टेक्नालॉजी से अधिक लोकतंत्र या लोकतंत्र गुलाम हो चला?

संपादकीय
18 मार्च 2018


डाटा विश्लेषण करने वाली एक कंपनी अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के चुनाव प्रचार के लिए फेसबुक पर से पांच करोड़ से अधिक अमरीकी मतदाताओं की निजी जानकारी चोरी की थी, और शुरुआती जानकारी से ही यह साफ जाहिर हो रहा है कि उसका इस्तेमाल ट्रंप के चुनाव अभियान के लिए किया गया था। अमरीका में करीब साढ़े 23 करोड़ वोटर हैं, और इस चोरी का मतलब उनमें से 20 फीसदी से अधिक लोगों को प्रभावित करने की कोशिश।
समाचार बताता है कि डाटा विश्लेषण करने वाली फर्म कैंब्रिज एनालिटिका ने अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के 2016 के चुनाव प्रचार में समर्थन तकनीक तैयार करने के लिए पांच करोड़ फेसबुक यूजरों की निजी जानकारी चुराई थी। समाचार प्रकाशित होने के बाद मैसाचुसेट्स की अटार्नी जनरल ने कहा कि उनके कार्यालय ने जांच शुरू कर दी है। फेसबुक ने शुक्रवार को कहा था कि डाटा प्राइवेसी नीति का उल्लंघन पाने के बाद उसने कैंब्रिज एनालिटिका को निलंबित कर दिया है। इसे फेसबुक के इतिहास में सबसे बड़ी डाटा चोरी कहा गया है।
जिन लोगों को यह लगता है कि टेक्नालॉजी में दुनिया में लोकतंत्र को बढ़ाने का काम किया है, और सबसे कमजोर तबके को भी आज इंटरनेट और कम्प्यूटर की वजह से कई किस्म के हक मिले हैं, उनकी बात टेक्नालॉजी के असर का एक पहलू भर है। इसका दूसरा पहलू यह है कि कम्प्यूटर और सोशल मीडिया, इन दोनों पर लोगों की जो निजी जानकारी दर्ज है, उसका बाजारू या जुर्म के लिए इस्तेमाल होने का खतरा भी खड़ा हो गया है। ट्रंप के चुनाव के दौरान ही यह पुख्ता बात सामने आ गई थी कि उनकी विरोधी उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन की ईमेल चोरी करके रूस के हैकरों ने वहां की सरकार के रास्ते उन्हें शायद ट्रंप के लोगों तक पहुंचाया था, और हिलेरी को बदनाम करने में उनका इस्तेमाल हुआ था। इसके बाद से योरप के कई देशों ने रूस की ऐसी हरकत और किसी देश के चुनाव में विदेशी दखल के खिलाफ बड़ी नाराजगी जाहिर की थी।
बात महज विदेशी दखल की नहीं है, फेसबुक की जानकारी चोरी करके वोटरों को प्रभावित करने की रणनीति बनाकर ट्रंप के लोगों ने अमरीका के भीतर ही यह जुर्म किया है, और आज जो टेक्नालॉजी अमरीका में इस्तेमाल हो रही है, वह दुनिया के किसी भी दूसरे हिस्से में काम लाई जा सकती है। कल के दिन भारत के चुनावों में लोगों के ईमेल बॉक्स की जानकारी उन्हें बदनाम करने में इस्तेमाल हो सकती है, लोगों के टेलीफोन कॉल डिटेल्स उजागर किए जा सकते हैं, और लोगों को ब्लैकमेल किया जा सकता है। आज सुप्रीम कोर्ट में आधार कार्ड की अनिवार्यता का जो विरोध चल रहा है, उसके पीछे एक तर्क यह भी है कि इससे सरकार के हाथ में लोगों की निजी जिंदगी की गोपनीयता आ जाएगी और कोई