15 जुलाई 2012


15 जुलाई 2012


15 जुलाई 2012


एक दिन के कुछ अखबारों की कुछ सुर्खियां, एक नजर में


15 जुलाई 2012
संपादकीय
0 तिलकडीह। पिंकी पर जुल्म से उसके गांव में गुस्सा और हैरत
0 गरियाबंद। युवती के हाथ-पांव बांधे और फिर उठा ले गए नक्सली
0 गुवाहाटी। बदसलूकी करने वालों ने लड़की को सिगरेट से भी जलाया
0 असम। जंगल गश्त के दौरान सेना के जवानों ने किशोरी से की छेड़छाड़
0 तिल्दा-नेवरा। विवाहित युवती ने आग लगाकर की खुदकुशी, दहेज प्रताडऩा का आरोप
0 भिलाई। चरित्र संदेह पर ली पत्नी और बच्चे की जान
0 भोपाल। एनआरआई दुल्हें ने दिया धोखा, पहले से था शादीशुदा
0 बेंगलुरू। डेंटिस्ट पति ने पत्नी को मूत्र पीने को किया मजबूर
0 रांची। पांच साल की बच्ची को गर्म चाकू से दागा, तीन माह पूर्व खाला ने बच्ची को 11 हजार में बेच दिया था
0 उस्मानाबाद। बदनामी का खौफ, आत्मदाह करने वाली लड़की की मौत
0 अहमदाबाद। महिला ने पुलिस पर लगाया दुष्कर्म का आरोप
0 भोपाल। ऑपरेशन के दौरान पेट में छूटा कपड़ा, महिला की मौत
0 गुवाहाटी। लड़की से सरेआम जुल्म के लिए टीवी पत्रकार ने उकसाया था
0 कोलकाता। छात्राओं से कहा गया कपड़े उतारो
0 रतनपुर। चीरहरण का एमएमएस...
0 राजिम। नहीं मिला नाबालिग अपहृत छात्रा का सुराग
0 जशपुर। जशपुर में भी नाबालिग छात्रा का अपहरण
0 कोलकाता। पिंकी पर रेप का आरोप ज्योतिर्मय सिकदर के पति अवतार सिंह के कहने पर लगाया था
0 नई दिल्ली। कोख से आ रही कराह क्यों नहीं सुन पाते हम, कन्या भू्रण हत्या रोकने का कानून दम तोड़ रहा
0 नई दिल्ली। अस्पताल में प्रसव के लिए आई महिला से दुष्कर्म की कोशिश
0 बीजापुर। राशन ढोकर 24 किलोमीटर पैदल ले जाती महिलाएं
0 मुरादाबाद। बलात्कार के आरोप में बड़ी संख्या में पुलिस जेल में
0 गुवाहाटी। लड़की पर सरेआम जुल्म में कांगे्रस नेता का हाथ-अखिल गोगोई
0 अहमदाबाद। एनआरआई महिला ने सीआईडी हिरासत में करोड़ों की जमीन के कागजों पर दस्तखत करवाने के लिए अफसरों द्वारा रेप का आरोप लगाया
0 नई दिल्ली। पन्द्रह बरस की लड़की से बलात्कार
0 नई दिल्ली। तेरह बरस की लड़की से बलात्कार
0 गुजरात। लड़की को नशा कराकर बलात्कार, वीडियो फिल्म बनाई, फैलाई
0 बंगाल। उत्तरी चौबीस परगना के एक गांव में 33 महिलाओं से बलात्कार, विरोध करने वाले की हत्या के 10 बरस पूरे हुए
0 तमिलनाडु। भूतपूर्व डीएमके विधायक नौकरानी से बलात्कार, हत्या में गिरफ्तार
0 अहमदाबाद। किराए की कोख वाली गर्भवती महिला से अपहरण और बलात्कार मामले में नया मोड़
0 नागपुर। सोलह बरस की लड़की से बलात्कार, युवक गिरफ्तार
0 हुगली (बंगाल)। यौन प्रताडऩा के बाद महिला की हत्या से पता लगा कि पुर्नवास केंद्र की विचलित, गूंगी, बहरी महिलाओं से बाहरी लोगों द्वारा नियमित रूप से बलात्कार
0 बहरामपुर (उड़ीसा)। नौ बरस की भूखी, पीटी जाती घरेलू नौकरानी से बदन पर जलाने के निशान
