देशी तालिबान


13 जुलाई 2012
संपादकीय
असम की राजधानी गुवाहाटी में कल शाम सड़क पर एक अकेली लड़की को एक -दो दर्जन लड़कों ने घेर लिया और सड़क पर ही उसके कपड़े फाड़े उसके साथ हर किस्म की शारीरिक बदसलूकी की। और यह सब एक या अधिक वीडियो कैमरों की रिकॉर्डिंग में इन लड़कों के चेहरों सहित दर्ज होते रहा। इसमें कुछ अरसा तो ये लड़के फख्र के साथ अपना चेहरा दिखाते भी रहे और इस अकेली लड़की की तरफ उंगलियों से इशारा भी करते रहे। भारत शायद दुनिया की बलात्कार राजधानी बन चुका है, और अफ्रीका के कुछ देशों में जहां फौज या हथियारबंद बागी बलात्कार को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं, उनको अगर छोड़ दें, तो भारत जैसे बलात्कार दुनिया के और किसी देश में सुनाई नहीं पड़ते। जिस वारदात को लेकर आज हम यहां लिख रहे हैं वह एक साधारण बलात्कार से कहीं अलग है, अधिक भयानक है और उसके सार्वजनिक पहलू को अलग से समझने की जरूरत है। जब सड़क पर चलते हुए गाडिय़ों के ट्रैफिक के बीच एक राज्य की राजधानी में सड़क पर खुलकर दर्जनों लोग एक अकेली लड़की पर सैकड़ों लोगों के बीच हमला करते हैं और उसके बदन के साथ हर तरह की बदसलूकी करते हैं, तो यह नौबत सिर्फ इन कुछ दर्जन लोगों की सोच नहीं बताती, यह एक राजधानी में लोगों के दुस्साहस को भी बताती है, कानून के लिए उनकी हेठी भी बताती है, और वहां से गुजरते हुए सैकड़ों गाड़ी वाले शहरी नागरिकों की बेफिक्री भी बताती है कि अगर उनके घर की लड़की-महिला पर हमला नहीं हो रहा है, तो उनको फिक्र की जरूरत नहीं है। 
अब यह सोचें कि एक लड़की पर कैमरे के सामने इस तरह की हरकत करने वाले लोगों का दिमागी हाल कैसा है? इस हाल के बारे में दिल्ली में पुलिस कमिश्नर से बड़े ओहदे पर बैठे हुए लोग एक से अधिक बार गैरजिम्मेदारी से यह कह चुके हैं कि रात होने के बाद लड़कियां और महिलाएं अकेले न निकलें, और ऐसे कपड़े न पहनें जिनसे  कि उन पर यौन हमलों की नौबत आए। इनमें से दूसरी बात से हम कुछ हद तक सहमत हैं कि कानून चाहे लोगों को किसी भी तरह के कपड़े पहनने की छूट, शालीनता की सीमा के भीतर, देता है, लेकिन लोगों को अपने शहर, अपने इलाके की संस्कृति को भी ध्यान में रखना चाहिए। लेकिन लड़कियां और महिलाएं रात में अकेले न निकलें, बयान का यह हिस्सा गैरजिम्मेदारी का है, और दिल्ली जैसे शहर में जहां पर कि दस लाख से अधिक लड़कियां और महिलाएं अलग-अलग किस्म के कामकाज से शाम से लेकर सुबह तक आती-जाती हैं, वहां पर उन्हें किसी पुरूष के साथ निकलने की सलाह देना, समाज में महिलाओं के बराबरी के मौकों को नकारने के बराबर है, शायद उससे अधिक है। पुलिस का ऐसा कहना यह बताता है कि देश की राजधानी में भी कानून का इंतजाम बहुत कमजोर है। देश भर के जितने पर्यटन केंद्र हैं, उन पर समय-समय पर बलात्कार होते रहते हैं, और बहुत से मामले अदालतों और खबरों तक पहुंचते नहीं, इसलिए तस्वीर कितनी भयानक है इसका सही अंदाज नहीं लगता। अभी-अभी योरप के एक बड़े देश ने अपने लोगों को भारत आते हुए जो सावधानियां बरतने को कहा गया है उनमें भी यह जिक्र है कि यहां पर विदेशी महिलाओं पर सेक्स-हमले हो सकते हैं। 
