दीवारों पर लिक्खा है, 18 सितंबर 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

किसानों के नाम पर फर्जी लोन की संगठित साजिश करने वाले बैंकरों को उम्रकैद तो हो ही...

18 सितंबर 2026  

 

छत्तीसगढ़ के सहकारी बैंकों ने गजब का काम किया है। कांग्रेस पार्टी ने 2018 के चुनाव के पहले किसानों की कर्जमाफी की घोषणा की थी, उसे देखते हुए इस राज्य में जगह-जगह सहकारी बैंकों ने किसानों के नाम से फर्जी कर्ज खाते खोल दिए, उन्हें रकम देना दिखा दिया, और बैंक के अधिकारी-कर्मचारी खुद पैसा खा गए। अकेले अंबिकापुर में ऐसा सैकड़ों करोड़ का घोटाला हुआ, और अब जांच में ईडी की दखल भी हो चुकी है। अभी सबसे ताजा मामला महासमुंद जिले का है, वहां ठीक इसी तौर-तरीके से किसानों की जानकारी के बिना उनके नाम से पौने दो करोड़ का लोन निकाल लिया गया, और अब मामला पकड़ में आने पर बैंक ने धोखाधड़ी की रिपोर्ट की है। जिन बैंकों का काम गांव-गांव तक लोगों को बैंकिंग की सहूलियत देना है, फसल का बीमा करवाने में मध्यस्थ का काम करना है, किसानों को खेती के लिए कर्ज देना है, वे अगर इतने संगठित रूप से जालसाजी और धोखाधड़ी में लग गए हैं, तो फिर सरकार और किसान इन दोनों के बचने की कोई संभावना कहां रह जाती है? 

अभी कुछ हफ्ते पहले ही हमने कुछ राष्ट्रीयकृत बैंकों की धोखाधड़ी के बारे में लिखा था, ऐसा एक बड़ा मामला पंजाब-हरियाणा के इलाके में हुआ था जिसमें सैकड़ों करोड़ की धांधली बैंक अफसरों ने की थी। एक दूसरा मामला उत्तरप्रदेश में और गजब हुआ जिसमें पंजाब नेशनल बैंक के एक नगदी-तिजोरी में 17 करोड़ के आसपास के नोट बदलकर उनकी जगह नकली नोट रख दिए गए। खुद बैंक इस धोखाधड़ी से हैरान रह गया है कि जिस तिजोरी में घुसने के लिए बैंक के अधिकृत कर्मचारी-अधिकारी को भी फिंगर प्रिंट देने पड़ते हैं, जो ताले दो अलग-अलग अधिकारियों की चाबियों के बिना खुलते नहीं है, वहां भीतर इतनी बड़ी रकम के असली नोट गायब होकर नकली नोट रख दिए गए! यह पूरा सिलसिला बताता है कि भारत में एक वक्त राष्ट्रीयकृत होने के पहले भी बैंकों की जो साख रहती थी, जिस वक्त एक अकेले मैनेजर ही अपनी निजी साख के दम पर बैंक के लिए जमा भी जुटा लेते थे, और कर्जदार के परिवार को डांटकर फिजूलखर्ची से रोक भी देते थे, आज निजी बैंकों से लेकर राष्ट्रीयकृत बैंकों तक हर स्तर पर लूटपाट के तौर-तरीके इस्तेमाल हो रहे हैं। यह सिलसिला निराश करता है कि जहां एक रूपए का लेन-देन भी कागज पर दर्ज होने के बाद होता है, वहां इतने बड़े पैमाने पर धांधली हो रही है।