भी सरकार इसके बेजा इस्तेमाल का लुभावना मोह छोड़ नहीं पाएगी। भारत में सरकार जिस बड़े पैमाने पर आधार कार्ड की अनिवार्यता को लादने में लगी हुई है, और जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल थोड़ी सी रोक लगाई है, उसके बहुत खतरनाक नतीजे हो सकते हैं। हमने यह देखा है कि भारत में सुरक्षित माने जाने वाले बैंकों को किस तरह लूट लिया गया, और बैंकों के सारे निगरानी के इंतजाम, उनके कम्प्यूटर की जांच का इंतजाम सब धरा रह गया। आज आधार कार्ड की वजह से लोगों की आवाजाही, उनकी खरीददारी, उनका बैंक से लेन-देन, उनके फोन, उनके इंटरनेट, उनके ट्रेन और प्लेन के रिजर्वेशन, उनके टैक्स की जानकारी, यह सब कुछ सरकार के हाथ में है, और काफी अरसे से एक लतीफा चल रहा है जो कि लतीफा कम हकीकत अधिक है। एक आदमी पीजा मंगाने के लिए फोन करता है, तो वहां से जवाब मिलता है कि आप हर बार जो पसंद करते हैं क्या वही भेजना है? हैरान आदमी पूछता है कि तुम्हें कैसे मालूम? तो जवाब मिलता है कि पिछले पन्द्रह बार आपने इस किस्म का पीजा मंगाया था। इस बार भी वही भेजने के लिए कहने पर सलाह मिलती है कि क्या आप अधिक सब्जियों वाला पीजा बेहतर नहीं समझेंगे? तो ग्राहक ने कहा कि नहीं मुझे सब्जियां नापसंद हैं। इस पर टेलीफोन पर ऑर्डर लेने वाले ने कहा कि आपका कोलेस्ट्रॉल बढ़ा हुआ है। हैरान आदमी ने पूछा कि तुम्हें कैसे मालूम? तो जवाब मिला- हमारे पास आपके पिछले सात बरस के सारे ब्लड टेस्ट की रिपोर्ट है क्योंकि आपने जिस कार्ड से भुगतान किया था, वह आधार से जुड़ा हुआ है। इस पर डरे-सहमे आदमी ने कहा लेकिन मैं तो बढ़े हुए कोलेस्ट्रॉल के लिए दवा ले रहा हूं। इस पर टेलीफोन पर जवाब मिला कि आपने चार महीनों में दवा नियमित रूप से नहीं ली है, और कुल 30 गोलियां ऑनलाईन खरीदी हैं। उसने कहा कि मैंने एक दवा दुकान से बाकी गोलियां खरीदी थीं। तो टेलीफोन पर कहा गया कि यह तो आपके क्रेडिट कार्ड पर दिख नहीं रहा है। उसने कहा कि मैंने नगद भुगतान किया था, तो फोन पर जवाब मिला कि आपका बैंक खाता इतनी नगदी निकालना दिखा नहीं रहा है। उसने कहा कि मेरे पास नगद पैसे आने का एक दूसरा जरिया है, तो फोन पर कहा गया कि आपके टैक्स रिकॉर्ड में तो ऐसी किसी नगद कमाई का जिक्र नहीं है...।
बातचीत का यह सिलसिला भयानक है कि एक आधार कार्ड के चलते लोगों की निजी जिंदगी नंगी हो चुकी है। लेकिन अमरीका की ताजा खबर बताती है कि बिना आधार कार्ड के फेसबुक से निजी जानकारियां निकाली जा सकती हैं। इसी को लेकर कई बरस पहले अमरीका में एक नया लतीफा बना कि सरकार ने वहां सीआईए का बजट एक चौथाई कर दिया कि फेसबुक के बाद अब जासूसी पर अधिक मेहनत तो करनी नहीं पड़ती। फिलहाल लतीफों के बीच यह सोचें कि निजी जिंदगी की गोपनीयता तो रह नहीं गई है, इसलिए निजी जिंदगी को ही साफ-सुथरा रखना समझदारी होगी। (Daily Chhattisgarh)

