संपादकीय
24 नवम्बर 2017

भारत में दशकों से राजनीतिक शरणार्थी का दर्जा पाकर रहने वाले तिब्बत के निर्वासित नेता और बौद्ध धर्म के एक प्रमुख व्यक्ति दलाई लामा ने अभी कहा कि भारत के लोग ज्यादा आलसी होते हैं, शायद इसकी वजह यहां का मौसम हो सकता है। उन्होंने यह बात बहुत सी और बातों के बीच कही है, इसलिए उनकी यह बात एक लंबी-चौड़ी सोच मानना ज्यादती होगी, लेकिन हम इस मुद्दे को लेकर यहां पर चर्चा जरूर करना चाहते हैं।
भारत में लोग आलसी हैं, या नहीं, इसे दूसरे देशों के इंसानों की तुलना करके ही समझा जा सकता है। हो सकता है कि ऐसे कई और देश हों, जहां पर हिन्दुस्तानियों के मुकाबले लोग कम मेहनत करते हों, वक्त अधिक बर्बाद करते हों, और चौक-चौराहों पर, चाय-ठेलों पर चर्चा को बहुत अहमियत का काम मानते हों। लेकिन हम लोगों की अपनी जरूरतों, और अपनी महत्वाकांक्षाओं को देखते हुए ही उनके मेहनतकश होने, या कि आलसी होने की बात कर सकते हैं। कई लोग जंगलों में बसते हैं, अपनी जरूरतों के लिए कुछ शिकार करते हैं, कुछ कंद-मूल ढूंढते हैं, मछली मार लेते हैं, और जिंदगी गुजार लेते हैं। वे हर दिन जितने घंटे काम करते हैं, उतने घंटे मुंबई में दसियों लाख लोग रोज लोकल ट्रेन में काम पर आने-जाने में सफर करते हैं। उनकी जरूरतें अलग हैं, उनकी महत्वाकांक्षाएं अलग हैं। इसलिए जाहिर है कि उनकी मेहनत भी कुछ अलग किस्म की होगी।
लेकिन हम भारत के लोगों में आबादी के एक बड़े हिस्से को ऐसा पाते हैं जिसकी महत्वाकांक्षाएं बहुत हैं, जिसकी हसरतें कभी थमने का नाम नहीं लेतीं, लेकिन वे इन हसरतों को हकीकत बनाने के लिए मेहनत करने से कतराते हैं। इनमें से अधिकतर ऐसे लोग हैं जो कि अपनी जमीन पर ही बसे हुए हैं, या कि यह कहें कि मां-बाप की छाती पर मूंग दल रहे हैं। जो लोग उत्तर भारत से मुंबई जाकर दूध बेचते हैं, या कि भेल और पावभाजी के ठेले लगाते हैं, वे दिन में अठारह घंटे मेहनत कर लेते हैं। कुछ वैसी ही मेहनत छत्तीसगढ़ के मजदूर लद्दाख में सड़क बनाने में, या कि हरियाणा के ईंट भट्टे में काम करते हुए कर लेते हैं जहां कि वे अपनी जमीन से दूर रहते हैं। कुछ ऐसी ही मेहनत पंजाब से गए हुए किसान अमरीका के कैलिफोर्निया में करते हैं, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा में करते हैं। वहां पर गए हुए पंजाबी भारत के पंजाब में बदनाम नशे के शिकार नहीं रहते। कुल मिलाकर होता यह है कि जब लोग अपनी जमीन से दूर जाते हैं, जहां उन्हें मुफ्त में रहने-खाने का भी कोई ठिकाना नहीं रहता है, और जिंदा रहने के रोज के मुकाबले में मेहनत करना ही उनके सामने अकेला विकल्प रहता है, तो वे आलसी नहीं रह पाते। लोग अपने घर पर ही आलसी रह सकते हैं, दूसरी जगह उन्हें मेहनत करनी ही होती है। यही वजह है कि केरल से खाड़ी के देशों में गए हुए लोग मेहनत करके करोड़ों कमाकर लौटते हैं। छत्तीसगढ़ के जो मजदूर बाहर जाते हैं, वे बाहर से लौटकर अपनी जमीन के साथ की और जमीन खरीद लेते हैं, अपनी संपन्नता बढ़ाते चलते हैं।
लोगों का बाहर जाना इसीलिए जरूरी है कि वे आगे बढ़ते चलें। लोग जब चुनौतियों का सामना करते हैं तो वे आलसी नहीं रह जाते। जब कड़े मुकाबले में उनको टिकना ही एक रास्ता रहता है, तो वे उस मुकाबले में उतर जाते हैं। इसलिए हिन्दुस्तान के उन लोगों को अपने बारे में सोचना चाहिए जिनको कि अपना घर, अपना मुहल्ला, अपना कामकाज, और अपना समाज आगे बढऩे ही नहीं देते हैं। इन्हीं सबमें जो लोग संतुष्ट रह जाते हैं, वे लोग अधिक आलसी होकर भी जी लेते हैं। ( Daily Chhattisgarh )
-सुनील कुमार
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