पढ़े-लिखे होने, और समझदार होने में कोई अनिवार्य रिश्ता नहीं

संपादकीय
15 दिसम्बर 2017


देश के एक प्रमुख मीडिया संस्थान द्वारा गुजरात चुनाव के मतदान के एक्जिट पोल का नतीजा सामने रखते हुए बताया गया है कि वहां पर अधिक पढ़े-लिखे वोटर भाजपा के हिमायती थे, और कम पढ़े-लिखे वोटर कांग्रेस की ओर थे। अभी हम गुजरात में पढ़ाई-लिखाई के इस पोल के पैमानों को नहीं जानते, लेकिन यह बात तो इस पोल के बिना भी साफ है कि पढ़ाई-लिखाई से समझदारी का कोई अधिक लेना-देना नहीं रहता। यहां पर हम यह भी कहना नहीं चाहते कि जो लोग भाजपा को चुन रहे हैं, वे लोग कम समझदार हैं, और संख्या में अधिक हैं। इनमें से किसी पार्टी से लगाव या दुराव के बिना हम केवल पढ़ाई-लिखाई और समझ पर बात करना चाहते हैं।
लोगों को याद होगा कि 1992 में जब अयोध्या में बाबरी मस्जिद को गिराया गया था, तो देश भर में रथयात्रा निकालने वाले लालकृष्ण अडवानी खासे पढ़े-लिखे व्यक्ति थे। उन्हें रथयात्रा और अयोध्या में कारसेवकों के जमावड़े का खतरा मालूम था। वे अपनी पीढ़ी के सबसे पढ़े-लिखे लोगों में से एक थे। उनके साथ उस समय बाबरी मस्जिद को गिरते देखकर अपनी पीठ पर उमा भारती को लादकर खुशी से खिलखिलाते हुए डॉ. मुरली मनोहर जोशी खड़े थे जो कि विज्ञान के प्राध्यापक थे, और शायद उनके नाम के पहले वाला डॉक्टर विज्ञान से ही आया हुआ था। आज देश में नफरत की सबसे अधिक बात करने वाले, घोर साम्प्रदायिक बात करने वाले विश्व हिन्दू परिषद के डॉ. प्रवीण तोगडिय़ा अपनी पढ़ाई-लिखाई से एक कैंसर सर्जन हैं, लेकिन वे इस देश की आत्मा में कैंसर का ट्यूमर ट्रांसप्लांट करके उसे बड़ा करने में रात-दिन लगे रहते हैं। इसलिए पढ़ाई-लिखाई से समझ का कोई लेना-देना रहता हो, ऐसा बिल्कुल भी जरूरी नहीं रहता।
