एक वोट, एक नोट की लॉटरी कैसी रहेगी?

संपादकीय
20 नवम्बर 2018


छत्तीसगढ़ की बाकी बहत्तर सीटों पर इस वक्त वोट चल रहा है। लोग ईवीएम की खराबी के बावजूद भी कतारों में डटे हुए हैं, और कहीं स्काउट बच्चे मतदाताओं की मदद कर रहे हैं, तो कहीं सुरक्षाकर्मी। तकरीबन हर इलाके से ऐसी तस्वीरें आ रही हैं कि सौ बरस से ऊपर की महिलाएं किस तरह वोट डालने आ रही हैं। यह बात भी एक दिलचस्प सामाजिक तथ्य दिख रहा है कि ऐसे सौ बरस से अधिक के लोगों में आदमी नहीं दिख रहे हैं, और औरतें ही हैं। ऐसा शायद इसलिए भी है कि हिंदुस्तान में महिला की औसत उम्र आदमी से कुछ बरस अधिक है। वोट बढ़ते हुए दिख रहे हैं, लेकिन अभी कई घंटे बाकी हैं तब जाकर आखिरी आंकड़े सामने आएंगे। पैंसठ से पचहत्तर फीसदी तक मतदान हो सकता है, और कई वोटर बाहर गए हुए भी हो सकते हैं, कुछ मर-खप गए होंगे, कुछ के नाम दो जगहों पर होंगे, और कुछ के जुड़े नहीं होंगे, लेकिन फिर भी कम से कम एक चौथाई ऐसे जिंदा, साबुत, और हिलते-डुलते वोटर ऐसे होंगे जो कि वोट नहीं डालेंगे। ये लोग सोच-समझकर या कि लापरवाही से अपनी इस जिम्मेदारी से दूर रहेंगे, और अपनी गैरमौजूदगी से किसी कम लोकप्रिय के चुन लिए जाने की नौबत भी ला खड़ी करेंगे।
अब ऐसे में सवाल यह उठता है कि मतदान को बढ़ाने के लिए और क्या किया जा सकता है? मीडिया और सोशल मीडिया पर पिछले कई हफ्तों से लगातार मतदान बढ़ाने की कोशिशें चल रही थीं, और उससे अधिक कोई जागरूकता अभियान चल नहीं सकता। ऐसे में दुनिया में कुछ जगहों पर कुछ लोगों का यह भी मानना रहता है कि मतदान को अनिवार्य क्यों न कर दिया जाए? जब नागरिक अपने सारे अधिकार के लिए दावे कर सकते हैं, तो फिर वे वोट डालने की जिम्मेदारी क्यों न निभाएं? लेकिन कुछ दूसरे लोगों का मानना है कि वोट न डालने की भी आजादी होनी चाहिए। ऐसे लोगों को ध्यान में रखते हुए पिछले विधानसभा चुनाव के समय से मशीनों में एक नोटा का विकल्प रखा गया था, जिसका मतलब होता है, नन ऑफ द अबोव, यानी ऊपर दिए गए नामों में से कोई भी नहीं। यह ऐसे वोटरों के लिए रखा गया विकल्प था जो कि सारे ही उम्मीदवारों से नाराज हैं, और सारी ही पार्टियों को खारिज करते हैं, और उनकी नापसंदगी का अंदाज लगाने के लिए नोटा के वोटों कभी गिनती की गई थी। छत्तीसगढ़ में कुछ सीटों पर नोटा पर इतने वोट पड़े थे जितने की जीतने वाले की लीड में भी नहीं थे।
इसलिए अब वोट और बढ़ाने के लिए क्या किया जाए? क्या मतदान पर एक ऐसी लॉटरी रखी जाए जो कि हर विधानसभा क्षेत्र में वोट डालने वाले लोगों में से किसी एक को लखपति बना दे? क्या इससे वोट बढ़ेंगे? क्या इससे जनता का फैसला बेहतर तरीके से सामने आएगा? या फिर ऐसा कोई लालच देना लोकतांत्रिक नहीं होगा? भारत जैसी राजनीतिक-सामाजिक स्थिति में लोगों को कई किस्म के विकल्प और तरीके सोचने चाहिए क्योंकि अभी पिछले चुनाव तक तो नोटा भी नहीं था, और वह पहली बार आया ही। इसी तरह क्यों न एक वोट एक नोट जैसी एक लॉटरी शुरू की जाए, और जिस विधानसभा क्षेत्र में जितने वोट पड़ें, उतने नोट लॉटरी से किसी एक को दिए जाएं? या फिर यह भी हो सकता है कि हर मतदान केंद्र के स्तर पर छोटी रकम की लॉटरी निकाली जाए और लोगों की दिलचस्पी पैदा की जाए। आखिर चुनाव में सरकार से लेकर पार्टियों और उम्मीदवारों तक का बड़ा खर्च तो होता ही है, और ऐसी लॉटरी शायद नाजायज भी न हो। (Daily Chhattisgarh)

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