हमने पिछले संपादकीय में यह लिखा भी था कि बैंक आज साइबर क्राइम करने वाले लोगों की कमाई को जमा करने, और फिर गुमनाम तरीके से उन्हें देश के बाहर भेजने तक में जिस तरह भागीदार हो गए हैं, उनसे लगता है कि जिस तरह एक आम मुजरिम काम करते हैं, बैंकों के अफसर भी उसी तरह काम कर रहे हैं। देश के एक प्रमुख अखबार ने कुछ हफ्ते पहले स्टिंग ऑपरेशन के साथ यह खोजी रिपोर्ट प्रकाशित की थी कि किस तरह बड़े-बड़े नामी-गिरामी बैंकों के अधिकारी सटोरियों और साइबर मुजरिमों की ठगी और लूट की रकम जमा करने के लिए बेनामी खाते खोलने के लिए तैयार खड़े रहते हैं, और रिजर्व बैंक या जांच अधिकारियों की कार्रवाई से इन जालसाजों को बचाने की गारंटी भी देते हैं। हम अपने आसपास भी देखते हैं कि ऐसा कोई हफ्ता नहीं गुजरता जब बैंकों में गरीब लोगों के कुछ खाते न पकड़ाते हों जिन्हें साइबर मुजरिमों और सट्टेबाजों ने भाड़े पर लेकर रखा हुआ है। ऐसी हर हरकत बैंक के अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ मिलकर ही हो सकती है। इस तरह राष्ट्रीयकृत बैंक, राष्ट्रीय स्तर के निजी बैंक, और राज्य स्तर के सरकार-नियंत्रित सहकारी बैंक, इनमें से कोई भी जालसाजी और धोखाधड़ी से बचे हुए नहीं हैं, बाहरी लोगों के किए हुए जुर्म नहीं, खुद बैंक के लोगों के किए हुए ऐसे जुर्म। 

इसके अलावा बैंकों का हाल यह है कि देश के बड़े-बड़े कारोबारियों को डूबने की गारंटी वाले ऐसे कर्ज देते हैं कि आखिर में जाकर उस घाटे को बैंक के आम खातेदारों को ही ढोना पड़ता है। भारत के बैंक कर्मचारियों की यूनियन बीच-बीच में यह आंकड़े सामने रखती है कि किस बैंक ने बीते बरसों में कितने हजार करोड़ रूपए की कर्जमाफी बड़े-बड़े खातेदारों की की है। देश के लिए यह एक गर्व की बात है कि सबसे छोटे खातेदारों की कर्ज अदायगी सबसे ईमानदार है, और सबसे बड़े कर्जदार सबसे अधिक डिफाल्टर निकलते हैं। फिर बैंकों की मेहरबानी से देश में यह खेल भी चल रहा है कि किस तरह कोई बड़ी कंपनी अपने आपको घाटे में आया हुआ दिखाती है, और उसका दसियों हजार करोड़ रूपया का कर्ज माफ करके उस कंपनी को किसी दूसरी कंपनी को पांच-दस फीसदी दाम पर दे दिया जाता है। छोटे से लेकर बड़े तक, हर किस्म की जलासजी, और धोखाधड़ी बहुत आम बात है, और बैंकों की अपनी कोई जेब नहीं रहती, उसकी जेब वहां रकम जमा करने वाले, वहां ब्याज पटाने वाले लोगों की ही रहती है, ऐसी जेब से रकम निकालकर बड़े-बड़े दीवालिया लोगों को जिस अंदाज में भारत के बैंक दे रहे हैं, उससे इन सबकी मिलीजुली साजिश बहुत साफ-साफ दिखाई पड़ती है। कहने के लिए तो भारत में बैंकिंग के नियम बहुत कड़े हैं, और रिजर्व बैंक से लेकर दूसरे सरकारी रेगुलेटर तक तरह-तरह से नजर रखते हैं, लेकिन इसके बावजूद जब बैंकों के भीतर जिम्मेदारी के ओहदों पर बैठे हुए लोग ही मुजरिमों के साथ भागीदार बन जाते हैं, तो बैंकों के बचने की कोई संभावना नहीं रहती है। जहां बैंक के अधिकारी-कर्मचारी साजिश में मिले हुए दिखें, वहां पर उन्हें उम्रकैद से कम कुछ भी नहीं होना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 17 सितंबर 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

अब रेलगाड़ी पटरियों पर मोबाइल खेलते हर लडक़े की जिंदगी तो बचा नहीं सकती!