आपातकाल के बाद जब चुनाव हुए तो अविभाजित मध्यप्रदेश में चालीस में से उनचालीस सीटों पर कांग्रेस हार गई थी। बाकी इलाकों की बात तो ठीक थी, लेकिन बस्तर का इलाका ऐसा था जिसमें कि 1975 से 1977 के बीच न तो अखबार बहुत प्रचलित थे, न ही वहां रेडियो-टीवी का चलन था, लेकिन कांग्रेस के राज में उस वक्त बिना पारदर्शिता वाले चुनाव में बस्तर के हर इलाके से कांग्रेस को हरा दिया गया था। सबसे कम पढ़ी-लिखी आदिवासी आबादी ने अपनी समझ से एक समझदार और लोकतांत्रिक फैसला लिया था, और तानाशाही को शिकस्त दी थी। इसलिए इंदिरा को हराने वाले बस्तर के आदिवासियों ने पढ़ा-लिखा न होने से कोई कमी नहीं थी, और बाबरी मस्जिद गिरवाने वाले अडवानी-जोशी जैसों को पढ़ाई-लिखाई से कोई फायदा भी नहीं हुआ था।
यह दरअसल एक बहुत ही शहरी, संपन्न, और शिक्षित सोच है कि पढऩे-लिखने से लोग अधिक समझदार हो जाते हैं। कम पढ़े-लिखे या बिल्कुल निरक्षर लोगों को समझदारी से दूर मानते हैं। ऐसी सोच वाले लोगों के फायदे के लिए हम यहां थोड़ा सा खुलासा करना चाहेंगे कि ज्ञान और समझ दो बिल्कुल ही अलग-अलग चीजें होती हैं, और ये दोनों एक-दूसरे के बिना भी हो सकती हैं, ये दोनों एक-दूसरे के बिना भी बढ़ सकती हैं, और अगर इन दोनों में से किसी एक को छांटने की जरूरत हो, छांटने की मजबूरी हो तो समझ को छांटना चाहिए। अब कैंसर सर्जन बनते हुए डॉ. प्रवीण तोगडिय़ा ने कोई कम पढ़ाई नहीं की होगी, मेडिकल कॉलेज में उन्होंने कम से कम दस बरस गुजारे होंगे। लेकिन इन दस बरसों का ज्ञान उनके ऊपर से ठीक उसी तरह फिसलकर बह गया, जिस तरह की किसी चिकने घड़े के ऊपर डाला गया पानी बह जाता है, या कि किसी चिकने शिवलिंग पर चढ़ाया गया दूध तुरंत ही बहकर बर्बाद हो जाता है। समझ एक ऐसी चीज होती है जो कि ज्ञान को उपयोगी बना देती है। ज्ञान तो लाइब्रेरी की आलमारियों में सजी हुई किताबों में सबसे अधिक होता है, लेकिन उसका इस्तेमाल अगर इंसान न करें, तो महज दीमक उनका इस्तेमाल करती है, और उस ज्ञान से उसे केवल पेट भरने का सामान मिलता है, उसकी समझ नहीं बढ़ती। इसलिए पढ़े-लिखे होने और समझदार होने के बीच किसी तरह का अनिवार्य रिश्ता नहीं होता। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 15 December

