12 मई 2012
संपादकीय
इस पल लखनऊ की एक खबर आ रही है कि वहां निर्मल बाबा नाम के एक पाखंडी के खिलाफ दो किशारों की शिकायत पर जुर्म दर्ज हुआ है। इस आदमी की धोखाधड़ी, जालसाजी, अंधविश्वास, धनउगाही के मामले पिछले कई हफ्तों से खबरों में हैं और यह कार्रवाई दो बच्चों की शिकायत पर हुई है। सरकार की एजेंसियां तो समय रहते ऐसे किसी धोखे और जालसाजी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करती है लेकिन सरकार के परे भी क्या हो सकता है और क्या होना चाहिए था इस पर भी बात होनी चाहिए।
भारत में हर बरस विज्ञान और कानून की पढ़ाई करके निकलने वाले लोग दसियों लाख हैं। दसियों लाख लोग विज्ञान और कानून को पढ़ाने वाले हैं या उससे जुड़े हुए रोजगार में हैं। जब इस तरह की खबरें चारों तरफ से आनी शुरू होती हैं उसके पहले की बात तो हम छोड़ दें, उन खबरों के बाद भी विज्ञान और कानून के इन लोगों का रूख ऐसी घोर अवैज्ञानिक और गैरकानूनी बात के लिए कैसा रहता है? क्या सरकार से परे भी किसी की कोई जिम्मेदारी बनती है? क्या लोग जिस पढ़ाई को किए हुए हैं, जिस पेशे में हैं, उसके साथ जिम्मेदारी निभाना उनकी कोई जिम्मेदारी बनती है? समाज के लोगों की ऐसी गैरजिम्मेदारी हमें उसी तरह की लगती है जैसे हिंदी भाषा पढ़ाने वाले लोग अपने घर के सामने की दूकान को हिंदी के बोर्ड में हिज्जे की कई गलतियां देखते हुए भी जिंदगी भर कुछ न कहें। अभी दो-तीन दिन पहले ही हमने छत्तीसगढ़ में अंधश्रद्धा निवारण उन्मूलन के काम में दशकों से अकेले जुटे हुए डॉ. दिनेश मिश्र की आपबीती छापी थी, जिसमें उन्होंने छत्तीसगढ़ में एक ईसाई धर्मप्रचारक की चंगाई सभा से चमत्कार के दावों को हटवाने में कामयाबी पाई थी। लेकिन पूरे छत्तीसगढ़ की सवा दो करोड़ आबादी में इस एक व्यक्ति से अधिक कोई दूसरा ऐसा जुझारू नहीं मिला है जो लोगों की अंधश्रद्धा के खिलाफ खुलकर बोलने की हिम्मत करे और ऐसा एक अभियान अपने खुद के समय को निकालकर चलाए। तो ऐसे में समाज को धोखाधड़ी से बचाने की सारी जिम्मेदारी क्या सरकार ही निभाए? क्या इक्का-दुक्का आंदोलनकारी ही यह काम करे?
मुंह को बंद रखकर चुपचाप घर में रहने वाले ऐसे समाज का हाल ऐसा ही होता है। जब तक दुनिया में बेवकूफों की भीड़ बनी रहेगी, निर्मल बाबा जैसे लोग अरबपति-खरबपति बनते ही रहेंगे। एक कहीं दक्षिण भारत के किसी बाबा की फिल्में इंटरनेट पर लाखों की संख्या में तैर रही हैं जिनमें वे किसी फिल्म अभिनेत्री से देहसुख पा रहे हैं। कहीं और कोई दूसरा गुरू किसी और तरीके से लोगों को धोखा दे रहा होगा। एक धर्म के एक प्रमुख व्यक्ति के बारे में मध्यप्रदेश के समय से यह आम चर्चा रही है कि राजनीति और सत्ता में ऊपर पहुंचने वाली कौन सी महिला उनकी संतान है। ऐसी तमाम बातों के चलते लगता यही है कि जब तक समाज में वजनदार जुबान रखने वाले लोग हल्की-फुल्की जिम्मेदारी से भी बचते चलेंगे, तब तक धूर्त और जालसाज, पाखंडी और बहुरूपिए लोग इसी तरह से लोगों को लूटते रहेंगे। सरकार की तो ऐसी चीजों पर नजर रखने की और उनको रोकने की अपनी जिम्मेदारी होती है, लेकिन समाज भी जिम्मेदारी से बरी नहीं हो सकता। लोगों को अपनी बनाई हुई कब्रों से निकलकर बाहर आना होगा, वरना समाज में अंधविश्वास अगर बढ़ते चलेगा तो उससे छुटकारा पाना मुश्किल होगा, और लोगों की अगली पीढ़ी एक और भयानक, और खतरनाक समाज में पैदा होगी।
निर्मल बाबा जैसे लोगों के खिलाफ मुंह खोलने के बजाय देश के बड़े-बड़े मीडिया कारोबारियों ने उनकी कमाई में भागीदार बनकर अपने चैनलों से उनके पाखंड को फैलाने का ही काम किया है। मीडिया के दर्शकों और पाठकों को भी यह सोचना होगा कि वे अपने चैनल या अपने अखबार के इस तरह के कारोबारी पाखंड और जालसाजी को कब तक बर्दाश्त करेंगे। यह सिलसिला समाचारों का झांसा देने वाले इश्तहारों से शुरू होता है और फिर भविष्यवाणियों तक और अंधविश्वास के कॉलमों तक बढ़ते चलता है। लोगों को अपने-आपको मीडिया से बचाना भी आना चाहिए और उसके लिए भी उनको मुंह तो खोलना ही होगा, क्योंकि मीडिया बाजार और बाजारू ताकतों के हित में उनके आंख-कान बंद करने में लगा ही हुआ है।

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