14 मई 2012
अमरीका के ओरेगान की एक दिलचस्प घटना अभी वहां छपी है। स्कूल में सातवीं कक्षा में पढऩे वाला लैरी बारह बरस का था उसने कोई ऐसी हरकत की जिससे कि उसके शिक्षक को तकलीफ हुई। बात आई-गई हो गई। लेकिन बाद मेें जब वह बड़ा हुआ और इंटरनेट का इस्तेमाल शुरू हुआ तो वह बार-बार अपने शिक्षक का नाम उसमें डालकर ढूंढता था कि उसकी कोई खबर लगे। ऐसा इसलिए कि उसे शिक्षक के दिल दुखाने का अफसोस हो रहा था। और वह उससे माफी मांगकर इस आत्मग्लानि से उबरना चाह रहा था। दिल के बोझ को दूर करने की और शिक्षक से माफी मांगने की उसकी कोशिश अब जाकर पूरी हुई जब उस घटना के उनचालीस बरस बाद ढूंढते-ढूंढते उसका अपने उस शिक्षक से संपर्क हो पाया।
यह कहानी खासी लंबी है कि किस तरह एक अखबार में छपी एक रिपोर्ट के साथ तस्वीर में उसने अपने उस शिक्षक को पहचाना और फिर अखबार को वजह बताते हुए उसने पता जानने की कोशिश की। घूमते-फिरते उसकी अपील शिक्षक तक पहुंची और फिर उसे अपनी गलती को सुधारने का मौका मिला।
जिंदगी में अपने किए हुए गलत को, अपनी की हुई गलती को सुधारने की गुंजाइश हो सकता है कभी हो, और न हो। लेकिन अपनी गलती को मान लेने, और दिल से उस पर अफसोस करने की गुंजाइश तो हमेशा ही रहती है। ऐसा ही वे लोग भी कर सकते हैं जो कि कोई गलत काम कर बैठते हैं, या करते हैं, और जब उन्हें मलाल होता है तो वे उससे उबरना चाहते हैं। इसकी भी पूरी गुंजाइश दुनिया और जिंदगी में होती है कि आपकी गलती या गलत काम से जिन लोगों को नुकसान पहुंचा हो, उस नुकसान की जितनी हो सके उतनी, और उससे भी अधिक, भरपाई करके दिल से मांगी गई एक माफी के साथ खुद भी माफी पाने की उम्मीद कर सकते हैं।
लेकिन हिंदुस्तान की आम बातचीत को देखें तो उर्दू जुबान की तहजीब वाले लोग किसी बात को शुरू करने के पहले अगर जरूरत होती है तो भी और कई बार जरूरत नहीं होती है तो भी, माफ कीजिएगा, जैसे शब्दों से बात शुरू करते हैं, और शुक्रिया जैसे शब्द पर बात खत्म करते हैं। अंगे्रजी में इसी किस्म से, एक्सक्यूज मी, से बात शुरू करके थैंक्स पर बात खत्म करते हैं। लेकिन हिंदी बोलने वाले अधिकतर इलाके में ऐसा कोई रिवाज आम जिंदगी में दिखता नहीं है। लोग राह चलते किसी से पता भी पूछते हैं, तो बात शुरू करने के पहले ऐसा कुछ कहने का रिवाज बोलचाल की हिंदी में नहीं है जिससे कि किसी के काम में दखल देने, या खलल डालने के लिए अफसोस जाहिर किया जाए। और किसी से कोई जानकारी मिल भी जाती है तो उसके बाद उसे धन्यवाद कहना भी आम बोलचाल की हिंदी में रिवाज में शामिल नहीं है।
जो लोग अंगे्रजी भी बोलते हैं, या जिनका उर्दू से वास्ता पड़ता है, उनकी आदत धीरे-धीरे जुबान से या दिल से ऐसे औपचारिक शब्द बोलने की पडऩे लगती है।
अब सवाल यह है कि किसी पुरानी घटना को लेकर, गलती या गलत काम को लेकर आधी जिंदगी गुजर जाने के बाद भी अफसोस जाहिर करने की और माफी मांगने की हसरत, बेचैनी और छाती पर लदा बोझ, इनमें से कुछ भी किसी भाषा से जुड़ा हुआ है या नहीं, यह तो पता नहीं। लेकिन बहुत से मामलों में ऐसी सोच एक दूसरी बात से जुड़ी हुई मुझे दिखती है। वह बात है लोगों के आस्थावान होने या नास्तिक होने की। नास्तिक गिनती में इतने कम हैं कि उनकी आस्तिक लोगों से कोई बहुत बड़ी तुलना नहीं हो सकती, लेकिन उनके मिजाज की तुलना हो सकती है।
मेरा पुराना तर्क यह है कि आस्थावान या आस्तिक को किसी ईश्वर पर भरोसा होने से उन्हें यह सहूलियत रहती है कि वे ईश्वर के दरबार में जाकर या उसे याद करके अपने किए हुए गलत काम पर माफी मांग लें। इसके लिए तकरीबन हर मजहब में रास्ते निकाले गए हैं। कहीं पर प्रायश्चित के लिए चेंबर ही बना हुआ है जहां पर बिना किसी की नजरों में आए बगल के चेंबर में बैठे पादरी से अपना चेहरा दिखाए बिना अपने पाप या गलत कामों को बयां करके प्रायश्चित किया जाए और माफी मांगी जाए। ऐसे में माफी का रास्ता भी धर्म ने बनाया है। दूसरे धर्मों में भी तरह-तरह के इंतजाम आत्मा पर लगे दाग-धब्बे छुड़ाने के लिए ईश्वर के एजेंटों और डीलरों ने निकाल रखे हैं। किसी पाप के लिए गऊदान, तो किसी के लिए सोने की बिल्ली बनवाकर चढ़ाना, और फिर जहां लोग डीलर और एजेंट से बात नहीं करते हैं वहां लोग खुद ही यह तय कर लेते हैं कि किस पाप के लिए कितना बड़ा प्रायश्चित ठीक होगा। कुछ लोग चींटियों को आटा डालना काफी समझते हैं, कुछ लोग गाय और कुत्ते को रोटी जितना बड़ा उपकार करते हैं, और कुछ लोग केवल ऐसे ही मौकों पर कुष्ठ रोगियों की बस्तियां, अनाथाश्रम और भिखारियों के डेरे ढूंढते हैं।
