कड़वी जुबान का बेमौसम नाजायज बेजा इस्तेमाल


14 जुलाई 2012
संपादकीय
पूरी दुनिया में असम की राजधानी गुवाहाटी में सड़क पर एक लड़की से हुई सामूहिक बदसलूकी को लेकर थू-थू हो रही है, और वहां के राज्य के पुलिस प्रमुख का अपराधियों को पकडऩे को लेकर कहना है कि पुलिस कोई एटीएम नहीं है कि जिसमें कार्ड डालो और अपराधी निकालो। इसी तरह की बात केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने महंगाई और मध्यम वर्ग को लेकर दो-चार दिन पहले कही। बस्तर की एक मुठभेड़ में सीआरपीएफ के हाथों डेढ़ दर्जन से अधिक बेकसूर आदिवासियों के मारे जाने के बाद एक बहुत हैवानी बात केंद्रीय गृह सचिव ने कही किसी जांच की जरूरत नहीं है। कुछ इसी तरह की बात इस मुठभेड़ के तुरंत बाद सीआरपीएफ के मुखिया ने कही। इन मुद्दों पर हम मोटे तौर पर पहले लिख चुके हैं, लेकिन अब बात आती है लोगों की जुबान की। खासकर ऐसे मौके पर जब जनता के एक बड़े तबके की भावनाएं बहुत बुरी तरह घायल हैं, तब किसी सच को कितने कड़वे सच की तरह कहा जाए, और लोगों के जख्मों पर नमक छिड़कने को कितना जायज कहा जाए? 
सार्वजनिक जीवन में कोई नेता हो या अफसर, या कोई अखबारनवीस ही हो, गमी के मौके पर कुछ कहने या लिखने के पहले यह सोचना जरूरी होता है कि बोलचाल की जुबान में हर सच कानूनी दर्जे का सच हो जाना काफी नहीं होता, उसके साथ-साथ लोगों की भावनाओं का इतना ख्याल रखना तो जरूरी होता है कि गैरजरूरी तरीके से किसी के जख्मों पर रेतकागज और नहीं रगड़ा जाए। यह बात सही है कि हम कई मौकों पर लिखते भी हैं कि जांच कर रही या मुजरिमों की तलाश कर रही पुलिस पर गैरजरूरी दबाव बनाने से उसके काम पर आंच भी आती है, और ऐसा नहीं करना चाहिए। लेकिन दूसरी तरफ भारतीय लोकतंत्र में यह एक हकीकत बन गई है कि जनदबाव अगर न रहे तो जांच एजेंसियां राजनीतिक दबाव या भ्रष्टाचार के चलते मुजरिमों को बच जाने का मौका भी बहुत बार देती हैं। इसलिए कई मौकों पर जनदबाव काम भी आता है। पाठकों को याद होगा कि कुछ हफ्ते पहले बिहार में जब रणवीर सेना का संस्थापक, एक माफिया मुजरिम जब मारा गया तो वहां राजनीतिक दलों से लेकर सरकार तक ने अपनी जुबान पर काबू रखा। इस मुखिया के समर्थकों ने जब बिहार की सड़कों पर आगजनी की, तब भी सरकार ने उनके साथ कुछ नरमी ही बरती, क्योंकि उनके समर्थक आहत थे और वैसे में उन पर कड़ी कार्रवाई से मामला और भड़कता। लेकिन कल असम के डीजीपी ने जिस जुबान में बात कही या उनके पहले कई और मौकों पर कई और नेता-अफसर संवेदनाशून्य बात कहते हैं, वह भयानक रहती है और उसके सच होने के बावजूद उसमें इतनी अधिक गैरजरूरी कड़वाहट रहती है कि उसके भीतर का तर्क और तथ्य खो जाता है, सिर्फ बदजुबानी सामने रह जाती है। 
इसलिए सार्वजनिक जीवन में जब संबंधित लोग किसी नाजुक मौके पर कुछ कहते हैं, तो उन्हें घायल लोगों के दिल-दिमाग की हालत के बारे में भी सोचना चाहिए। लापरवाह भाषा और गैरजरूरी सच को जो लोग अपनी खूबी मानते हैं, उनको यह समझना चाहिए कि ऐसा बेजा इस्तेमाल बाद में उस जुबान को असरदार भी नहीं रख छोड़ता। इसलिए कोड़े जैसी भाषा को दुष्ट लोगों पर उसी वक्त चलाना चाहिए जब वे दुष्ट किसी हमदर्दी के हकदार न हों। गांधी समेत बहुत से महान लोगों ने समय-समय पर अलग-अलग शब्दों में कहा है कि सच कहो, लेकिन कड़वा सच मत कहो। कड़वा सच किसी बीमारी के कीटाणु या जीवाणु मारने के लिए तो इस्तेमाल होना चाहिए, कुनैन की तरह, लेकिन वह मरीज को मारने के लिए इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। आज सत्ता में बैठे लोग बहुत बार यही काम कर रहे हैं। 

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