वैज्ञानिक सोच कमजोर करने के कई किस्म के नुकसान...

संपादकीय
17 मार्च 2018


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दिल्ली के कृषि मेले में किसानों से अपील की कि वे फसल काटने के बाद बचे हुए ठूंठ को जलाना बंद करें क्योंकि इससे बहुत प्रदूषण फैलता है, और खेतों की मिट्टी को नुकसान भी पहुंचता है। लोगों को याद होगा कि दिल्ली का राजधानी क्षेत्र और पंजाब, उत्तरप्रदेश, इन तमाम इलाकों में खेतों में ठूंठ जलाने से जो प्रदूषण पहुंचता है, उससे लोगों की सेहत बहुत बुरे खतरे में पड़ चुकी है, और दिल्ली खेतों की ऐसी लगाई गई आग के घेरे में देश का सबसे प्रदूषित शहर बन चुकी है। अब एक तरफ तो प्रधानमंत्री ने किसानों से यह अपील की है, उधर दूसरी तरफ मेरठ से दूसरी खबर आई है कि एक हिन्दू संस्था नौ दिनों का एक यज्ञ कर रही है जिसमें साढ़े तीन सौ ब्राम्हण शामिल होंगे, और प्रदूषण को घटाने के लिए किया जा रहा यह यज्ञ आम की पांच सौ क्विंटल लकड़ी जलाकर होगा। इसके आयोजकों का कहना है कि हिन्दुत्व के मुताबिक यज्ञ करने से प्रदूषण घटता है, और हवा पवित्र होती है। आम की लकड़ी पर गाय के दूध से बने घी को डालकर जब जलाया जाएगा, तो उससे प्रदूषण घटेगा। 
यह देश इक्कीसवीं सदी में पहुंच गया है, लेकिन अवैज्ञानिक बातों को देश की सांस्कृतिक विरासत साबित करते हुए इस किस्म के बहुत से काम हो रहे हैं। गोबर और गोमूत्र को इस तरह का साबित किया जा रहा है कि मानो उससे अंतरिक्षयान भी चलाए जा सकते हैं। यह साबित करने की कोशिश हो रही है कि गाय ऑक्सीजन छोड़ती है। अभी दो दिन पहले उत्तर-पूर्व में शुरू हुई राष्ट्रीय साईंस कांग्रेस में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि क्या भारत में बच्चों को विज्ञान की समझ देने के लिए पर्याप्त काम हुआ है? उन्होंने कहा कि हमारी वैज्ञानिक उपलब्धियों को समाज में ठीक से पहुंचाने की जरूरत है जिससे नौजवानों में वैज्ञानिक सोच विकसित होगी। उन्होंने वैज्ञानिकों से यह भी अनुरोध किया कि वे हर बरस सौ घंटे स्कूली बच्चों के साथ गुजारें ताकि बच्चों में वैज्ञानिक समझ बढ़ सके। 
लेकिन देश की हकीकत यह है कि आए दिन सरकारों में बैठे हुए लोग, सार्वजनिक-राजनीति में बड़े ओहदों पर बैठे हुए चर्चित और मशहूर लोग लगातार अवैज्ञानिक बातें करते हैं, और उस वक्त न तो उनकी सरकार के मुखिया कुछ कहते, न ही उनकी पार्टी के लोग कुछ कहते, और वैसी बातें खबरों में जगह पाती रहती हैं, कुछ समझदार लोग उन बयानों के पीछे के झूठ को समझते हैं, लेकिन बहुत से कमसमझ लोग उसे नहीं समझ पाते, और उस पर भरोसा भी कर बैठते हैं, और सोशल मीडिया की मेहरबानी से उसे आगे भी बढ़ाते चलते हैं। आज देश में जरूरत इस बात की है कि भारत की प्राचीन संस्कृति के नाम पर, एक इतिहास के नाम पर जिस तरह का झूठ-फरेब आगे फैलाया जा रहा है, उसका विरोध ऐसे लोगों के मुखिया ही करें, फिर चाहे वे पार्टी के हों या सरकार के। भारत को यह बात समझनी होगी कि बाकी दुनिया के मुकाबले वह विज्ञान और टेक्नालॉजी पर टिके हुए कारोबार में अगर आगे बढऩा चाहता है, तो यह अंधविश्वास और पाखंड पर चलते हुए नहीं हो पाएगा। जब देश के लोगों के एक बड़े हिस्से को धर्मान्धता और कट्टरता में डुबाकर रखा जाएगा तो उनकी क्षमता का, उनकी उत्पादकता का, देश के लिए इस्तेमाल कम ही हो सकेगा।
आज एक तरफ नदियों को प्रदूषण से मुक्त कराने का नारा चल रहा है। गंगा को साफ करने के लिए हजारों करोड़ शायद खर्च हो भी चुके हैं। और दूसरी तरफ इसी गंगा में लगातार धार्मिक प्रदूषण जारी है, और उससे मोक्ष प्राप्ति की सोच प्रचलित है। जितने किस्म का धार्मिक विसर्जन गंगा सहित बाकी तमाम नदियों में हो रहा है, वह नदियों की बर्दाश्त करने की क्षमता से बहुत अधिक है, और अदालत के बहुत से आदेशों के बावजूद वह कम होते नहीं दिख रहा है। चारों तरफ धार्मिक कोलाहल लोगों का जीना हराम कर रहा है, और चूंकि इनके साथ धर्म का नाम जुड़ा हुआ है, इसलिए किसी शासन-प्रशासन की इन पर कार्रवाई की हिम्मत नहीं पड़ती। सुप्रीम कोर्ट का आदेश धरा रह गया है जिसमें देश भर से सड़क किनारे से, सार्वजनिक जगहों से अवैध धार्मिक निर्माण हटाने को कहा गया था, हटाना तो दूर, चारों तरफ नए धार्मिक अवैध निर्माण जारी हैं, और उन पर कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है। 
विज्ञान और धर्मान्धता, इन दो चीजों का साथ-साथ चलना मुमकिन नहीं है। एक तरफ खेतों में फसलों के ठूंठ जलाने से प्रदूषण बढ़ रहा है, तो दूसरी तरफ धार्मिक प्रदूषण हर किस्म से लोगों का जीना हराम कर रहा है। इन दोनों ही बातों से निपटने का एक आसान जरिया वैज्ञानिक सोच हो सकती है, लेकिन प्रधानमंत्री के दो दिनों के भीतर दिए गए दो किस्म के बयान उनकी पार्टी, और उनकी सरकार के लोग अनसुने कर रहे हैं, और वैज्ञानिक सोच को खत्म भी कर रहे हैं, और धर्मान्धता का प्रदूषण बढ़ा भी रहे हैं। इस मौके पर प्रधानमंत्री को भाषणों से परे भी ऐसी कार्रवाई करनी चाहिए जिसका असर उनके और बाकी लोगों पर भी हो। (Daily Chhattisgarh)

बात की बात, 17 मार्च

दीवारों पर लिक्खा है, 17 मार्च

खुशहाली के पैमानों पर भारत खोटा तो साबित हुआ, पर क्या सचमुच ही नौबत इतनी खराब?