17 सितंबर 2026  

 

अभी रेलवे पटरी पर बैठकर मोबाइल फोन देखते, या उस पर खेल खेलते दो किशोर वहां से गुजरती मालगाड़ी के शिकार हो गए। एक की तुरंत मौत हो गई, दूसरा बुरी तरह जख्मी अस्पताल में है। छत्तीसगढ़ के एक गांव के ये दोनों लडक़े मोबाइल फोन लिए हुए रात 8 बजे पटरियों पर बैठे थे। पटरियों से दूर-दूर बसे हुए लोगों को भी यह मालूम रहता है कि वहां से रेलगाडिय़ां गुजरती हैं। दिन के वक्त भी समझदार लोग अपने बच्चों को सिखाते हैं कि पटरियां पार करने के पहले दोनों तरफ देख लेना चाहिए कि किसी तरफ से ट्रेन आते तो नहीं दिख रही है। ऐसे में अगर 14 बरस के लडक़े पटरियों पर ही बैठकर मोबाइल खेल खेल रहे हैं, तो उन्हें कौन बचा सकते हैं? रेलगाडिय़ों के पास इतनी दूर तक देखने की क्षमता नहीं रहती, अगर दिख भी जाएं, तो अचानक ट्रेन को रोकने से एक-दो जिंदगियां चाहे बच जाएं, बहुत सी और जिंदगियां खत्म हो सकती हैं, इसलिए ट्रेन के इमरजेंसी ब्रेक की एक सीमा रहती है। ऐसे में पटरियों के आसपास बसने वाले, वहां से गुजरने वाले लोगों की ही यह जिम्मेदारी रहती है कि वे राष्ट्रीय महत्व की इस जनसुविधा का सम्मान करें। लेकिन जिस देश में छांट-छांटकर तेज रफ्तार की रंग-बिरंगी रेलगाडिय़ों पर पत्थर चलाना नौजवान पीढ़ी का शगल है, वहां पर लोग अपनी खुद की जिंदगी के प्रति भी लापरवाह हो जाते हैं। 

ऐसे ढेर सारे मामले आजकल आ रहे हैं जिसमें कोई सेल्फी-रील बनाने के लिए, कोई बिजली वाली रेलगाड़ी की छत पर चढक़र अपनी जान खतरे में डाल देते हैं, तो कोई ऐसे रहते हैं जो पटरियों पर रेलगाड़ी के दो-चार फीट करीब तक आ जाने पर छलांग लगाकर किसी तरह अपनी जान बचाते हैं, और फिर ऐसी रील के लिए अधिक से अधिक दर्शक पाते हैं। बहुत से लोग चलती रेलगाड़ी के दरवाजों से बाहर लटककर वीडियोग्राफी करते हैं। एक मोबाइल फोन ने, खासकर उसके कैमरे ने, और कैमरे की वीडियो रिकॉर्डिंग ने लोगों से उनकी समझ को बिल्कुल ही छीन लिया है। लेकिन बात सिर्फ वीडियो तक सीमित नहीं हैं। 

बहुत से लोग आज सडक़ों पर ऐसे दिखते हैं जो दुपहियों पर सवार हैं, एक हाथ से हैंडल संभाले हुए हैं, और दूसरे हाथ में मोबाइल थामकर कान से लगाए हुए हैं, या दूसरे हाथ से स्क्रीन को आगे-पीछे करते हुए उस पर कुछ देख रहे हैं, कुछ लोग तो इसी तरह एक हाथ से मोबाइल थामकर चलते दुपहिए पर वीडियोकॉल पर बात करते भी दिख जाते हैं। जब दुपहिया व्यस्त सडक़ पर चल रहा हो, जब दाएं-बाएं मुडऩे के लिए इंडिकेटर देना हो, या हाथ दिखाना हो, तो ऐसे सारे मौकों पर लोग मोबाइल पर अपनी इतनी एकाग्रता रखते हैं कि मानो योग-ध्यान कर रहे हों, फर्क सिर्फ यही रहता है कि वे ट्रैफिक के बीच रहते हैं, और लोगों की जिंदगी अपनी टक्कर से खत्म कर सकते हैं, या अपनी जिंदगी गंवा भी सकते हैं। इन दिनों जगह-जगह लगे हुए पुलिस के कैमरे पता नहीं ऐसे मोबाइल चालकों का चालान करते हैं या नहीं। एक वक्त बड़ी गाडिय़ों के पीछे लिखा रहता था कि वाहन चालन और सौंदर्यपान एक साथ नहीं, जान जा सकती है, आज तो वाहन चालन और मोबाइल चालन दोनों धड़ल्ले से साथ-साथ चलता है, और राह चलती किसी सुंदरी को एक नजर देख लेने के मुकाबले हजार गुना अधिक ध्यान मोबाइल फोन पर लगे रहता है। 

इससे परे सार्वजनिक आम जनजीवन में मोबाइल ने लोगों से तमीज छीनकर नाली में फेंक दी है। लोग दूसरों के बीच, स्टेशन या एयरपोर्ट पर, अस्पताल की भीड़ में, या बगीचों में योग-ध्यान करते लोगों के बीच में अपने फोन पर चीख-चीखकर बात करने के आदी हो गए हैं, और उन्हें यह लगता है कि उनके पास एक मोबाइल फोन से आसपास के कई एकड़ की दुनिया के वे मालिक हो गए हैं। लोगों के पास एक मोबाइल फोन होने से वे अपने आपको बाकी तमाम लोगों की जिंदगी बर्बाद करने का हकदार मानने लगे हैं। मोहल्लों के भीतर भी कई लोग अपने घर के सामने की सडक़ पर चीख-चीखकर बात करते हुए घूमते रहते हैं, और अड़ोस-पड़ोस के लोग उनकी बकवास को सुनने पर मजबूर रहते हैं। हालत यह हो गई है कि लोगों को अगर परले दर्जे का झूठ कहना है, तो भी वे उसे दर्जनों या सैकड़ों लोगों के बीच बोलने से नहीं कतराते। वे रहते किसी एक शहर में हैं, और वहां सैकड़ों लोगों तक आवाज जाते हुए वे मोबाइल पर झूठ बोलते रहते हैं कि वे उस वक्त किसी और शहर में हैं। इस तरह एक फोन लोगों से झूठा कहलाने की शर्म भी छीन ली है, और वे खुलकर चीख-चीखकर झूठ बोलते हैं। लोगों को यह भी फर्क नहीं पड़ता कि वे अपनी कौन सी निजी बातें भीड़ के बीच बोल रहे हैं, आसपास के लोगों को कितनी परेशानी हो रही है, इससे उन लोगों की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता जो कि अपने एक निजी औजार, मोबाइल फोन को एक सार्वजनिक हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं। 

अभी चौथाई सदी पहले तक जिस मोबाइल का कोई चलन नहीं था, उसने आज जिंदगी पर ऐसा कब्जा जमा रखा है कि लोगों को बदतमीज बना दिया है, बेशर्म और लापरवाह बना दिया है, आत्मघाती हद तक खतरनाक बना दिया है। इंसानों ने एक तकनीक के सामने अपनी इंसानियत को, मामूली समझबूझ या समझदारी को जिस तरह उतारकर किनारे रख दिया है, उस लापरवाही से तो नदी या समंदर में खुदकुशी के लिए उतरने वाले लोग भी अपने कपड़े उतारकर नहीं रखते। चूंकि हिन्दुस्तान जैसे देश में सार्वजनिक जीवन की सभ्यता अब खत्म हो चुकी है, इसलिए जिंदगी की इन महीन बातों की तरफ लोगों का ध्यान खींचना फिजूल है। फिर भी जब हमसे बर्दाश्त नहीं होता है, तो ऐसी गैरजरूरी बकवास करके अपना गुबार निकाल लेते हैं। आपके आसपास के बच्चे मोबाइल फोन को लेकर इस तरह की बदतमीजी न सीखें, ऐसे आत्मघाती न हों, इसकी कोशिश कर सकें तो बेवक्त उन्हें श्रद्धांजलि देने से बच सकते हैं।

(Daily Chhattisgarh)   

मेटा जैसी कंपनी पर जरा सा दबाव काफी नहीं, भारत विकसित देशों से सीखे

16 सितंबर 2026  

 

