ट्रस्टों की दौलत, सफेदपोश लुटेरे बेहतर, या सरकारें?


संपादकीय
12 जुलाई 2012
जेडीयू अध्यक्ष शरद यादव ने मंदिरों में जमा दसियों हजार करोड़ की संपत्ति को लेकर कहा है कि सरकार तुरंत इस संपत्ति पर कब्जा करे और इसका इस्तेमाल तीर्थ स्थानों के विकास में किया जाना चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर देते हुए कहा कि मंदिरों में जमा पैसा जनता का पैसा है और लोकतंत्र ने जनता के पैसे का इस्तेमाल जनता के हितों के लिए किया जाना चाहिए। इसके लिए कानून बनाए जाने की जरूरत है। जेडीयू नेता के मुताबिक अगर मंदिरों में जमा राशि को धार्मिक स्थानों के विकास पर खर्च किया जाएगा तो इससे पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, साथ ही रोजगार के अवसर पैदा होंगे जिससे खुशहाली आएगी।
देश भर में न सिर्फ मंदिरों में बल्कि तरह-तरह के धार्मिक ट्रस्टों में, और कई तरह के दान पर चलने वाली संस्थाओं में खूब पैसा जमा है और सफेदपोश लुटेरे उसे हड़प कर रहे हैं। हम यहीं से मिसाल शुरू करें तो छत्तीसगढ़ में कई जगहों पर मठों की जमीनों पर और दौलत पर सामाजिक नेताओं और ताकतवर लोगों का कानूनी-गैरकानूनी कब्जा ऐसा है मानो वह उनकी निजी मिल्कियत हो। राजधानी रायपुर में ही बहुत महंगी, चर्च की जमीन को बेचने के मामले में ईसाई समुदाय के लोग ही सड़कों पर हैं और जमीन माफिया ने उसे खरीद लिया है। इसी तरह का काम मुस्लिम समाज ने वक्फ की जमीन का होता है जिसके खिलाफ अभी कुछ दिन पहले ही लोगों ने मुख्यमंत्री से मिलकर शिकायत की है। राज्य में दान-धर्म और आस्था के नाम पर बने और चल रहे संगठनों की जमीनों को बेच खाने को लेकर जिला अदालतों से लेकर हाईकोर्ट तक हजारों मामले चल रहे हैं, और जो लोग समाज में अपने-आपको बहुत इज्जतदार साबित करते हैं, वे लोग इस लूटमार के मुखिया हैं। सरकारी नियमों के मुताबिक वैसे तो राज्य सरकार, और उसके प्रतिनिधि के रूप में कलेक्टर को ऐसे तमाम ट्रस्टों को लेकर बड़ी कार्रवाई करने के बड़े-बड़े अधिकार मिले हुए हैं, लेकिन इतिहास यह बताता है कि राजनीतिक दबाव के चलते या भ्रष्टाचार के चलते सरकारी अमला इस लूटमार की अधिक से अधिक समय तक अनदेखी करते चलता है। और यह बात सिर्फ छत्तीसगढ़ में हो ऐसा नहीं, देश भर में जगह-जगह यही नौबत है। उत्तरप्रदेश में अभी गुजर चुके जयगुरूदेव के ट्रस्ट की दस-बीस हजार करोड़ की दौलत पर किसी एक वसीयत के आधार पर किसी एक शिष्ट के काबिज हो जाने की खबर है। देश में ऐसा कड़ा कानून बनना और लागू होना चाहिए कि जनता के दान से जुटने वाली ऐसी दौलत पर सरकार की दखल हो। लेकिन यह सुझाव देते हुए यह भी लगता है कि क्या ऐसी दखल इस लूटमार में एक और हिस्सा साबित होगी? 
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में पिछले दस बरसों में यह देखने में आया कि बहुत सी रिहायशी कॉलोनियों में सरकार के एक ही भ्रष्ट छोटे अफसर को निर्वाचित सोसायटी की जगह प्रशासक बनाकर बिठाया गया और उसने उन कॉलोनियों की एक-एक इंच जमीन को गैरकानूनी तरीके से कुछ दिनों में ही बेच दिया। बार-बार ऐसे एक कुख्यात अफसर को सोच-समझकर सोसायटियों में बिठाकर करोड़ों की जमीन कागजों पर लाखों में बेचने के पीछे किसकी कैसी नीयत रही होगी, यह सबको आसानी से समझ आ जाता है। इसलिए अब सवाल यह उठता है कि धार्मिक या आध्यात्मिक ट्रस्टों में अगर सरकार की दखल और बढ़ेगी तो वह दखल सरकार के सबसे भ्रष्ट लोगों के हाथों में चली जाएगी या कि उससे जनता के दान का कुछ बेहतर इस्तेमाल होगा? शरद यादव की बात से हम सहमत हैं, लेकिन क्या सरकार के बिना एक व्यापक सामाजिक भागीदारी से ऐसे ट्रस्टों को एक अनिवार्य पारदर्शिता के साथ चलाना मुमकिन है? सरकार की साख इतनी गिरी हुई है कि लोग टैक्स चोरी करने को यह कहकर सही ठहराते हैं कि राजा-कलमाड़ी का घर भरने से बेहतर है कि अपना ही घर भरा जाए। लोग प्रधानमंत्री राहत कोष में दान देने से कतराने लगे हैं कि उसका पता नहीं किस तरह के लूटमार में इस्तेमाल हो। ऐसे में मंदिरों और दूसरे धर्म स्थानों की दौलत पर सार्वजनिक निगरानी और सरकारी काबू तो ठीक है, लेकिन सरकारें क्या समाज के सफेदपोश लुटेरों से बेहतर तरीके से इन ट्रस्टों को चलाएंगी?

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