0 अमृतसर। गोद ली गई सात साल की बच्ची से पिता द्वारा बलात्कार की कोशिश, मां ने की बच्ची की हत्या
0 जयपुर। दो नवजात कन्याएं फेंकी गईं, ट्रेन के डिब्बे के शौचालय की सीट से फेंकी गई बच्ची ने रेलवे पटरी पर दम तोड़ा
0 मुंबई। सेक्स अपराधों की शिकार महिलाएं प्रताडऩा और अपमान के डर से शिकायत करने में पीछे
0 उत्तरप्रदेश। अजीत सिंह के बेटे ने महिलाओं के खिलाफ खाप पंचायत के तालिबानी फैसले का समर्थन किया
0 पूर्णिया। पे्रमी जोड़े को घर के बाहर घसीटा, रस्सियों से बांधा मारा, गर्म सलाखों से दागा
0 अहमदाबाद। इशरत जहां मुठभेड़ हत्या के जांच अफसर की कमर टूटी
0 नासिक। सोलह बरस की आदिवासी लड़की बलात्कार के बाद 23 हफ्ते की गर्भवती पाई गई
0 नई दिल्ली। तेजाब हमले की शिकार सोनाली ने इंसाफ पाने की 9 बरस लंबी  कोशिश में निराशा के बाद मरने की इजाजत मांगी
0 पाकिस्तान। दो दिन की बच्ची जिंदा दफन की
0 दक्षिण भारत। पिता ने नवजात बेटी को बदसूरत मानकर जिंदा दफन किया
0 नई दिल्ली। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि बच्चियों से सर्वाधिक बलात्कार मप्र में
0 नई दिल्ली। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि बच्चों से बलात्कार देश में 29.7 फीसदी बढ़े, मप्र, उप्र और महाराष्ट्र में देश भर के 44 फीसदी से अधिक
0 बिहार। अररिया जिले में महिला ने 62 रूपये में बच्चा बेचा
0 उत्तरप्रदेश। महिलाओं के बाजार जाने और फोन रखने पर रोक लगाने के खाप के खतरे का और पार्टियों, संगठनों ने समर्थन किया
0 कोरबा। गाज गिरने से महिला की मौत
हे राम ! 
हजारों बरस पहले एक पति ने अपनी समर्पित पत्नी पर जुल्म करके उसे घर से निकाल दिया था, तबसे अब तक महिलाओं पर तरह-तरह के जुल्म जारी हैं।

कड़वी जुबान का बेमौसम नाजायज बेजा इस्तेमाल


14 जुलाई 2012
संपादकीय
पूरी दुनिया में असम की राजधानी गुवाहाटी में सड़क पर एक लड़की से हुई सामूहिक बदसलूकी को लेकर थू-थू हो रही है, और वहां के राज्य के पुलिस प्रमुख का अपराधियों को पकडऩे को लेकर कहना है कि पुलिस कोई एटीएम नहीं है कि जिसमें कार्ड डालो और अपराधी निकालो। इसी तरह की बात केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने महंगाई और मध्यम वर्ग को लेकर दो-चार दिन पहले कही। बस्तर की एक मुठभेड़ में सीआरपीएफ के हाथों डेढ़ दर्जन से अधिक बेकसूर आदिवासियों के मारे जाने के बाद एक बहुत हैवानी बात केंद्रीय गृह सचिव ने कही किसी जांच की जरूरत नहीं है। कुछ इसी तरह की बात इस मुठभेड़ के तुरंत बाद सीआरपीएफ के मुखिया ने कही। इन मुद्दों पर हम मोटे तौर पर पहले लिख चुके हैं, लेकिन अब बात आती है लोगों की जुबान की। खासकर ऐसे मौके पर जब जनता के एक बड़े तबके की भावनाएं बहुत बुरी तरह घायल हैं, तब किसी सच को कितने कड़वे सच की तरह कहा जाए, और लोगों के जख्मों पर नमक छिड़कने को कितना जायज कहा जाए? 
सार्वजनिक जीवन में कोई नेता हो या अफसर, या कोई अखबारनवीस ही हो, गमी के मौके पर कुछ कहने या लिखने के पहले यह सोचना जरूरी होता है कि बोलचाल की जुबान में हर सच कानूनी दर्जे का सच हो जाना काफी नहीं होता, उसके साथ-साथ लोगों की भावनाओं का इतना ख्याल रखना तो जरूरी होता है कि गैरजरूरी तरीके से किसी के जख्मों पर रेतकागज और नहीं रगड़ा जाए। यह बात सही है कि हम कई मौकों पर लिखते भी हैं कि जांच कर रही या मुजरिमों की तलाश कर रही पुलिस पर गैरजरूरी दबाव बनाने से उसके काम पर आंच भी आती है, और ऐसा नहीं करना चाहिए। लेकिन दूसरी तरफ भारतीय लोकतंत्र में यह एक हकीकत बन गई है कि जनदबाव अगर न रहे तो जांच एजेंसियां राजनीतिक दबाव या भ्रष्टाचार के चलते मुजरिमों को बच जाने का मौका भी बहुत बार देती हैं। इसलिए कई मौकों पर जनदबाव काम भी आता है। पाठकों को याद होगा कि कुछ हफ्ते पहले बिहार में जब रणवीर सेना का संस्थापक, एक माफिया मुजरिम जब मारा गया तो वहां राजनीतिक दलों से लेकर सरकार तक ने अपनी जुबान पर काबू रखा। इस मुखिया के समर्थकों ने जब बिहार की सड़कों पर आगजनी की, तब भी सरकार ने उनके साथ कुछ नरमी ही बरती, क्योंकि उनके समर्थक आहत थे और वैसे में उन पर कड़ी कार्रवाई से मामला और भड़कता। लेकिन कल असम के डीजीपी ने जिस जुबान में बात कही या उनके पहले कई और मौकों पर कई और नेता-अफसर संवेदनाशून्य बात कहते हैं, वह भयानक रहती है और उसके सच होने के बावजूद उसमें इतनी अधिक गैरजरूरी कड़वाहट रहती है कि उसके भीतर का तर्क और तथ्य खो जाता है, सिर्फ बदजुबानी सामने रह जाती है। 
इसलिए सार्वजनिक जीवन में जब संबंधित लोग किसी नाजुक मौके पर कुछ कहते हैं, तो उन्हें घायल लोगों के दिल-दिमाग की हालत के बारे में भी सोचना चाहिए। लापरवाह भाषा और गैरजरूरी सच को जो लोग अपनी खूबी मानते हैं, उनको यह समझना चाहिए कि ऐसा बेजा इस्तेमाल बाद में उस जुबान को असरदार भी नहीं रख छोड़ता। इसलिए कोड़े जैसी भाषा को दुष्ट लोगों पर उसी वक्त चलाना चाहिए जब वे दुष्ट किसी हमदर्दी के हकदार न हों। गांधी समेत बहुत से महान लोगों ने समय-समय पर अलग-अलग शब्दों में कहा है कि सच कहो, लेकिन कड़वा सच मत कहो। कड़वा सच किसी बीमारी के कीटाणु या जीवाणु मारने के लिए तो इस्तेमाल होना चाहिए, कुनैन की तरह, लेकिन वह मरीज को मारने के लिए इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। आज सत्ता में बैठे लोग बहुत बार यही काम कर रहे हैं। 

देशी तालिबान


13 जुलाई 2012
संपादकीय
असम की राजधानी गुवाहाटी में कल शाम सड़क पर एक अकेली लड़की को एक -दो दर्जन लड़कों ने घेर लिया और सड़क पर ही उसके कपड़े फाड़े उसके साथ हर किस्म की शारीरिक बदसलूकी की। और यह सब एक या अधिक वीडियो कैमरों की रिकॉर्डिंग में इन लड़कों के चेहरों सहित दर्ज होते रहा। इसमें कुछ अरसा तो ये लड़के फख्र के साथ अपना चेहरा दिखाते भी रहे और इस अकेली लड़की की तरफ उंगलियों से इशारा भी करते रहे। भारत शायद दुनिया की बलात्कार राजधानी बन चुका है, और अफ्रीका के कुछ देशों में जहां फौज या हथियारबंद बागी बलात्कार को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं, उनको अगर छोड़ दें, तो भारत जैसे बलात्कार दुनिया के और किसी देश में सुनाई नहीं पड़ते। जिस वारदात को लेकर आज हम यहां लिख रहे हैं वह एक साधारण बलात्कार से कहीं अलग है, अधिक भयानक है और उसके सार्वजनिक पहलू को अलग से समझने की जरूरत है। जब सड़क पर चलते हुए गाडिय़ों के ट्रैफिक के बीच एक राज्य की राजधानी में सड़क पर खुलकर दर्जनों लोग एक अकेली लड़की पर सैकड़ों लोगों के बीच हमला करते हैं और उसके बदन के साथ हर तरह की बदसलूकी करते हैं, तो यह नौबत सिर्फ इन कुछ दर्जन लोगों की सोच नहीं बताती, यह एक राजधानी में लोगों के दुस्साहस को भी बताती है, कानून के लिए उनकी हेठी भी बताती है, और वहां से गुजरते हुए सैकड़ों गाड़ी वाले शहरी नागरिकों की बेफिक्री भी बताती है कि अगर उनके घर की लड़की-महिला पर हमला नहीं हो रहा है, तो उनको फिक्र की जरूरत नहीं है। 
अब यह सोचें कि एक लड़की पर कैमरे के सामने इस तरह की हरकत करने वाले लोगों का दिमागी हाल कैसा है? इस हाल के बारे में दिल्ली में पुलिस कमिश्नर से बड़े ओहदे पर बैठे हुए लोग एक से अधिक बार गैरजिम्मेदारी से यह कह चुके हैं कि रात होने के बाद लड़कियां और महिलाएं अकेले न निकलें, और ऐसे कपड़े न पहनें जिनसे  कि उन पर यौन हमलों की नौबत आए। इनमें से दूसरी बात से हम कुछ हद तक सहमत हैं कि कानून चाहे लोगों को किसी भी तरह के कपड़े पहनने की छूट, शालीनता की सीमा के भीतर, देता है, लेकिन लोगों को अपने शहर, अपने इलाके की संस्कृति को भी ध्यान में रखना चाहिए। लेकिन लड़कियां और महिलाएं रात में अकेले न निकलें, बयान का यह हिस्सा गैरजिम्मेदारी का है, और दिल्ली जैसे शहर में जहां पर कि दस लाख से अधिक लड़कियां और महिलाएं अलग-अलग किस्म के कामकाज से शाम से लेकर सुबह तक आती-जाती हैं, वहां पर उन्हें किसी पुरूष के साथ निकलने की सलाह देना, समाज में महिलाओं के बराबरी के मौकों को नकारने के बराबर है, शायद उससे अधिक है। पुलिस का ऐसा कहना यह बताता है कि देश की राजधानी में भी कानून का इंतजाम बहुत कमजोर है। देश भर के जितने पर्यटन केंद्र हैं, उन पर समय-समय पर बलात्कार होते रहते हैं, और बहुत से मामले अदालतों और खबरों तक पहुंचते नहीं, इसलिए तस्वीर कितनी भयानक है इसका सही अंदाज नहीं लगता। अभी-अभी योरप के एक बड़े देश ने अपने लोगों को भारत आते हुए जो सावधानियां बरतने को कहा गया है उनमें भी यह जिक्र है कि यहां पर विदेशी महिलाओं पर सेक्स-हमले हो सकते हैं। 
भारत में लड़कियों के फैशन, उनके जीने के तरीके, उनके खाने-पीने और नाच-गाने को लेकर एक पाखंडी भारतीय संस्कृति का दावा करने वाला साम्प्रदायिक अपराधी पहले भी जगह-जगह उन पर हमले करते आए हैं। वे हमले कल आधे घंटे चले इस सार्वजनिक हमले की तरह के नहीं थे, लेकिन वे महिलाओं पर हमले तो थे ही। इसी किस्म की सार्वजनिक मारपीट की रिकॉर्डिंग कुछ बरस पहले कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू से सामने आई थी जहां पर श्रीराम सेना के गुंडों ने एक पब से निकलती लड़कियों को पीटा था और आधुनिक जीवनशैली का विरोध किया था। देश में जगह-जगह, जिनमें छत्तीसगढ़ भी शामिल है, वेलेंटाइन-डे या नए बरस के मौके पर लड़के-लड़कियों को मिलने से रोकने का काम कुंठा में जीने वाले दकियानूसी लोग भी करते हैं और इन मौकों को ईसाई त्यौहार मानने वाले ईसाई-विरोधी साम्प्रदायिक संगठन भी करते हैं। इन सबका हमला आमतौर पर एक लड़की या महिला पर ही