संपादकीय
18 नवम्बर 2017

कभी दिल्ली शहर में प्रदूषण के चलते छा जाने वाले कोहरे-धुएं, स्मॉग, की खबरें आती हैं, तो अदालत से लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल तक और केन्द्र से लेकर राज्य सरकार तक सभी हड़बड़ाते हैं, और कुछ न कुछ करने की कोशिश करते दिखने की कोशिश करते हुए दिखते हैं। लेकिन दूसरी तरफ भारत के ऑटोमोबाइल उद्योग की आक्रामक मार्केटिंग के चलते हुए सभी तरह की गाडिय़ां सड़कों पर लगातार बढ़ते चल रही हैं। जहां तक हमारी नजर जाती है, हम देख रहे हैं कि जरूरत से कई गुना अधिक गाडिय़ां सड़कों पर आ गई हैं, और उनके मालिक उन्हें सड़कों पर ही खड़ा करके रख देते हैं। इन गाडिय़ों के लिए पार्किंग की कोई निजी जगह नहीं होती, और इन्हें फुटपाथों पर, सड़क के किनारे, घर-दफ्तर के बाहर रखा जाता है।
आज देश में एक ऐसी नीति की जरूरत है कि किसी भी गाड़ी का रजिस्ट्रेशन उसी हालत में किया जाए जबकि उसे रखने के लिए निजी जगह का इंतजाम हो। आज सार्वजनिक जगहों पर, हाईवे की पूरी की पूरी सर्विस लेन पर, और शहरों के बीच की हर खुली जगह पर कारोबारी गाडिय़ों की पार्किंग दिखती है, और ये गाडिय़ां लगातार बढ़ती चल रही हैं। भारत की उदार अर्थव्यवस्था में निजी गाडिय़ों की खरीदी पर शायद सरकार कोई रोक न लगा सके, लेकिन हर कारोबारी गाड़ी का इस्तेमाल तय रहता है। वह मुसाफिर ढोती है, या कि सामान ढोती है, या फिर वह क्रेन-बुलडोजर किस्म की कोई मशीन होती है। हर कारोबारी गाड़ी के लिए पार्किंग की जगह को तुरंत अनिवार्य करना चाहिए, तभी पुरानी गाडिय़ां घटेंगीं, और नई गाडिय़ों के लिए लोग पार्किंग की जगह का इंतजाम करेंगे। आज तो हालत यह है कि बड़े-बड़े शहरों के व्यस्त इलाकों में भी गाडिय़ों के कंकाल बरसों तक सड़क किनारे खड़े रहते हैं, उन्हें कोई जब्त भी नहीं करते।
प्रदूषण घटाने के लिए कारखानों और निर्माण सामग्री पर कड़ाई से रोक लगानी जरूरी है, इसके साथ-साथ लोगों के चलने के लिए सार्वजनिक बसों का, मेट्रो या दूसरे साधनों का इंतजाम होना चाहिए। भारत के शहर अपनी बड़ी आबादी और चुक चुके ढांचे के चलते और आबादी की और गाडिय़ां नहीं झेल सकते। ऐसे में रात-दिन ट्रैफिक जाम के चलते गाडिय़ों का प्रदूषण कई गुना अधिक हो जा रहा है, और आज अगर केवल दिल्ली को लेकर सरकारों की नींद खुल रही है, तो बाकी देश में भी लोगों के फेंफड़े छलनी होना जारी हैं। यह भी याद रखने की जरूरत है कि प्रदूषण की सबसे बुरी मार उस गरीब तबके पर पड़ती है जो कि जाम सड़क-चौराहों पर धुआं और धूल झेलने को मजबूर रहता है। ऐसे गरीब के इलाज का बोझ भी सरकार पर आता है, और उसकी उत्पादकता भी घट जाती है। इसलिए प्रदूषण को सिर्फ हवा के जहर तक सीमित खतरा मानना तंगनजरिया होगा, और यह याद रखने की जरूरत है कि इंसान के साथ-साथ कुदरत के दूसरे पहलू भी इंसान के पैदा किए हुए, और लगातार बढ़ाए जा रहे इस भयानक प्रदूषण का शिकार होते चल रहे हैं।
देश का सुप्रीम कोर्ट आमतौर पर दिल्ली को सुधारने में अपनी खासी ताकत लगा देता है, और ऐसे में बाकी देश को दिल्ली को एक मिसाल मानकर चलना चाहिए, और अपने आपको खुद भी सुधारना चाहिए। प्रदूषण को लेकर सरकारों की गंभीरता का हाल यह है कि छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अभी चार दिन पहले रायपुर और बिलासपुर जैसे सबसे बड़े शहरों में नल के पानी में बीमारी को लेकर सरकार को कटघरे में खड़ा किया, और कल उसने यह पूछा कि राज्य सरकार इतने खर्च के बावजूद शहरों में शोरगुल से हो रहे प्रदूषण को रोक क्यों नहीं पा रही है? आज जिस समय हम यह लिख रहे हैं, पर्यावरण को बचाने के लिए राज्य सरकार उद्योगपतियों से बात कर रही है, और इसी बातचीत में कई दूसरे पहलुओं पर भी चर्चा हुई है। हमारा मानना है कि इस प्रदेश, देश और धरती को बचाने के लिए बड़ी कड़ी मेहनत की जरूरत है, वरना हम महज दिल्ली को देखते रह जाएंगे, तो दिल्ली सरीखा स्मॉग, उससे भी जहरीली हवा हमें अपने ही शहर में घेर लेगी। जनता की जागरूकता तो जरूरी है, लेकिन सबसे बड़ी जिम्मेदारी सरकार की बनती है, और उसे शहरी योजना के जानकारों और विशेषज्ञों से बात करनी चाहिए, खासकर ऐसे लोगों से जो कि सरकार के बाहर हैं। (Daily Chhattisgarh)
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