संपादकीय
27 नवम्बर 2017

मध्यप्रदेश में कल यह तय किया है कि बारह बरस या उससे कम उम्र की लड़कियों से बलात्कार करने पर, या किसी भी उम्र की महिला से सामूहिक बलात्कार करने पर मौत की सजा दी जा सके। इसके लिए वहां की सरकार विधानसभा में कानून का प्रस्ताव ला रही है। इसके साथ-साथ महिलाओं के साथ बाकी किस्म के अपराधों पर भी कड़ी सजा का इंतजाम किया जा रहा है। अभी पिछले ही हफ्ते जब इस प्रस्तावित सजा पर चर्चा हो रही थी, कुछ लोगों ने यह राय रखी थी कि इस सजा का एक खतरा यह रहेगा कि लोग बलात्कार के बाद बलात्कार की शिकार को मार ही डालेंगे क्योंकि सजा तो हत्या जितनी ही बलात्कार की भी मिलेगी, ऐसे में सुबूत या गवाह को क्यों छोड़ा जाए?
हम इसके पहले भी कई बार यह बात लिख चुके हैं कि भारत को एक सभ्य लोकतंत्र के रूप में मौत की सजा खत्म करनी चाहिए। दुनिया के बेहतर देशों में एक-एक करके इसे खत्म किया जा रहा है, खासकर उन देशों में जहां पर लोकतंत्र के बारीक पहलुओं को महत्व दिया जाता है। अमरीका में भी कई राज्यों में यह सजा खत्म हो चुकी है, और तकरीबन हर राज्य में इसका बड़ा विरोध होता है। इस आधार पर भी भारत में अधिक किस्म के अपराधों पर मौत की सजा का विस्तार करना एक गलत सिलसिला है। दूसरी बात यह है कि अधिक कड़ी सजा से किसी अपराध में कमी आती हो ऐसा जुर्म के इतिहास के इतिहास में कहीं स्थापित नहीं है। बलात्कारियों को मौत की सजा दी जाए, या नहीं, इसका फैसला करते हुए सरकारों के सामने जब सड़कों और चौराहों पर भीड़ चीखती होती है, तब वोटों से चुनी गई सरकारें आमतौर पर कड़वे फैसले नहीं ले पातीं। लेकिन हमारा मानना है कि कानून का फेरबदल भीड़ के सिरों को गिनकर नहीं होना चाहिए, बल्कि इस नजरिए से होना चाहिए कि उसके असर से जुर्म कम हों। जो लोग बलात्कार के लिए मौत की सजा मांग रहे हैं, उनको यह समझने की जरूरत है कि आज तो बलात्कारी पांच-सात बरसों में छूटकर बाहर आ जाते हैं। कल जब उनको पता होगा कि बलात्कार की सजा भी फांसी होगी, तो सुबूत खत्म करने के लिए उनके पास सबसे आसान तरीका होगा, बलात्कार की शिकार का कत्ल कर देना। न सुबूत, न गवाह, और न फांसी। इसलिए कानून में फांसी जोड़ देने से बलात्कार तो कम नहीं होंगे, सजा मिलना तो नहीं बढ़ेगा, कत्ल और बढ़ जाएंगे।
दरअसल जो सरकारें मौजूदा कानून को कड़ाई से लागू नहीं कर पाती हैं, वे अपनी नालायकी, और अपने निकम्मेपन को छुपाने के लिए कानून को और कड़ा करके यह जाहिर करती हैं कि वे सचमुच कुछ कर रही हैं। जबकि मध्यप्रदेश या भारत के किसी भी दूसरे राज्य में अगर सरकारें लड़कियों और महिलाओं को सामाजिक सुरक्षा दे पातीं, उनको बलात्कारियों से, छेडख़ानी करने वालों से बचा पातीं, तो फांसी की इस नई सजा का इंतजाम करने की नौबत भी नहीं आती। मध्यप्रदेश में देश के बाकी राज्यों के मुकाबले बलात्कार का अनुपात बहुत अधिक है। मध्यप्रदेश में दलितों पर अत्याचार भी बहुत अधिक है, और जहां-जहां दलित आदिवासी पर जुल्म अधिक होते हैं, वहां-वहां उनकी महिलाओं पर ऐसे जुल्म और जुर्म अनुपात से अधिक होते ही हैं। यह नौबत बदलने के लिए सरकार को कानून को कड़ा करने के बजाय मुजरिमों पर रोकथाम को कड़ा करने की जरूरत है। रसोई में अगर खाना जल गया है, तो गैस सिलेंडर को खुले में ले जाकर जला देना किसी बात का समाधान नहीं हो सकता। मध्यप्रदेश की राजधानी में ही पुलिस मां-बाप की बेटी सामूहिक बलात्कार के बाद 20 घंटे से अधिक भटकती रहे, थाने में रपट दर्ज कराने, और उसके बाद सरकारी डॉक्टर एक फर्जी मेडिकल रिपोर्ट बनाए कि उस लड़की के साथ कोई बलात्कार नहीं हुआ है, उसने अपनी सहमति और मर्जी से सेक्स किया है। जिस प्रदेश में सरकार में बैठे लोगों का महिलाओं के साथ यह रूख है, वहां पर मध्यप्रदेश सरकार मुजरिमों से यह उम्मीद करती है कि वे अधिक कड़ी सजा से डर-सहम जाएं।
