टेक्नालॉजी से अधिक लोकतंत्र या लोकतंत्र गुलाम हो चला?

संपादकीय
18 मार्च 2018


डाटा विश्लेषण करने वाली एक कंपनी अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के चुनाव प्रचार के लिए फेसबुक पर से पांच करोड़ से अधिक अमरीकी मतदाताओं की निजी जानकारी चोरी की थी, और शुरुआती जानकारी से ही यह साफ जाहिर हो रहा है कि उसका इस्तेमाल ट्रंप के चुनाव अभियान के लिए किया गया था। अमरीका में करीब साढ़े 23 करोड़ वोटर हैं, और इस चोरी का मतलब उनमें से 20 फीसदी से अधिक लोगों को प्रभावित करने की कोशिश।
समाचार बताता है कि डाटा विश्लेषण करने वाली फर्म कैंब्रिज एनालिटिका ने अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के 2016 के चुनाव प्रचार में समर्थन तकनीक तैयार करने के लिए पांच करोड़ फेसबुक यूजरों की निजी जानकारी चुराई थी। समाचार प्रकाशित होने के बाद मैसाचुसेट्स की अटार्नी जनरल ने कहा कि उनके कार्यालय ने जांच शुरू कर दी है। फेसबुक ने शुक्रवार को कहा था कि डाटा प्राइवेसी नीति का उल्लंघन पाने के बाद उसने कैंब्रिज एनालिटिका को निलंबित कर दिया है। इसे फेसबुक के इतिहास में सबसे बड़ी डाटा चोरी कहा गया है।
जिन लोगों को यह लगता है कि टेक्नालॉजी में दुनिया में लोकतंत्र को बढ़ाने का काम किया है, और सबसे कमजोर तबके को भी आज इंटरनेट और कम्प्यूटर की वजह से कई किस्म के हक मिले हैं, उनकी बात टेक्नालॉजी के असर का एक पहलू भर है। इसका दूसरा पहलू यह है कि कम्प्यूटर और सोशल मीडिया, इन दोनों पर लोगों की जो निजी जानकारी दर्ज है, उसका बाजारू या जुर्म के लिए इस्तेमाल होने का खतरा भी खड़ा हो गया है। ट्रंप के चुनाव के दौरान ही यह पुख्ता बात सामने आ गई थी कि उनकी विरोधी उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन की ईमेल चोरी करके रूस के हैकरों ने वहां की सरकार के रास्ते उन्हें शायद ट्रंप के लोगों तक पहुंचाया था, और हिलेरी को बदनाम करने में उनका इस्तेमाल हुआ था। इसके बाद से योरप के कई देशों ने रूस की ऐसी हरकत और किसी देश के चुनाव में विदेशी दखल के खिलाफ बड़ी नाराजगी जाहिर की थी।
बात महज विदेशी दखल की नहीं है, फेसबुक की जानकारी चोरी करके वोटरों को प्रभावित करने की रणनीति बनाकर ट्रंप के लोगों ने अमरीका के भीतर ही यह जुर्म किया है, और आज जो टेक्नालॉजी अमरीका में इस्तेमाल हो रही है, वह दुनिया के किसी भी दूसरे हिस्से में काम लाई जा सकती है। कल के दिन भारत के चुनावों में लोगों के ईमेल बॉक्स की जानकारी उन्हें बदनाम करने में इस्तेमाल हो सकती है, लोगों के टेलीफोन कॉल डिटेल्स उजागर किए जा सकते हैं, और लोगों को ब्लैकमेल किया जा सकता है। आज सुप्रीम कोर्ट में आधार कार्ड की अनिवार्यता का जो विरोध चल रहा है, उसके पीछे एक तर्क यह भी है कि इससे सरकार के हाथ में लोगों की निजी जिंदगी की गोपनीयता आ जाएगी और कोई भी सरकार इसके बेजा इस्तेमाल