होता है। लेकिन जब ऐसे हमलावर वीडियो रिकॉर्डिंग के बाद भी बरसों तक सार्वजनिक जीवन में नेताओं की तरह पेश होते रहते हैं, और कानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ता तो फिर दूसरे लोगों को भी ऐसे अपराध करके मजा लेने या खबरों में आने का उत्साह मिलता है। कल की ही एक और खबर है। उत्तरप्रदेश में एक पंचायत ने पे्रम-विवाहों पर रोक लगाने का फैसला लिया है और साथ ही उन्होंने चालीस बरस से कम उम्र की महिलाओं के बाजार जाने पर रोक की घोषणा भी की है। उन्होंने लड़कियों को मोबाईल फोन के इस्तेमाल पर भी रोक लगाई है। यह इलाका केंद्रीय विमान मंत्री अजीत सिंह के लोकसभा क्षेत्र का है। 
दरअसल जब तक कानून असरदार नहीं होगा, उसके आधार पर होने वाले फैसले समय पर नहीं होंगे, जब तक जांच एजेंसियों और मुकदमा एजेंसियों से भ्रष्टाचार कम नहीं होगा, जब तक निचली अदालत से लेकर ऊपर की अदालत तक पलटने वाले फैसलों की दूरी घटेगी नहीं, तब तक न सिर्फ सेक्स-अपराधियों के हौसले बने रहेंगे बल्कि कुछ दूसरे सामाजिक कारणों की वजह से इनमें बढ़ोतरी भी होती चलेगी। शहरीकरण और औद्योगिकीकरण के चलते बहुत से लोग अकेले रहने पर मजबूर होते हैं, और ऐसे में उनकी देह की जरूरतें कभी तो बाजार में खरीददारी से पूरी हो जाती हैं, कभी वे आसपास बच्चों पर हमले करते हैं, और कभी वे सड़कों पर इस तरह के खूंखार गिरोहबंद हमले करते हैं जो कि पूरी दुनिया में भारत की बदनामी की एक बड़ी वजह बन जाते हैं। लोगों को याद होगा कि दो ही दिन पहले अफगानिस्तान में तालिबान ने एक महिला पर बदचलनी का आरोप लगाकर भरी भीड़ के बीच उसे गोलियों से भून डाला, और उसकी वीडियो रिकॉर्डिंग इंटरनेट पर आकर पूरी दुनिया को हिला गई। अफगानिस्तान में तो कानून का राज अभी असरदार नहीं है, लेकिन भारत के असम में तो उस पार्टी का राज है जो पिछली आधी सदी में अधिकतर समय एक या दूसरी महिला नेता के मातहत काम करती रही है। कांगे्रस के राज वाले असम की राजधानी में सरेशाम ऐसा होना एक बहुत बड़े सदमे की बात है। और जहां तक हमले की शिकार इस लड़की के कपड़ों की बात है तो इस वारदात की वीडियो रिकॉर्डिंग देखें तो उसके कपड़े कहीं से भी अश्लील या उत्तेजक नहीं दिखते। इसलिए  इन हमलावरों को बलात्कार के कानून के तहत मुमकिन सबसे कड़ी सजा देनी चाहिए और गिरोहबंदी करके किसी निहत्थे पर हमला करने के लिए भी सजा देनी चाहिए। इसके अलावा देश और प्रदेशों की सरकारों को ऐसे हमलों को रोकने के लिए खास बैठक बुलाकर अपने इंतजाम एक बार फिर देखने चाहिए क्योंकि इसके बिना समाज में लड़कियां कभी भी बराबरी से आगे नहीं बढ़ पाएंगी। राष्ट्रीय और प्रादेशिक स्तर पर महिला आयोगों को, महिला पुलिस को इस वारदात से सबक लेकर यह देखना चाहिए कि उनके अपने इलाके ऐसी घटनाओं के कितने खतरे वाले हैं, और सरकारी इंतजाम उनको रोकने के लिए पुख्ता हैं या नहीं। ऐसे एक हमले के बाद, ऐसी एक वारदात के बाद अनगिनत दूसरी लड़कियां अपने परिवारों की बंदिशें झेलने लगती हैं। यह जिम्मेदारी सरकार की है कि सार्वजनिक जगहों पर हर लड़की और महिला हिफाजत से रह सके, और जहां उनके आने-जाने का वक्त अंधेरे के बाद का हो, वहां उनके लिए अलग से सुरक्षा का इंतजाम किया जाए।

12 जुलाई 2012


ट्रस्टों की दौलत, सफेदपोश लुटेरे बेहतर, या सरकारें?


