खुशहाली के पैमानों पर भारत खोटा तो साबित हुआ, पर क्या सचमुच ही नौबत इतनी खराब?

संपादकीय
16 मार्च 2018


संयुक्त राष्ट्र की वल्र्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट-2018 के 156 देशों में भारत को 133वीं जगह मिली है। दुनिया के किस देश में वहां के लोग कितने खुशहाल रहते हैं इसकी रिपोर्ट में भारत पिछले बरस 122वीं जगह पर था, लेकिन ऐसा लगता है कि पिछले साल भर में हालात खराब हुए हैं और भारत 133वीं जगह पर फिसल गया है। दिलचस्प बात यह है कि भारत के अड़ोस-पड़ोस के पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार के लोग भारत के लोगों के मुकाबले अधिक खुश हैं। पाकिस्तान तो इस लिस्ट में 75वीं पायदान पर है, बांग्लादेश 115वीं, श्रीलंका 116वीं, और म्यांमार 130वीं जगह पर है। भारत के लोग इन सबसे भी कम खुशहाल हैं! 
इस रिपोर्ट को देखकर ऐसा लगता है कि आंकड़ों पर आधारित निष्कर्ष संदेह से परे नहीं रहते। और आंकड़ों पर आधारित अखबारनवीसी भी कोई सही खबर नहीं बना पाती। हमें खबरों से भारत से लगे हुए इन देशों के जो हालात पता लगते हैं, उनसे यह बात भरोसेमंद नहीं लगती कि वहां के लोग भारत के मुकाबले अधिक खुश होंगे। आए दिन पाकिस्तान के लोग इलाज कराने हिन्दुस्तान आते हैं, आसपास के तमाम देशों के लोग पढऩे के लिए भारत आते हैं, और जाहिर तौर पर भारत की हालत पड़ोस के इन देशों के मुकाबले बेहतर लगती है। अब सवाल उठता है कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने ऐसा नतीजा कैसे निकाला होगा? अभी हमने इस रिपोर्ट को पूरा देखा नहीं है, लेकिन इस पर बनी हुई खबर को ही देखा है जो बताती है कि यह रिपोर्ट किसी देश के जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) सामाजिक सहयोग, उदारता, भ्रष्टाचार के स्तर, सामाजिक स्वतंत्रता, और स्वास्थ्य जैसे पैमानों पर बनाई जाती है। 
अब एक बात यह लगती है कि ये पैमाने तो ठोस आंकड़े हैं, जो कि किसी देश की सरकार छुपा नहीं सकती, और किसी देश के लोग उसे दबा नहीं सकते। लेकिन जहां तक लोगों की सोच का सवाल है, तो यहां पर ऐसा लगता है कि लोग उतने ही खुश शायद रहते हों जितनी कि उनकी उम्मीद के पैमाने पर खरी उतरती हो। लोगों की नाउम्मीदी पूरी तरह उनकी उम्मीद पर टिकी होती है, और जहां उम्मीदें अधिक होती हैं, वहीं पर नाउम्मीदी भी अधिक होती होगी। भारत में शायद लोगों की उम्मीदें अधिक रहती हों, और उस हिसाब से वे कम खुश हो पाते होंगे। ऐसी कोई वजह नहीं लगती है कि पाकिस्तान के लोग भारत के लोगों के मुकाबले अधिक खुश रहते हों, सिवाय इसके कि उनकी खुद की उम्मीदें ही बहुत कम हों। 
फिर भी ब्रिटेन से लेकर मध्यप्रदेश तक, बहुत से देश-प्रदेशों में सरकारें खुशहाली या खुश रहने को महत्व देते दिख रही हैं। ब्रिटेन में भी इसके लिए एक विभाग बनाकर एक मंत्री को उसका जिम्मा दिया गया है, और मध्यप्रदेश में भी शिवराज सरकार ने ऐसा किया है। अब यह अलग बात है कि बहुत सी सरकारों का रूख किसी एक तबके को खुश रखने का होता है, और अगर ऐसा तबका बहुसंख्यक तबका है, तो फिर उस देश-प्रदेश में खुशहाली होने की गारंटी बढ़ जाती है। लेकिन मध्यप्रदेश की चर्चा करते हुए हमें याद पड़ता है कि अभी हफ्ते भर में ही दो-तीन दिनों में दो ऐसी घटनाएं हुईं जिनमें किसी लड़की ने छेडख़ानी के बाद उसकी शिकायत पर पुलिस की कार्रवाई न होने पर परेशान होकर खुदकुशी कर ली। अब जहां पर बहुसंख्यक तबका अगर किसी नदी के किनारे आरती करके खुश है, तो वहां पर कुछ लड़कियों या महिलाओं की ऐसी खुदकुशी राज्य में खुशहाली के आंकड़ों को कितना बिगाड़ पाएगी? इसलिए खुशहाली एक तुलनात्मक स्थिति दिखती है जो कि किसी देश-प्रदेश की जनता की उम्मीदों और हकीकत की उसकी धारणा के बीच का अनुपात रहती होगी। अपने पड़ोसी देशों के मुकाबले भारत एक अधिक परिपक्व लोकतंत्र है, जो कि फौजी हुकूमत से बचा हुआ भी है। पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार, इन सबमें लंबे समय तक फौजी हुकूमत भी रही, वहां का लोकतंत्र भी बहुत भ्रष्ट रहा, वहां के राष्ट्र प्रमुख या शासन प्रमुख भी सजा पाए हुए रहे, या नेपाल में काफी अरसे तक एक धर्मराज रहा, एक राजशाही रही। ऐसे में इन जगहों के लोगों का भारत के मुकाबले अधिक खुशहाल होने की एक ही वजह लगती है कि वहां के लोगों की उम्मीदें बहुत कम हैं, बहुत छोटी हैं, और वे वैसी हालत में आसानी से खुश हो रहे हैं। फिलहाल हम अपने इस निष्कर्ष को लेकर भारत के भीतर संतुष्ट हो जाना नहीं चाहते, और भारत को बैठकर ठंडे दिल से यह सोचना चाहिए कि किन पैमानों पर कैसा खोटा उतरने की वजह से उसे खुशहाली की लिस्ट में तकरीबन आखिर में जगह मिली है, और यह नौबत कैसे बेहतर की जा सकती है। इसके साथ-साथ यह कुछ लोगों के शोध और अध्ययन का मामला भी दिखता है कि भारत और उसके इन पड़ोसी देशों के बीच इस रिपोर्ट में ऐसा फर्क कैसे आ गया? (Daily Chhattisgarh)

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