संपादकीय
16 मार्च 2018


संयुक्त राष्ट्र की वल्र्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट-2018 के 156 देशों में भारत को 133वीं जगह मिली है। दुनिया के किस देश में वहां के लोग कितने खुशहाल रहते हैं इसकी रिपोर्ट में भारत पिछले बरस 122वीं जगह पर था, लेकिन ऐसा लगता है कि पिछले साल भर में हालात खराब हुए हैं और भारत 133वीं जगह पर फिसल गया है। दिलचस्प बात यह है कि भारत के अड़ोस-पड़ोस के पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार के लोग भारत के लोगों के मुकाबले अधिक खुश हैं। पाकिस्तान तो इस लिस्ट में 75वीं पायदान पर है, बांग्लादेश 115वीं, श्रीलंका 116वीं, और म्यांमार 130वीं जगह पर है। भारत के लोग इन सबसे भी कम खुशहाल हैं! 
इस रिपोर्ट को देखकर ऐसा लगता है कि आंकड़ों पर आधारित निष्कर्ष संदेह से परे नहीं रहते। और आंकड़ों पर आधारित अखबारनवीसी भी कोई सही खबर नहीं बना पाती। हमें खबरों से भारत से लगे हुए इन देशों के जो हालात पता लगते हैं, उनसे यह बात भरोसेमंद नहीं लगती कि वहां के लोग भारत के मुकाबले अधिक खुश होंगे। आए दिन पाकिस्तान के लोग इलाज कराने हिन्दुस्तान आते हैं, आसपास के तमाम देशों के लोग पढऩे के लिए भारत आते हैं, और जाहिर तौर पर भारत की हालत पड़ोस के इन देशों के मुकाबले बेहतर लगती है। अब सवाल उठता है कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने ऐसा नतीजा कैसे निकाला होगा? अभी हमने इस रिपोर्ट को पूरा देखा नहीं है, लेकिन इस पर बनी हुई खबर को ही देखा है जो बताती है कि यह रिपोर्ट किसी देश के जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) सामाजिक सहयोग, उदारता, भ्रष्टाचार के स्तर, सामाजिक स्वतंत्रता, और स्वास्थ्य जैसे पैमानों पर बनाई जाती है। 
अब एक बात यह लगती है कि ये पैमाने तो ठोस आंकड़े हैं, जो कि किसी देश की सरकार छुपा नहीं सकती, और किसी देश के लोग उसे दबा नहीं सकते। लेकिन जहां तक लोगों की सोच का सवाल है, तो यहां पर ऐसा लगता है कि लोग उतने ही खुश शायद रहते हों जितनी कि उनकी उम्मीद के पैमाने पर खरी उतरती हो। लोगों की नाउम्मीदी पूरी तरह उनकी उम्मीद पर टिकी होती है, और जहां उम्मीदें अधिक होती हैं, वहीं पर नाउम्मीदी भी अधिक होती होगी। भारत में शायद लोगों की उम्मीदें अधिक रहती हों, और उस हिसाब से वे कम खुश हो पाते होंगे। ऐसी कोई वजह नहीं लगती है कि पाकिस्तान के लोग भारत के लोगों के मुकाबले अधिक खुश रहते हों, सिवाय इसके कि उनकी खुद की उम्मीदें ही बहुत कम हों। 
फिर भी ब्रिटेन से लेकर मध्यप्रदेश तक, बहुत से देश-प्रदेशों में सरकारें खुशहाली या खुश रहने को महत्व देते दिख रही हैं। ब्रिटेन में भी इसके लिए एक विभाग बनाकर एक मंत्री को उसका जिम्मा दिया गया है, और मध्यप्रदेश में भी शिवराज सरकार ने ऐसा किया है। अब यह अलग बात है कि बहुत सी सरकारों का रूख किसी एक तबके को खुश रखने का होता है, और अगर ऐसा तबका बहुसंख्यक तबका है, तो फिर उस देश-प्रदेश में खुशहाली होने की गारंटी बढ़ जाती है। लेकिन मध्यप्रदेश की चर्चा करते हुए हमें याद पड़ता है कि अभी हफ्ते भर में ही दो-तीन दिनों में दो ऐसी घटनाएं हुईं जिनमें किसी लड़की ने छेडख़ानी के बाद उसकी शिकायत पर पुलिस की कार्रवाई न होने पर परेशान होकर खुदकुशी कर ली। अब जहां पर बहुसंख्यक तबका अगर किसी नदी के किनारे आरती करके खुश है, तो वहां पर कुछ लड़कियों या महिलाओं की ऐसी खुदकुशी राज्य में खुशहाली के आंकड़ों को कितना बिगाड़ पाएगी? इसलिए खुशहाली एक तुलनात्मक स्थिति दिखती है जो कि किसी देश-प्रदेश की जनता की उम्मीदों और हकीकत की उसकी धारणा के बीच का अनुपात रहती होगी। अपने पड़ोसी देशों के मुकाबले भारत एक अधिक परिपक्व लोकतंत्र है, जो कि फौजी हुकूमत से बचा हुआ भी है। पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार, इन सबमें लंबे समय तक फौजी हुकूमत भी रही, वहां का लोकतंत्र भी बहुत भ्रष्ट रहा, वहां के राष्ट्र प्रमुख या शासन प्रमुख भी सजा पाए हुए रहे, या नेपाल में काफी अरसे तक एक धर्मराज रहा, एक राजशाही रही। ऐसे में इन जगहों के लोगों का भारत के मुकाबले अधिक खुशहाल होने की एक ही वजह लगती है कि वहां के लोगों की उम्मीदें बहुत कम हैं, बहुत छोटी हैं, और वे वैसी हालत में आसानी से खुश हो रहे हैं। फिलहाल हम अपने इस निष्कर्ष को लेकर भारत के भीतर संतुष्ट हो जाना नहीं चाहते, और भारत को बैठकर ठंडे दिल से यह सोचना चाहिए कि किन पैमानों पर कैसा खोटा उतरने की वजह से उसे खुशहाली की लिस्ट में तकरीबन आखिर में जगह मिली है, और यह नौबत कैसे बेहतर की जा सकती है। इसके साथ-साथ यह कुछ लोगों के शोध और अध्ययन का मामला भी दिखता है कि भारत और उसके इन पड़ोसी देशों के बीच इस रिपोर्ट में ऐसा फर्क कैसे आ गया? (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 16 मार्च