आज एक अकेला जिद्दी चना भी टेक्नालॉजी साथ लेकर भाड़ को फोड़ सकता है...

संपादकीय
14 दिसम्बर 2017


भारत के कानून और दुनिया की टेक्नालॉजी ने मिलकर इस देश में सच और झूठ को बड़ी रफ्तार से उजागर कर देने का दिन ला दिया है। एक तरफ तो पिछली मनमोहन सिंह सरकार के वक्त देश में लागू हुआ सूचना के अधिकार का कानून लोगों के हाथ में एक अभूतपूर्व और बेमिसाल ताकत दे चुका है, दूसरी ओर टेक्नालॉजी ने सब कुछ इतना आसान कर दिया है कि गुजरात चुनाव में जब मोदी ने समुद्री विमान में सफर करके सुर्खियां बटोरीं, तो कुछ घंटों के भीतर ही लोगों ने ये सुबूत जुटाकर सामने रख दिए कि अमरीका का यह समुद्री विमान पाकिस्तान होते हुए भारत पहुंचा, और प्रधानमंत्री ने उसमें सफर किया। अब यहां पर कई बातें उठना अभी बाकी है कि ऐसे विदेशी, और पाकिस्तान से होते हुए आए समुद्री विमान पर एक व्यवसायिक विदेशी पायलट के साथ भारतीय प्रधानमंत्री का यूं सफर करना क्या उनकी सुरक्षा के नियमों को तोडऩा नहीं हुआ? दूसरी बात आनन-फानन में यह सामने आई कि यह भारत का पहला समुद्री विमान सफर नहीं था, और इस देश में अंडमान के इलाके में बरसों से समुद्री विमान आम लोगों के लिए चल रहे हैं। केरल के मुख्यमंत्री ने तुरंत वहां चलने वाले समुद्री विमानों की तस्वीर ट्विटर पर पोस्ट की कि किस तरह केरल से लक्षद्वीप के लिए 2015 से समुद्री विमान सेवा चल रही है। कुछ लोगों ने यह भी ढूंढकर निकाला कि अंग्रेजों के वक्त ग्वालियर रियासत में एक झील में समुद्री विमान उतरते थे। अब अंग्रेजों के वक्त की यह जानकारी सही हो चाहे न हो, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा की वेबसाइटों से इस सुर्खी को तुरंत हटा दिया गया कि वे समुद्री विमान से भारत में सफर करने वाले पहले व्यक्ति हैं।
आज दुनिया की वेबसाइटों पर किसी भी विमान के नंबर से यह जानकारी निकालना आसान है कि वह किस-किस रास्ते किस-किस तारीख को कब उड़कर कहां पहुंचा। और उत्साही लोगों ने आनन-फानन मोदी के इस्तेमाल वाले इस समुद्री विमान के बारे में जानकारी निकालकर सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दी। अभी दो दिन पहले ही कांग्रेस पार्टी ने अपने एक बयान में यह याद दिलाया कि देश में भ्रष्टाचार के बहुत से मामले इसलिए उजागर हो पाए हैं कि कांग्रेस ने देश में सूचना का