22 सितंबर 2026
हमारे समाज में 10वीं के बाद लगभग हर विद्यार्थी के लिए एक ही रास्ता मान लिया गया है, 12वीं करो, फिर स्नातक करो और उसके बाद नौकरी तलाशो। लेकिन उन विद्यार्थियों के बारे में भी गंभीरता से सोचने की जरूरत है जो 10वीं तक की पढ़ाई में लगातार कमजोर हैं। अगर पढ़ाई में तेज विद्यार्थी भी स्नातक होने के बाद रोजगार के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तो केवल किसी तरह डिग्री हासिल कर लेने से पढ़ाई में कमजोर विद्यार्थी के लिए रोजगार की संभावना बहुत बेहतर हो जाएगी, इसकी क्या गारंटी है? अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की 2026 की रिपोर्ट के अनुसार 25 वर्ष से कम उम्र के स्नातक युवाओं में बेरोजगारी दर 39.33 प्रतिशत और 25 से 29 वर्ष में 20.04 प्रतिशत थी। इसका अर्थ यह नहीं कि स्नातक की डिग्री बेकार है। रोजगार मिलने पर स्नातकों की औसत कमाई गैर-स्नातकों से अधिक है। सवाल यह है कि डिग्री मिलेगी तो रोजगार भी मिलेगा, इसकी गारंटी कहां है?
एक और आंकड़ा इस समस्या को समझने में मदद करता है। 2004-05 से 2023 के बीच भारत में हर साल करीब 50 लाख नए स्नातक बढ़े, लेकिन रोजगार पाने वाले स्नातकों की संख्या में सालाना बढ़ोतरी केवल करीब 28 लाख रही और वेतनभोगी रोजगार तक पहुंचने वालों की संख्या इससे भी कम रही। यानी डिग्री हासिल करने वालों की संख्या जिस तेजी से बढ़ी, उनके लिए रोजगार उसी अनुपात में नहीं बढ़ा। यह स्थिति केवल बेरोजगारी की संख्या का सवाल नहीं है, बल्कि उस पूरी सोच पर सवाल है जिसमें हम मान लेते हैं कि ज्यादा से ज्यादा विद्यार्थियों को स्नातक बना देना अपने आप रोजगार की समस्या का समाधान कर देगा। इसलिए 10वीं तक पढ़ाई में लगातार कमजोर विद्यार्थियों को किसी तरह 12वीं और फिर स्नातक तक खींचते रहने के बजाय 8वीं से ही उन्हें अलग-अलग तरह के कामों और कौशलों से परिचित कराने की जरूरत है। 10वीं तक आते-आते उनकी रुचि, क्षमता और व्यावहारिक योग्यता समझी जा सकती है और उसके बाद उन्हें गंभीर कौशल प्रशिक्षण का विकल्प मिलना चाहिए। बिजली, वाहन मरम्मत, वातानुकूलन और कूलिंग, प्लंबिंग, वेल्डिंग, मशीन संचालन, सौर उपकरण, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, मोबाइल और कंप्यूटर मरम्मत, स्वास्थ्य तकनीक, खाद्य प्रसंस्करण, सिलाई, डिजाइन, फोटोग्राफी, वीडियो निर्माण, आतिथ्य सेवा, कृषि उपकरण और ऐसे अनेक क्षेत्रों में अच्छे प्रशिक्षण की जरूरत है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी कक्षा 6 से व्यावसायिक शिक्षा से परिचय और स्थानीय स्तर पर व्यावहारिक अनुभव की बात कही गई है।
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हुनर केवल नौकरी पाने का साधन नहीं, रोजगार की अपनी पूंजी है। कोई हुनरमंद व्यक्ति किसी संस्था या दुकान में काम कर सकता है, फिर स्वतंत्र रूप से काम ले सकता है और अनुभव के साथ अपना छोटा कारोबार भी शुरू कर सकता है। नौकरी चली जाए तो उसका हुनर उसके साथ रहता है। एक अच्छे बिजली मिस्त्री, वाहन मैकेनिक, तकनीशियन, दर्जी, फोटोग्राफर या दूसरे किसी काम का दक्ष व्यक्ति अपनी अगली आजीविका उसी हुनर से तलाश सकते हैं। इसके विपरीत किसी सामान्य स्नातक की नौकरी चली जाए और उसके पास कोई विशेष कौशल या काम का अनुभव न हो तो उसे फिर उसी डिग्री के आधार पर दूसरी नौकरी की तलाश करनी पड़ती है। इसलिए हुनर की असली ताकत केवल उसकी कमाई में नहीं, रोजगार खोने के बाद फिर से खड़े होने की क्षमता में भी है।
