फुटपाथी कुत्तों के लिए नरमी, इंसानों की हिफाजत का क्या?

20 सितंबर 2026  

 

कभी-कभी कोई एक खबर अपने आप में उतनी महत्वपूर्ण नहीं लगती है, जितनी कि एक साथ 2 जगह पर हुई 2 खबरें मिलकर लगती हैं। अब जैसे छत्तीसगढ़ के पलारी में कल एक कुत्ते ने एक-एक करके 13 लोगों को काटा। इनमें छोटे बच्चे थे, स्कूली बच्चे, बस स्टैंड के मुसाफिर, महिलाएं, अस्पताल आए मरीज, अलग-अलग जगह पर जाकर इसने 13 लोगों को काटा। इस बात को शायद संपादकीय के लिए विषय छांटते हुए हम अनदेखा भी कर देते, लेकिन सारंगढ़ शहर की दूसरी खबर यह है कि एक ही कुत्ते ने शहर के अलग-अलग इलाकों में लोगों को दौड़ के 32 लोगों को काट लिया। जिला अस्पताल में पहुंचने वाले मरीज 32 हो गए, जो कि इस कुत्ते के काटे हुए थे। अब सवाल यह उठता है कि फुटपाथी कुत्तों का क्या किया जाए। देश का सुप्रीम कोर्ट इस समस्या पर ऐसे उतार-चढ़ाव से गुजर रहा है, कभी उसे लगता है कि कड़ी कार्रवाई करना चाहिए, कभी उसे लगता है कि बहुत नरमी बरतनी चाहिए। कभी वह सरकारों के जिम्मे ऐसी बातें डाल देता है, जिनका पूरा होना मुमकिन नहीं है कि अस्पताल, स्कूल, कॉलेज और बस स्टैंड के अंदर कोई कुत्ता न घुस सके। ऐसा कैसे हो सकता है कि इन जगहों में ही कुत्ते आने से पूरी तरह रोका जाए?

सरकारी आंकड़ों को देखें तो समस्या छोटी नहीं है। 2019 की 20वीं पशुधन गणना में देश में करीब 153 लाख आवारा कुत्ते दर्ज किए गए थे। 2024 में देश में 37 लाख 17 हजार 336 कुत्ते के काटने के मामले दर्ज हुए और 54 संदिग्ध मानव रेबीज मौतें दर्ज की गईं। एक दूसरे सरकारी आंकड़े में 2024 के दौरान ग्रामीण इलाकों में ही कुत्तों के काटने के 21 लाख 95 हजार 122 मामले और 37 मौतें दर्ज हुईं। 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में कुत्ते के काटने के 5 लाख 19 हजार 704 मामले दर्ज हुए। यानी यह सिर्फ पशुओं और पशु-प्रेम का सवाल नहीं है, यह सीधे सार्वजनिक स्वास्थ्य का सवाल है। और इसका आर्थिक बोझ भी गरीब आदमी पर पड़ता है। बाजार में मानव रेबीज वैक्सीन की एक डोज अलग-अलग ब्रांड में करीब 270 रुपयों से 400 रुपयों तक दिखाई देती है। 5 डोज का कोर्स मानें तो केवल वैक्सीन का खर्च करीब 1,350 रुपयों से 2,000 रुपयों तक हो सकता है; निजी अस्पताल में डॉक्टर की फीस और इंजेक्शन लगाने का खर्च इसके ऊपर हो सकता है। सरकारी अस्पतालों में कई जगह 5 इंजेक्शनों का तय अंतराल वाला कोर्स दिया जाता है। रोज कमाने-खाने वाला मजदूर अगर हर इंजेक्शन के लिए अस्पताल जाए तो हर बार आने-जाने का खर्च तो है ही, कई घंटे अस्पताल में लगने के कारण उस दिन की मजदूरी भी जा सकती है। छोटी निजी नौकरी करने वाले कम वेतन वाले कर्मचारी के लिए भी यही परेशानी है। उसे हर बार अस्पताल जाने के लिए छुट्टी लेनी पड़ सकती है और हर नौकरी में बार-बार ऐसी छुट्टी आसानी से नहीं मिलती। इसलिए कुत्ते के काटने के इलाज की कीमत केवल वैक्सीन की कीमत नहीं है। उसमें अस्पताल तक आने-जाने का खर्च और सबसे बढक़र रोज की मजदूरी का नुकसान भी जोडऩा चाहिए।