अधिकार लागू किया है। इन दो बातों को देखते हुए ऐसा लगता है कि पिछली पीढ़ी के लोगों को आज भारत के नए कानून, और दुनिया की नई टेक्नालॉजी के बीच सांस लेना सीखना होगा। वे दिन अब हवा हुए जब लोगों के बड़े-बड़े स्कैंडल छुप जाते थे। आज तो हिन्दुस्तान में आबादी के इलाकों में औसतन हर सौ वर्गफीट पर कोई न कोई एक मोबाइल कैमरा जीता होगा। ऐसे में कोई भी बात छुपना भी थोड़ा मुश्किल है, और लोगों के किसी भी तरह के बेबुनियाद दावों के पांवोंतले से भी दरी या कालीन पल भर में खींच ली जाती है।
हमारा ख्याल है कि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक समझ और सीख जिस रफ्तार से बढ़ती है, उससे कई गुना अधिक रफ्तार से टेक्नालॉजी आगे बढ़ जा रही है। इसके साथ-साथ लोगों में अपने लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर जागरूकता और समझ भी बढ़ती जा रही है। भारत में अपने अनगिनत भांडाफोड़ में यह देखा है कि उसके लिए किसी बहुत बड़े बहुमत की जरूरत नहीं होती, किसी बहुत बड़े संगठन की जरूरत नहीं होती, हवाला डायरियां एक अकेले आदमी ने उजागर की थी, इसी तरह पिछले दस-बीस बरस में भारत में सामने आए अधिकतर स्कैंडल अकेले लोगों ने ही उजागर किए हैं। इसलिए ताकतवर लोगों, और ताकतवर संगठनों को यह समझने की जरूरत है कि आज एक अकेला जिद्दी चना भी टेक्नालॉजी साथ लेकर भाड़ को फोड़ सकता है। वे दिन इतिहास हो गए हैं जब कहा जाता था कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता। इस देश में एक अकेले राजनारायण ने करीब आधी सदी पहले नेहरू की बेटी की सरकार फोड़कर रख दी थी जिसकी कि भारत में कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था।
आज भारत के बड़े-बड़े नेताओं के कुछ बरस पहले के वीडियो, उनकी तस्वीरें, और उनकी कही और लिखी हुई बातें निकाल-निकालकर लोग उनके सामने पोस्टर बनाकर रखते आ रहे हैं। लेकिन भारत के नेताओं में इस बात की फिक्र अभी कम ही दिख रही है कि उनके अतीत के कंकाल कब्र से निकलकर, सड़कों पर आकर, उनकी ताजपोशी की राह के रोड़े बन सकते हैं। हमारा ख्याल है कि भारत जैसे लोकतंत्र के नेताओं के लिए सावधानी का एक ऐसा कोर्स शुरू किया जाना चाहिए जो कि उन्हें झूठ और फरेब की शर्मिंदगी से बचाने में मददगार हो। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 14 December

