सच और हकीकत से कोसों दूर

11 दिसंबर  2017

अभी चार दिन पहले ब्रिटिश मीडिया पर एक ऐसी रिपोर्ट आई जो कि पश्चिम के उदार और आधुनिक मूल्यों के पैमानों पर भी कुछ सनसनीखेज मानी गई। वहां पर एक कामयाब पेशेवर वित्तीय सलाहकार महिला ने एक इंटरव्यू में यह खुलासा किया कि अपने पति के गुजर जाने के बाद उसने अब तक सौ से अधिक ऐसे शादीशुदा मर्दों से संबंध बनाए जो कि अपनी निजी जिंदगी से नाखुश थे। उसका कहना है कि इन लोगों के साथ अच्छा वक्त गुजार कर उसने इनकी शादीशुदा जिंदगी को बचाने में मदद भी की है क्योंकि बहुत से लोग शादी के बाद के बरसों में धीरे-धीरे एक-दूसरे में दिलचस्पी खो बैठते हैं, और उनकी शारीरिक और मानसिक जरूरतें एक-दूसरे से पूरी नहीं होती। ऐसे में अगर ऐसे जोड़ों में से कोई एक भी बाहर से कुछ खुशी पाकर घर लौटते हैं, तो उनकी शादी के बच जाने की संभावना बढ़ जाती है।
पिछले बरसों में कई बार मैंने इस मुद्दे पर लिखा और आसपास के लोगों की खूब गालियां भी खाई हैं। करीबी लोगों ने रूबरू मुझे कहा कि मैं लोगों को बदचलनी की ओर धकेल रहा हूं। उनका यह कहना सही था कि विवाहेत्तर संबंधों को बुरा न कहना उन्हें भला कहने जैसा होता है, और उससे हो सकता है कि बहुत से लोगों की दिलचस्पी ऐसे रिश्तों में बढ़ चले क्योंकि मेरा लिखा होने अपराधबोध से अग्रिममुक्ति दिला देता है।
उनकी यह तोहमत कुछ हद तक सही है, और इसे तोहमत मानने की वजह मेरी अपनी सोच नहीं है, बल्कि शादीशुदा जोड़ों की आपसी, और उनसे समाज की ये उम्मीदें हैं कि शादी में वफादारी एक अनिवार्य और स्वाभाविक बात है। उम्मीदें तो उम्मीदें होती हैं, हर बार उनका हकीकत से कुछ वास्ता जरूरी नहीं होता, इसलिए वफादारी को अनिवार्य मानने वाली उम्मीद बेबुनियाद सी होती है। और इसके लिए दो बातों को समझना जरूरी है कि शादीशुदा जोड़ों के भीतर आपसी रिश्ते वक्त के साथ-साथ कैसे बदलते हैं, और दूसरा यह कि इंसान का अपना मिजाज कैसा होता है।
दुनिया के किसी भी हिस्से में, खासकर शहरी हिस्से में, शादी का मामला उसके दोनों भागीदारों की एक वक्त की पसंद, सोच, और उम्मीदों की बुनियाद पर बना हुआ रहता है। वक्त के साथ-साथ इन तीनों में एक ऐसा फेरबदल आ सकता है कि आज का जोड़ीदार कल बोझ लगने लगे, और परसों उससे परे कुछ और दिखने लगे। शादी और वफादारी, इन दोनों को अनिवार्य रूप से जोडऩे की बात इंसान के बुनियादी मिजाज से मेल नहीं खाती। समय के साथ-साथ लोगों को नए लोग मिलते हैं, उनकी अपनी पसंद बदलती है, अपना मिजाज बदलता है, और अपनी जरूरत भी बदलती है। और ऐसा ही कुछ उनके जोड़ीदार के साथ भी होते चलता है। इन दोनों के किसी भी वक्त के ऐसे फेरबदल एक साथ देखने पर उनके रास्ते काफी कुछ अलग भी होते दिख सकते हैं। ऐसे में कुछ पल के लिए, या कि कुछ बरसों के लिए शादीशुदा जोड़ीदार एक-दूसरे से परे भी एक ऐसी खुशी पाने की चाह रख सकते हैं, पा सकते हैं, जो कि शादी की वफादारी वाली परिभाषा के साथ मेल न खाए।
लेकिन होता यह है कि जब लोग अपने जोड़ीदार से परे ऐसी खुशी पाकर लौटते हैं, तो वे घर के भीतर का तनाव झेलने के लिए कुछ अधिक दूर तक लैस होकर भी आते हैं। इसके साथ-साथ उनके भीतर का एक अपराधबोध भी होता है जो कि उन्हें घर के भीतर कुछ अधिक समझौते करने, कुछ अधिक बर्दाश्त करने का हौसला देता है। अगर ऐसे जोड़ों में इस तरह की खुशी पाने की गुंजाइश बाहर न निकले, तो हो सकता है कि उनमें से बहुत से लोग भीतर के तनाव को झेल नहीं पाएं।
इस बात को पहले अपने इस कॉलम में कुछ मौकों पर मैं लिख भी चुका हूं, और अब यह ब्रिटिश महिला मानो बरसों बाद उसी बात को एक और अधिक मजबूत मिसाल के साथ सामने रख रही है, अपनी खुद की गुजरी बातों को बताते हुए, बिना किसी अफसोस के साथ, और एक बिल्कुल ही आम इंसान की तरह अपनी कमजोरियों और खूबियों को मानते हुए, बताते हुए।
चाहे प्रेम-संबंध हो, चाहे विवाह-संबंध, लोगों से वफादारी की उम्मीद इसलिए भी सही नहीं लगती कि वह उम्मीद आने वाले उन दिनों को लेकर है जिनका कि अभी उन्हें एहसास भी न हो, वह उन लोगों को लेकर है जिनसे कि वे अभी तक मिले भी नहीं हैं, वह उम्मीद दिल-दिमाग की ऐसी हालत को लेकर है जो कि अभी तक आई नहीं है, और जब ऐसे नए लोग मिलते हैं, ऐसी नई नौबतें आती हैं, ऐसी नई शारीरिकऔर मानसिक जरूरत सिर चढ़कर बोलती है, तो पहले के सारे वायदे और सारी कसमें धरी रह जाती हैं, और इंसान एकदम इंसान की तरह बर्ताव करने लगते हैं, बजाय प्रेमी या प्रेमिका के, पति या पत्नी के। यह बात याद रखने की जरूरत है कि इंसानों के बीच रिश्ते तो इंसान के इतिहास में बड़े ताजा हैं, रिश्तों की इस सामाजिकता से परे इंसान की अपनी इंसानी जरूरतें तो बहुत ही पुरानी हैं। रिश्तों से लाखों बरस अधिक पुरानी जरूरतें, भला रिश्ते कैसे इन जरूरतों को दबा सकते हैं?
जिस तरह कि इंसान के भीतर हिंसा करने वाला एक पहलू होता है जिसे कि इंसान हैवान कहकर अपने बाकी हिस्से को उस तोहमत से बचा ले जाते हैं, ठीक उसी तरह  इंसान के भीतर रिश्तों की नैतिकताओं और उनके बंधनों से मुक्त एक ऐसा पहलू होता है जिसे कि सामाजिकता और निजी वफादारी छू भी नहीं पाते, और जो इंसान के हाड़-मांस, दांत और नाखूनों की तरह का अधिक पुराना, अधिक प्राकृतिक पहलू होता है।
आधुनिक समाज ने अपने ढांचे को अधिक मजबूत बनाने के लिए शादी के साथ वफादारी की उम्मीदें और कसमें जोडऩे का काम किया। उसने एक बार शादी के बाद, उस शादी के कायम रहने तक शादी के दोनों भागीदारों को परिवार नाम की एक बड़ी घड़ी के पुर्जों की तरह हिलने-डुलने की एक बड़ी सीमित आजादी दी, लेकिन उससे परे कुछ नहीं। भारत के हिन्दू समाज में तो शादी को सात जन्मों का रिश्ता कहा गया, हालांकि अगला जन्म भी किसी का देखा हुआ नहीं है। ऐसे अनदेखे छह और जन्मों की भी वफादारी का पैमाना सामने रखते हुए यह भी नहीं देखा गया कि शादी के बाद एक जन्म में ही कितने उतार-चढ़ाव आते हैं, और दोनों भागीदार उन्हें भी हर बार झेल नहीं पाते हैं। शादी नाम की व्यवस्था लोगों को कई मायनों में एक मशीन के पुर्जों की तरह एक-दूसरे से जोड़कर रख देती है, और यह व्यवस्था यह ध्यान रखती कि असल जिंदगी में ये दोनों पुर्जे तो दुनिया के और बहुत से पुर्जों के साथ संपर्क में आते हैं, और अपने आपमें भी इन दो पुर्जों के बीच कई किस्म की रगड़ाहट होती है।
आज दुनिया के किसी भी समाज में शादी से परे के संबंधों को अच्छी निगाह से देखा नहीं जाता, लेकिन इससे भी बड़ी बात यह है कि इन्हें हकीकत भी नहीं माना जाता। ऐसा मान लिया जाता है कि शादी नाम की संस्था लोगों को इंसान से मशीनी पुर्जा बनाने की ताकत रखती है, और बना भी देती है। लेकिन यह बात सच और हकीकत से कोसों दूर की बात है। (Daily Chhattisgarh)

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