दुनिया के दूसरे कई देशों की सख्ती के बाद अब भारत में भी सरकार ने दुनिया के सबसे बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म कारोबारी मेटा पर दबाव डाला है ताकि उससे भारत के लोगों के सामने परोसे जा रहे बच्चों के सेक्स कंटेंट की अधिक जानकारी मिल सके। दुनिया के कई विकसित देशों ने बीते एक बरस में फेसबुक, इंस्टाग्राम, और वॉट्सऐप चलाने वाली कंपनी मेटा से मोटा जुर्माना वसूला है, कई देशों में, जिनमें मेटा का खुद का देश अमरीका भी शामिल है, बच्चों के माँ-बाप ने इस कंपनी के खिलाफ मुकदमे कर रखे हैं। ऑस्ट्रेलिया जैसे देश ने एक उम्रसीमा के नीचे के बच्चों को सोशल मीडिया पर मेंबरशिप देने के खिलाफ बहुत मोटा जुर्माना लगा रखा है। यूरोपियन यूनियन ने भी सोशल मीडिया कंपनियों पर कई तरह की सख्ती लगाई है। भारत में अभी बीते कुछ महीनों से ही जरा सी सुगबुगाहट चालू हुई है, वह भी शायद बीबीसी की इस खोजी रिपोर्ट के बाद हुई है कि मेटा के इंस्टाग्राम पर भारत के बच्चों की यौन सामग्री बेची जा रही है, और ऐसे कारोबारी इंस्टाग्राम पर इश्तहार दे रहे हैं। एक के बाद एक बीबीसी की ऐसी दो बड़ी, और पुख्ता खोजी रिपोर्ट के बाद भारत में भी लोग हक्का-बक्का हैं कि किस तरह यहां की सरकार यह सब बर्दाश्त कर रही है। यहां कानून में विदेशी कंपनियों को यह छूट दी गई है कि उनके उपभोक्ता अगर उनके प्लेटफॉर्म पर किसी तरह का जुर्म करते हैं, तो उसके लिए ये प्लेटफॉर्म जिम्मेदार नहीं माने जाएंगे। इसका फायदा उठाकर तमाम बहुराष्ट्रीय सोशल मीडिया कंपनियां मनमानी कर रही हैं। जब कई विकसित देश मेटा पर इस बात के लिए मुकदमा चला रहे हैं, कि वह बच्चों को अपने प्लेटफॉर्म की आदत डालने की तरकीबें अपने कम्प्यूटरों के एल्गोरिद्म पर इस्तेमाल कर रहे हैं, और ऐसे में खुदकुशी करने वाले कई बच्चों के माँ-बाप ने अदालत में भी मुकदमे किए हैं, भारत मोटे तौर पर ऐसी तमाम फिक्र से अब तक आजाद है।

हम इस मुद्दे पर पहले भी कई बार लिख चुके हैं कि भारतीय बच्चों को ऐसी सोशल मीडिया कंपनियों की कारोबारी साजिशों से बचाना जरूरी है। इसके साथ-साथ भारतीय बच्चों को स्क्रीन की लत से बचाना भी जरूरी है। आज बहुत से माँ-बाप लापरवाह हैं जो कि बच्चों को टीवी का रिमोट देकर, उनके हाथ में मोबाइल फोन देकर उन्हें व्यस्त रखते हैं, और खुद भी अपने उपकरणों पर व्यस्त हो जाते हैं। बहुत से माँ-बाप ऐसे हैं जो मजबूरी में काम करने में लगे रहते हैं, और बच्चों को व्यस्त रखने के लिए उनके पास स्क्रीन ही अकेला तरीका है। नतीजा यह हो रहा है कि छोटे-छोटे बच्चे भी हर दिन आठ-दस घंटे तक फोन, कम्प्यूटर, या टीवी स्क्रीन पर लगे रहते हैं। हमने भारत सरकार को कई बार यह सुझाया है कि उसे फोन और टीवी जैसे उपकरण बनाने वाली कंपनियों से बात करके उस पर इस तरह के फीचर जुड़वाने चाहिए कि बच्चों की सामग्री किसी दिन में एक सीमित तक ही उस पर चल पाए। आज तो एआई की मेहरबानी से यह बहुत आसान हो गया है कि बच्चों की पसंद के चैनल, उस पर के कार्यक्रम, उनके चहेते वीडियो गेम की सीमा तय  की जा सकती है कि एक दिन में वे कुल मिलाकर 30 मिनट, या 60 मिनट से अधिक न चलें। भारत में सरकार को अभी इस बात का महत्व समझ नहीं आ रहा है कि बच्चों को स्क्रीन में डूबते चले जाने से कैसे बचाया जाए। आज ही सुबह किसी एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया पर यह रिपोर्ट थी कि छोटे बच्चे जो कि किताबें पढ़ते हैं, वे किस तरह मानसिक रूप से अधिक विकसित होते हैं, और आगे जाकर उनको मानसिक और बुढ़ापे की दूसरे किस्म की बीमारियां होने का खतरा घट जाता है। इस नई शोध के पहले से भी मनोवैज्ञानिक इस बात को अच्छी तरह जानते थे कि बच्चों की कल्पनाओं में जब वे खुद रंग भरते हैं, तो उनके दिमाग का विकास होता है। लेकिन जब कल्पनाओं की जगह पर आकार, रंग, और विविध हलचल वाले वीडियो कब्जा कर लेते हैं, तो बच्चों की कल्पनाशीलता, और रचनात्मकता धरी रह जाती है, और उनका मानसिक विकास ठीक से नहीं हो पाता। भारत में सरकार को तमाम किस्म के स्क्रीन वाले उपकरण बनाने वाली कंपनियों पर ऐसे चाइल्ड-लॉक लगाने के लिए कहना चाहिए जो कि माँ-बाप के हाथ में उन उपकरणों का नियंत्रण दे सकें। भारत सरकार को चाहिए कि उपकरणों में ऐसा इंतजाम न करने पर उन पर एक पेनाल्टी लगाई जाए, और किसी भी कारोबारी के लिए पेट पर लात पडऩा ही सबसे अधिक मायने रखता है। 