संपादकीय
12 जुलाई 2012
जेडीयू अध्यक्ष शरद यादव ने मंदिरों में जमा दसियों हजार करोड़ की संपत्ति को लेकर कहा है कि सरकार तुरंत इस संपत्ति पर कब्जा करे और इसका इस्तेमाल तीर्थ स्थानों के विकास में किया जाना चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर देते हुए कहा कि मंदिरों में जमा पैसा जनता का पैसा है और लोकतंत्र ने जनता के पैसे का इस्तेमाल जनता के हितों के लिए किया जाना चाहिए। इसके लिए कानून बनाए जाने की जरूरत है। जेडीयू नेता के मुताबिक अगर मंदिरों में जमा राशि को धार्मिक स्थानों के विकास पर खर्च किया जाएगा तो इससे पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, साथ ही रोजगार के अवसर पैदा होंगे जिससे खुशहाली आएगी।
देश भर में न सिर्फ मंदिरों में बल्कि तरह-तरह के धार्मिक ट्रस्टों में, और कई तरह के दान पर चलने वाली संस्थाओं में खूब पैसा जमा है और सफेदपोश लुटेरे उसे हड़प कर रहे हैं। हम यहीं से मिसाल शुरू करें तो छत्तीसगढ़ में कई जगहों पर मठों की जमीनों पर और दौलत पर सामाजिक नेताओं और ताकतवर लोगों का कानूनी-गैरकानूनी कब्जा ऐसा है मानो वह उनकी निजी मिल्कियत हो। राजधानी रायपुर में ही बहुत महंगी, चर्च की जमीन को बेचने के मामले में ईसाई समुदाय के लोग ही सड़कों पर हैं और जमीन माफिया ने उसे खरीद लिया है। इसी तरह का काम मुस्लिम समाज ने वक्फ की जमीन का होता है जिसके खिलाफ अभी कुछ दिन पहले ही लोगों ने मुख्यमंत्री से मिलकर शिकायत की है। राज्य में दान-धर्म और आस्था के नाम पर बने और चल रहे संगठनों की जमीनों को बेच खाने को लेकर जिला अदालतों से लेकर हाईकोर्ट तक हजारों मामले चल रहे हैं, और जो लोग समाज में अपने-आपको बहुत इज्जतदार साबित करते हैं, वे लोग इस लूटमार के मुखिया हैं। सरकारी नियमों के मुताबिक वैसे तो राज्य सरकार, और उसके प्रतिनिधि के रूप में कलेक्टर को ऐसे तमाम ट्रस्टों को लेकर बड़ी कार्रवाई करने के बड़े-बड़े अधिकार मिले हुए हैं, लेकिन इतिहास यह बताता है कि राजनीतिक दबाव के चलते या भ्रष्टाचार के चलते सरकारी अमला इस लूटमार की अधिक से अधिक समय तक अनदेखी करते चलता है। और यह बात सिर्फ छत्तीसगढ़ में हो ऐसा नहीं, देश भर में जगह-जगह यही नौबत है। उत्तरप्रदेश में अभी गुजर चुके जयगुरूदेव के ट्रस्ट की दस-बीस हजार करोड़ की दौलत पर किसी एक वसीयत के आधार पर किसी एक शिष्ट के काबिज हो जाने की खबर है। देश में ऐसा कड़ा कानून बनना और लागू होना चाहिए कि जनता के दान से जुटने वाली ऐसी दौलत पर सरकार की दखल हो। लेकिन यह सुझाव देते हुए यह भी लगता है कि क्या ऐसी दखल इस लूटमार में एक और हिस्सा साबित होगी? 