दो-तीन लोकसभा उपचुनावों ने बदल दिया देश का माहौल

संपादकीय
15 मार्च 2018


उत्तरप्रदेश और बिहार में कल लोकसभा सीटों के उपचुनावों के नतीजों ने देश की तस्वीर को एकदम से बदलकर रख दिया है। त्रिपुरा के बाद ऐसा लग रहा था कि देश में भगवा के अलावा कोई रंग बचा ही नहीं है, लेकिन उप्र के सीएम-डिप्टी सीएम की खाली की गई सीटों पर जिस तरह से भाजपा की हार हुई है, और जिस तरह से जेल में बंद लालू की पार्टी ने बिहार में एक लोकसभा सीट जीती है, उससे भाजपा की अश्वमेघी साख को खासी चोट पहुंची है। और यह जीत-हार महज दो-तीन लोकसभा सीटों की जीत-हार नहीं है, यह देश में अनहोनी से लगते एक भाजपा-विरोधी गठबंधन की संभावना की जीत है। जिस तरह उत्तरप्रदेश में दो सबसे बड़े परंपरागत राजनीतिक-विरोधी बसपा और सपा ने एक होकर यह चुनाव जीता है, उससे देश के भाजपा-एनडीए-विरोधी दलों के बीच एक नया उत्साह दिख रहा है। भाजपा की परंपरागत साथी रह चुकी पार्टियां, शिवसेना, और तेलुगूदेशम ने खुलकर कहा है कि यह देश में भाजपा-विरोधी लहर का नतीजा है। बाकी बहुत सी पार्टियों ने इसे भाजपा-विरोधी गठबंधन का एक बड़ा मौका बताया है। अखिलेश यादव और मायावती ने अपनी पार्टियों के अस्तित्व के लिए जिस तरह भाजपा के खिलाफ जमकर एक-दूसरे का साथ दिया है, उसे देखकर भाजपा हक्का-बक्का रह गई है। 
कुल मिलाकर देखें तो उत्तरप्रदेश की इन दो लोकसभा सीटों पर भाजपा की शिकस्त लाख वोटों से भी कम की है। लेकिन इसने देश में एक विपक्षी मोर्चे की संभावनाओं की सुगबुगाहट शुरू कर दी है जो कि इस चुनावी हार के मुकाबले अधिक दिक्कत वाली बात दिखती है। उत्तरप्रदेश के बड़बोले और हमलावर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इन दो लोकसभा सीटों पर हार को सपा-बसपा के अवसरवादी समझौते का नतीजा बताया है, लेकिन आज पूरा भारतीय लोकतंत्र लगातार यह देख रहा है कि भाजपा खुद पूरे देश में किस तरह के समझौते कर रही है, और इसी उत्तरप्रदेश में भाजपा ने उस नरेश अग्रवाल को सपा से भाजपा लाकर स्वागत किया है जिसे पाकिस्तानी करार देते हुए देश से निकालने की मांग भाजपा के नेताओं ने ही की थी, अभी हाल में ही की थी। इसलिए बसपा और सपा के बीच एक चुनावी तालमेल में कोई भी बात अनैतिक नहीं है, बस इतना ही है कि यह गठबंधन अभूतपूर्व रहा है, और यह गठबंधन इन दोनों पार्टियों को भूतपूर्व होने से बचा सकता है। लगे हाथों यहां पर कांग्रेस की चर्चा भी जरूरी है जिसने सपा-बसपा का साथ न देकर अपने उम्मीदवार अलग से खड़े किए, और उन्हें जमानत जब्ती देखनी पड़ी। कांग्रेस को जितने वोट मिले, उनकी गिनती पहली-दूसरी के बच्चे भी बिना कोई चूक किए कर सकते हैं। इसलिए देश में आज भाजपा-विरोधी गठबंधन की किसी संभावना के उभरने पर कांग्रेस को अपनी बददिमागी और बेदिमागी छोडऩी चाहिए, और अपनी पार्टी के बहुत ही संकुचित हितों से ऊपर जाकर उसे एक ऐतिहासिक जिम्मेदारी के मौके पर जिम्मेदारी भी दिखानी चाहिए। कांग्रेस वैसे तो हाशिए पर पहुंच चुकी पार्टी है, लेकिन हाशिए पर बने रहने के लिए भी उसे देश की दूसरी विपक्षी पार्टियों के साथ मिलकर चलना होगा। छत्तीसगढ़ में हम देख रहे हैं कि प्रदेश कांग्रेसाध्यक्ष भूपेश बघेल ने खुलकर बसपा के कार्यकर्ताओं से अपील की है कि वे कांग्रेस के साथ आएं। मतलब यही है कि कई सीटों पर बसपा और कांग्रेस का तालमेल नतीजे बदल सकता है। हालांकि उनका यह कहना है कि इस मुद्दे पर कोई भी फैसला कांग्रेस का हाईकमान ही ले सकता है, लेकिन भाजपा-विरोधी वोट आपस में न बंटें इसलिए उन्होंने ऐसी अपील की है। 
सोनिया गांधी ने दो दिन पहले करीब डेढ़ दर्जन विपक्षी नेताओं को खाने पर बुलाया था। यूपीए की अध्यक्ष रहते हुए उनका अधिकतर पार्टियों के साथ तालमेल अच्छा था, और शरद पवार जैसे जिन नेताओं ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल के खिलाफ कांग्रेस छोड़ी थी, उनसे भी सोनिया को कोई परहेज नहीं था, न है। ऐसे में कांग्रेस को एक दरियादिली दिखाकर उन राज्यों में पीछे की सीट पर बैठना मंजूर करना चाहिए जहां पर उसकी पकड़ बहुत कमजोर है, या नहीं के बराबर है। ऐसा करके ही कांग्रेस पार्टी देश में एक जिम्मेदार पार्टी की साख पा सकेगी, और भारतीय लोकतंत्र में एक मजबूत विपक्षी गठबंधन खड़ा हो सकेगा। उत्तरप्रदेश के नतीजों को लेकर भाजपा के जो लोग आत्ममंथन कर रहे हैं, उन्हें योगी सरीखे भाजपा के कई नेताओं के साम्प्रदायिक, हमलावर, और बददिमाग बयानों के बारे में एक बार फिर सोचना चाहिए। जब वक्त अच्छा चलता है, तब उसे बाकी पूरी जिंदगी के लिए स्थाई नहीं मान लेना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