बीबीसी की रिपोर्ट सचमुच भयानक है कि मेटा के प्लेटफॉर्म जानते-बूझते, समय पर खबर मिल जाने पर भी ऐसे लोगों के इश्तहार चला रहे हैं, जो कि भारत के बच्चों के नग्न और अश्लील फोटो-वीडियो ऑनलाईन बेच रहे हैं। हमारा तो ख्याल यह है कि जब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ऐसे जुर्म से कमाई पा रहे हैं, तो उन पर अरबों का जुर्माना भी लगाना चाहिए। उनके पास अपने प्लेटफॉर्म पर इश्तहार पर नजर रखने की हर तकनीक मौजूद है। फेसबुक खासकर सबसे अधिक बदनाम है कि उस पर आने वाले विज्ञापनों में से बड़ी संख्या धोखा देने वालों की रहती है, और धोखा खाने के बाद लोग जब ऐसे पेज पर जाकर कमेंट बॉक्स में यह लिखते भी हैं कि यह विज्ञापन फ्रॉड है, तब भी मेटा उसे रोकने की कोई कोशिश नहीं करता। महीनों तक धोखाधड़ी के ऐसे विज्ञापन चलते रहते हैं। सोशल मीडिया कंपनियों को भारत में सरकार का वार तभी झेलना पड़ता है, जब सरकार को नापसंद कोई राजनीतिक बात पोस्ट की जाती है। इसके अलावा किसी और बात के लिए सरकार आक्रामक नहीं रहती, चौकन्ना भी नहीं रहती। 

देश में एक-दो प्रदेशों की सरकारों ने जरूर यह कोशिश की है कि सोशल मीडिया पर पहुंचने वाले बच्चों की एक न्यूनतम उम्रसीमा तय करवाई जाए। लेकिन भारत की संघीय व्यवस्था में अंतरराष्ट्रीय कंपनियों पर रोक-टोक लगाने का मुख्य अधिकार तो केन्द्र सरकार के पास ही है, राज्य सरकार भी हो सकता है अपने स्तर पर कुछ कर पाए। लेकिन केन्द्र को राज्यों के साथ बात करके सोशल मीडिया सुधार की पहल करनी चाहिए, आज इन्हीं प्लेटफॉम्र्स पर बच्चों को लत डाली जा रही है, वहां उन्हें कई गलत चीजों का आदी बनाया जा रहा है, और जो कंपनियां अपने खुद के देश में अरबों-खरबों का जुर्माना दे रही हैं, वे भी भारत में यहां के बच्चों के सेक्स वीडियो बेचने के बाद मजा कर रही है, यह नौबत बिल्कुल भी नहीं चलने देना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 16 सितंबर 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

दीवारों पर लिक्खा है, 15 सितंबर 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

मर्दों की शुभचिंता को महिलाएं जिम्मेदारी नहीं हक मानने लगती हैं!