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में पिछले दस बरसों में यह देखने में आया कि बहुत सी रिहायशी कॉलोनियों में सरकार के एक ही भ्रष्ट छोटे अफसर को निर्वाचित सोसायटी की जगह प्रशासक बनाकर बिठाया गया और उसने उन कॉलोनियों की एक-एक इंच जमीन को गैरकानूनी तरीके से कुछ दिनों में ही बेच दिया। बार-बार ऐसे एक कुख्यात अफसर को सोच-समझकर सोसायटियों में बिठाकर करोड़ों की जमीन कागजों पर लाखों में बेचने के पीछे किसकी कैसी नीयत रही होगी, यह सबको आसानी से समझ आ जाता है। इसलिए अब सवाल यह उठता है कि धार्मिक या आध्यात्मिक ट्रस्टों में अगर सरकार की दखल और बढ़ेगी तो वह दखल सरकार के सबसे भ्रष्ट लोगों के हाथों में चली जाएगी या कि उससे जनता के दान का कुछ बेहतर इस्तेमाल होगा? शरद यादव की बात से हम सहमत हैं, लेकिन क्या सरकार के बिना एक व्यापक सामाजिक भागीदारी से ऐसे ट्रस्टों को एक अनिवार्य पारदर्शिता के साथ चलाना मुमकिन है? सरकार की साख इतनी गिरी हुई है कि लोग टैक्स चोरी करने को यह कहकर सही ठहराते हैं कि राजा-कलमाड़ी का घर भरने से बेहतर है कि अपना ही घर भरा जाए। लोग प्रधानमंत्री राहत कोष में दान देने से कतराने लगे हैं कि उसका पता नहीं किस तरह के लूटमार में इस्तेमाल हो। ऐसे में मंदिरों और दूसरे धर्म स्थानों की दौलत पर सार्वजनिक निगरानी और सरकारी काबू तो ठीक है, लेकिन सरकारें क्या समाज के सफेदपोश लुटेरों से बेहतर तरीके से इन ट्रस्टों को चलाएंगी?

खोटे सिक्कों से भरा सोनिया का बटुआ


संपादकीय
11 जुलाई 2012
कल जिस वक्त केंद्र सरकार के एक महत्वपूर्ण मंत्री सलमान खुर्शीद कांगे्रस लीडरशिप और पार्टी की दशा-दिशा के बारे में एक दिन पहले अपने दिए हुए सनसनीखेज और विवादास्पद बयान को लेकर सफाई दे रहे थे और मीडिया पर कम समझी और तोड़-मरोड़ की तोहमत लगा रहे थे। मानो कोई मुकाबला चल रहा हो और दूसरे लोग पीछे न रह जाएं, इस अंदाज में केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने कह डाला कि भारत का मध्यम वर्ग पन्द्रह रूपए की पानी की बोतल खरीद लेता है लेकिन चावल के दाम एक रूपए बढऩे पर उसे बर्दाश्त नहीं होता। आज चिदंबरम ने उस बात को लेकर मीडिया पर तोडऩे-मरोडऩे की तोहमत लगा दी है। कल जिन्होंने सलमान खुर्शीद को सफाई देते हुए सुना वे यह सुनकर और हक्का-बक्का रह गए कि वे मीडिया से कह रहे थे कि उसकी कमसमझ की वजह से वे जिन बातों को अब तक मीडिया में कहते आए थे अब पार्टी के भीतर कहना बेहतर समझेंगे। 
लोगों को याद होगा कि मनीष तिवारी से लेकर दिग्विजय सिंह तक और सत्यव्रत चतुर्वेदी से लेकर दूसरे कई कांगे्रस प्रवक्ताओं तक, वक्त-वक्त पर बेतुकी और भड़काऊ, आत्मघाती और ओछी बातें कहने को लेकर इनको जिम्मेदारियों से कभी अलग किया तो कभी इनकी बातों को खारिज किया गया। यह अंदाज लगाना बहुत मुश्किल है कि किसी एक नाजुक मामले में अपने ही साथी दलों या सहयोगी नेताओं के खिलाफ जहर उगलने की बेमौसम की बरसात करने वाले ये लोग किसी सोची-समझी बात के तहत पार्टी की राजनीतिक रणनीति चलाते हैं या फिर समाचार