अब एक तरफ पशु प्रेमी संगठन हैं, जो किसी भी कुत्ते को पकडक़र उसे ले जाकर किसी सरकारी बाड़े में रखने के भी खिलाफ हैं और सुप्रीम कोर्ट कई बार उनके तर्कों को मानकर ऐसे किसी भी कदम के खिलाफ बोलता है और यह कहता है कि उनको ले जाकर टीकाकरण करके, उनकी नसबंदी करके, उनको वापस लाकर इसी इलाके में छोड़ दिया जाए। भारत की आज की हालत को अगर देखें तो जिस तरह यहां करोड़ों कुत्ते बिना किसी मालिक के हैं, सडक़ों पर हैं, उनका भला किस तरह पकडक़र ले जाकर और इलाज के बाद वापस लाकर इस इलाके में छोड़ा जा सकता है? और इसके साथ-साथ जुड़ी हुई कुछ और बातों को भी समझना जरूरी है। इस देश में अराजकता इतनी अधिक है कि कुत्तों की कई प्रतिबंधित नस्लें भी लोग पालते हैं, क्योंकि उनके पास खर्च करने को पैसा है और वे अपने आप को दूसरों से ऊपर, दूसरों से अलग, अधिक ताकतवर दिखाना चाहते हैं। अभी ऐसे कई वीडियो एक-एक करके आए हैं, जब पिटबुल नाम की एक नस्ल के कुत्ते ने अपने मालिक के घर से बाहर निकलकर छोटे-छोटे बच्चों को बुरी तरह से काट लिया। खुद उनके मालिक उनको नहीं रोक पाए।

जिस देश में अराजकता इतनी है कि कुत्ते पालने वाले लोगों को न सरकार को इत्तिला देनी पड़ती है, न इस बात का सरकार कोई रिकॉर्ड रख सकती है कि उन्होंने अपने पालतू कुत्तों को टीके लगवाए हैं कि नहीं। जहां सरकार यह भी नहीं कर सकती कि लोग पालतू कुत्तों को घूमने के लिए ले जाते हैं और वे सडक़ों पर जो पाखाना करते हैं, उसे उठाने का इंतजाम भी उनके मालिक करें। मेरा मतलब यह कि यहां का कोई काबू जनता के ऊपर नहीं चलता। एक बड़ी दर्जे की अराजकता कुत्ते पालने को लेकर है। इसके साथ-साथ पशु प्रेमियों का हाल यह है कि वे कुत्तों पर कोई भी कार्रवाई करने के खिलाफ रोने-चीखने लगते हैं, सडक़ों पर उतर आते हैं। कई जगहों पर कुत्तों के दौडऩे से सडक़ों पर दोपहिया चलाते हुए लोग, साइकिल चलाते हुए लोग गिर जाते हैं, बुरी तरह जख्मी हो जाते हैं। लेकिन इसका कोई इलाज है सुप्रीम कोर्ट के पास नहीं है। कुल मिलाकर यह सिलसिला बहुत भयानक है।

खासकर तब, जब इसके साथ एक और पहलू को हम जोडक़र देखें कि सरकार के अस्पतालों में कई जगहों पर कुत्तों के काटने के बाद लगने वाले इंजेक्शन का इंतजाम नहीं है। स्टॉक में इंजेक्शन नहीं रहते तो गरीबों को बाहर से खरीदकर लाना पड़ता है और 5 इंजेक्शनों का कोर्स पूरा करने में गरीबों का खासा पैसा लग जाता है। और उससे भी बड़ा बोझ कई बार उन दिनों की छूटी हुई मजदूरी का होता है। इसके अलावा सरकारी अस्पतालों की क्षमता भी नहीं रहती है कि इतने इंजेक्शन किसी व्यक्ति को अलग-अलग तारीखों पर लगाए जाएं। पैसे वाले लोगों का हाल तो ठीक है, लेकिन जो गरीब लोग रहते हैं, रोज रोजी कमाने वाले लोग रहते हैं, छोटी-छोटी निजी नौकरियां करते हैं, उनको अगर 1 महीने में 5 बार जाकर हर बार कई-कई घंटे अस्पताल में गंवाना पड़े, तो उनके लिए यह बहुत नुकसान का काम भी रहता है। कुत्ते के काटने के इलाज की असली कीमत इसलिए सिर्फ दवा की कीमत नहीं है; उसमें आने-जाने का खर्च, अस्पताल में लगने वाला समय और उस दौरान छूटने वाली मजदूरी भी शामिल है।

