संपादकीय
30 नवम्बर 2017

चुनावों के वक्त प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हमलावर तेवरों के साथ हर बार बहुत सी ऐसी बातें कहते सुनाई देते हैं जो कि चुनावी हड़बड़ी का एक सुबूत तो हो सकती है, लेकिन जो न तो प्रधानमंत्री के पद की मर्यादा के लायक बात होतीं, और न ही किसी बड़े नेता के मुंह से सुहातीं। गुजरात में उन्होंने इंदिरा गांधी की ऐसी तस्वीर का जिक्र किया जो कि लाशों की बदबू के बीच खड़ी थीं, और नाक पर उन्होंने रूमाल रखा हुआ था। इसे लेकर मोदी ने अपने भाषणों में कहा कि उनको गुजरात से बदबू आती थी, और हमें खुशबू आती है। इसके जवाब में तुरंत ही मीडिया में ऐसी तस्वीरें आईं जो कि मौरवी की उस बाढ़ के वक्त आरएसएस के स्वयं सेवकों की हैं जो कि लाशों के बीच काम करते हुए नाक पर रूमाल और कपड़ा बांधे हुए हैं। जाहिर है कि लाशों के बीच, चाहे वे घर के लोगों की ही क्यों न हों, अगर वहां बदबू फैली हुई है तो लोग नाक पर रूमाल तो रखेंगे ही, चाहे वह इंदिरा गांधी हो, चाहे वह आरएसएस स्वयं सेवक हों। दूसरी बात मोदी की पार्टी की तरफ से राहुल गांधी के हिन्दू होने न होने को लेकर उठाई गई, और यह चुनौती उछाली गई कि आज राहुल जिस मंदिर में जा रहे हैं, सोमनाथ का वह मंदिर उनके नाना-परनाना का बनवाया हुआ नहीं है। ये दोनों बातें मोदी के आम चुनावी तेवरों की तो हैं, लेकिन उन्होंने और उनकी पार्टी ने देश के भीतर एक बहुत ही बड़ी तकलीफ भी पैदा की है कि जिस गुजरात में मोदी ने कई कार्यकाल पूरे किए, और जहां 22 बरस से उनकी पार्टी की सरकार है, वहां पर आज इस स्तर पर प्रचार करना पड़ रहा है? क्या किसी के किसी मंदिर में जाने पर इसलिए रोक लग सकती है कि वह मंदिर उसके पुरखों ने नहीं बनवाया है? लोकतंत्र अगर पुरखों का हिसाब करने बैठे तो देश के बहुत से नेताओं, पार्टियों, और संगठनों पर बहुत बड़ी-बड़ी देनदारी निकल जाएगी।
इसके जवाब में कांग्रेस ने राहुल गांधी की जनेऊधारी तस्वीर जारी करते हुए यह साफ किया है कि वे हिन्दू हैं, इस तस्वीर में शायद प्रियंका की शादी होते दिख रही है, और दुल्हन के भाई के रूप में राहुल गांधी जनेऊ पहने कुछ रस्म पूरी कर रहे हैं। यह बात अपने आपमें तकलीफदेह है कि देश के सबसे विकसित राज्य होने का दावा करने वाले गुजरात में चुनाव को इस घटिया स्तर पर ले जाया गया है कि लोगों को अपना जनेऊ दिखाना पड़ रहा है। इसी चुनाव के मौके पर उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ यह कहते सुनाई देते हैं कि राहुल गांधी को मंदिर में बैठना भी नहीं आता, और वे जब ऐसे बैठे कि मानो नमाज पढ़ रहे हों, तो पंडित को उन्हें ठीक से बैठने को कहना पड़ा। इसी मौके पर भाजपा के सबसे बड़बोले, और खासे कमअक्ल प्रवक्ता संबित पात्रा टीवी पर यह बोलते हैं कि राहुल के दादा फिरोज गांधी पारसी नहीं थे, मुस्लिम थे, और उन्हें फिरोज गांधी नहीं, फिरोज खान कहना चाहिए।
चुनाव तो आएंगे और चले जाएंगे, और हो सकता है कि चुनावों में जीत भी साम्प्रदायिक बातों से परे की है, लेकिन यह समझ लेना चाहिए कि देश में गंदगी की बातें इतिहास में अच्छी तरह दर्ज हो जाती हैं, चाहे उन्हें किसी भी पार्टी के लोग क्यों न कहें। लोगों के मंदिर जाने पर अगर उन पर ऐसे ओछे हमले होने लगें कि उनकी वल्दियत का धर्म उठाया जाने लगे, उनके हिन्दू होने न होने पर सवाल उठने लगे, और एक राज्य का मुख्यमंत्री घोर साम्प्रदायिक बयान देकर किसी को पूजा में नमाजी अंदाज में बैठने वाला कहने लगे, तो चुनाव प्रचार के ऐसे तरीकों को धिक्कार है। बाईस बरस के राज के बाद भी अगर प्रधानमंत्री और भाजपा बहस को विकास की ओर से मोड़कर धार्मिक उन्माद की ओर ले जा रहे हैं, तो यह तकलीफदेह बात है। ऐसा लगता है कि गुजरात का विकास वहां चल रहे एक नारे के मुताबिक पागल तो नहीं हुआ है, लेकिन वह मोर्चा छोड़कर, मुंह छुपाकर भाग निकला है।
इस मौके पर लोकतंत्र की एक भावना को भी समझने की जरूरत है। लोकतंत्र महज चुनावी आंकड़ों में फतह पाने का नाम नहीं है, आंकड़ों से परे लोकतंत्र की एक भावना भी है जो कि चुनावी नतीजों से साबित नहीं होती, और सत्ता जिसका विकल्प नहीं रहती। देश में धार्मिक ध्रुवीकरण करके या जाति के आधार पर, या किसी और मुद्दे पर जनमत संग्रह की तरह चुनाव मतदान लोकतंत्र नहीं है। अगर ऐसा ही होता तो लोकतंत्र में सभी मुद्दों पर अलग-अलग जनमत संग्रह करवा लिया जाता, और फिर किसी संसद की जरूरत नहीं होती, अदालत की जरूरत भी नहीं होती। बहुमत किसी भी तरह से लोकतंत्र का एक विकल्प नहीं है, बहुमत लोकतंत्र में सरकार तक पहुंचने का एक कानूनी रास्ता जरूर है, बहुमत कोई कानून नहीं है। इसलिए बहुमत का हवाला देते हुए देश की बुनियादी संस्कृति, देश की गंगा-जमुनी तहजीब के खिलाफ ओछी बातें हो सकता है कि किसी चुनाव में लोगों को बहुमत दिला दें, लेकिन इतिहास में सम्मान नहीं दिला सकतीं। आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जिस स्थिति में हैं, उन्हें, और उनकी पार्टी को, ऐसे बहुमत के लिए मेहनत करने के बजाय सम्मान के लिए, देश की एकता के लिए, देश में सर्वधर्म समभाव के लिए, देश में बेहतर संस्कृति के लिए कोशिश करनी चाहिए। (Daily Chhattisgarh)
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