अकेले राहुल से बहुत उम्मीदें करना नाजायज

संपादकीय
13 दिसम्बर 2017


गुजरात के विधानसभा चुनाव के ठीक पहले कांग्रेस ने राहुल गांधी को अपना अध्यक्ष बनाया, और देश भर के राजनीतिक विश्लेषकों ने यह लिखना शुरू कर दिया है कि गुजरात राहुल गांधी के लिए एक कसौटी रहेगी। उन्हें चुनाव में जीतकर ही अपनी अध्यक्षता की कामयाबी साबित करनी होगी। हमारा ख्याल है कि किसी भी व्यक्ति से ऐसी उम्मीद करना इसलिए नाजायज है कि न तो गुजरात कभी राहुल गांधी का इलाका रहा, और न ही वहां उस अंदाज में चुनाव लड़ सकते, जिस अंदाज में वहां भाजपा और नरेन्द्र मोदी लड़ रहे हैं। गुजरात को न तो मोदी के लिए कसौटी मानना चाहिए, और न ही राहुल गांधी के लिए। फिर भी जिन लोगों कसौटी पर लोगों को कसने का शौक ही रहता है, तो फिर उन्हें मोदी और अमित शाह को ही गुजरात पर तौलना चाहिए। जहां तक राहुल गांधी का सवाल है कि उन्होंने कांग्रेस की परंपरा के मुताबिक, और अपने खुद के मिजाज की शराफत के मुताबिक प्रचार किया, और किसी तरह की हलकट बात नहीं कही। गुजरात को पूरे देश के लिए पैमाना मानना गलत होगा क्योंकि आने वाले लोकसभा के चुनाव पूरे देश में होंगे, और आज का गुजरात तो मोदी और अमित शाह का अपना घर है।
लेकिन आज हम गुजरात चुनाव पर नहीं लिख रहे, क्योंकि वहां के नतीजे ही अपने आपको इतिहास में लिखेंगे, और अटकलबाजी के लिए हम गुजरात से कुछ दूर बैठे हुए हैं। हम आज यहां राहुल गांधी की चर्चा करना चाहते हैं जो कि एक हादसे के बाद कांग्रेस की राजनीति में आए, ठीक अपने पिता की तरह, या कि कुछ हद तक अपनी मां की तरह। खैर, जब वे राजनीति में आ ही गए हैं, तो किसी तरह की नर्मी या रियायत के हकदार वे नहीं रह जाते। भारतीय लोकतांत्रिक चुनाव बहुत ही बेरहम होते हैं, और नतीजे ही लोगों की कामयाबी, और उनकी लीडरशिप साबित करते हैं। लेकिन हम इससे सहमत नहीं हैं, और हमारा यह मानना है कि लोगों को आंकड़ों से परे इंसानियत की बात भी करनी चाहिए, और अगर किसी जगह भीड़ में बहुमत हिंसा करने पर उतारू हो, तो उसे जायज नहीं कहा जा सकता। ठीक उसी तरह अगर देश का बहुमत या किसी प्रदेश का बहुमत किसी हिंसा के झांसे में आकर, नफरत को अपनाकर किसी को जिता दे, तो वैसे जीतने वाले लोग कामयाब तो रहते हैं, लेकिन वे बेहतर भी रहते हों यह जरूरी नहीं है। और इसीलिए कहा जाता है कि लोकतंत्र में लोगों को वैसी ही सरकार नसीब होती है जैसी सरकार के वे हकदार होते हैं।
हमारा मानना है कि राहुल गांधी से यह उम्मीद नाजायज है कि वे अगले आम चुनाव तक अपने आपको, अपनी पार्टी को, और अपने गठबंधन को इतना मजबूत बना दें कि वे चुनाव जीत जाएं, और मोदी को हरा दें। अगर देश के मतदाताओं का एक बहुमत नाजायज मुद्दों को लेकर किसी का साथ देना चाहता है, तो उसे हासिल करने के लिए वैसे ही या कुछ और दूसरे नाजायज मुद्दों को उठाकर चुनाव लडऩा ठीक नहीं है। हमारा मानना है कि चुनाव में सिद्धांतों को छोड़कर गंदगी और हिंसा के साथ, नफरत और झूठ के साथ चुनाव लडऩे से बेहतर है ईमानदार मुद्दों को लेकर चुनाव लडऩा और फिर चाहे हार जाना। अगला आम चुनाव अकेले राहुल गांधी की जिम्मेदारी मानना उनके साथ ज्यादती होगी। देश की हर उस पार्टी को अपना रूख देखना होगा जो कि भाजपा और उसके साथियों के खिलाफ है, और जो भाजपा की या मोदी सरकार की नीतियों के खिलाफ है। जब तक ऐसे सारे लोग अपने छोटे-बड़े मतभेदों को भूलकर सिद्धांतों के आधार पर साथ नहीं आएंगे, तब तक इस लोकतंत्र में किसी नेता या किसी पार्टी से अकेले कोई उम्मीद नहीं करनी चाहिए।
राहुल गांधी गुजरात की आग से तपकर निकले हैं, और खरे होकर निकले हैं। वहां की जीत या हार से परे उन्होंने देश के समझदार लोगों की बड़ी वाहवाही पाई है, और उन्होंने यह साबित किया है कि कठिन चुनौती के बीच भी वे सिद्धांतों के खिलाफ जाकर कुछ नहीं करेंगे। ऐसा रूख हो सकता है कि एक-दो चुनाव में उनकी अधिक मदद न करे, लेकिन हमें एक छोटी सी उम्मीद अब भी बाकी है कि देश की जनता अच्छे और बुरे सिद्धांतों में फर्क करना सीखेगी, और बेहतर लोगों को वोट देगी। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 13 दिसंबर

