बस्तर में इतनी मौतों से निकलते हैं ये दो सबक

संपादकीय
14 मार्च 2018


बस्तर में हफ्ते भर में दो बड़े मामले हुए। पहले पुलिस और दूसरे सुरक्षा बलों ने 9 नक्सलियों को एक मुठभेड़ में मारा, और उसके तीन-चार दिनों के भीतर ही नक्सलियों ने एक विस्फोट में एंटी लैंडमाईन गाड़ी को उड़ा दिया जिसमें सीआरपीएफ के 9 जवान शहीद हुए, कई और जख्मी भी हुए जिन्हें बस्तर से रायपुर लाया गया। यह सिलसिला बस्तर सहित देश के कुछ दूसरे नक्सलप्रभावित इलाकों में बरसों से चले आ रहा है, और पिछले दो-तीन बरस में बस्तर में पुलिस की कामयाबी ने जिंदगियों का नुकसान कुछ घटाया है, लेकिन फिर भी हिंसा का पूरी तरह खात्मा अभी नजरों से दूर है। बस्तर के जंगलों को जिन लोगों ने देखा है वे ही समझ सकते हैं कि वहां गुरिल्ला लड़ाई अधिक आसान है, और उसके खिलाफ सरकारी कार्रवाई खासी मुश्किल है। जो लोग इन दोनों पक्षों को बराबरी का समझते हैं, उन्हें कुछ बुनियादी बातों का फर्क समझना जरूरी है। पहली बात तो यह कि पुलिस और सुरक्षा बल सरकार, अदालत, मानवाधिकार आयोग, मीडिया, और समाज, इन तमाम के सवालों से घिरे रहते हैं, और जवाबदेह भी रहते हैं। किसी हत्या, बलात्कार, या हिंसा को लेकर उनके खिलाफ जुर्म भी दर्ज होते हैं, और गिरफ्तारियां भी होती हैं। पुलिस या केन्द्र सरकार से आए हुए दूसरे सुरक्षा बलों के पास यह सहूलियत नहीं होती कि वे नक्सलियों की राह में जमीनी सुरंगें बिछाकर, उनमें विस्फोट करके, नक्सलियों को थोक में मार सकें। लेकिन नक्सलियों के साथ इन तमाम बातों पर सहूलियतें ही सहूलियतें हैं। वे किसी के प्रति जवाबदेह नहीं हैं, उन्हें किसी अदालती कटघरे में नहीं जाना है, वे जनसुनवाई के नाम पर गांव के बेकसूरों का भरे गांव के सामने गला रेत देते हैं, वे बस्तर के इलाके में काम करने वाले नेता, अफसर, ठेकेदार, और कारोबारियों से वसूली और उगाही करते हैं, वे तरह-तरह के विस्फोटक लगाकर सुरक्षा बलों को थोक में मारते हैं। नतीजा यह होता है कि यह पूरी
लड़ाई एक गैरबराबरी की लड़ाई होकर रह गई है, और इसमें पुलिस और सुरक्षा बल मानो बंधे हाथों से लड़ रहे हैं।
ऐसी नौबत में सुरक्षा बलों की जिंदगी का इतना बड़ा नुकसान जब-जब होता है, तब-तब श्रद्धांजलि, सलामी, और मुआवजे के साथ बात खत्म हो जाती है। यह समझने की जरूरत है कि इन तीनों बातों से आगे की मौतों का खतरा कहीं भी कम नहीं हो रहा है। केन्द्र और राज्य सरकार की ताकत इतनी अधिक है कि जितने लोग मारे जाएं, उनसे सौ गुना अधिक नए लोगों को वहां भेजा जा सकता है, भेजा जा रहा है। सरकार की श्रद्धांजलि, सलामी, और मुआवजे की क्षमता भी असीमित है। लेकिन आज समाज के बीच से यह बात उठनी चाहिए कि दशकों से चली आ रही नक्सल हिंसा को क्या महज पुलिस-समस्या बनाकर रखना काफी है? आज छत्तीसगढ़ के बस्तर की मिसाल सामने रखें तो दो बातें बड़ी तल्खी के साथ महसूस होती हैं। पहली तो यह कि यह आर्थिक-सामाजिक और राजनीतिक समस्या सिर्फ पुलिस