संपादकीय
11 जुलाई 2012
कल जिस वक्त केंद्र सरकार के एक महत्वपूर्ण मंत्री सलमान खुर्शीद कांगे्रस लीडरशिप और पार्टी की दशा-दिशा के बारे में एक दिन पहले अपने दिए हुए सनसनीखेज और विवादास्पद बयान को लेकर सफाई दे रहे थे और मीडिया पर कम समझी और तोड़-मरोड़ की तोहमत लगा रहे थे। मानो कोई मुकाबला चल रहा हो और दूसरे लोग पीछे न रह जाएं, इस अंदाज में केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने कह डाला कि भारत का मध्यम वर्ग पन्द्रह रूपए की पानी की बोतल खरीद लेता है लेकिन चावल के दाम एक रूपए बढऩे पर उसे बर्दाश्त नहीं होता। आज चिदंबरम ने उस बात को लेकर मीडिया पर तोडऩे-मरोडऩे की तोहमत लगा दी है। कल जिन्होंने सलमान खुर्शीद को सफाई देते हुए सुना वे यह सुनकर और हक्का-बक्का रह गए कि वे मीडिया से कह रहे थे कि उसकी कमसमझ की वजह से वे जिन बातों को अब तक मीडिया में कहते आए थे अब पार्टी के भीतर कहना बेहतर समझेंगे।
लोगों को याद होगा कि मनीष तिवारी से लेकर दिग्विजय सिंह तक और सत्यव्रत चतुर्वेदी से लेकर दूसरे कई कांगे्रस प्रवक्ताओं तक, वक्त-वक्त पर बेतुकी और भड़काऊ, आत्मघाती और ओछी बातें कहने को लेकर इनको जिम्मेदारियों से कभी अलग किया तो कभी इनकी बातों को खारिज किया गया। यह अंदाज लगाना बहुत मुश्किल है कि किसी एक नाजुक मामले में अपने ही साथी दलों या सहयोगी नेताओं के खिलाफ जहर उगलने की बेमौसम की बरसात करने वाले ये लोग किसी सोची-समझी बात के तहत पार्टी की राजनीतिक रणनीति चलाते हैं या फिर समाचार चैनलों के माईक्रोफोन और कैमरे दिखते ही उनको यह उम्मीद दिखने लगती है कि अधिक ऊटपटांग बात प्राइम टाईम पर कितने अधिक बार दिखाई जाएगी। यह सिलसिला कांगे्रस के लिए बहुत आत्मघाती तो है ही, देश के सार्वजनिक माहौल के लिए भी यह खतरनाक है। मीडिया के मार्फत लोगों का इतना वक्त इस निहायत गैरजरूरी जुबानी जमा-खर्च को पढऩे और देखने-सुनने में गुजरता है और असल मुद्दों की तरफ ध्यान जाने की गुंजाइश खत्म हो जाती है।
कांगे्रस के नेताओं और प्रवक्ताओं ने अपने साथियों पर हमले करने में महारत हासिल कर ली है। कभी वे पवार पर हमला करते हैं, कभी ममता पर और कभी मुसीबत के साथी मुलायम को आरएसएस का एजेंट कहते हैं। जब कोई साथी दल नहीं बच जाता और जुबान की खुजली खत्म नहीं होती तो फिर सलमान खुर्शीद कभी चुनाव आयोग के खिलाफ बोलते हैं तो कभी अपनी ही पार्टी की दशा और दिशा को कोसते हैं। और पी. चिदंबरम देश की जनता, मध्यमवर्ग पर हमला करने लगते हैं। कल ही योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोटेंक सिंह अहलूवालिया ने अमरीकी पत्रिका टाईम द्वारा मनमोहन सिंह की आलोचना करने पर कहा कि मनमोहन सिंह तीन महीने में ही तस्वीर बदल देंगे। यह बयान अपने-आपमें बेतुका इसलिए है कि देश-विदेश में भारत की हालत के बारे में बहुत कुछ कहने वाले मनमोहन सिंह ने ऐसी कोई बात अगले तीन महीनों के बारे में नहीं कही है और क्या एक अमरीकी पत्रिका के भड़कावे में आकर अब इस देश का प्रधानमंत्री ओवरटाईम करके देश की अर्थव्यवस्था सुधारेगा?
यूपीए सरकार और कांगे्रस पार्टी आए दिन ऐसी हरकतें कर रहे हैं जिनसे लगता है कि अगले चुनाव में इन्हें डर है कि कहीं यूपीए सत्ता पर लौट न आए। ऐसी नौबत न आए इसकी कोशिश में लगे हुए ये लोग दिखते हैं। इससे अलग हटकर एक दूसरा मामला सामने आया जिसमें हिमाचल के भूतपूर्व मुख्यमंत्री और यूपीए सरकार के मौजूदा केंद्रीय मंत्री वीरभद्र सिंह अदालत में भ्रष्टाचार का चालान पेश हो जाने के बाद हिमाचल में कांगे्रस के प्रचार अभियान के मुखिया बनाए गए हैं। यह लोकतंत्र पर थूक देने जैसा मामला है। अदालत से सजा तो जब होगी, तब होगी। और अदालत से कोई बरी भी हो सकता है। लेकिन सार्वजनिक जीवन में लंबी-चौड़ी जांच के बाद, रिकॉर्डिंग के आधार पर अगर कोई अदालत में अभियुक्त बनाया गया है, तो उसके बाद भी उसे पार्टी के किसी बड़े सार्वजनिक मोर्चे पर लीडर तैनात करना, जनता और कानून के लिए हिकारत के अलावा कुछ नहीं है। और हिकारत के लिए भारतीय कानून में किसी तरह की सजा नहीं है, वह कोई जुर्म नहीं है। ऐसा लगता है कि भ्रष्टाचार के अंतहीन मामलों से गुजरते हुए और कांगे्रस पार्टी में भ्रष्टाचार को लेकर एक बड़ी प्रतिरोधक शक्ति विकसित हो गई है, और इस नए बर्दाश्त के साथ कांगे्रस अब शायद दिग्विजय सिंह की उस घोषणा पर भी जल्द अमल कर ले कि पार्टी को कलमाड़ी की जरूरत हो। खोटे सिक्कों से भरा हुआ बटुआ लेकर सोनिया गांधी 2014 में जीत की खरीददारी करने निकलने वाली हैं, अब देखना है कि दुकानदारों की नजर क्या सचमुच इतनी धुंधली साबित होगी?

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