यह भी सच है कि हर हुनरमंद व्यक्ति स्नातक से ज्यादा नहीं कमाते। उपलब्ध राष्ट्रीय आंकड़े ऐसी कोई सामान्य बात साबित नहीं करते। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। तकनीकी शिक्षा और व्यावहारिक कौशल रोजगार की संभावनाएं बढ़ाते हैं और कुछ क्षेत्रों में अनुभव के साथ कमाई भी काफी बढ़ सकती है। स्वरोजगार में समय और काम के तरीके पर अपेक्षाकृत अधिक नियंत्रण भी हो सकता है, हालांकि उसके साथ नियमित छुट्टी, भविष्य निधि और दूसरी सामाजिक सुरक्षा की कमी का जोखिम रहता है। इसलिए कौशल शिक्षा का मतलब केवल प्रशिक्षण प्रमाणपत्र देना नहीं होना चाहिए। प्रशिक्षण के बाद रोजगार, प्रशिक्षुता, औजार खरीदने के लिए ऋण, बाजार तक पहुंच और सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था भी जरूरी है। नीति आयोग की 2026 की रिपोर्ट भी शिक्षा और कौशल को रोजगार से जोडऩे तथा व्यावसायिक शिक्षा को व्यापक बनाने पर जोर देती है।
भारत के रोजगार बाजार की एक और सच्चाई है जिसे हमारी शिक्षा व्यवस्था अक्सर नजरअंदाज करती है। नीति आयोग की 2026 की रिपोर्ट के अनुसार देश के श्रमबल में करीब 58.4 प्रतिशत लोग स्वरोजगार में हैं, जबकि नियमित वेतन या वेतनभोगी रोजगार में करीब 21.7 प्रतिशत और आकस्मिक श्रम में करीब 19.8 प्रतिशत हैं। यानी भारत की रोजी-रोटी का बड़ा हिस्सा केवल दफ्तर की नियमित नौकरी पर निर्भर नहीं है। बड़ी संख्या में लोग अपने काम, छोटे कारोबार, सेवा या किसी कौशल के सहारे कमाते हैं। इसलिए कौशल को पढ़ाई का दूसरा दर्जा मानने के बजाय उसे रोजगार की मुख्य धारा का हिस्सा बनाना जरूरी है। जिस हुनर से नौकरी मिल सकती है, उसी हुनर से स्वरोजगार भी शुरू किया जा सकता है।
हमने शिक्षा की सफलता का पैमाना बहुत संकरा बना दिया है, कितने विद्यार्थी 12वीं पास हुए, कितने ग्रेजुएट हुए और कितने पोस्ट-ग्रेजुएट, इससे बड़ा सवाल यह होना चाहिए कि कितने विद्यार्थियों के पास अपनी आजीविका कमाने की क्षमता है। हर विद्यार्थी डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर या अधिकारी नहीं बन सकते और इसमें कोई शर्म की बात नहीं है। शर्म की बात तब होगी जब पढ़ाई में कमजोर विद्यार्थी को वर्षों तक ऐसी पढ़ाई में धकेलते रहें जिसमें वह लगातार असफल होते रहें और अंत में उसके हाथ में न पर्याप्त रोजगार-योग्य डिग्री हो, न कोई मजबूत हुनर। इसके बजाय वही विद्यार्थी 10वीं के बाद किसी अच्छे हुनर में दक्ष होकर कामकाजी बन सकते हैं, नौकरी कर सकते हैं, स्वरोजगार शुरू कर सकते हैं और आगे चलकर अपना व्यवसाय भी खड़ा कर सकते हैं।
हमें विद्यार्थियों के रास्ते बंद नहीं करने हैं, रास्ते बढ़ाने हैं। डिग्री पाने वाले विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षा और रोजगार के रास्ते खुले रहें, लेकिन जो विद्यार्थी पढ़ाई में कमजोर हैं उनके लिए हुनर का रास्ता भी उतना ही सम्मानजनक बनाया जाए। सवाल यह नहीं होना चाहिए कि हर विद्यार्थी कितनी बड़ी डिग्री लेंगे। सवाल यह भी होना चाहिए कि हर विद्यार्थी ऐसा क्या सीखेंगे जिसके बदले समाज उसे सम्मान के साथ पैसा देने को तैयार हो। कमजोर विद्यार्थी को कमजोर स्नातक बनाने से बेहतर है कि उसे मजबूत हुनरमंद बनाया जाए। आज के समय में केवल डिग्री और दफ्तर-आधारित काम पर निर्भर रहने का सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार कृत्रिम बुद्धिमत्ता से सबसे अधिक प्रभावित होने वाले कामों में आंकड़े दर्ज करने, हिसाब-किताब, प्रशासन और दूसरे कागजी काम शामिल हैं। संगठन का आकलन यह नहीं है कि ये सारी नौकरियां खत्म हो जाएंगी; अधिक संभावना काम के स्वरूप में बदलाव की है। लेकिन इससे यह जरूर स्पष्ट होता है कि भविष्य के विद्यार्थी को केवल प्रमाणपत्र नहीं, बदलते रोजगार बाजार के अनुकूल वास्तविक कौशल भी चाहिए।
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