बात की बात, 15 मार्च

बस्तर में इतनी मौतों से निकलते हैं ये दो सबक

संपादकीय
14 मार्च 2018


बस्तर में हफ्ते भर में दो बड़े मामले हुए। पहले पुलिस और दूसरे सुरक्षा बलों ने 9 नक्सलियों को एक मुठभेड़ में मारा, और उसके तीन-चार दिनों के भीतर ही नक्सलियों ने एक विस्फोट में एंटी लैंडमाईन गाड़ी को उड़ा दिया जिसमें सीआरपीएफ के 9 जवान शहीद हुए, कई और जख्मी भी हुए जिन्हें बस्तर से रायपुर लाया गया। यह सिलसिला बस्तर सहित देश के कुछ दूसरे नक्सलप्रभावित इलाकों में बरसों से चले आ रहा है, और पिछले दो-तीन बरस में बस्तर में पुलिस की कामयाबी ने जिंदगियों का नुकसान कुछ घटाया है, लेकिन फिर भी हिंसा का पूरी तरह खात्मा अभी नजरों से दूर है। बस्तर के जंगलों को जिन लोगों ने देखा है वे ही समझ सकते हैं कि वहां गुरिल्ला लड़ाई अधिक आसान है, और उसके खिलाफ सरकारी कार्रवाई खासी मुश्किल है। जो लोग इन दोनों पक्षों को बराबरी का समझते हैं, उन्हें कुछ बुनियादी बातों का फर्क समझना जरूरी है। पहली बात तो यह कि पुलिस और सुरक्षा बल सरकार, अदालत, मानवाधिकार आयोग, मीडिया, और समाज, इन तमाम के सवालों से घिरे रहते हैं, और जवाबदेह भी रहते हैं। किसी हत्या, बलात्कार, या हिंसा को लेकर उनके खिलाफ जुर्म भी दर्ज होते हैं, और गिरफ्तारियां भी होती हैं। पुलिस या केन्द्र सरकार से आए हुए दूसरे सुरक्षा बलों के पास यह सहूलियत नहीं होती कि वे नक्सलियों की राह में जमीनी सुरंगें बिछाकर, उनमें विस्फोट करके, नक्सलियों को थोक में मार सकें। लेकिन नक्सलियों के साथ इन तमाम बातों पर सहूलियतें ही सहूलियतें हैं। वे किसी के प्रति जवाबदेह नहीं हैं, उन्हें किसी अदालती कटघरे में नहीं जाना है, वे जनसुनवाई के नाम पर गांव के बेकसूरों का भरे गांव के सामने गला रेत देते हैं, वे बस्तर के इलाके में काम करने वाले नेता, अफसर, ठेकेदार, और कारोबारियों से वसूली और उगाही करते हैं, वे तरह-तरह के विस्फोटक लगाकर सुरक्षा बलों को थोक में मारते हैं। नतीजा यह होता है कि यह पूरी
लड़ाई एक गैरबराबरी की लड़ाई होकर रह गई है, और इसमें पुलिस और सुरक्षा बल मानो बंधे हाथों से लड़ रहे हैं।
ऐसी नौबत में सुरक्षा बलों की जिंदगी का इतना बड़ा नुकसान जब-जब होता है, तब-तब श्रद्धांजलि, सलामी, और मुआवजे के साथ बात खत्म हो जाती है। यह समझने की जरूरत है कि इन तीनों बातों से आगे की मौतों का खतरा कहीं भी कम नहीं हो रहा है। केन्द्र और राज्य सरकार की ताकत इतनी अधिक है कि जितने लोग मारे जाएं, उनसे सौ गुना अधिक नए लोगों को वहां भेजा जा सकता है, भेजा जा रहा है। सरकार की श्रद्धांजलि, सलामी, और मुआवजे की क्षमता भी असीमित है। लेकिन आज समाज के बीच से यह बात उठनी चाहिए कि दशकों से चली आ रही नक्सल हिंसा को क्या महज पुलिस-समस्या बनाकर रखना काफी है? आज छत्तीसगढ़ के बस्तर की मिसाल सामने रखें तो दो बातें बड़ी तल्खी के साथ महसूस होती हैं। पहली तो यह कि यह आर्थिक-सामाजिक