बच्चे को तांत्रिक बताकर निकालना, स्कूलों में काउंसलर क्यों जरूरी हैं

19 सितंबर 2026  

 

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के एक सरकारी आवासीय स्कूल, प्रयास के 9वीं क्लास के एक बच्चे को स्कूल प्रबंधन ने यह कहते हुए निकाल दिया कि वह कोई तांत्रिक क्रिया करता था, रात में अंधेरे में बैठा रहता था और तरह-तरह की आकृतियां बनाता था। उसे स्कूल से टीसी देकर भेज दिया गया। बाद में बाल आयोग तक जब इसकी शिकायत पहुंची तो उसने दखल देकर इस बच्चे की टीसी रद्द करवाने और पढ़ाई जारी रखने के निर्देश दिए। यह घटना छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में मौजूद कई तरह की दिक्कतों में से एक है। यह बिल्कुल नए तरह की है, बहुत ही अटपटी है, लेकिन इस घटना से यह पता लगता है कि सरकारी अमला बच्चों की दिक्कतों को समझने में किस हद तक नाकाम है। जिस प्रदेश में अंधविश्वास के खिलाफ, किसी को टोनही कहने या प्रताडि़त करने के खिलाफ एक मजबूत कानून बना हुआ है, उस प्रदेश में सरकारी आवासीय स्कूल का प्रबंधन किसी बच्चे को तांत्रिक क्रिया करने के आरोप में निकाल दे, यह हक्का-बक्का करने वाली बात है।

यह समझने की जरूरत है कि अगर किसी बच्चे की कोई हरकतें अटपटी लग रही हैं तो कम से कम आवासीय विद्यालय में तो स्कूल और हॉस्टल प्रबंधन की यह जिम्मेदारी बनती है कि उस बच्चे को किसी परामर्शदाता से मिलवाए, किसी मनोचिकित्सक के पास उस बच्चे को ले जाए, उसके परिवार को बुलाकर उन्हें परामर्श दे। अगर किसी बच्चे में कोई अस्वाभाविक बात देखी है तो यह तो स्कूल के लिए एक अधिक बड़ी जिम्मेदारी की बात बनती है, न कि उससे हाथ धो लेने का कारण। राज्य में सरकारी स्कूलों और छात्रावास से जुड़े हुए स्कूलों में कई तरह की दिक्कत सामने आती हैं। हम समय-समय पर इस बारे में लिखते भी रहते हैं। अधिकांश दिक्कतें बच्चियों को लेकर आती हैं, जिनका तरह-तरह से शोषण सामने आता है। सरकार को कोई ऐसा तरीका विकसित करना चाहिए जिससे बच्चियों का हौसला बढ़ सके और वे अपने किसी भी तरह के शोषण के खिलाफ शिकायत कर सकें।

कोई शिकायतों के लिए ऐसा बक्सा लगाया जाए जिसकी चाबी स्कूल के बाहर हो। ऐसे नंबर लिखे जाएं जिस पर बच्चियां फोन करके शिकायत कर सकें। या जिस इलाके में स्कूल है, उस इलाके की शिक्षा विभाग से परे की शासकीय महिलाओं को स्कूलों में भेजा जाए। उन्हें बिना शिक्षकों और प्राचार्य की मौजूदगी के बच्चियों से बात करने को कहा जाए, ताकि किसी की कोई शिकायत हो तो वह खुलकर सामने आ सके। देखा हुआ है कि राज्य में जिन स्कूलों में लड़कियों को गुड टच या बैड टच का फर्क समझाया जाता है, वहां पर लड़कियां अपने शोषण के खिलाफ अधिक मुखर होती हैं। इस राज्य के स्कूलों में कई जगह यह भी देखने मिलता है कि शिक्षक या उनसे अधिक वरिष्ठ लोग नशा करके स्कूल आते हैं। कुछ लोग स्कूल में नशा करते हैं। लड़कियों से अश्लील बर्ताव की बहुत सारी शिकायतें आती हैं। कुछ ऐसे मामले भी सामने आए, जिनमें स्कूल के शिक्षक ने अपने मोबाइल फोन को शिक्षिकाओं के शौचालय में रखकर उनके वीडियो बनाए। राजधानी रायपुर की एक प्रतिष्ठित स्कूल में बहुत सारी बच्चियों के मां-बाप को थाने में जाकर प्रदर्शन करना पड़ा था, क्योंकि स्कूल का एक शिक्षक छात्राओं को अश्लील संदेश भेजता था।