15 सितंबर 2026  

 

छत्तीसगढ़ और उत्तर भारत में आज हरतालिका तीज मनाई जा रही है। महिलाएं अपने मायके जाती हैं, माँ या भाई-भाभी की तरफ से साड़ी मिलती है, कुछ उपवास होता है, कुछ पकवान होता है। हिन्दू धर्म के और बहुत से त्यौहारों और रिवाजों की तरह तीज या तीजा पर भी महिला का उपवास रहता है। सावन के महीने में लड़कियां सोलह सोमवार या ऐसे कोई व्रत रखती हैं ताकि अच्छा पति मिले। करवा चौथ पर महिलाएं पति की दीर्घायु के लिए व्रत रखती हैं। कमरछठ पर महिलाएँ उपवास करती हैं कि उनके बच्चों को लंबी उम्र मिले। और तमाम त्यौहारों और रिवाजों से परे हर दिन वे ऐसा काम भी करती हैं कि परिवार में सबकी उम्र लंबी हो, परिवार में कई पीढिय़ों की देखभाल, और सेवा के काम में हिन्दुस्तानी महिला लगी ही रहती हैं। उसके त्याग, बलिदान, उसकी मेहनत, और उसकी सहनशक्ति को लेकर उसका इतना गौरवगान होता है कि महिलाओं की अगली पीढ़ी अपने को ऐसा ही गौरवशाली बनाने में अपनी पूरी जिंदगी खपा देती हैं। संयुक्त परिवार हो, तो जिम्मेदारियां और कई गुना हो जाती हैं। 

अभी दूसरे धर्मों और दूसरे देशों की बात अलग रखें, क्योंकि वहां के धार्मिक रीति-रिवाजों की उतनी जानकारी है नहीं जितनी कि भारत के हिन्दू और हिन्दीभाषी समाज की है। परिवार को स्वस्थ रखना, और उसे लंबी उम्र दिलवाना, इन दोनों की जिम्मेदारी का एकाधिकार महिलाओं को ही दे दिया गया है। इसके एवज में महिलाओं को भाई को राखी बांधकर यह आत्मविश्वास और भरोसा रखने मिलता है कि वे बहन की रक्षा करेंगे। ऐसी रक्षा कितनी हो पाती है, वह एक अलग बात है, आजकल तो अधिक मामले ऐसे ही सुनाई पड़ते हैं कि बहन को मायके से दूर रखने की कोशिश होती है, ताकि वह माँ-बाप की छोड़ी विरासत में कोई हिस्सा न मांग ले। इसके साथ-साथ जब बाप-भाई को यह लगता है कि घर की लडक़ी अपनी पसंद से, और परिवार की मर्जी के खिलाफ शादी कर रही है, तो कम से कम उस लडक़ी, और कई मामलों में उसकी पसंद, दोनों को मारने की कोशिश भी होती है, और इसे ऑनरकिलिंग कहा जाता है, मान लो इस कत्ल से खानदान की इज्जत बच रही हो, और बढ़ भी रही हो। 

हिन्दू धर्म की कहानियों को अगर देखेंगे, तो कहीं पति को बचाने के लिए सावित्री की कहानी सुनाई देगी, तो कहीं पति के साथ सती होने का गौरवगान होगा, हिन्दू धर्म की आरतियों को अगर सुनेंगे, तो इन दिनों गणेशोत्सव में सबसे अधिक प्रचलित एक आरती में बांझन को पुत्र देय, कोढिऩ को काया, सुनाई देता है। किसी महिला की संतान न होने पर उसके लिए वही अकेली बांझ कही जाती है, और उसे संतान हो, तो उसे पुत्र ही हो, ऐसी कामना गणपति से की जाती है। कल ही इस अखबार के यूट्यूब चैनल ‘इंडिया-आजकल’ पर तीज के उपवास की परंपरा को लेकर एक बातचीत हुई, और उसमें कई अनछुए पहलू भी सामने आए। लेकिन एक भी बात निकलकर ऐसी नहीं आ पाई कि हिन्दू और हिन्दुस्तान में पुरूष पर भी महिला के लिए कोई धार्मिक रीति-रिवाज, या कोई सामाजिक संस्कार लागू होता हो। हर किस्म की जिम्मेदारी सिर्फ महिला पर ही आती है। 

