संपादकीय
28 नवम्बर 2017

केरल की
एक पच्चीस बरस की हिंदू युवती ने एक मुस्लिम युवक से शादी की, और उसके बाद उसे लव-जेहाद
करार देते हुए भारत सरकार ने ऐसी कुछ और शादियों के मामलों को राष्ट्रीय जांच एजेंसी,
एनआईए को जांच के लिए दे दिया। यह एजेंसी बनते समय यह कहा गया था कि यह आतंक के मामलों
की जांच के लिए बनाई जा रही है क्योंकि ऐसे मामले एक से अधिक राज्यों तक बिखरे रहते
हैं, और उनकी तेजी से जांच के लिए ऐसी एक एजेंसी जरूरी है। अब दो धर्मों के बीच की
शादियों को मानो आतंक का दर्जा देते हुए ऐसी जांच शुरू की गई जो कि इस शादी के दोनों
पक्षों के बुनियादी हक के खिलाफ बात पहली नजर में ही दिखती है। लेकिन कानून की बारीकियां
और उलझनें ऐसी रहीं कि यह मामला हाईकोर्ट से होते हुए अब सुप्रीम कोर्ट में है, और
कल इसकी सुनवाई के दौरान जजों ने एक बालिग शादीशुदा महिला के निजी फैसलों पर जिस तरह
से दखल दिया है, वह हक्का-बक्का करने वाला है। शादी के बाद वह महिला अपने पति को अभिभावक
के रूप में चाहती थी, तो सुप्रीम कोर्ट के जज ने अपनी खुद की मिसाल दी कि वे भी अपनी
पत्नी के अभिभावक नहीं हैं। इसके साथ ही जज ने उस कॉलेज के डीन को इस महिला का अभिभावक
बनाया जहां वह आगे पढ़ाई करना चाहती है। एनआईए की जांच और नीचे की अदालत के चलते पिछले
ग्यारह महीनों से इस महिला को उसके हिंदू मां-बाप के हवाले किया गया था, और करीब एक
बरस उनके साथ रहने के बाद भी उसने अदालत में कहा कि वह अपने पति के साथ रहना चाहती
है, उसकी पढ़ाई का खर्च उसका पति उठाएगा, और वह अपने पति को ही अभिभावक के रूप में
चाहती है।
सुप्रीम
कोर्ट के जजों का इस बारे में रूख बड़ा हैरान करने वाला है। जहां एक तरफ एनआईए की इस
पूरी जांच को खारिज किया जाना चाहिए था, अदालत ने वह तो किया नहीं, दूसरी तरफ जजों
ने कुछ ऐसा रूख दिखाया है कि पच्चीस बरस की यह युवती अपनी जिंदगी के फैसले लेने के
लायक नहीं है। जजों ने इस बात को भी अनदेखा किया कि एक शादीशुदा महिला को करीब साल
भर जबर्दस्ती उसके मां-बाप के पास रखा गया, पति से दूर रखा गया, फिर भी वह चट्टान की
तरह अपने फैसले, अपने इरादे, और अपने पति के साथ खड़ी हुई है। ऐसे में भारी पूर्वाग्रह
से भरी हुई दिखती इस जांच के अधकचरा नतीजों को जज इतनी गंभीरता से ले रहे हैं कि वे
इस युवती के मौलिक अधिकारों के ऊपर एनआईए की साजिश की कहानी पर भरोसा कर रहे हैं। भारत
की अदालत को इतने दकियानूसी अंदाज में काम नहीं करना चाहिए कि वे पच्चीस बरस की एक
शादीशुदा युवती को अपनी जिंदगी के बारे में बोलने का हकदार भी न पाएं। यह पूरा सिलसिला
बड़ा निराश करता है, और ऐसा लगता है कि अदालत दो धर्मों के बीच शादी के ही खिलाफ है।
ऐसा आभास भी भारतीय लोकतंत्र के लिए बहुत ही खतरनाक है क्योंकि आज इस देश में कुछ ताकतें
धर्मों के बीच एक अंतहीन तनाव खड़ा करना, और बढ़ाते चलना चाहती हैं, और उनकी नीयत को
अदालत के ऐसे रूख से बड़ा बढ़ावा मिल रहा है। अभी इस मामले की सुनवाई जारी है, और अदालत
का कोई फैसला नहीं आया है, महज टुकड़ा-टुकड़ा आदेश ही आ रहे हैं। लेकिन आज देश की धर्मनिरपेक्ष
ताकतें, देश की आजादी की हिमायती ताकतें अदालत के फैसले के पहले के रूख को भी ध्यान
से देख रही हैं, और बहुत निराश हो रही हैं। कल खबर आने से लेकर आज दोपहर तक सोशल मीडिया
पर बहुत से जिम्मेदार अखबारनवीसों ने सुप्रीम कोर्ट के रूख पर बहुत ही निराशा जताई
है, और उसके खिलाफ लिखा है। हादिया नाम की इस युवती को मां-बाप के घेरे से लेकर पुलिस
के घेरे तक में सुप्रीम कोर्ट में खड़े रहकर इस हौसले के साथ जजों को जवाब दिया है,
वह देखने लायक है। और अदालत को उसे यह कहने का भला क्या हक बनता है कि वह पहले अपनी
पढ़ाई पूरी करे? वह पढ़े या न पढ़े, यह भला कैसे अदालत के सोचने-विचारने का मामला हो
सकता है?
-सुनील
कुमार
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