के हवाले करके अगर लोकतांत्रिक-राजनीतिक ताकतें इसे छोड़ देंगी, तो इससे कोई हल नहीं निकलेगा। छत्तीसगढ़ और केन्द्र सरकार, और बाकी राज्य सरकारें भी, इन सबको लोकतंत्र के प्रति अपनी अधिक बड़ी जिम्मेदारी को पूरा करना चाहिए, नक्सलियों से बातचीत का सिलसिला शुरू करके। नक्सली तो गैरलोकतांत्रिक हैं, वे लोकतंत्र विरोधी हैं, वे जनता द्वारा निर्वाचित नहीं हैं, और उनके कंधों पर सरकार चलाने की कोई जिम्मेदारी नहीं है। इसलिए उनका तो बातचीत की टेबिल से दूर रहना समझ पड़ता है, लेकिन जब भारत की सरकार उन देशों से भी बात करती है जहां से आतंकी आकर मुंबई हमले जैसी हिंसा करते हैं, तो फिर देश के भीतर के नक्सलियों से बात करके इस खून-खराबे को खत्म करने की एक कोशिश होनी चाहिए, दूसरी कोशिश भी होनी चाहिए, और तीसरी कोशिश भी होनी चाहिए। यह काम जितनी जल्दी शुरू होगा, उतनी ही जल्दी नक्सल-हिंसा के खत्म होने की संभावना शुरू होगी। 
एक दूसरी बात जो छत्तीसगढ़ के संदर्भ में जरूरी है, वह यह कि जिस बस्तर में आए दिन नक्सल-हमलों में सुरक्षा जवान मारे जा रहे हैं, या बुरी तरह घायल होकर राजधानी रायपुर लाए जा रहे हैं, उनके लिए बस्तर के उसी इलाके के बीच विश्व स्तर का एक ऐसा अस्पताल शुरू होना चाहिए, जहां जिंदगियों को तुरंत बचाया जा सके। ऐसे अस्पताल के लिए न तो खर्च की परवाह करनी चाहिए, और न ही वहां पर देश के सबसे महंगे डॉक्टरों को लाकर बसाने में खर्च की परवाह करनी चाहिए। यह इसलिए जरूरी है कि जिन जवानों को वहां पर लोकतंत्र को बचाने के लिए तैनात किया गया है, उनकी जिंदगियों को बचाने का बहुत ही कमजोर इंतजाम सरकारों ने किया है। बुरी तरह से जख्मी जवानों को बस्तर से राजधानी तक लाने में कम से कम डेढ़-दो घंटों का वह सुनहरा वक्त बर्बाद होता है जो कि किसी को बचा सकता है, या किसी को मार सकता है। छत्तीसगढ़ सरकार हो, या केन्द्र सरकार, हमारा मानना है कि इनमें से किसी को यह हक नहीं है कि बस्तर के बीच ऐसे इंतजाम के बिना वे जवानों को वहां खतरे में डालकर रखें। इस बारे में तुरंत काम होना चाहिए, और किसी किस्म की बजट-सीमा इसमें आड़े नहीं आनी चाहिए। आज राज्य सरकार के हिस्से यह एक फिक्र और निराशा की बात है कि जब बस्तर से बुरी तरह से जख्मी जवानों को घंटों के सफर के बाद राजधानी रायपुर में अस्पताल तक लाया भी जाता है, तो वह अस्पताल सरकारी नहीं होता, निजी होता है। सरकार के पास राजधानी में भी ऐसा अस्पताल नहीं है जो कि बस्तर के नक्सल इलाकों के बीच होना चाहिए। श्रद्धांजलि और सलामी बिल्कुल ही नाकाफी हैं, और जिंदगी को बचाने का इंतजाम केन्द्र और राज्य सरकार की बुनियादी जिम्मेदारी है, और इसके लिए तुरंत शुरुआत होनी चाहिए। यह सिलसिला नक्सलियों से बातचीत से परे एक अलग बचाव का मोर्चा है, और दोनों बातों पर अलग-अलग मेहनत की जानी चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

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