बच्चों के यौनशोषण को अब तो हकीकत मानें


14 मई 2012
संपादकीय
जिन लोगों को कई बरसों से इसी जगह पर लगातार हमारे लिखे हुए का असर न हुआ हो, उन लोगों को भी कल शायद टेलीविजन के एक कार्यक्रम में आमिर खान के उठाए हुए मुद्दे में गंभीरता लगेगी। पिछले हफ्ते आमिर खान ने कन्या भू्रण हत्या के खिलाफ बातें कीं, तो देश के कई तबकों में उस पर चर्चा होने लगी और हमने भी समाज में सकारात्मक फेरबदल के लिए किसी भी प्रेरणास्रोत के सामने आने पर इसी कॉलम में खुशी जाहिर की थी। कल उन्होंने बच्चों के यौन शोषण का मुद्दा उठाया और मनोचिकित्सकों से लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं तक से बातें कीं। उनकी शोहरत का भी कुछ असर होगा कि उन्होंने जब तीन बरस से दस बरस तक के बच्चों से बात करके उन्हें यह समझाया कि किस तरह उन्हें देहशोषण के मामले में सावधान रहना चाहिए तो देश में बहुत से परिवारों मेें इसे लेकर असुविधा हुई होगी। लेकिन हमारा मानना है कि भारत का दकियानूसी समाज जिस सच को अनदेखा करके अपने-आपको महफूज पाता है, उसे इसी तरह झकझोरने की जरूरत है, और बार-बार झकझोरने की जरूरत है। इस अखबार में हम इसीलिए दुनिया के बच्चों पर छाए हुए इस खतरे की बात हर कुछ महीनों में छेड़ते हैं कि किसी न किसी दिन तो मां-बाप को लगेगा कि शायद उन्हें अपने बच्चों को लेकर एक सावधानी बरतने की जरूरत है। 
बच्चों का देहशोषण दुनिया की एक शर्मनाक हकीकत है, और इस जुर्म के शौकीन लोग अपनी बीमार मानसिकता के साथ रात-दिन ऐसे मौके ढूंढते रहते हैं कि उन्हें बच्चों के करीब पहुंचने मिले। दो-चार बरस उम्र से ही बच्चों पर ऐसा खतरा मंडराने लगता है जो उनके वयस्क हो जाने तक जारी रहता है। इसके बाद के लिए वे खुद जवाबदेह भी रहते हैं और किसी नौबत से निपटने के लिए खुद काबिल भी रहते हैं। आंकड़ों का अंदाज बताता है कि हिंदुस्तान में करीब आधे बच्चे अपना बचपन पार करते हुए ऐसे शोषण के शिकार हो चुके रहते हैं। और इन बच्चों को खतरों से बचाने के लिए जो लोग लगे रहते हैं, उनका अध्ययन यह कहता है कि इन बच्चों को सबसे बड़ा खतरा उन लोगों से रहता है जिनकी इन बच्चों तक पहुंच रहती है। घर के लोग, रिश्तेदार, पड़ोसी, पारिवारिक मित्र और स्कूल के शिक्षक या हॉस्टल के लोग। ऐसे आसपास के लोगों से ही बच्चों का देहशोषण पूरी दुनिया में एक बड़ा खतरा है और अमरीका जैसे देश अगुवाई करके इंटरनेट पर बच्चों को फंसाने वालों को पूरी दुनिया से पकड़ रहे हैं और उन पर मुकदमे चला रहे हैं। दुनिया के अधिक जिम्मेदार देशों में इसके लिए अलग से कड़े कानून हैं, लेकिन भारत में इस पर सेक्स अपराध से जुड़े हुए साधारण कानून ही हैं। 
हम बार-बार इस बात को लिखते हैं कि भारतीय समाज में मां-बाप अपने छोटे बच्चों की शिकायतों को झूठा मानते हुए उन्हें डांटकर चुप करा देते हैं। जबकि कल की ही खबर है कि किसी दादा ने अपनी ही दो बरस की पोती के साथ बलात्कार किया। ऐसे बहुत से मामले होते हैं और लोगों को अपने बच्चों के मुकाबले दूसरे बड़े लोगों पर अधिक भरोसा रहता है, और बच्चों को यह समझ भी नहीं आता कि वे शिकायत लेकर कहां जाएं। अभी तक की बातें तो परिवार के भीतर के देहशोषण की हैं लेकिन भारत में लाखों बच्चे हर बरस देह के धंधे में उतार दिए जाते हैं और चकलाघरों का संगठित अपराध पुलिस और दूसरी एजेंसियों को इस हद तक जेब में रखता है कि कमउम्र बच्चों के साथ ऐसी ज्यादती भी लगभग हर मामले में दबी ही रह जाती है। 
इन दोनों किस्म की बातों को देखें तो लगता है कि भारत जब तक बच्चों के शोषण की हकीकत को मंजूर नहीं करेगा तब तक वह इसके किसी इलाज की तरफ भी एक कदम नहीं बढ़ा पाएगा। चाहे एक फिल्मी सितारे के असरदार कार्यक्रम से ही सही, इस बारे में बात आगे बढऩी चाहिए और जैसा कि जानकारों और विशेषज्ञों का कहना है, तीन बरस की उम्र से ही बच्चों को यह सावधान करने की जरूरत है कि उनके साथ कोई लोग अगर खिलवाड़ करते हैं तो इस बात को उन्हें किस तरह मां-बाप को और दूसरे जिम्मेदार लोगों को बताना चाहिए। यहां पर इस बात को फिर लिखने का हमारा मकसद यह है कि इसे पढऩे वाले लोग अपने आसपास के दायरे में इसकी चर्चा करें और हर बच्चे को इस खतरे से बचाने की कोशिश भी करें।

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