राजधानी रायपुर के इस प्रयास आवासीय विद्यालय में बच्चों को तांत्रिक मानकर जिस तरह यह निष्कासन किया गया है, वह बतलाता है कि बच्चों की मानसिकता से, उनके मनोविज्ञान से स्कूल प्रबंधन पूरी तरह अछूते हैं। दूसरी बात यह भी कि स्कूल प्रबंधन की जो औपचारिक कानूनी जिम्मेदारी रहती है, उससे भी वह परे रहते हैं। यह नौबत अच्छी नहीं है। हम पहले भी अपने संपादकीय में कई बार इस बात को लिखने आए हैं कि राज्य सरकार को प्रदेश के विश्वविद्यालयों में बच्चों और बड़ों के परामर्श के कोर्स बड़े पैमाने पर चलना चाहिए। बहुत अधिक संख्या में परामर्शदाताओं की जरूरत है। यह भी किया जा सकता है कि स्कूल शिक्षकों के सामने यह विकल्प रखा जाए कि वे चाहें तो परामर्श का यह कोर्स कर सकते हैं और इसके बाद में जहां कहीं तैनात रहेंगे, वहां बच्चों को, उनके माता-पिता को परामर्श दे सकेंगे। क्योंकि स्कूल शिक्षक लाखों की संख्या में हैं, स्कूल गांव-गांव तक हैं। इसलिए अगर बड़े पैमाने पर परामर्शदाता बनते हैं तो न सिर्फ स्कूली बच्चों को, बल्कि उनके मां-बाप को भी इसका फायदा मिल सकेगा।

हम स्कूली शिक्षकों को परामर्शदाताओं की जरूरत पूरी करने के लिए इसलिए कह रहे हैं कि बहुत सारे ऐसे बच्चे रहते हैं, जिनको अपने परिवार के भीतर भी दिक्कत रहती है। उनके मां-बाप आदर्श पालक नहीं रहते। कहीं मां-बाप नशा करते हैं, कहीं हिंसा करते हैं और कई जगह तो मां-बाप या परिवार के दूसरे लोग बच्चों का यौन शोषण भी करते हैं। ऐसे सारे मामलों में स्कूल के शिक्षक, चाहे वह 100 दूसरे किस्म की सरकारी योजनाओं के बोझ से दबे हुए हों, उनमें से जो लोग परामर्श का कोर्स करते हैं, वे सरकार के लिए, समाज के लिए सबसे सस्ते, कम खर्च के मनोवैज्ञानिक परामर्शदाता हो सकते हैं। जरूरत यही है कि विश्वविद्यालयों के मनोविज्ञान विभाग के तहत परामर्श के पाठ्यक्रम बड़े पैमाने पर चलाए जाएं। जरूरत रहे तो विश्वविद्यालयों के भीतर ऐसा एक अलग शिक्षण केंद्र बनाया जा सकता है, जिसमें एक साथ सैकड़ों लोगों को एक साल या 2 साल का परामर्श का कोर्स करवाकर उनका समाज के भले के लिए योगदान लिया जा सके।

हम अलग-अलग कई तरह के मुद्दों को लेकर बच्चों की बात करते हैं, जिनमें नाबालिग बच्चों के किए जा रहे गंभीर अपराध भी शामिल हैं। बहुत से ऐसे बच्चे भी हैं, जो स्कूल छोड़ चुके हैं और वे अधिक खतरनाक जिंदगी जीते हैं। इसलिए शिक्षकों को परामर्शदाता बनाने से वे न केवल अपने शैक्षणिक संस्थान में, बल्कि उस स्कूल के इलाके में, गांव, कस्बे या शहर में और लोगों के लिए भी परामर्श का काम कर सकेंगे। सरकार को इस बारे में सोचना चाहिए, क्योंकि अभी बहुत बड़ी-बड़ी और महंगी निजी स्कूलों में ही परामर्श का काम, परामर्शदाता उपलब्ध हैं। सरकारी स्कूलों में यह सुविधा शायद कहीं भी नहीं है। इसलिए बच्चों के साथ शिक्षकों द्वारा की जा रही ज्यादती, बच्चों के आपस के झगड़े, बच्चों के मानसिक विकास में कई और तरह की आने वाली दिक्कतें, इन सबका एक समाधान शिक्षित, प्रशिक्षित परामर्शदाता हो सकते हैं।

(Daily Chhattisgarh)   

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