का लुभावना मोह छोड़ नहीं पाएगी। भारत में सरकार जिस बड़े पैमाने पर आधार कार्ड की अनिवार्यता को लादने में लगी हुई है, और जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल थोड़ी सी रोक लगाई है, उसके बहुत खतरनाक नतीजे हो सकते हैं। हमने यह देखा है कि भारत में सुरक्षित माने जाने वाले बैंकों को किस तरह लूट लिया गया, और बैंकों के सारे निगरानी के इंतजाम, उनके कम्प्यूटर की जांच का इंतजाम सब धरा रह गया। आज आधार कार्ड की वजह से लोगों की आवाजाही, उनकी खरीददारी, उनका बैंक से लेन-देन, उनके फोन, उनके इंटरनेट, उनके ट्रेन और प्लेन के रिजर्वेशन, उनके टैक्स की जानकारी, यह सब कुछ सरकार के हाथ में है, और काफी अरसे से एक लतीफा चल रहा है जो कि लतीफा कम हकीकत अधिक है। एक आदमी पीजा मंगाने के लिए फोन करता है, तो वहां से जवाब मिलता है कि आप हर बार जो पसंद करते हैं क्या वही भेजना है? हैरान आदमी पूछता है कि तुम्हें कैसे मालूम? तो जवाब मिलता है कि पिछले पन्द्रह बार आपने इस किस्म का पीजा मंगाया था। इस बार भी वही भेजने के लिए कहने पर सलाह मिलती है कि क्या आप अधिक सब्जियों वाला पीजा बेहतर नहीं समझेंगे? तो ग्राहक ने कहा कि नहीं मुझे सब्जियां नापसंद हैं। इस पर टेलीफोन पर ऑर्डर लेने वाले ने कहा कि आपका कोलेस्ट्रॉल बढ़ा हुआ है। हैरान आदमी ने पूछा कि तुम्हें कैसे मालूम? तो जवाब मिला- हमारे पास आपके पिछले सात बरस के सारे ब्लड टेस्ट की रिपोर्ट है क्योंकि आपने जिस कार्ड से भुगतान किया था, वह आधार से जुड़ा हुआ है। इस पर डरे-सहमे आदमी ने कहा लेकिन मैं तो बढ़े हुए कोलेस्ट्रॉल के लिए दवा ले रहा हूं। इस पर टेलीफोन पर जवाब मिला कि आपने चार महीनों में दवा नियमित रूप से नहीं ली है, और कुल 30 गोलियां ऑनलाईन खरीदी हैं। उसने कहा कि मैंने एक दवा दुकान से बाकी गोलियां खरीदी थीं। तो टेलीफोन पर कहा गया कि यह तो आपके क्रेडिट कार्ड पर दिख नहीं रहा है। उसने कहा कि मैंने नगद भुगतान किया था, तो फोन पर जवाब मिला कि आपका बैंक खाता इतनी नगदी निकालना दिखा नहीं रहा है। उसने कहा कि मेरे पास नगद पैसे आने का एक दूसरा जरिया है, तो फोन पर कहा गया कि आपके टैक्स रिकॉर्ड में तो ऐसी किसी नगद कमाई का जिक्र नहीं है...।
बातचीत का यह सिलसिला भयानक है कि एक आधार कार्ड के चलते लोगों की निजी जिंदगी नंगी हो चुकी है। लेकिन अमरीका की ताजा खबर बताती है कि बिना आधार कार्ड के फेसबुक से निजी जानकारियां निकाली जा सकती हैं। इसी को लेकर कई बरस पहले अमरीका में एक नया लतीफा बना कि सरकार ने वहां सीआईए का बजट एक चौथाई कर दिया कि फेसबुक के बाद अब जासूसी पर अधिक मेहनत तो करनी नहीं पड़ती। फिलहाल लतीफों के बीच यह सोचें कि निजी जिंदगी की गोपनीयता तो रह नहीं गई है, इसलिए निजी जिंदगी को ही साफ-सुथरा रखना समझदारी होगी। (Daily Chhattisgarh)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें