संपादकीय
12 दिसम्बर 2017

बीच-बीच में देश के कुछ शहरों से खबरें आती हैं कि किस तरह किसी इंसान के दान किए हुए अंग किसी दूसरे शहर के अस्पताल तक पहुंचाने, और वहां पर किसी मरीज की जिंदगी बचाने के लिए इस्तेमाल होते हैं। ऐसे शहरों में पुलिस और वहां की जनता मिलकर सारी सड़कों को खाली करती हैं, ताकि अंग ले जा रहे चिकित्सा कर्मचारी तेज रफ्तार से एयरपोर्ट तक पहुंच सकें। ऐसा ग्रीन कॉरिडोर लोगों की मदद के बिना नहीं बन सकता। छत्तीसगढ़ में भी हमने एक-दो मरीजों को दूसरे शहर से राजधानी के एयरपोर्ट तक लाने के लिए बनाया ऐसा ग्रीन कॉरिडोर देखा है।
लेकिन इस बात से हमको एक दूसरी बात सूझती है जिसकी वजह से आज इस मुद्दे पर यहां चर्चा की जा रही है, वह है अंगदान की। भारत वैसे तो अपने-आपको दानियों का देश बताता है, लेकिन हकीकत यह है कि लोगों में धर्म और किसी गुरु के नाम पर ही आमतौर पर दान देने की बात सामने आती है। जहां तक अंगदान की बात है, तो लोग तो मरने के बाद भी अपनी आंखें, या अपना बदन दान करना नहीं चाहते। आंखों की कमी इतनी है कि देश में लाखों लोग इंतजार कर रहे हैं कि उन्हें किसी दूसरे इंसान के गुजरने पर उनकी आंखें मिल सकें, और दूसरी तरफ देश में रोजाना कई लाख आंखें जलाई या दफनाई जा रही हैं। अब चिकित्सा विज्ञान खासा आगे बढ़ गया है, और भारत में जरूरतमंद मरीजों को दूसरे मरीजों से मिली हुई किडनी, लीवर, दिल, या और दूसरे अंग लगातार लगाए जा रहे हैं। देश के अधिकतर बड़े शहरों में अस्पताल ऐसे प्रत्यारोपण आसानी से कर रहे हैं, और जरूरत अब केवल ऐसे लोगों की है जो कि अपने परिवार के गुजर चुके, या कि बे्रन-डेड हो चुके लोगों के अंग दान कर सकें।
इस पर लिखते हुए हमें केरल की उस महिला की तस्वीर याद पड़ती है जिसने अपने पति के दोनों हाथ दान किए, और किसी विदेशी को वे दोनों हाथ लगाए गए। इसके बाद जब दोनों का सामना हुआ तो वह महिला अपने पति के हाथ दूसरे किसी बदन पर लगे हुए देखती ही रह गई, और अगर उसके चेहरे पर लिखी तसल्ली को देखा जाए, तो बाकी तमाम लोगों को भी प्रेरणा मिल सकती है। केरल के ये हाथ अफगानिस्तान के एक ऐसे भूतपूर्व सैनिक को मिले जो कि जमीनी सुरंग हटाते हुए दोनों हाथ खो चुका था। आज हिंदुस्तान में ऑपरेशन कराने के लिए पाकिस्तान से रोजाना ही मरीज आ रहे हैं, और दुनिया के और बहुत से देशों से आ रहे हैं। इस देश में लोगों में अंगदान का रिवाज बढ़ाने की जरूरत है, और चाहे हिंदू धर्म हो, चाहे जैन, चाहे बौद्ध, चाहे मुस्लिम, चाहे सिख, चाहे पारसी, इन सबमें दान की अपार महिमा लिखी हुई है। लोगों को दूसरों के काम आना चाहिए, ऐसा भी सबमें लिखा हुआ है। पारसियों में तो मौत के बाद भी लाश को पक्षियों के खाने के लिए एक मीनार पर रखकर छोड़ दिया जाता है।
आज जब भारत के कोई गुरु अयोध्या के विवाद को सुलझाने में दिलचस्पी ले रहे हैं, कोई गुरु नदियों को बचाने के अभियान में लगे हैं, और अधिकतर दूसरे गुरु भी दूसरों की मदद करने, दान करने, दूसरी जिंदगियों को बचाने जैसी बातें कहते हैं। ऐसे में देश में एक बड़ी पहल करने की जरूरत है ताकि लोगों को अंगदान करने के लिए प्रेरित किया जा सके। बौद्ध लोगों से भरे हुए श्रीलंका को दुनिया का ऐसा अकेला देश होने का गौरव हासिल है जो कि इतने नेत्रदान पाता है कि अपने देश से बाहर भी वह दुनिया के दूसरे देशों को आंखें भेजता है और वहां लोगों को उनसे रौशनी मिलती है। यह सिलसिला धर्म, राजनीतिक विचारधारा, आध्यामिक अनुयायियों, सभी की मदद से आगे बढ़ाने की जरूरत है। अभी बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के बेटे की शादी हुई, तो समारोह में खाने का इंतजाम तो नहीं था, लेकिन वहां पर एक स्टॉल लगाया गया था ताकि लोग अंगदान करने के फॉर्म भर सकें। (Daily Chhattisgarh)
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