चैनलों के माईक्रोफोन और कैमरे दिखते ही उनको यह उम्मीद दिखने लगती है कि अधिक ऊटपटांग बात प्राइम टाईम पर कितने अधिक बार दिखाई जाएगी। यह सिलसिला कांगे्रस के लिए बहुत आत्मघाती तो है ही, देश के सार्वजनिक माहौल के लिए भी यह खतरनाक है। मीडिया के मार्फत लोगों का इतना वक्त इस निहायत गैरजरूरी जुबानी जमा-खर्च को पढऩे और देखने-सुनने में गुजरता है और असल मुद्दों की तरफ ध्यान जाने की गुंजाइश खत्म हो जाती है। 
कांगे्रस के नेताओं और प्रवक्ताओं ने अपने साथियों पर हमले करने में महारत हासिल कर ली है। कभी वे पवार पर हमला करते हैं, कभी ममता पर और कभी मुसीबत के साथी मुलायम को आरएसएस का एजेंट कहते हैं। जब कोई साथी दल नहीं बच जाता और जुबान की खुजली खत्म नहीं होती तो फिर सलमान खुर्शीद कभी चुनाव आयोग के खिलाफ बोलते हैं तो कभी अपनी ही पार्टी की दशा और दिशा को कोसते हैं। और पी. चिदंबरम देश की जनता, मध्यमवर्ग पर हमला करने लगते हैं। कल ही योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोटेंक सिंह अहलूवालिया ने अमरीकी पत्रिका टाईम द्वारा मनमोहन सिंह की आलोचना करने पर कहा कि मनमोहन सिंह तीन महीने में ही तस्वीर बदल देंगे। यह बयान अपने-आपमें बेतुका इसलिए है कि देश-विदेश में भारत की हालत के बारे में बहुत कुछ कहने वाले मनमोहन सिंह ने ऐसी कोई बात अगले तीन महीनों के बारे में नहीं कही है और क्या एक अमरीकी पत्रिका के भड़कावे में आकर अब इस देश का प्रधानमंत्री ओवरटाईम करके देश की अर्थव्यवस्था सुधारेगा? 
यूपीए सरकार और कांगे्रस पार्टी आए दिन ऐसी हरकतें कर रहे हैं जिनसे लगता है कि अगले चुनाव में इन्हें डर है कि कहीं यूपीए सत्ता पर लौट न आए। ऐसी नौबत न आए इसकी कोशिश में लगे हुए ये लोग दिखते हैं। इससे अलग हटकर एक दूसरा मामला सामने आया जिसमें हिमाचल के भूतपूर्व मुख्यमंत्री और यूपीए सरकार के मौजूदा केंद्रीय मंत्री वीरभद्र सिंह अदालत में भ्रष्टाचार का चालान पेश हो जाने के बाद हिमाचल में कांगे्रस के प्रचार अभियान के मुखिया बनाए गए हैं। यह लोकतंत्र पर थूक देने जैसा मामला है। अदालत से सजा तो जब होगी, तब होगी। और अदालत से कोई बरी भी हो सकता है। लेकिन सार्वजनिक जीवन में लंबी-चौड़ी जांच के बाद, रिकॉर्डिंग के आधार पर अगर कोई अदालत में अभियुक्त बनाया गया है, तो उसके बाद भी उसे पार्टी के किसी बड़े सार्वजनिक मोर्चे पर लीडर तैनात करना, जनता और कानून के लिए हिकारत के अलावा कुछ नहीं है। और हिकारत के लिए भारतीय कानून में किसी तरह की सजा नहीं है, वह कोई जुर्म नहीं है। ऐसा लगता है कि भ्रष्टाचार के अंतहीन मामलों से गुजरते हुए और कांगे्रस पार्टी में भ्रष्टाचार को लेकर एक बड़ी प्रतिरोधक शक्ति विकसित हो गई है, और इस नए बर्दाश्त के साथ कांगे्रस अब शायद दिग्विजय सिंह की उस घोषणा पर भी जल्द अमल कर ले कि पार्टी को कलमाड़ी की जरूरत हो। खोटे सिक्कों से भरा हुआ बटुआ लेकर सोनिया गांधी 2014 में जीत की खरीददारी करने निकलने वाली हैं, अब देखना है कि दुकानदारों की नजर क्या सचमुच इतनी धुंधली साबित होगी? 

10 जुलाई 2012