अब अगर औरत-मर्द के अधिकारों की बराबरी की बात करें, तो कई लोगों को लग सकता है कि यह हिन्दू धर्म के खिलाफ बात हो रही है। लेकिन जब तीन तलाक, या बाल विवाह के खिलाफ, या बहुपत्नी प्रथा के खिलाफ, या शाहबानो सरीखे गुजारा-भत्ते पर बातचीत होगी, तब हिन्दुओं पर नहीं होगी, तब सिर्फ मुस्लिमों पर होगी। इसलिए आज जब हिन्दू उपवास की बात हो रही है, तो वह तो हिन्दुओं तक ही सीमित रहेगी। किसी मुद्दे को किसी एक धर्म का विरोधी होने की तोहमत से बचाने के लिए उस धर्म की बारीकियों पर की जा रही चर्चा में हर धर्म को तो शामिल किया नहीं जा सकता। भारत के हिन्दुओं के भीतर अगर समाज सुधार की बात होनी है, तो वह तो हिन्दू-रीति-रिवाजों को लेकर ही होगी। आज 21वीं सदी के दूसरे चौथाई हिस्से में पहुंचकर भी यह चर्चा क्या नाजायज होगी कि हर किस्म के त्याग की उम्मीद सिर्फ महिलाओं से ही क्यों की जाती है, और पुरूषों की नैतिकता का भी कोई तकाजा रहना चाहिए या नहीं? 

जब कभी इस तरह की कोई चर्चा हो, तो महिलाओं का एक बड़ा तबका उसी पर पुरूष प्रधान व्यवस्था द्वारा थोपी गई जिम्मेदारी की वकालत करने पर आमादा हो जाता है। उन्हें ऐसे सारे उपवास अपने हक के लगते हैं, उन्हें जिम्मेदारी के बोझ का अहसास नहीं होता, उन्हें यह अहसास भी नहीं होता कि एक लडक़ी या महिला को भी बराबरी के हक का हक होता है। यह बात सिर्फ हिन्दू महिला के साथ नहीं होती, मुस्लिम महिलाओं के साथ यह कुछ और अधिक हद तक होती है जिन्हें बुर्का और हिजाब अपना हक लगने लगता है, उन्हें यह लगता ही नहीं कि मुस्लिम मर्दों ने उन पर यह थोप दिया है। हमने पहले भी इस बात की चर्चा की है कि कई समाजों में महिलाओं की सोच मनोविज्ञान की भाषा में, ‘स्टॉकहोम सिंड्रोम’ कहलाती है। दरअसल दशकों पहले एक अरबपति की बेटी का अपहरण हुआ था, और उसके छूटने में खासा वक्त लग गया था। अपहरणकर्ताओं के साथ जीते हुए वह उन्हीं को भला मानने लगी थी, और उसे लगने लगा था कि वे उसके शुभचिंतक हैं। इस तरह जब कोई शोषित अपने शोषक को ही अपना शुभचिंतक मानने लगे, ऐसी ही नौबत धर्म और सामाजिक रीति-रिवाजों को लेकर महिलाओं की हो जाती है, और वे परिवार के पुरूषों के लिए, बच्चों के लिए उपवास करने को अपनी जिम्मेदारी न मानकर हक मानने लगती हैं। ऐसे स्टॉकहोम सिंड्रोम के बीच औरत-मर्द की बराबरी की बात भी नहीं हो सकती। लेकिन धर्म और समाज के भीतर ऐसी बराबरी की संभावनाओं को हमेशा ही ढूंढना चाहिए, हमेशा ही उसकी कोशिश करनी चाहिए। हो सकता है कि हजार-दो हजार साल बाद पहली महिला शंकराचार्य बने, पहली महिला पोप बने! अमूमन हर धर्म में महिलाओं की स्थिति बहुत ही कमजोर करके रखी जाती है, और धार्मिक परंपराओं को इसके लिए हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है। यह सिलसिला खत्म करने की कोशिश होनी चाहिए। अगले करवाचौथ पर, कमरछठ पर, और तीजा पर मर्दों को भी उपवास कराकर देखा जाए कि समाज में एक नई जागरूकता आती है या नहीं।

(Daily Chhattisgarh)