वैज्ञानिक सोच कमजोर करने के कई किस्म के नुकसान...

संपादकीय
17 मार्च 2018


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दिल्ली के कृषि मेले में किसानों से अपील की कि वे फसल काटने के बाद बचे हुए ठूंठ को जलाना बंद करें क्योंकि इससे बहुत प्रदूषण फैलता है, और खेतों की मिट्टी को नुकसान भी पहुंचता है। लोगों को याद होगा कि दिल्ली का राजधानी क्षेत्र और पंजाब, उत्तरप्रदेश, इन तमाम इलाकों में खेतों में ठूंठ जलाने से जो प्रदूषण पहुंचता है, उससे लोगों की सेहत बहुत बुरे खतरे में पड़ चुकी है, और दिल्ली खेतों की ऐसी लगाई गई आग के घेरे में देश का सबसे प्रदूषित शहर बन चुकी है। अब एक तरफ तो प्रधानमंत्री ने किसानों से यह अपील की है, उधर दूसरी तरफ मेरठ से दूसरी खबर आई है कि एक हिन्दू संस्था नौ दिनों का एक यज्ञ कर रही है जिसमें साढ़े तीन सौ ब्राम्हण शामिल होंगे, और प्रदूषण को घटाने के लिए किया जा रहा यह यज्ञ आम की पांच सौ क्विंटल लकड़ी जलाकर होगा। इसके आयोजकों का कहना है कि हिन्दुत्व के मुताबिक यज्ञ करने से प्रदूषण घटता है, और हवा पवित्र होती है। आम की लकड़ी पर गाय के दूध से बने घी को डालकर जब जलाया जाएगा, तो उससे प्रदूषण घटेगा। 
यह देश इक्कीसवीं सदी में पहुंच गया है, लेकिन अवैज्ञानिक बातों को देश की सांस्कृतिक विरासत साबित करते हुए इस किस्म के बहुत से काम हो रहे हैं। गोबर और गोमूत्र को इस तरह का साबित किया जा रहा है कि मानो उससे अंतरिक्षयान भी चलाए जा सकते हैं। यह साबित करने की कोशिश हो रही है कि गाय ऑक्सीजन छोड़ती है। अभी दो दिन पहले उत्तर-पूर्व में शुरू हुई राष्ट्रीय साईंस कांग्रेस में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि क्या भारत में बच्चों को विज्ञान की समझ देने के लिए पर्याप्त काम हुआ है? उन्होंने कहा कि हमारी वैज्ञानिक उपलब्धियों को समाज में ठीक से पहुंचाने की जरूरत है जिससे नौजवानों में वैज्ञानिक सोच विकसित होगी। उन्होंने वैज्ञानिकों से यह भी अनुरोध किया कि वे हर बरस सौ घंटे स्कूली बच्चों के साथ गुजारें ताकि बच्चों में वैज्ञानिक समझ बढ़ सके। 
लेकिन देश की हकीकत यह है कि आए दिन सरकारों में बैठे हुए लोग, सार्वजनिक-राजनीति में बड़े ओहदों पर बैठे हुए चर्चित और मशहूर लोग लगातार अवैज्ञानिक बातें करते हैं, और उस वक्त न तो उनकी सरकार के मुखिया कुछ कहते, न ही उनकी पार्टी के लोग कुछ कहते, और वैसी बातें खबरों में जगह पाती रहती हैं, कुछ समझदार लोग उन बयानों के पीछे के झूठ को समझते हैं, लेकिन बहुत से कमसमझ लोग उसे नहीं समझ पाते, और उस पर भरोसा भी कर बैठते हैं, और सोशल मीडिया की मेहरबानी से उसे आगे भी बढ़ाते चलते हैं। आज देश में जरूरत इस बात की है कि भारत की प्राचीन संस्कृति के नाम पर, एक इतिहास के नाम पर जिस तरह का झूठ-फरेब आगे फैलाया जा रहा है, उसका विरोध ऐसे लोगों के मुखिया ही करें, फिर चाहे वे पार्टी के हों या सरकार के। भारत को यह बात समझनी होगी कि बाकी दुनिया के मुकाबले वह विज्ञान और टेक्नालॉजी पर टिके हुए कारोबार में अगर आगे बढऩा चाहता है, तो यह अंधविश्वास और पाखंड पर चलते हुए नहीं हो पाएगा। जब देश के लोगों के एक बड़े हिस्से को धर्मान्धता और कट्टरता में डुबाकर रखा जाएगा तो उनकी क्षमता का, उनकी उत्पादकता का, देश के लिए इस्तेमाल कम ही हो सकेगा।
आज एक तरफ नदियों को प्रदूषण से मुक्त कराने का नारा चल रहा है। गंगा को साफ करने के लिए हजारों करोड़ शायद खर्च हो भी चुके हैं। और दूसरी तरफ इसी गंगा में लगातार धार्मिक प्रदूषण जारी है, और उससे मोक्ष प्राप्ति की सोच प्रचलित है। जितने किस्म का धार्मिक विसर्जन गंगा सहित बाकी तमाम नदियों में हो रहा है, वह नदियों की बर्दाश्त करने की क्षमता से बहुत अधिक है, और अदालत के बहुत से आदेशों के बावजूद वह कम होते नहीं दिख रहा है। चारों तरफ धार्मिक कोलाहल लोगों का जीना हराम कर रहा है, और चूंकि इनके साथ धर्म का नाम जुड़ा हुआ है, इसलिए किसी शासन-प्रशासन की इन पर कार्रवाई की हिम्मत नहीं पड़ती। सुप्रीम कोर्ट का आदेश धरा रह गया है जिसमें देश भर से सड़क किनारे से, सार्वजनिक जगहों से अवैध धार्मिक निर्माण हटाने को कहा गया था, हटाना तो दूर, चारों तरफ नए धार्मिक अवैध निर्माण जारी हैं, और उन पर कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है। 
विज्ञान और धर्मान्धता, इन दो चीजों का साथ-साथ चलना मुमकिन नहीं है। एक तरफ खेतों में फसलों के ठूंठ जलाने से प्रदूषण बढ़ रहा है, तो दूसरी तरफ धार्मिक प्रदूषण हर किस्म से लोगों का जीना हराम कर रहा है। इन दोनों ही बातों से निपटने का एक आसान जरिया वैज्ञानिक सोच हो सकती है, लेकिन प्रधानमंत्री के दो दिनों के भीतर दिए गए दो किस्म के बयान उनकी पार्टी, और उनकी सरकार के लोग अनसुने कर रहे हैं, और वैज्ञानिक सोच को खत्म भी कर रहे हैं, और धर्मान्धता का प्रदूषण बढ़ा भी रहे हैं। इस मौके पर प्रधानमंत्री को भाषणों से परे भी ऐसी कार्रवाई करनी चाहिए जिसका असर उनके और बाकी लोगों पर भी हो। (Daily Chhattisgarh)

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