संपादकीय
18 नवम्बर 2018

छत्तीसगढ़ में दो दिन बाद जनता के हाथ से सरकार चुनने का मौका निकल जाएगा। तीन कार्यकाल की रमन सरकार ने पिछले एक बरस में अपने तमाम कामों को जनता के सामने तरह-तरह से रखा है, और भूपेश बघेल की शक्ल में कांग्रेस को आक्रामक तेवर वाला एक ऐसा प्रदेश अध्यक्ष मिला है जिसने राज्य सरकार पर हमला बोलने का एक भी मौका नहीं चूका। सरकार ने खूब काम भी किए हैं, खूब गड़बडिय़ां भी हुई हैं। सीडी के मामले में भी दोनों तरफ का स्कोर बराबर हो गया है, और हैरानी की बात यह है कि मतदान के पहले के दो दिनों में सीडी का कोई जिक्र भी अब बाकी नहीं है क्योंकि लोग थक गए हैं। अब न कोई सेक्स-सीडी की असली या नकली शक्ल देखना चाहते, और न ही दबे-छुपे कैमरों से रिकॉर्ड की हुई बातों पर लोगों का अधिक भरोसा है। यह सब देखकर लोग अब गंभीरता से उन मुद्दों को देख रहे हैं जो कि राष्ट्रीय स्तर के नेता यहां आकर राज्य स्तर के चुनाव में उठा रहे हैं।
ऐसी जानकारी है कि रमन सरकार ने संगठन के हिस्से का भी बहुत सा काम किया है, और सरकार के किए गए अच्छे कामों को मतदान केन्द्र स्तर पर दर्ज करके ऐसी वोटर लिस्ट तैयार की है जिसके घर-घर को मिला हुआ फायदा एक नजर में दिख जाता है। जाहिर है कि पन्द्रह बरस से विपक्ष में बैठी कांग्रेस को न तो ऐसी सहूलियत थी कि वह अपनी किसी कामयाबी को दर्ज कर सके, और न ही उसके पास ऐसी क्षमता ही थी। फिर भी विपक्ष में रहते हुए सरकार की खामियों को गिनाने का जो एक बेहतर मौका रहता है, कांग्रेस ने समय रहते उसका इस्तेमाल करके पूरी तैयारी की हो ऐसा लगता नहीं। नतीजा यह है कि दिल्ली से आए हुए भाजपा के नेता कुछ आधारहीन बातें भी छत्तीसगढ़ में कर जा रहे हैं, तो उसे पकडऩे की फुर्ती कांग्रेस के पास आज नहीं है।
कुछ दिनों पहले इसी बात को छूते हुए हमने इसी जगह लिखा था कि विपक्ष का काम सरकार पर नजर रखने का जितना पैनेपन का होना चाहिए, उतना भारतीय राजनीति में दिखाई नहीं पड़ता है। आज अगर कोई पिछले पांच बरस की अखबारी कतरनों को लेकर भी बैठें तो भी सत्तारूढ़ पार्टी के बड़े-बड़े नेताओं की जीत को मुश्किल में डाल सकते हैं, लेकिन कांग्रेस की वैसी तैयारी है नहीं, और न ही राज्य में इस बार उतरी तीसरी पार्टी जोगी की है। आखिरी का पूरा हफ्ता ठोस मुद्दों से परे गंगाजल और गीता-कुरान की कसम जैसी बातों पर सरक गया है, और मतदाता को इस रफ्तार से भावनाओं के सैलाब में बहाना मुमकिन नहीं है क्योंकि लोग अब समझदार भी हो चुके हैं। सच पूछा जाए तो आज चुनाव के ठीक पहले का माहौल देखकर भी यह लगता है कि पांच बरस इस प्रदेश में मीडिया ही मुख्य विपक्ष था जिसने तमाम किस्म के मुद्दे उठाए थे। अब चुनाव के वक्त पर उसकी धार कुछ कम जरूर हो गई है, लेकिन इतने बरस के मीडिया के रिकॉर्ड का इस्तेमाल करके विपक्ष एक शानदार तैयारी कर सकता था। लेकिन यह चर्चा दो दिन बाद गैरजरूरी नहीं हो जाएगी क्योंकि अगली सरकार प्रदेश में जो भी बने, उसका एक विपक्ष तो रहेगा ही, और वह चौकन्ना रहेगा, तो लोकतंत्र बेहतर तरीके से चल सकेगा।
एक दूसरी जरूरत छत्तीसगढ़ में ऐसे जनसंगठनों की लगती है जो कि चुनाव के हिसाब से राज्य की सत्ता, और राज्य के विपक्ष से भी हिसाब मांग सकें, और जनता के मन के मुद्दों को उठा सकें। लोकतंत्र सिर्फ चुनाव, सिर्फ विधानसभा या संसद, सिर्फ घोषणा पत्र नहीं होता है, लोकतंत्र इन सबसे बढ़कर तमाम जनता की जिंदगी तक फैला रहता है, और उसके मुद्दों को अगर राजनीतिक दल ठीक से नहीं उठा पाते, तो देश के और संगठनों को, और लोगों को इस काम में मदद करनी चाहिए। अगर छत्तीसगढ़ या किसी दूसरे प्रदेश का विपक्ष पांच बरस जमकर तैयारी करेगा, तो शायद कोई भी सत्ता लगातार दुबारा जीतकर न आ पाए। (Daily Chhattisgarh)
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