और एक बात ऐसी है, जिस पर शायद अदालतों में बैठे लोगों को भी जमीनी हकीकत के साथ सोचना चाहिए। अस्पतालों, स्कूल-कॉलेजों और बस स्टैंडों की अपनी चारदीवारी होती है, उनके दरवाजे और गेट होते हैं, कहीं सुरक्षा कर्मचारी होते हैं, कहीं आने-जाने का नियंत्रण होता है। इसके बावजूद अगर इन जगहों पर कुत्ते पहुंच जाते हैं तो यह सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि उन्हें वहां पहुंचने से रोकने का आदेश दे दिया जाए। सवाल यह है कि देश के हर शहर और हर कस्बे में इन जगहों को वास्तव में कुत्तों से मुक्त रखने की व्यवस्था कौन करेगा और कैसे करेगा? सुप्रीम कोर्ट के जज अगर अपनी ऊंची अदालत में बैठकर यह आदेश दे दें कि अस्पताल, स्कूल, कॉलेज और बस स्टैंड जैसे स्थानों में कोई आवारा कुत्ता नहीं होना चाहिए, तो आदेश कागज पर बहुत सीधा दिखाई देता है। लेकिन किसी शहर के नगर निगम, किसी अस्पताल के अधीक्षक या किसी स्कूल के प्राचार्य के लिए यह तभी संभव है, जब उनके पास पकडऩे वाली टीम हो, सुरक्षित व्यवस्था हो, निगरानी हो और आसपास के पूरे इलाके में कुत्तों की समस्या से निपटने का कोई व्यावहारिक इंतजाम हो। वरना यह भी उन आदेशों की तरह होगा, जिनका पालन करने की जिम्मेदारी तो सरकारों की होगी, लेकिन जिन्हें जमीन पर लागू करना संभव ही नहीं होगा।

अब एक और पहलू पर सोचें। जिस देश में लाखों रुपए दाम वाली कैंसर की दवाइयों की जगह नकली दवाइयां बिक रही हैं, देश के एक सबसे विकसित शहर बेंगलुरु में अभी 100 अस्पतालों में कैंसर और ऐसी दूसरी गंभीर, जानलेवा बीमारियों की जीवनरक्षक दवाइयों की जगह नकली दवाइयां सप्लाई करते हुए कारोबारी गिरफ्तार हुए हैं। यह पूरा सिलसिला कुत्तों के काटने पर लगने वाले इंजेक्शनों के प्रति भरोसा खत्म करता है। जिस देश के बीच के एक प्रदेश में ?20 का नकली सिक्का डालने के लिए लोगों ने घर पर मशीन लगा रखी है और ऐसे हजारों सिक्कों के साथ लोग गिरफ्तार हुए हैं, तो ऐसे देश में नकली दवाइयों का कारोबार तो धड़ल्ले से चल ही रहा है। क्या होगा अगर कुत्ते के काटने के बाद लोग इंजेक्शन लगाकर भरोसे में बैठे रहे और उसके बाद भी वे हाइड्रोफोबिया के शिकार होकर उसी कुत्ते की तरह ही बुरी मौत मरें?

यह देश पशुओं के साथ नरमी बरतने वाला देश हमेशा से रहा है, लेकिन जिन पशुओं के लिए कोई जवाबदेह नहीं है, जो किसी के पालतू पशु नहीं हैं, सडक़ों पर लोगों को काट रहे हैं, उन्हें सडक़ों पर रखना, उनके लिए वहीं पर सार्वजनिक जगह पर खाने का इंतजाम करना, यह एक भयानक नौबत है। जब तक पशुओं में रेबीज जैसी कोई संक्रामक बीमारी नहीं होती थी, तब तक इंसान उनके काटे हुए जख्म को झेल लेते थे। लेकिन अब तो रेबीज जैसी शत-प्रतिशत जानलेवा बीमारी से ग्रस्त कुत्ते चारों तरफ हैं। तो ऐसे में सुप्रीम कोर्ट को जमीनी हकीकत से अनजान बने रहकर कागजी आदेश नहीं देने चाहिए, जिन पर अमल मुमकिन नहीं है और जिनसे जाना-जाना तय है। 

(यह संपादकीय बोलकर टाइप किया गया है, और चैटजीपीटी से हिज्जे सुधारे गए हैं.)

(Daily Chhattisgarh)   

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