दीवारों पर लिक्खा है, 12 दिसंबर

अंगदान श्रीलंका से सीखें और मिसाल कायम करें

संपादकीय
12 दिसम्बर 2017


बीच-बीच में देश के कुछ शहरों से खबरें आती हैं कि किस तरह किसी इंसान के दान किए हुए अंग किसी दूसरे शहर के अस्पताल तक पहुंचाने, और वहां पर किसी मरीज की जिंदगी बचाने के लिए इस्तेमाल होते हैं। ऐसे शहरों में पुलिस और वहां की जनता मिलकर सारी सड़कों को खाली करती हैं, ताकि अंग ले जा रहे चिकित्सा कर्मचारी तेज रफ्तार से एयरपोर्ट तक पहुंच सकें। ऐसा ग्रीन कॉरिडोर लोगों की मदद के बिना नहीं बन सकता। छत्तीसगढ़ में भी हमने एक-दो मरीजों को दूसरे शहर से राजधानी के एयरपोर्ट तक लाने के लिए बनाया ऐसा ग्रीन कॉरिडोर देखा है।
लेकिन इस बात से हमको एक दूसरी बात सूझती है जिसकी वजह से आज इस मुद्दे पर यहां चर्चा की जा रही है, वह है अंगदान की। भारत वैसे तो अपने-आपको दानियों का देश बताता है, लेकिन हकीकत यह है कि लोगों में धर्म और किसी गुरु के नाम पर ही आमतौर पर दान देने की बात सामने आती है। जहां तक अंगदान की बात है, तो लोग तो मरने के बाद भी अपनी आंखें, या अपना बदन दान करना नहीं चाहते। आंखों की कमी इतनी है कि देश में लाखों लोग इंतजार कर रहे हैं कि उन्हें किसी दूसरे इंसान के गुजरने पर उनकी आंखें मिल सकें, और दूसरी तरफ देश में रोजाना कई लाख आंखें जलाई या दफनाई जा रही हैं। अब चिकित्सा विज्ञान खासा आगे बढ़ गया है, और भारत में जरूरतमंद मरीजों को दूसरे मरीजों से मिली हुई किडनी, लीवर, दिल, या और दूसरे अंग लगातार लगाए जा रहे हैं। देश के अधिकतर बड़े शहरों में अस्पताल ऐसे प्रत्यारोपण आसानी से कर रहे हैं, और जरूरत अब केवल ऐसे लोगों की है जो कि अपने परिवार के गुजर चुके, या कि बे्रन-डेड हो चुके लोगों के अंग दान कर सकें।
इस पर लिखते हुए हमें केरल की उस महिला की तस्वीर याद पड़ती है जिसने अपने पति के दोनों हाथ दान किए, और किसी विदेशी को वे दोनों हाथ लगाए गए। इसके बाद जब दोनों का सामना हुआ तो वह महिला अपने पति के हाथ दूसरे किसी बदन पर लगे हुए देखती ही रह गई, और अगर उसके चेहरे पर लिखी तसल्ली को देखा जाए, तो बाकी तमाम लोगों को भी प्रेरणा मिल सकती है। केरल के ये हाथ अफगानिस्तान के एक ऐसे भूतपूर्व सैनिक को मिले जो कि जमीनी सुरंग हटाते हुए दोनों हाथ खो चुका था। आज हिंदुस्तान में ऑपरेशन कराने के लिए पाकिस्तान से रोजाना ही मरीज आ रहे हैं, और दुनिया के और बहुत से देशों से आ रहे हैं। इस देश में लोगों में अंगदान का रिवाज बढ़ाने की जरूरत है, और चाहे हिंदू धर्म हो, चाहे जैन, चाहे बौद्ध, चाहे मुस्लिम, चाहे सिख, चाहे पारसी, इन सबमें दान की अपार महिमा लिखी हुई है। लोगों को दूसरों के काम आना चाहिए, ऐसा भी सबमें लिखा हुआ है। पारसियों में तो मौत के बाद भी लाश को पक्षियों के खाने के लिए एक मीनार पर रखकर छोड़ दिया जाता है।
आज जब भारत के कोई गुरु अयोध्या के विवाद को सुलझाने में दिलचस्पी ले रहे हैं, कोई गुरु नदियों को बचाने के अभियान में लगे हैं, और अधिकतर दूसरे गुरु भी दूसरों की मदद करने, दान करने, दूसरी जिंदगियों को बचाने जैसी बातें कहते हैं। ऐसे में देश में एक बड़ी पहल करने की जरूरत है ताकि लोगों को अंगदान करने के लिए प्रेरित किया जा सके। बौद्ध लोगों से भरे हुए श्रीलंका को दुनिया का ऐसा अकेला देश होने का गौरव हासिल है जो कि इतने नेत्रदान पाता है कि अपने देश से बाहर भी वह दुनिया के दूसरे देशों को आंखें भेजता है और वहां लोगों को उनसे रौशनी मिलती है। यह सिलसिला धर्म, राजनीतिक विचारधारा, आध्यामिक अनुयायियों, सभी की मदद से आगे बढ़ाने की जरूरत है।  अभी बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के बेटे की शादी हुई, तो समारोह में खाने का इंतजाम तो नहीं था, लेकिन वहां पर एक स्टॉल लगाया गया था ताकि लोग अंगदान करने के फॉर्म भर सकें। (Daily Chhattisgarh)