बहुत से ऐसे लोग होते हैं जो कि कुछ गलत कामों के करने की तैयारी के साथ-साथ ही इस तरह का प्रायश्चित खरीदने लगते हैं। जैसे मुंबई में माफिया डॉन हाजी मस्तान खुद भी हज कर आया था, एंबुलेंस चलवाता था, और दूसरे गरीबों को हज जैसी तीर्थयात्रा में मदद भी करता था। उसके लिए यह एक किस्म की बीमा पॉलिसी थी जो कि उसने अपने आने वाले कुकर्मों के लिए खरीदकर रखी थी। मुंबई की ही कहानी एक बड़े स्मगलर और माफिया डॉन वरदराजन उर्फ वरदा की है जिसका गणेशोत्सव में से एक होता था। ऐसा कभी भी नहीं हुआ कि उसके पंडाल से उठकर गणेश विसर्जन के पहले ही समंदर चले गए हों कि ऐसे जुर्म की कमाई के लड्डू वे नहीं खा सकते। मतलब यह कि एक मुजरिम-भक्त, और उसके लड्डुओं से कोई परहेज न रखने वाला उसका ईश्वर। मेरा पक्का भरोसा है कि मस्तान और वरदा ईश्वर की मेहरबानी से अपनी छाती पर बिना किसी बोझ के सोते होंगे क्योंकि ईश्वर को खुश करने का इंतजाम वे जुर्म के साथ-साथ, जुर्म के पहले, और जुर्म के बाद करते ही रहते थे। और इसके बाद में पूरी जिंदगी उनका कोई नुकसान न होने से यह बात तो लगती ही है कि बीमा पॉलिसी खरी थी।
एक नास्तिक के रूप में मेरा अनुभव यह है कि आस्था की ऐसी लॉन्ड्री की सुविधा नास्तिक को नहीं रहती उसके पास किसी नतीजे पर पहुंचने के लिए तर्क और विज्ञान का ही रास्ता रहता है और ये रास्ते किसी भी आस्था के मुकाबले अधिक न्यायसंगत होते हैं। हो सकता है कि अमरीका के जिस बच्चे से आज की यह बात शुरू हुई है वह आस्तिक भी रहा हो, आस्तिकों में अच्छे लोग नहीं होते हैं ऐसी बात नहीं है, लेकिन आस्तिकों में जो खराब होते हैं उनके पास भी अपनी खराबी के बोझ से छुटकारा पाने का एक अच्छा रास्ता हमेशा ही रहता है। बहुत से तो ऐसे आस्तिक मेरे देखे हुए हैं जो कि किसी गलत काम को करने के ठीक पहले से ईश्वर को कुछ किस्म की मनौतियों के मार्फत एक किस्म का भागीदार ही बनाकर चलते हैं।
इसलिए ऐसा लगता है कि अपनी गलती या अपने गलत काम के लिए माफी मांगने का काम करने वाला यह इंसान शायद नास्तिक रहा हो।
खैर उस ईश्वर की अधिक चर्चा क्या करना जिसके ऊपर से देखते हुए निठारी में बलात्कारी हत्यारे एक-एक करके दर्जनों बच्चों को निपटाते रहे और खुले आसमान के नीचे वे लाशें एक पर एक थप्पी बनती रहीं। आज की यह चर्चा उन लोगों के लिए अधिक है जो ईश्वर से ऐसा प्रोटेक्शन प्लान खरीदकर बैठे हैं या फिर जरूरत पडऩे पर मजहब के रास्ते एक बाईपास सर्जरी करवाने की तैयारी रखते हैं। इन लोगों को एक बार यह सोचना चाहिए कि क्या ईश्वर को बीच में लाए बिना अपनी गलतियों का पूरी तरह अहसास करके, उसके लिए अफसोस, माफी और भरपाई करके वे एक बेहतर काम कर सकते हैं, बजाय ईश्वर के दरबार में जाकर मामला निपटाने के।
और आस्तिक या नास्तिक इस बात को छोड़ भी दें, तो लोगों को अपने मिजाज में इतनी नरमी तो लानी ही चाहिए कि वे उन लोगों से माफी मांगने में शर्म महसूस न करें जिनका उन्होंने दिल दुखाया है, या जिनका नुकसान किया है। और इस बात को भी यहां पर कहना ठीक होगा कि जैसा कि लंबे समय से कहा जाता है कि कोई भी माफी किंतु-परंतु के साथ की नहीं होनी चाहिए, माफी पूरे खुले दिल से और ईमानदारी से मांगी हुई होनी चाहिए और उसी से भले लोगों की छाती पर बैठा हुआ बोझ हल्का होता है। जिनकी छाती का बोझ हल्का करने के लिए ईश्वर नाम का एक कुली मौजूद है, उनके बारे में अब हम क्या कहें।

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