और राजनीतिक समस्या सिर्फ पुलिस के हवाले करके अगर लोकतांत्रिक-राजनीतिक ताकतें इसे छोड़ देंगी, तो इससे कोई हल नहीं निकलेगा। छत्तीसगढ़ और केन्द्र सरकार, और बाकी राज्य सरकारें भी, इन सबको लोकतंत्र के प्रति अपनी अधिक बड़ी जिम्मेदारी को पूरा करना चाहिए, नक्सलियों से बातचीत का सिलसिला शुरू करके। नक्सली तो गैरलोकतांत्रिक हैं, वे लोकतंत्र विरोधी हैं, वे जनता द्वारा निर्वाचित नहीं हैं, और उनके कंधों पर सरकार चलाने की कोई जिम्मेदारी नहीं है। इसलिए उनका तो बातचीत की टेबिल से दूर रहना समझ पड़ता है, लेकिन जब भारत की सरकार उन देशों से भी बात करती है जहां से आतंकी आकर मुंबई हमले जैसी हिंसा करते हैं, तो फिर देश के भीतर के नक्सलियों से बात करके इस खून-खराबे को खत्म करने की एक कोशिश होनी चाहिए, दूसरी कोशिश भी होनी चाहिए, और तीसरी कोशिश भी होनी चाहिए। यह काम जितनी जल्दी शुरू होगा, उतनी ही जल्दी नक्सल-हिंसा के खत्म होने की संभावना शुरू होगी। 
एक दूसरी बात जो छत्तीसगढ़ के संदर्भ में जरूरी है, वह यह कि जिस बस्तर में आए दिन नक्सल-हमलों में सुरक्षा जवान मारे जा रहे हैं, या बुरी तरह घायल होकर राजधानी रायपुर लाए जा रहे हैं, उनके लिए बस्तर के उसी इलाके के बीच विश्व स्तर का एक ऐसा अस्पताल शुरू होना चाहिए, जहां जिंदगियों को तुरंत बचाया जा सके। ऐसे अस्पताल के लिए न तो खर्च की परवाह करनी चाहिए, और न ही वहां पर देश के सबसे महंगे डॉक्टरों को लाकर बसाने में खर्च की परवाह करनी चाहिए। यह इसलिए जरूरी है कि जिन जवानों को वहां पर लोकतंत्र को बचाने के लिए तैनात किया गया है, उनकी जिंदगियों को बचाने का बहुत ही कमजोर इंतजाम सरकारों ने किया है। बुरी तरह से जख्मी जवानों को बस्तर से राजधानी तक लाने में कम से कम डेढ़-दो घंटों का वह सुनहरा वक्त बर्बाद होता है जो कि किसी को बचा सकता है, या किसी को मार सकता है। छत्तीसगढ़ सरकार हो, या केन्द्र सरकार, हमारा मानना है कि इनमें से किसी को यह हक नहीं है कि बस्तर के बीच ऐसे इंतजाम के बिना वे जवानों को वहां खतरे में डालकर रखें। इस बारे में तुरंत काम होना चाहिए, और किसी किस्म की बजट-सीमा इसमें आड़े नहीं आनी चाहिए। आज राज्य सरकार के हिस्से यह एक फिक्र और निराशा की बात है कि जब बस्तर से बुरी तरह से जख्मी जवानों को घंटों के सफर के बाद राजधानी रायपुर में अस्पताल तक लाया भी जाता है, तो वह अस्पताल सरकारी नहीं होता, निजी होता है। सरकार के पास राजधानी में भी ऐसा अस्पताल नहीं है जो कि बस्तर के नक्सल इलाकों के बीच होना चाहिए। श्रद्धांजलि और सलामी बिल्कुल ही नाकाफी हैं, और जिंदगी को बचाने का इंतजाम केन्द्र और राज्य सरकार की बुनियादी जिम्मेदारी है, और इसके लिए तुरंत शुरुआत होनी चाहिए। यह सिलसिला नक्सलियों से बातचीत से परे एक अलग बचाव का मोर्चा है, और दोनों बातों पर अलग-अलग मेहनत की जानी चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