सच और हकीकत से कोसों दूर

11 दिसंबर  2017

अभी चार दिन पहले ब्रिटिश मीडिया पर एक ऐसी रिपोर्ट आई जो कि पश्चिम के उदार और आधुनिक मूल्यों के पैमानों पर भी कुछ सनसनीखेज मानी गई। वहां पर एक कामयाब पेशेवर वित्तीय सलाहकार महिला ने एक इंटरव्यू में यह खुलासा किया कि अपने पति के गुजर जाने के बाद उसने अब तक सौ से अधिक ऐसे शादीशुदा मर्दों से संबंध बनाए जो कि अपनी निजी जिंदगी से नाखुश थे। उसका कहना है कि इन लोगों के साथ अच्छा वक्त गुजार कर उसने इनकी शादीशुदा जिंदगी को बचाने में मदद भी की है क्योंकि बहुत से लोग शादी के बाद के बरसों में धीरे-धीरे एक-दूसरे में दिलचस्पी खो बैठते हैं, और उनकी शारीरिक और मानसिक जरूरतें एक-दूसरे से पूरी नहीं होती। ऐसे में अगर ऐसे जोड़ों में से कोई एक भी बाहर से कुछ खुशी पाकर घर लौटते हैं, तो उनकी शादी के बच जाने की संभावना बढ़ जाती है।
पिछले बरसों में कई बार मैंने इस मुद्दे पर लिखा और आसपास के लोगों की खूब गालियां भी खाई हैं। करीबी लोगों ने रूबरू मुझे कहा कि मैं लोगों को बदचलनी की ओर धकेल रहा हूं। उनका यह कहना सही था कि विवाहेत्तर संबंधों को बुरा न कहना उन्हें भला कहने जैसा होता है, और उससे हो सकता है कि बहुत से लोगों की दिलचस्पी ऐसे रिश्तों में बढ़ चले क्योंकि मेरा लिखा होने अपराधबोध से अग्रिममुक्ति दिला देता है।
उनकी यह तोहमत कुछ हद तक सही है, और इसे तोहमत मानने की वजह मेरी अपनी सोच नहीं है, बल्कि शादीशुदा जोड़ों की आपसी, और उनसे समाज की ये उम्मीदें हैं कि शादी में वफादारी एक अनिवार्य और स्वाभाविक बात है। उम्मीदें तो उम्मीदें होती हैं, हर बार उनका हकीकत से कुछ वास्ता जरूरी नहीं होता, इसलिए वफादारी को अनिवार्य मानने वाली उम्मीद बेबुनियाद सी होती है। और इसके लिए दो बातों को समझना जरूरी है कि शादीशुदा जोड़ों के भीतर आपसी रिश्ते वक्त के साथ-साथ कैसे बदलते हैं, और दूसरा यह कि इंसान का अपना मिजाज कैसा होता है।
दुनिया के किसी भी हिस्से में, खासकर शहरी हिस्से में, शादी का मामला उसके दोनों भागीदारों की एक वक्त की पसंद, सोच, और उम्मीदों की बुनियाद पर बना हुआ रहता है। वक्त के साथ-साथ इन तीनों में एक ऐसा फेरबदल आ सकता है कि आज का जोड़ीदार कल बोझ लगने लगे, और परसों उससे परे कुछ और दिखने लगे। शादी और वफादारी, इन दोनों को अनिवार्य रूप से जोडऩे की बात इंसान के बुनियादी मिजाज से मेल नहीं खाती। समय के साथ-साथ लोगों को नए लोग मिलते हैं, उनकी अपनी पसंद बदलती है, अपना मिजाज बदलता है, और अपनी जरूरत भी बदलती है। और ऐसा ही कुछ उनके जोड़ीदार के साथ भी होते चलता है। इन दोनों के किसी भी वक्त के ऐसे फेरबदल एक साथ देखने पर उनके रास्ते काफी कुछ अलग भी होते दिख सकते हैं। ऐसे में कुछ पल के लिए, या कि कुछ बरसों के लिए शादीशुदा जोड़ीदार एक-दूसरे से परे भी एक ऐसी खुशी पाने की चाह रख सकते हैं, पा सकते हैं, जो कि शादी की वफादारी वाली परिभाषा के साथ मेल न खाए।
लेकिन होता यह है कि जब लोग अपने जोड़ीदार से परे ऐसी खुशी पाकर लौटते हैं, तो वे घर के भीतर का तनाव झेलने के लिए कुछ अधिक दूर तक लैस होकर भी आते हैं। इसके साथ-साथ उनके भीतर का एक अपराधबोध भी होता है जो कि उन्हें घर के भीतर कुछ अधिक समझौते करने, कुछ अधिक बर्दाश्त करने का हौसला देता है। अगर ऐसे जोड़ों में इस तरह की खुशी पाने की गुंजाइश बाहर न निकले, तो हो सकता है कि उनमें से बहुत से लोग भीतर के तनाव को झेल नहीं पाएं।