समाज और सरकार, संसद और अदालत, अपनी नालायकी को छुपाने के लिए कानून को अधिक लायक बनाने में जुट जाते हैं। अगर चौकीदार सो रहा है, तो उसकी लाठी की जगह बंदूक, या मामूली बंदूक की जगह मशीनगन दे देने से क्या फर्क पड़ेगा? अगर कोई बच्चा पढऩे में दिलचस्पी नहीं रखता, तो उसे एक किताब की जगह दस किताबें दे देने से क्या फर्क पड़ेगा? दरअसल कड़े कानून की कड़ी-कड़ी बातें, लोगों के मुंह को अपने निकम्मेपन की कड़वाहट से बचा लेती हैं। यह सिलसिला बहुत घातक है। जहां समाज में महिला को पैदा होने के पहले से ही बराबरी के हक से परे कर दिया जाए, पेट में ही मार दिया जाए, या पैदा होते ही घूरे पर फेंक दिया जाए, ट्रेन में छोड़ दिया जाए, या पटक-पटककर मार दिया जाए, जहां कदम-कदम पर उससे शारीरिक और मानसिक बलात्कार हो, जहां उसे घर में बराबरी का खाना न मिले, दहेज की कमी से जिसे प्रताडऩा मिले या मर जाने पर मजबूर होना पड़े, जहां उसके साथ हुए बलात्कार की पुलिस जांच देश के आम निकम्मेपन की वजह से कमजोर हो, जहां पर अदालतें एक-एक पीढ़ी लगा दें फैसला करने में, जहां पर आखिरी अदालत के फैसले के बाद भी बच्चियों के बलात्कारी-हत्यारों को राष्ट्रपति माफ कर दे, उनको फांसी से बचा ले, वहां पर बलात्कारियों को फांसी की सजा का इंतजाम करने से क्या हो जाएगा? अपने काम को ठीक से न करने वाली लोकतांत्रिक संस्थाएं, और उनको हांकने वाले, उन पर काबिज लोग कड़े-कड़े कानूनों की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। यह सिलसिला बहुत खतरनाक है और अपने आपको धोखा देने का है। कड़े कानून के झांसे में उन लोगों को आना चाहिए जो कि नर्म कानून को असरदार होते देख चुके हों। आज देश में बलात्कारियों में से अधिकतर, और बाकी किस्म के जुर्मों में भी अधिकतर मुजरिम जब अदालत से छूट जाते हैं, उनमें से अधिकतर बाइज्जत बरी होते हैं, तो नया और कड़ा कानून क्या खाकर किसी को सजा दिला देगा?
बलात्कारियों को फांसी का इंतजाम अगर सजा में किया जाता है, तो उससे एक बात की गारंटी हो जाएगी, कि फांसी से बचने के लिए बलात्कारी अपनी हिंसा की शिकार को मार डालेंगे। जब बलात्कार की सजा फांसी, और उसके बाद हत्या की सजा भी फांसी, तो फिर सुबूत को पूरी तरह खत्म करके अपनी जिंदगी बचाने की कोशिश में क्या बुराई है? आज अगर कोई बलात्कारी किसी बच्ची या लड़की को, या महिला को, सिर्फ उसकी देह लूटकर जिंदा छोड़ देते हैं, तो चार-छह फांसियों की खबर छपते ही ऐसी जिंदगी बचना खत्म हो जाएगा। लेकिन आज संसद से लेकर सड़क तक जिन लोगों की हस्ती नारों पर चलती है, उनको मौत की सजा का नारा अपनी जनता के लिए, अपने वोटरों के लिए लुभावना लग रहा है। मौत की सजा की मांग खत्म होनी चाहिए, और समाज को, सरकार को, संसद को, अदालत को यह सोचना चाहिए कि कैसे बलात्कार थमें, कैसे जांच बेहतर हो, कैसे अदालतों में जुर्म साबित हो, और कैसे सजा मिले। इससे परे की बात करना आज की नाकामयाबी पर एक नए कानून का कफन ढांकने जैसा है। (Daily Chhattisgarh)
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