भारत में लड़कियों के फैशन, उनके जीने के तरीके, उनके खाने-पीने और नाच-गाने को लेकर एक पाखंडी भारतीय संस्कृति का दावा करने वाला साम्प्रदायिक अपराधी पहले भी जगह-जगह उन पर हमले करते आए हैं। वे हमले कल आधे घंटे चले इस सार्वजनिक हमले की तरह के नहीं थे, लेकिन वे महिलाओं पर हमले तो थे ही। इसी किस्म की सार्वजनिक मारपीट की रिकॉर्डिंग कुछ बरस पहले कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू से सामने आई थी जहां पर श्रीराम सेना के गुंडों ने एक पब से निकलती लड़कियों को पीटा था और आधुनिक जीवनशैली का विरोध किया था। देश में जगह-जगह, जिनमें छत्तीसगढ़ भी शामिल है, वेलेंटाइन-डे या नए बरस के मौके पर लड़के-लड़कियों को मिलने से रोकने का काम कुंठा में जीने वाले दकियानूसी लोग भी करते हैं और इन मौकों को ईसाई त्यौहार मानने वाले ईसाई-विरोधी साम्प्रदायिक संगठन भी करते हैं। इन सबका हमला आमतौर पर एक लड़की या महिला पर ही होता है। लेकिन जब ऐसे हमलावर वीडियो रिकॉर्डिंग के बाद भी बरसों तक सार्वजनिक जीवन में नेताओं की तरह पेश होते रहते हैं, और कानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ता तो फिर दूसरे लोगों को भी ऐसे अपराध करके मजा लेने या खबरों में आने का उत्साह मिलता है। कल की ही एक और खबर है। उत्तरप्रदेश में एक पंचायत ने पे्रम-विवाहों पर रोक लगाने का फैसला लिया है और साथ ही उन्होंने चालीस बरस से कम उम्र की महिलाओं के बाजार जाने पर रोक की घोषणा भी की है। उन्होंने लड़कियों को मोबाईल फोन के इस्तेमाल पर भी रोक लगाई है। यह इलाका केंद्रीय विमान मंत्री अजीत सिंह के लोकसभा क्षेत्र का है। 
दरअसल जब तक कानून असरदार नहीं होगा, उसके आधार पर होने वाले फैसले समय पर नहीं होंगे, जब तक जांच एजेंसियों और मुकदमा एजेंसियों से भ्रष्टाचार कम नहीं होगा, जब तक निचली अदालत से लेकर ऊपर की अदालत तक पलटने वाले फैसलों की दूरी घटेगी नहीं, तब तक न सिर्फ सेक्स-अपराधियों के हौसले बने रहेंगे बल्कि कुछ दूसरे सामाजिक कारणों की वजह से इनमें बढ़ोतरी भी होती चलेगी। शहरीकरण और औद्योगिकीकरण के चलते बहुत से लोग अकेले रहने पर मजबूर होते हैं, और ऐसे में उनकी देह की जरूरतें कभी तो बाजार में खरीददारी से पूरी हो जाती हैं, कभी वे आसपास बच्चों पर हमले करते हैं, और कभी वे सड़कों पर इस तरह के खूंखार गिरोहबंद हमले करते हैं जो कि पूरी दुनिया में भारत की बदनामी की एक बड़ी वजह बन जाते हैं। लोगों को याद होगा कि दो ही दिन पहले अफगानिस्तान में तालिबान ने एक महिला पर बदचलनी का आरोप लगाकर भरी भीड़ के बीच उसे गोलियों से भून डाला, और उसकी वीडियो रिकॉर्डिंग इंटरनेट पर आकर पूरी दुनिया को हिला गई। अफगानिस्तान में तो कानून का राज अभी असरदार नहीं है, लेकिन भारत के असम में तो उस पार्टी का राज है जो पिछली आधी सदी में अधिकतर समय एक या दूसरी महिला नेता के मातहत काम करती रही है। कांगे्रस के राज वाले असम की राजधानी में सरेशाम ऐसा होना एक बहुत बड़े सदमे की बात है। और जहां तक हमले की शिकार इस लड़की के कपड़ों की बात है तो इस वारदात की वीडियो रिकॉर्डिंग देखें तो उसके कपड़े कहीं से भी अश्लील या उत्तेजक नहीं दिखते। इसलिए  इन हमलावरों को बलात्कार के कानून के तहत मुमकिन सबसे कड़ी सजा देनी चाहिए और गिरोहबंदी करके किसी निहत्थे पर हमला करने के लिए भी सजा देनी चाहिए। इसके अलावा देश और प्रदेशों की सरकारों को ऐसे हमलों को रोकने के लिए खास बैठक बुलाकर अपने इंतजाम एक बार फिर देखने चाहिए क्योंकि इसके बिना समाज में लड़कियां कभी भी बराबरी से आगे नहीं बढ़ पाएंगी। राष्ट्रीय और प्रादेशिक स्तर पर महिला आयोगों को, महिला पुलिस को इस वारदात से सबक लेकर यह देखना चाहिए कि उनके अपने इलाके ऐसी घटनाओं के कितने खतरे वाले हैं, और सरकारी इंतजाम उनको रोकने के लिए पुख्ता हैं या नहीं। ऐसे एक हमले के बाद, ऐसी एक वारदात के बाद अनगिनत दूसरी लड़कियां अपने परिवारों की बंदिशें झेलने लगती हैं। यह जिम्मेदारी सरकार की है कि सार्वजनिक जगहों पर हर लड़की और महिला हिफाजत से रह सके, और जहां उनके आने-जाने का वक्त अंधेरे के बाद का हो, वहां उनके लिए अलग से सुरक्षा का इंतजाम किया जाए।

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