दलबदल अब दलदल नहीं, राजनीति मुनाफे का कारोबार

संपादकीय
13 मार्च 2018


समाजवादी पार्टी छोड़कर नरेश अग्रवाल का भाजपा जाना कुछ लोगों को चौंका सकता है और कुछ लोगों को इसमें कुछ अटपटा नहीं लगेगा। ऐसा माना जा रहा है कि सपा ने उन्हें राज्यसभा में फिर से नहीं भेजना तय किया, और इसलिए वे भाजपा में चले गए। उनके बारे में आई खबरों ने याद दिलाया है कि वे पहले बसपा में थे, उसके भी पहले वे कांगे्रस के विधायक थे, फिर वे सपा में आए, और विधानसभा, लोकसभा, राज्यसभा, इन सबमें वे अलग-अलग पार्टियों से रहे। अब भाजपा शायद उनकी चौथी पार्टी रहेगी। लोगों ने इस मौके पर यह भी याद दिलाया है कि पहले वे भाजपा और संघ परिवार के खिलाफ कैसा जहर उगलते आए थे, और भाजपा-संघ परिवार के लोग नरेश अग्रवाल के खिलाफ क्या-क्या बोलते रहे हैं। लेकिन आज वक्त ऐसा आ गया दिखता है कि हर पार्टी, या कि अधिकतर पार्टियां दूसरी पार्टी के कचरे, घूरे, मुजरिम, बदनाम को तब तक लेने के लिए न महज तैयार रहती हैं, बल्कि उतावली भी रहती हैं अगर ऐसे लोगों को लेने से तुरत-फुरत कोई फायदा होते दिखता हो।
भारतीय राजनीति ने नीति और सिद्धांत के दायरे पूरी तरह खो दिए हैं। अब शायद वामपंथी दल अकेले ऐसे रह गए हैं जो कि अपनी सोच पर कायम हैं, और फिर चाहे वे सत्ता से बाहर क्यों न हो जाएं। उनके अलावा कोई पार्टी ऐसी नहीं दिखती जिसके लोग कभी किसी पार्टी में, तो कभी दूसरी पार्टी में ठीक उसी तरह जाते दिखते हैं जिस तरह की सार्वजनिक शौचालय में जब जो पखाना खाली दिखे, उसी में घुस जाएं। यह सिलसिला लोकतंत्र को महज एक फायदातंत्र में तब्दील कर चुका दिखता है, और जिस तरह जंगल का कानून रहता है जिसमें जानवर महज अपने तात्कालिक फायदे के लिए किसी भी दूसरे पर हमला करते हैं, उसे मारकर खा जाते हैं, ठीक उसी तरह अब भारतीय राजनीति के नेता पूरी तरह अपनी आत्मरक्षा को सबसे ऊपर मानते हैं, और यह आत्मरक्षा भी महज फायदे और सहूलियत को जुटाने के लिए है।
जो पार्टियां एक-दूसरे के खिलाफ नफरत की आग उगलते आई हैं, उन पार्टियों को अब उन दुश्मन-पार्टियों के लड़ाकों से कोई परहेज नहीं रह गया है। भाजपा ने कुछ बरस पहले अपनी अभूतपूर्व कामयाबी पर खुश होकर कांगे्रसमुक्त भारत बनाने की कसम खाई थी, और वह पूरी होते दिख रही है, बस उसके लिए भाजपा को खुद को कांगे्रसयुक्त बनाना पड़ा है। अब एक-एक करके सारे के सारे कट्टर भाजपा-विरोधी भाजपा में लाए जा रहे हैं, और विश्व की इस सबसे बड़ी पार्टी का चेहरा देश के बहुत से हिस्सों में बड़ा बदला हुआ दिख रहा है। आज चूंकि भाजपा ही हिंदुस्तान में बढ़ती हुई ताकत है, उगता हुआ सूरज है, इसलिए राजनीति के तमाम सूरजमुखी-फूल उसी की तरफ चेहरा किए हुए हैं। अब इस देश की राजनीति में दलबदल को दलदल भी नहीं माना जाता, और राजनीति कामयाबी का एक कारोबार रह गया दिखता है। (Daily Chhattisgarh)