ऐसा शर्मनाक नियम आजादी की पौन सदी बाद जारी था!

संपादकीय
23 नवम्बर 2017


भारत नियमों और कानूनों से लदा हुआ देश है। हालत यह है कि इनके तले दबकर इंसान खत्म हुए जा रहे हैं, लेकिन सरकार में बैठे लोगों को अपनी ताकत दिखाने के लिए, आम जनता को सरकारी जूतों तले कुचलने के लिए नियमों का मोह ही नहीं छूटता। इसमें से कई नियम तो ऐसे हैं जिनकी जानकारी भी आम लोगों को नहीं है, और चूंकि उनके शिकार लोग बड़ी संख्या में नहीं हैं, इसलिए इंसानियत के खिलाफ के ऐसे नियम हटाने की मांग भी कोई नहीं करते हैं। अभी केन्द्र सरकार के रक्षा मंत्रालय ने एक नियम खत्म किया है और यह छूट दी है कि वीरता पुरस्कार प्राप्त गुजर चुके सैनिक की पत्नी अगर पति के भाई के अलावा किसी और से भी शादी करती है तो उसे पति के भत्ते मिलते रहेंगे। लोगों के लिए यह समझना कुछ मुश्किल हो सकता है कि एक लोकतंत्र में, आजादी की पौन सदी के बाद भी ऐसा नियम हो सकता है कि किसी शहीद की पत्नी पर सरकार यह नियम लगाए कि वह गुजरे हुए पति के भाई से ही शादी करे, तो उसे पति की वीरता का भत्ता मिलेगा। सेना में काम करते हुए जिसने वीरता से अपनी जान दी हो, उसकी पत्नी को एक इंसान की तरह जीने का बुनियादी हक भी भारत सरकार नहीं दे रही थी, और यह बात खबरों में आई भी नहीं थी।
भारत कहने को तो एक लोकतंत्र है, लेकिन यहां पर लोगों की निजी जिंदगी में दखल देने से सरकार थकती नहीं है। लोगों के बेडरूम में झांककर सरकार और देश की अदालतें यह देखती हैं कि दो वयस्क अगर आपसी सहमति से भी सेक्स कर रहे हैं, तो कहीं वे समलैंगिक तो नहीं हैं? अगर वे समलैंगिक हैं, तो उस पर सजा देने का लालच न सरकार छोड़ पा रही है, न अदालत छोड़ पा रही है, और संसद तो जनता के वोटों से बनती है, इसलिए वह इस हकीकत को अनदेखा ही करना चाहती है कि भारत में भी लोग समलैंगिक हो सकते हैं। ऐसे पाखंड के साथ जीने वाले देश में लोगों के बुनियादी हक सभ्य देशों की बराबरी तक पहुंचने में शायद एक सदी ही लग जाए।
यह देश एक तरफ तो अनुसूचित जाति, और जनजाति के लोगों को बढ़ावा देने के नाम पर ऐसे पुरस्कार रखता है कि इन जातियों से परे के लोग अगर इन जातियों के लोगों से शादी करते हैं, तो उन्हें नगद पुरस्कार मिलेगा। लेकिन दूसरी तरफ ऐसी शादी के लिए जब एक माहौल की जरूरत होती है जिसमें कि अलग-अलग जातियों के लोग मिल-बैठ सकें, तो बाग-बगीचों से लेकर तालाब किनारे तक से पुलिस लोगों को मारकर भगाती है, और उत्तर भारत में तो पुलिस और सरकार के बढ़ावे और उकसावे से गुंडों के संगठन जवान लड़के-लड़कियों को मार-मारकर उन्हें भाई-बहन बनाने में लगे रहते हैं। जब लोगों को मर्जी से उठने-बैठने का ही मौका नहीं मिलेगा, तो फिर कहां से अंतरजातीय विवाह होगा? और दूसरे धर्म में शादी को जहां एक बहुत बड़ा आतंक मानकर, लव जेहाद मानकर, उसे राष्ट्रीय जांच एजेंसी से जांच करवाने के लायक आतंकी काम माना जाता है, तो फिर जाति व्यवस्था टूटेगी कैसे?
अभी जो ताजा समाचार आया है, वह हैरान करने लायक है कि भारत सरकार यह मानकर चलती थी कि किसी वीर शहीद सैनिक की पत्नी किसी और से शादी ही नहीं करेगी, सिवाय अपने देवर या जेठ के। यह एक किस्म से एक खतरनाक मिजाज की बात है जो कि एक महिला को उसकी निजी पसंद के साथ जीने का हक भी नहीं देती, और एक किस्म से जो महाभारत काल की एक कहानी को इक्कीसवीं सदी में भी लागू करने की कोशिश करती है। भारत के लिए यह भारी शर्मिंदगी की बात है कि अभी दो दिन पहले तक भारतीय महिला के खिलाफ ऐसा एक नियम चले आ रहा था, और खबरों में अधिक आए बिना ही यह खत्म हो गया, यह एक अच्छी बात है। भारत को एक सभ्य समाज बनने के लिए यह तय करना होगा कि निजी जिंदगी का हक सरकार के कामकाज से ऊपर का होता है। मौलिक अधिकार सरकार के शिकंजे के बाहर के होते हैं। और आज से कुछ बरस बाद सही, जब समलैंगिकता जुर्म के दायरे से बाहर किया जाएगा, तो उस दिन हो सकता है कि भारत की तबकी सरकार, संसद, और तबकी अदालत देश से यह माफी मांगें कि समय रहते उनको अक्ल नहीं आई थी। (Daily Chhattisgarh)

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