इस बात को पहले अपने इस कॉलम में कुछ मौकों पर मैं लिख भी चुका हूं, और अब यह ब्रिटिश महिला मानो बरसों बाद उसी बात को एक और अधिक मजबूत मिसाल के साथ सामने रख रही है, अपनी खुद की गुजरी बातों को बताते हुए, बिना किसी अफसोस के साथ, और एक बिल्कुल ही आम इंसान की तरह अपनी कमजोरियों और खूबियों को मानते हुए, बताते हुए।
चाहे प्रेम-संबंध हो, चाहे विवाह-संबंध, लोगों से वफादारी की उम्मीद इसलिए भी सही नहीं लगती कि वह उम्मीद आने वाले उन दिनों को लेकर है जिनका कि अभी उन्हें एहसास भी न हो, वह उन लोगों को लेकर है जिनसे कि वे अभी तक मिले भी नहीं हैं, वह उम्मीद दिल-दिमाग की ऐसी हालत को लेकर है जो कि अभी तक आई नहीं है, और जब ऐसे नए लोग मिलते हैं, ऐसी नई नौबतें आती हैं, ऐसी नई शारीरिकऔर मानसिक जरूरत सिर चढ़कर बोलती है, तो पहले के सारे वायदे और सारी कसमें धरी रह जाती हैं, और इंसान एकदम इंसान की तरह बर्ताव करने लगते हैं, बजाय प्रेमी या प्रेमिका के, पति या पत्नी के। यह बात याद रखने की जरूरत है कि इंसानों के बीच रिश्ते तो इंसान के इतिहास में बड़े ताजा हैं, रिश्तों की इस सामाजिकता से परे इंसान की अपनी इंसानी जरूरतें तो बहुत ही पुरानी हैं। रिश्तों से लाखों बरस अधिक पुरानी जरूरतें, भला रिश्ते कैसे इन जरूरतों को दबा सकते हैं?
जिस तरह कि इंसान के भीतर हिंसा करने वाला एक पहलू होता है जिसे कि इंसान हैवान कहकर अपने बाकी हिस्से को उस तोहमत से बचा ले जाते हैं, ठीक उसी तरह  इंसान के भीतर रिश्तों की नैतिकताओं और उनके बंधनों से मुक्त एक ऐसा पहलू होता है जिसे कि सामाजिकता और निजी वफादारी छू भी नहीं पाते, और जो इंसान के हाड़-मांस, दांत और नाखूनों की तरह का अधिक पुराना, अधिक प्राकृतिक पहलू होता है।
आधुनिक समाज ने अपने ढांचे को अधिक मजबूत बनाने के लिए शादी के साथ वफादारी की उम्मीदें और कसमें जोडऩे का काम किया। उसने एक बार शादी के बाद, उस शादी के कायम रहने तक शादी के दोनों भागीदारों को परिवार नाम की एक बड़ी घड़ी के पुर्जों की तरह हिलने-डुलने की एक बड़ी सीमित आजादी दी, लेकिन उससे परे कुछ नहीं। भारत के हिन्दू समाज में तो शादी को सात जन्मों का रिश्ता कहा गया, हालांकि अगला जन्म भी किसी का देखा हुआ नहीं है। ऐसे अनदेखे छह और जन्मों की भी वफादारी का पैमाना सामने रखते हुए यह भी नहीं देखा गया कि शादी के बाद एक जन्म में ही कितने उतार-चढ़ाव आते हैं, और दोनों भागीदार उन्हें भी हर बार झेल नहीं पाते हैं। शादी नाम की व्यवस्था लोगों को कई मायनों में एक मशीन के पुर्जों की तरह एक-दूसरे से जोड़कर रख देती है, और यह व्यवस्था यह ध्यान रखती कि असल जिंदगी में ये दोनों पुर्जे तो दुनिया के और बहुत से पुर्जों के साथ संपर्क में आते हैं, और अपने आपमें भी इन दो पुर्जों के बीच कई किस्म की रगड़ाहट होती है।
आज दुनिया के किसी भी समाज में शादी से परे के संबंधों को अच्छी निगाह से देखा नहीं जाता, लेकिन इससे भी बड़ी बात यह है कि इन्हें हकीकत भी नहीं माना जाता। ऐसा मान लिया जाता है कि शादी नाम की संस्था लोगों को इंसान से मशीनी पुर्जा बनाने की ताकत रखती है, और बना भी देती है। लेकिन यह बात सच और हकीकत से कोसों दूर की बात है। (Daily Chhattisgarh)