों की नाराजगी से डरकर यूपीए सरकार ने जिस तरह से आधी सदी पुराने और अंबेडकर की जिंदगी में ही उनके सामने आ चुके एक निहायत मासूम और अच्छे कार्टून को हटाया है वह कट्टरता के सामने बुरी तरह से घुटने टेक देना है। एक तरफ महाराष्ट्र में ठाकरे कुनबा जिस तरह से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ लाठियां लेकर टूट पड़ता है, उसी तरह से कांग्रेस की लीडरशिप वाले यूपीए ने सरकार की कलम से पाठ्य पुस्तकों पर हमला करने का भरोसा दिलाया और दलितों की नाराजगी से यह पार्टी और यह सरकार बची। सरकार में इतना नैतिक साहस होना चाहिए कि वह नाजायज मांगों को मानने से इंकार कर सके। लेकिन अपने कुकर्मों से लदी हुई यूपीए सरकार और कांग्रेस पार्टी न तो आज ममता बैनर्जी को किसी बात के लिए मना कर सकती और न ही दलितों को नाराज कर सकती। 
देश एक किस्म से पीछे जा रहा है, धर्मान्ध और कट्टर पार्टियों से, सांप्रदायिक ताकतों से तो ऐसी उम्मीद की जाती है कि वे वैज्ञानिक सोच और प्रगतिशीलता के खिलाफ लोगों को गुदगुदाकर पिछली सदी में ले जाएं। लेकिन कांग्रेस पार्टी, एक वक्त की नेहरू की पार्टी, आज इस कदर दहशत में जी रही है, इस कदर समझौतापरस्त हो गई है कि उसके पास सही बातों के साथ खड़े रहने का हौसला भी नहीं है। एक कार्टून ने यह साबित कर दिया है कि इस सरकार और इस पार्टी की रीढ़ की हड्डी नीचे खिसक कर इसके घुटनों में आ गई है और आए दिन यह घुटनों पर दिखाई पड़ती है। पिछले दिनों इसी सरकार के आर्थिक सलाहकार ने कुछ बातें कहीं थीं जिनसे उपजी खबरों से यह तस्वीर बनी थी कि बचे कार्यकाल में यह सरकार कोई आर्थिक सुधार नहीं कर पाएगी। बाद में उन बातों की कुछ लीपापोती की गई। लेकिन यह बात साफ है कि यह कार्यकाल इसी तरह का गुजरने वाला है और देश के लिए यह बहुत ही महंगा भी पडऩे वाला है। पता नहीं आने वाले दिन केन्द्र सरकार और उसकी मुखिया पार्टी के और कितने किस्म के समझौतों के आएंगे। 

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